24-07-14 प्रातः मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन
“मीठे बच्चे - माया रावण के संग में आकर तुम भटक गये, पवित्र पौधे अपवित्र बन गये, अब फिर पवित्र बनो ।“
प्रश्न:-
हर एक बच्चे को अपने ऊपर कौन-सा वन्डर लगता है? बाप को बच्चों पर कौन-सा वन्डर लगता है?उत्तर:-
बच्चों को वन्डर लगता कि हम क्या थे, किसके बच्चे थे, ऐसे बाप का हमें वर्सा मिला था, उस बाप को ही हम भूल गये । रावण आया इतनी फागी आ गई जो रचयिता और रचना सब भूल गया । बाप को बच्चों पर वन्डर लगता, जिन बच्चों को मैंने इतना ऊंच बनाया, राज्य- भाग्य दिया, वही बच्चे मेरी ग्लानि करने लगे । रावण के संग में आकर सब कुछ गँवा दिया ।ओम् शान्ति |
क्या सोच रहे हो? नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार हर एक की जीव आत्मा अब अपने ऊपर वन्डर खा रही है कि हम क्या थे, किसके बच्चे थे और बरोबर बाप से वर्सा मिला था, फिर कैसे हम भूल गये! हम सतोप्रधान दुनिया में सारे विश्व के मालिक थे, बहुत सुखी थे । फिर हम सीढ़ी उतरे । रावण आया गोया इतनी फागी आ गई जो रचता और रचना को हम भूल गये । फागी में मनुष्य रास्ता आदि भूल जाते हैं ना । तो हम भी भूल गये-हमारा घर कहाँ है, कहाँ के रहने वाले थे । अब बाबा देख रहे हैं हमारे बच्चे, जिन्हें हम आज से 5 हजार वर्ष पहले राज्य- भाग्य देकर गये, बड़े आनन्द मौज में थे, यह भूमि फिर क्या हो गई! कैसे रावण के राज्य में आ गये! पराये राज्य में तो जरूर दुःख ही मिलेगा । कितने तुम भटके! अन्धश्रधा में बाप को ढूँढते रहे परन्तु मिले कहाँ । जिसको पत्थर-ठिक्कर में डाल दिया तो मिलेगा फिर कैसे । आधाकल्प तुम भटक- भटक कर जैसे फाँ हो गये । अपने ही अज्ञान के कारण रावण राज्य में तुमने कितना दु :ख उठाया है । भारत भक्ति मार्ग में कितना गरीब बन गया है । बाप बच्चों की तरफ देखते हैं तो ख्याल होता है भक्ति मार्ग में कितना भटके हैं! आधाकल्प भक्ति की है, किसलिए? भगवान् से मिलने लिए । भक्ति के बाद ही भगवान् फल देते हैं । क्या देते हैं? वह तो कोई जानते नहीं, बिल्कुल बुद्धु बन गये हैं । यह सब बातें बुद्धि में आनी चाहिए-हम क्या थे फिर कैसे राज्य- भाग्य करते थे फिर कैसे सीढ़ी नीचे उतरते-उतरते रावण की जंजीरों में बंधते गये । अपरमअपार दुःख थे । पहले-पहले तुम अपरमअपार सुख में थे । तो दिल में आना चाहिए, अपने राज्य में कितना सुख था फिर पराये राज्य में कितना दु :ख उठाया । जैसे वो लोग समझते हैं अंग्रेजों के राज्य में हमने दु :ख उठाया है । अब तुम बैठे हो, अन्दर में यह ख्याल आना चाहिए हम कौन थे, किसके बच्चे थे? बाप ने हमको सारे विश्व का राज्य दिया फिर कैसे हम रावण राज्य में जकड़ गये । कितने दुःख देखे, कितने गन्दे कर्म किये । सृष्टि दिन-प्रतिदिन गिरती ही गई है । मनुष्यों के संस्कार दिन-प्रतिदिन क्रिमिनल होते गये हैं । तो बच्चों को स्मृति में आना चाहिए । बाप देखते हैं यह पवित्र पौधे थे, जिसको राज्य- भाग्य दिया वह फिर मेरे आक्यूपेशन को ही भूल गये । अब फिर तुम तमोप्रधान से सतोप्रधान बनना चाहते हो तो मुझ बाप को याद करो तो सब पाप कट जायें । परन्तु याद भी नहीं कर सकते, घड़ी-घड़ी कहते हैं बाबा हम भूल जाते हैं । अरे, तुम याद नहीं करेंगे तो पाप कैसे कटेंगे? एक तो तुम विकारों में गिर पतित बने और दूसरा फिर बाप को गाली देने लगे । माया के संग में तुम इतना गिर पड़े जो जिसने तुमको आसमान में चढ़ाया उनको ठिक्कर-भित्तर में ले गये । माया के संग में तुमने ऐसा काम किया है! बुद्धि में आना चाहिए ना । एकदम पत्थरबुद्धि तो नहीं बनना चाहिए । बाप रोज़-रोज़ कहते हैं मैं फर्स्टक्लास प्वाइंट तुमको सुनाता हूँ ।
जैसे बाम्बे में संगठन हुआ तो उसमें बतला सकते हैं कि बाप कहते हैं-हे भारत-वासियों, तुमको हमने राज्य- भाग्य दिया । तुम देवतायें हेविन में थे फिर तुम रावण राज्य में कैसे आये, यह भी ड्रामा में पार्ट है । तुम रचता और रचना के आदि-मध्य- अन्त को समझो तब ऊँच पद पा सको । और मेरे को याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश हो । यहाँ भल सब बैठे हैं फिर भी किसकी बुद्धि कहाँ, किसकी बुद्धि कहाँ है । बुद्धि में आना चाहिए - हम कहाँ थे, अब हम पराये रावण राज्य में आकर पड़े हैं, तो कितने दु :खी हुए हैं । हम शिवालय में तो बहुत सुखी थे । अब बाप आये हैं वेश्यालय से निकालने, तो भी निकलते ही नहीं । बाप कहते हैं तुम शिवालय चलेंगे फिर वहाँ यह विष नहीं मिलेगा । यहाँ का गन्दा खान-पान नहीं मिलेगा । यह तो विश्व के मालिक थे ना । फिर यह कहाँ गये? फिर से अपना राज्य- भाग्य ले रहे हैं । कितना सहज है । यह तो बाप समझाते हैं, सब सर्विसएबुल नहीं होंगे । नम्बरवार राजधानी स्थापन करनी है, जैसे 5 हजार वर्ष पहले की थी । सतोप्रधान बनना है, बाप कहते हैं यह है तमोप्रधान पुरानी दुनिया । एक्यूरेट पुरानी जब होगी तब तो बाप आयेंगे ना । बाप बिगर तो कोई समझा न सके । भगवान् इस रथ द्वारा हमको पढ़ा रहे हैं, यह याद रहे तो भी बुद्धि में ज्ञान हो । फिर औरों को बताकर आपसमान भी बनाये । बाप समझाते हैं पहले तो तुम्हारे क्रिमिनल कैरेक्टर्स थे, जो मुश्किल सुधरते हैं । आँखों की क्रिमिनलिटी निकलती नहीं है । एक तो काम की क्रिमिनलिटी वह मुश्किल छूटती है फिर साथ में 5 विकार हैं । क्रोध की क्रिमिनलिटी भी कितनी है । बैठे-बैठे भूत आ जाता है । यह भी क्रिमिनलिटी हुई । सिविलाइज्ड तो हुए नहीं । नतीजा क्या होगा! सौ गुणा पाप चढ़ जायेगा । घड़ी-घड़ी क्रोध करते रहेंगे । बाप समझाते हैं तुम अभी रावण राज्य में तो नहीं हो ना । तुम तो ईश्वर के पास बैठे हुए हो । तो इन विकारों से छूटने की प्रतिज्ञा करनी है । बाप कहते हैं अब मुझे याद करो । क्रोध मत करो । 5 विकार तुमको आधाकल्प गिराते आये हैं । सबसे ऊंच भी तुम थे । सबसे जास्ती गिरे भी तुम हो । इन 5 भूतों ने तुमको गिराया है । अब शिवालय में जाने के लिए इन विकारों को निकालना है । इस वेश्यालय से दिल हटाते रहो । बाप को याद करो तो अन्त मती सो गति हो जायेगी । तुम घर में पहुँच जायेंगे और कोई यह रास्ता बता नहीं सकते । भगवानुवाच, मैंने तो कभी भी कहा नहीं है कि मैं सर्वव्यापी हूँ । मैंने तो राजयोग सिखाया और कहा तुमको विश्व का मालिक बनाता हूँ फिर वहाँ तो इस नॉलेज की दरकार ही नहीं रहती । मनुष्य से देवता बन जाते हैं, तुम वर्सा पा लेते हो । इसमें हठयोग आदि की बात नहीं । अपने को आत्मा समझो, अपने को शरीर क्यों समझते हो । शरीर समझने से फिर ज्ञान उठा नहीं सकते । यह भी भावी । तुम समझते हो हम रावणराज्य में थे, अब रामराज्य में जाने के लिए पुरूषार्थ कर रहे हैं । अभी हम पुरूषोत्तम संगमयुग वासी हैं ।
भल गृहस्थ में रहो । इतने सब यहाँ कहाँ रहेंगे । ब्राह्मण बनकर सब यहाँ ब्रह्मा के पास भी नहीं रह सकते हैं । रहना भी अपने घर में है और बुद्धि से समझना है - हम शूद्र नहीं, हम ब्राह्मण हैं । ब्राह्मणों की चोटी कितनी छोटी है । तो गृहस्थ में रहते, शरीर निर्वाह लिए धन्धा आदि करते सिर्फ बाप को याद करो । हम क्या थे, अब हम पराये राज्य में बैठे हैं । कितना हम दु :खी थे । अब बाबा हमको फिर ले जाते हैं तो गृहस्थ व्यवहार में रहते वह अवस्था जमानी है । शुरू में कितने बड़े-बड़े झाड़ आये, फिर उनसे कोई रहे, बाकी चले गये । तुम्हारी बुद्धि में है हम अपने राज्य में थे फिर अभी कहाँ आकर पड़े हैं । फिर अपने राज्य में जाते हैं । तुम लिखते हो, कहते हो बाबा फलाना बहुत अच्छा रेग्युलर था फिर आते नहीं । नहीं आते हैं तो गोया विकार में गिरे । फिर ज्ञान की धारणा हो न सके । उन्नति के बदले गिरते-गिरते पाई पैसे का पद पा लेंगे । कहाँ राजा, कहाँ नीच पद! भल सुख तो वहाँ है ही परन्तु पुरूषार्थ किया जाता है ऊंच पद पाने का । बड़ा मर्तबा कौन पा सकते हैं? यह तो सभी समझ सकते हैं, अभी सब पुरूषार्थ कर रहे हैं । किंग महेन्द्र (भोपाल के) भी पुरूषार्थ कर रहा है । वह किंग तो पाई पैसे के हैं, यह तो सूर्यवंशी राजधानी में जाने वाला है । पुरूषार्थ ऐसा हो जो विजय माला में जा सकें । बाप बच्चों को समझाते हैं- अपने दिल में जांच करते रहना है - हमारी आँखें कहाँ क्रिमिनल तो नहीं होती हैं? अगर सिविलाइज़ हो जाए तो बाकी क्या चाहिए । भल विकार में नहीं जायेंगे परन्तु कुछ न कुछ आँखें धोखा देती रहती हैं । नम्बरवन है काम, क्रिमिनल आई बड़ी खराब है इसलिए नाम ही है क्रिमिनल- आइज्ड, सिविल- आइज्ड । बेहद का बाप बच्चों को जानते तो हैं ना-यह क्या कर्म करते हैं, कितनी सर्विस करते हैं? फलाने की क्रिमिनल- आइज अभी तक गई नहीं है, अभी तक ऐसे गुप्त समाचार आते हैं । आगे चल और भी एक्यूरेट लिखेंगे । खुद भी फील करेंगे हम तो इतना समय झूठ बोलते, गिरते आये हैं । ज्ञान पूरा बुद्धि में बैठा नहीं था । यही कारण था जो हमारी अवस्था नहीं बनी । बाप से हम छिपाते थे । ऐसे बहुत छिपाते हैं । सर्जन से 5 विकारों की बीमारी छिपानी नहीं है, सच बताना चाहिए-हमारी बुद्धि इस तरफ जाती है, शिवबाबा तरफ नहीं जाती । बताते नहीं हैं तो वह वृद्धि को पाती रहती है । अब बाप समझाते हैं-बच्चे, देही- अभिमानी बनो, अपने को आत्मा समझो । आत्मा भाई- भाई है । तुम कितने सुखी थे जब पूज्य थे । अब तुम पुजारी दु :खी बन पड़े हो । तुमको क्या हो गया! सब कहते हैं यह गृहस्थ आश्रम तो परमपरा से चला आया है । क्या राम-सीता को बच्चे नहीं थे! लेकिन वहाँ विकार से बच्चे नहीं होते । अरे, वह तो है ही सम्पूर्ण निर्विकारी दुनिया । वहाँ भ्रष्टाचार से पैदाइस नहीं होती, विकार नहीं था । वहाँ यह रावण राज्य होता ही नहीं, वह तो राम राज्य है । वहाँ रावण कहाँ से आया । मनुष्यों की बुद्धि बिल्कुल चट खाते में हैं । किसने की? मैंने तुमको सतोप्रधान बनाया था, तुम्हारा बेड़ा पार किया था फिर तुमको तमोप्रधान किसने बनाया? रावण ने । यह भी तुम भूल गये हो । कहते हैं यह तो परम्परा से चला आता है, अरे, परम्परा कब से? कोई हिसाब तो बताओ । कुछ भी समझते नहीं । बाप समझाते हैं-तुमको कितना राज्य- भाग्य देकर गये । तुम भारतवासी बहुत ही खुशी में थे, और कोई था ही नहीं । क्रिस्चियन भी कहते हैं पैराडाइज था, चित्र भी देवताओं के हैं, उनसे कोई पुरानी चीज़ तो है नहीं । पुराने ते पुराने यह लक्ष्मी-नारायण होंगे या इन्हों की कोई वस्तु होगी । सबसे पुराने ते पुराना है श्रीकृष्ण । नये से नया भी श्रीकृष्ण था । पुराना क्यों कहते? क्योंकि पास्ट हो गया ना । तुम ही गोरे थे फिर सांवरे बने । सांवरे कृष्ण को भी देखकर बड़ा खुश होते हैं । झूले में भी सांवरे को झुलायेगे । उनको क्या पता कि गोरा कब था । कृष्ण को कितना प्यार करते हैं! राधे ने क्या किया?
बाप कहते हैं तुम यहाँ सत के संग में बैठे हो, बाहर कुसंग में जाने से फिर भूल जाते हो । माया बड़ी प्रबल है, गज को ग्राह हप कर लेते हैं । ऐसे भी हैं - अभी भागे कि भागे । थोड़ा भी अपना अहंकार आने से और ही सत्यानाश कर लेते हैं । बेहद का बाप तो समझाते रहेंगे । इसमें फंक नहीं होना चाहिए । बाबा ने ऐसे क्यों कहा, हमारी इज्जत गई! अरे इज्जत तो रावण राज्य में चट हो ही गई है । देह- अभिमान में आने से अपना ही नुकसान कर देंगे । पद भ्रष्ट हो पड़ेगा । क्रोध, लोभ भी क्रिमिनल आई है । आँखों से चीज देखते हैं, तब तो लोभ होता है ।
बाप आकर अपना बगीचा देखते हैं किस-किस किस्म के फूल हैं । यहाँ से जाकर फिर उस बगीचे में फूलों को देखते हैं । शिवबाबा को फूल भी बरोबर चढ़ाते हैं । वह तो है निराकार, चैतन्य फूल । तुम अभी पुरूषार्थ कर ऐसा फूल बनते हो । बाबा कहते हैं-मीठे-मीठे बच्चों, जो कुछ बीता, उसको ड्रामा समझो । सोचो नहीं । कितनी मेहनत करते हैं, होता तो कुछ नहीं, ठहरता नहीं । अरे, प्रजा भी तो चाहिए ना । थोड़ा भी सुना तो वह प्रजा हो गई । प्रजा तो ढेर बननी है । ज्ञान कभी विनाश को नहीं पाता है । एक बार सुना-शिवबाबा है, तो भी बस, प्रजा में आ जायेंगे । अन्दर में तुम्हें यह स्मृति आनी चाहिए हम जिस राज्य में थे, वह फिर से अब पा रहे हैं । उसके लिए पूरा पुरूषार्थ करना चाहिए । बिल्कुल एक्यूरेट सर्विस चल रही है । अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग । रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते ।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1. शिवालय में जाने के लिए इन विकारों को निकालना है । इस वेश्यालय से दिल हटाते जाना है । शूद्रों के संग से किनारा कर लेना है ।
2. जो कुछ बीता उसे ड्रामा समझ कोई भी विचार नहीं करना है । अहंकार में कभी नहीं आना है । कभी शिक्षा मिलने पर फंक नहीं होना है ।
वरदान:-
कर्म और योग के बैलेन्स द्वारा ब्लैसिंग का अनुभव करने वाले कर्मयोगी भव !
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कर्मयोगी अर्थात् हर कर्म योगयुक्त हो । कर्मयोगी आत्मा सदा ही कर्म और योग का साथ अर्थात् बैलेन्स रखने वाली होगी । कर्म और योग का बैलेन्स होने से हर कर्म में बाप द्वारा तो ब्लैसिंग मिलती ही है लेकिन जिसके भी सम्बन्ध-सम्पर्क में आते हैं उनसे भी दुआयें मिलती हैं । कोई अच्छा काम करता है तो दिल से उसके लिए दुआयें निकलती हैं कि बहुत अच्छा है । बहुत अच्छा मानना ही दुआयें हैं ।
स्लोगन:-
सेकेण्ड में संकल्पों को स्टॉप करने का अभ्यास ही कर्मातीत अवस्था के समीप लायेगा ।
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ओम् शान्ति |
25-07-14 प्रातः मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन
"मीठे बच्चे - देह- अभिमान आसुरी कैरेक्टर है, उसे बदल दैवी कैरेक्टर्स धारण करो तो रावण की जेल से छूट जायेंगे"
प्रश्न:-
हर एक आत्मा अपने पाप कर्मों की सजा कैसे भोगती है, उससे बचने का साधन क्या है?उत्तर:-
हर एक अपने पापों की सजा एक तो गर्भ जेल में भोगते हैं, दूसरा रावण की जेल में अनेक प्रकार के दु:ख उठाते हैं । बाबा आया है तुम बच्चों को इन जेलों से छुड़ाने । इनसे बचने के लिए सिविलाइज्ड बनो ।
ओम् शान्ति |
ड्रामा के प्लैन अनुसार बाप बैठ समझाते हैं । बाप ही आकर रावण की जेल से छुड़ाते हैं क्योंकि सब क्रिमिनल, पाप आत्मायें हैं । सारी दुनिया के मनुष्य मात्र क्रिमिनल होने के कारण रावण की जेल में हैं । फिर जब शरीर छोड़ते हैं तो भी गर्भ जेल में जाते हैं । बाप आकर दोनों जेल से छुड़ाते हैं फिर तुम आधाकल्प रावण की जेल में भी नहीं और गर्भ जेल में भी नहीं जायेंगे । तुम जानते हो बाप धीरे- धीरे पुरुषार्थ अनुसार हमें रावण की जेल से और गर्भ जेल से छुड़ाते रहते हैं । बाप बताते हैं तुम सब क्रिमिनल हो रावण राज्य में । फिर राम राज्य में सब सिविलाइज्ड होते हैं । कोई भी भूत की प्रवेशता नहीं होती है । देह का अहंकार आने से ही फिर और भूतों की प्रवेशता होती है । अब तुम बच्चों को पुरुषार्थ कर देही- अभिमानी बनना है । जब ऐसे (लक्ष्मी-नारायण) बन जायेंगे तब ही देवता कहलायेंगे । अभी तो तुम ब्राह्मण कहलाते हो । रावण की जेल से छुड़ाने लिए बाप आकर पढ़ाते भी हैं और जो सबके कैरेक्टर्स बिगड़े हुए हैं वह सुधारते भी हैं । आधाकल्प से कैरेक्टर्स बिगड़ते-बिगड़ते बहुत बिगड़ गये है । इस समय है तमोप्रधान कैरेक्टर्स । दैवी और आसुरी कैरेक्टर्स में बरोबर रात-दिन का फर्क है । बाप समझाते हैं अब पुरुषार्थ कर अपना दैवी कैरेक्टर्स बनाना है, तब ही आसुरी कैरेक्टर्स से छूटते जायेंगे । आसुरी कैरेक्टर्स में देह- अभिमान है नम्बरवन । देही- अभिमानी के कैरेक्टर्स कभी बिगड़ते नहीं हैं । सारा मदार कैरेक्टर्स पर है । देवताओं का कैरेक्टर कैसे बिगड़ता है । जब वे वाम मार्ग में जाते हैं अर्थात्( विकारी बनते हैं तब कैरेक्टर्स बिगड़ते हैं । जगन्नाथ के मन्दिर में ऐसे चित्र दिखाये हैं वाम मार्ग के । यह तो बहुत वर्षों का पुराना मन्दिर है, ड्रेस आदि देवताओं की ही है । दिखाते हैं देवता वाम मार्ग में कैसे जाते हैं । पहली-पहली क्रिमिनलिटी है ही यह । काम चिता पर चढ़ते हैं, फिर रंग बदलते-बदलते बिल्कुल काले हो जाते हैं ।
पहले-पहले गोल्डन एज़ में हैं सम्पूर्ण गोरे, फिर दो कला कम हो जाती हैं । त्रेता को स्वर्ग नहीं कहेंगे, वह है सेमी स्वर्ग । बाप ने समझाया है रावण के आने से ही तुम्हारे ऊपर कट चढ़ना शुरू हुई है । पूरे क्रिमिनल अन्त में बनते हो । अभी 100 परसेन्ट क्रिमिनल कहेंगे । 100 परसेन्ट वाइसलेस थे फिर 100 परसेन्ट विशश बने । अब बाप कहते हैं सुधरते जाओ, यह रावण का जेल बहुत बड़ा है । सबको क्रिमिनल ही कहेंगे क्योंकि रावण के राज्य में हैं ना । राम राज्य और रावण राज्य का तो उनको पता ही नहीं है । अभी तुम पुरुषार्थ कर रहे हो रामराज्य में जाने का । सम्पूर्ण तो कोई बना नहीं है । कोई फर्स्ट, कोई सेकण्ड, कोई थर्ड में है । अब बाप पढ़ाते हैं, दैवीगुण धारण कराते हैं । देह- अभिमान तो सबमें है । जितना-जितना तुम सर्विस में लगे रहेंगे उतना देह- अभिमान कम होता जायेगा । सर्विस करने से ही देह- अभिमान कम होगा । देही- अभिमानी बड़ी-बड़ी सर्विस करेंगे । बाबा देही- अभिमानी है तो कितनी अच्छी सर्विस करते हैं । सभी को क्रिमिनल रावण की जेल से छुड़ाए सद्गति प्राप्त करा देते हैं, वहाँ फिर दोनों जेल नहीं होगी । यहाँ डबल जेल है, सतयुग में न कोर्ट है, न पाप आत्मायें हैं, न तो रावण की जेल ही है । रावण की है बेहद की जेल । सभी 5 विकारों की रस्सियों में बंधे हुए हैं । अपरमअपार दुःख हैं । दिन-प्रतिदिन दु :ख वृद्धि को पाता रहता है । सतयुग को कहा जाता है गोल्डन एज, त्रेता को सिलवर एज । सतयुग वाला सुख त्रेता में नहीं हो सकता क्योंकि आत्मा की दो कला कम हो जाती है । आत्मा की कला कम होने से शरीर भी ऐसे हो जाते हैं, तो यह समझना चाहिए कि बरोबर हम रावण के राज्य में देह- अभिमानी बन पड़े हैं । अब बाप आया है रावण की जेल से छुड़ाने के लिए । आधाकल्प का देह- अभिमान निकलने में देरी तो लगती है । बहुत मेहनत करनी पड़ती है । जल्दी में जो शरीर छोड़ गये वह फिर भी बड़े होकर आए कुछ ज्ञान उठा सकते हैं । जितना देरी होती जाती है तो फिर पुरुषार्थ तो कर न सकें । कोई मरे फिर आकर पुरुषार्थ करे सो तो जब आरगन्स बड़े हों, समझदार हों तब कुछ कर भी सकें । देरी से जाने वाले तो कुछ सीख नहीं सकेंगे । जितना सीखे उतना सीखे इसलिए मरने से पहले पुरुषार्थ करना चाहिए, जितना हो सके इस तरफ आने की कोशिश जरूर करेंगे । इस हालत में बहुत आयेंगे । झाड़ वृद्धि को पायेगा । समझानी तो बहुत सहज है । बाम्बे में बाप का परिचय देने के लिए चांस बहुत अच्छा है - यह हम सबका बाप है, बाप से वर्सा तो जरूर स्वर्ग का ही चाहिए । कितना सहज है । दिल अन्दर गद्गद् होना चाहिए, यह हमको पढ़ाने वाला है । यह हमारी एम ऑबजेक्ट है । हम पहले सद्गति में थे फिर दुर्गति में आये अब फिर दुर्गति से सद्गति में जाना है । शिवबाबा कहते हैं मामेकम् याद करो तो तुम्हारे जन्म-जन्मान्तर के पाप कट जायेंगे । तुम बच्चे जानते हो - जब द्वापर में रावण राज्य होता है तो 5 विकार रूपी रावण सर्वव्यापी हो जाता है । जहाँ विकार सर्वव्यापी है वहाँ बाप सर्वव्यापी कैसे हो सकता है । सभी मनुष्य पाप आत्मायें हैं ना । बाप सम्मुख है तब तो ऐसे कहते हैं कि मैंने कहा ही नहीं है, उल्टा समझ गये हैं । उल्टा समझते, विकारों में गिरते-गिरते, गालियां देते-देते भारत का यह हाल हुआ है । क्रिस्चियन लोग भी जानते हैं कि 5 हजार वर्ष पहले भारत स्वर्ग था, सभी सतोप्रधान थे । भारतवासी तो लाखों वर्ष कह देते हैं क्योंकि तमोप्रधान बुद्धि बन पड़े है । वह फिर न इतना ऊंच बने, न इतना नींच बने हैं । वह तो समझते हैं बरोबर स्वर्ग था । बाप कहते हैं यह ठीक कहते हैं- 5 हजार वर्ष पहले भी मैं तुम बच्चों को रावण की जेल से छुड़ाने आया था, अब फिर छुड़ाने आया हूँ । आधाकल्प है राम राज्य, आधाकल्प है रावण राज्य । बच्चों को चांस मिलता है तो समझाना चाहिए ।
बाबा भी तुम बच्चों को समझाते हैं - बच्चे, ऐसे-ऐसे समझाओ । इतने अपरमअपार दुःख क्यों हुए हैं? पहले तो अपरमअपार सुख थे जब इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था । यह सर्वगुण सम्पन्न थे, अब यह नॉलेज है ही नर से नारायण बनने की । पढ़ाई है, इनसे दैवी कैरेक्टर्स बनते हैं । इस समय रावण के राज्य में सभी के कैरेक्टर्स बिगड़े हुए हैं । सबके कैरेक्टर्स सुधारने वाला तो एक ही राम है । इस समय कितने धर्म हैं, मनुष्यों की कितनी वृद्धि होती रहती है, ऐसे ही वृद्धि होती रहेगी तो फिर खाना भी कहाँ से मिलेगा! सतयुग में तो ऐसी बातें होती नहीं हैं । वहाँ दुःख की कोई बात ही नहीं । यह कलियुग है दुःखधाम, सब विकारी हैं । वह है सुखधाम, सभी सम्पूर्ण निर्विकारी हैं । घड़ी-घड़ी उन्हों को यह बतलाना चाहिए तो कुछ समझ जाएं । बाप कहते हैं मैं पतित-पावन हूँ, मुझे याद करने से तुम्हारे जन्म-जन्मान्तर के पाप कट जायेंगे । अब बाप कैसे कहेंगे! जरूर शरीर धारण कर बोलेंगे ना । पतित-पावन सर्व का सद्गति दाता एक बाप है, जरूर वह किसी रथ में आया होगा । बाप कहते हैं मैं इस रथ में आता हूँ, जो अपने जन्मों को नहीं जानते हैं । बाप समझाते हैं यह 84 जन्मों का खेल है, जो पहले- पहले आये होंगे वही आयेंगे, उनके ही बहुत जन्म होंगे फिर कम होते जायेंगे । सबसे पहले देवताये आये । बाबा बच्चों को भाषण करना सिखलाते हैं-ऐसे-ऐसे समझाना चाहिए । अच्छी रीति याद में रहेंगे, देह- अभिमान नहीं होगा तो भाषण अच्छा करेंगे । शिवबाबा देही- अभिमानी है ना । कहते रहते हैं-बच्चे, देही- अभिमानी भव । कोई विकार न रहे, अन्दर में कोई शैतानी न रहे । तुम्हें किसको भी दु :ख नहीं देना है, किसकी निंदा नहीं करनी है । तुम बच्चों को कभी भी सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास नहीं करना चाहिए । बाप से पूछो-यह ऐसे कहते हैं, क्या सत्य है? बाबा बता देंगे । नहीं तो बहुत हैं जो झूठी बातें बनाने में देरी नहीं करते हैं-फलाने ने तुम्हारे लिए ऐसे-ऐसे कहा, सुनाकर उनको ही खाक कर देंगे । बाबा जानते हैं, ऐसे बहुत होता है । उल्टी-सुल्टी बातें सुनाकर दिल को खराब कर देते हैं इसलिए कभी भी झूठी बातें सुनकर अन्दर में जलना नहीं चाहिए । पूछो फलाने ने मेरे लिए ऐसे कहा है? अन्दर सफाई होनी चाहिए । कई बच्चे सुनी-सुनाई बातों पर भी आपस में दुश्मनी रख देते हैं । बाप मिला है तो बाप से पूछना चाहिए ना । ब्रह्मा बाबा पर भी बहुतों को विश्वास नहीं होता है । शिवबाबा को भी भूल जाते हैं । बाप तो आये हैं सबको ऊंच बनाने । प्यार से उठाते रहते हैं । ईश्वरीय मत लेनी चाहिए । निश्चय ही नहीं होगा तो पूछेंगे ही नहीं तो रेसपान्ड भी नहीं मिलेगा । बाप जो समझाते हैं उसको धारण करना चाहिए ।
तुम बच्चे श्रीमत पर विश्व में शान्ति स्थापन करने के निमित्त बने हो । एक बाप के सिवाए और कोई की मत ऊँच ते ऊँच हो नहीं सकती । ऊँच ते ऊँच मत है ही भगवान् की । जिससे मर्तबा भी कितना ऊँचा मिलता है । बाप कहते हैं अपना कल्याण कर ऊँच पद पाओ, महारथी बनो । पढ़ेंगे ही नहीं तो क्या पद पायेंगे । यह है कल्प-कल्पान्तर की बात । सतयुग में दास- दासियां भी नम्बरवार होते हैं । बाप तो आये है ऊँच बनाने परन्तु पढ़ते ही नहीं हैं तो क्या पद पायेंगे । प्रजा में भी तो ऊँच-नीच पद होते हैं ना, यह बुद्धि से समझना है । मनुष्यों को पता नहीं पड़ता है कि हम कहाँ जाते हैं । ऊपर जाते हैं या नीचे उतरते जाते हैं । बाप आकर तुम बच्चों को समझाते हैं कहाँ तुम गोल्डन, सिलवर एज में थे, कहाँ आइरन एज में आये हो । इस समय तो मनुष्य, मनुष्य को खा लेते हैं । अब यह सभी बातें जब समझें तब कहें कि ज्ञान किसको कहा जाता है । कई बच्चे एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देते हैं । अच्छे- अच्छे सेंटर्स के अच्छे- अच्छे बच्चों की क्रिमिनल आई रहती है । फायदा, नुकसान, इज्जत की परवाह थोड़ेही रखते हैं । मूल बात है ही क्रिमिनल आई की । बाप समझाते हैं काम महाशत्रु है, इनको जीतने के लिए कितना माथा मारते हैं । मूल बात है ही पवित्रता की । इस पर ही कितने झगड़े होते हैं । बाप कहते हैं यह काम महाशत्रु है, इन पर जीत पहनो तब ही जगत जीत बनेंगे । देवतायें सम्पूर्ण निर्विकारी हैं ना । आगे चल समझ ही जायेंगे । स्थापना हो ही जायेगी । अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग । रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते ।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1. कभी भी सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करके अपनी स्थिति खराब नहीं करनी है । अन्दर में सफाई रखनी है । झूठी बातें सुनकर अन्दर में जलना नहीं है, ईश्वरीय मत ले लेनी है ।
2. देही- अभिमानी बनने का पूरा पुरुषार्थ करना है, किसी की भी निंदा नहीं करनी है । फायदा, नुकसान और इज्जत को ध्यान में रखते हुए क्रिमिनल आई को खत्म करना है । बाप जो सुनाते हैं उसे एक कान से सुनकर दूसरे से निकालना नहीं है ।
वरदान:-
श्रेष्ठ स्मृति द्वारा श्रेष्ठ स्थिति और श्रेष्ठ वायुमण्डल बनाने वाले सर्व के सहयोगी भव !
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योग का अर्थ है श्रेष्ठ स्मृति में रहना । मैं श्रेष्ठ आत्मा श्रेष्ठ बाप की सन्तान हूँ, जब ऐसी स्मृति रहती है तो स्थिति श्रेष्ठ हो जाती है । श्रेष्ठ स्थिति से श्रेष्ठ वायुमण्डल स्वत: बनता है जो अनेक आत्माओं को अपनी ओर आकर्षित करता है । जहाँ भी आप आत्मायें योग में रहकर कर्म करती हो वहाँ का वातावरण, वायुमण्डल औरों को भी सहयोग देता है । ऐसी सहयोगी आत्मायें बाप को और विश्व को प्रिय हो जाती हैं ।
स्लोगन:-
अचल स्थिति के आसन पर बैठने से ही राज्य का सिंहासन मिलेगा ।
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ओम् शान्ति |
26-07-14 प्रातः मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन
"मीठे बच्चे - ड्रामा की यथार्थ नॉलेज से ही तुम अचल, अडोल और एकरस रह सकते हो, माया के तूफान तुम्हें हिला नहीं सकते"
प्रश्न:-
देवताओं का मुख्य एक कौन-सा गुण तुम बच्चों में सदा दिखाई देना चाहिए?
उत्तर:-
हर्षित रहना । देवताओं को सदा मुस्कराते हुए हर्षित दिखाते हैं । ऐसे तुम बच्चों को भी सदा हर्षित रहना है, कोई भी बात हो, मुस्कराते रहो । कभी भी उदासी या गुस्सा नहीं आना चाहिए । जैसे बाप तुम्हें राइट और रांग की समझानी देते हैं, कभी गुस्सा नहीं करते, उदास नहीं होते, ऐसे तुम बच्चों को भी उदास नहीं होना है ।
ओम् शान्ति |
बेहद के बच्चों को बेहद का बाप समझाते हैं । लौकिक बाप तो ऐसे नहीं कहेंगे । उनके तो करके 5 - 7 बच्चे होंगे । यह तो जो सभी आत्मायें हैं, आपस में ब्रदर्स हैं । उन सबका जरूर बाप होगा । कहते भी हैं हम सब भाई- भाई हैं । सबके लिए कहते हैं । जो भी आयेंगे, उनके लिए कहेंगे हम भाई- भाई हैं । ड्रामा में तो सभी बांधें हुए हैं, जिसको कोई नहीं जानते । यह न जानना भी ड्रामा में नूँध है । जो बाप ही आकर सुनाते हैं, कथायें आदि जब बैठ सुनाते हैं तो कहते हैं-परमपिता परमात्माए नम : । अब वह कौन है-यह जानते नहीं । कहते हैं ब्रह्मा देवता, विष्णु देवता, शंकर देवता परन्तु समझ से नहीं कहते हैं । ब्रह्मा को वास्तव में देवता नहीं कहेंगे । देवता विष्णु को कहा जाता है । ब्रह्मा का किसको भी पता नहीं है । विष्णु देवता ठीक है, शंकर का तो कुछ भी पार्ट है नहीं । उनकी बॉयोग्राफी नहीं है, शिवबाबा की तो बायोग्राफी है । वह आते ही हैं पतितों को पावन बनाने, नई दुनिया स्थापन करने । अभी एक आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना और सब धर्मों का विनाश होता है । सभी कहाँ जाते हैं? शान्तिधाम । शरीर तो सबके विनाश होने हैं । नई दुनिया में होंगे ही सिर्फ तुम । जो भी मुख्य धर्म हैं, उनको तुम जानते हो । सबके तो नाम ले नहीं सकेंगे । छोटी-छोटी टाल-टालियां तो बहुत हैं । पहले-पहले है डिटीज्म फिर इस्लामी । यह बातें सिवाए तुम बच्चों के और कोई की बुद्धि में नहीं हैं । अभी वह आदि सनातन देवी-देवता धर्म प्राय:लोप है इसलिए बनेन ट्री का मिसाल देते हैं । सारा झाड़ खडा है । फाउन्डेशन है नहीं । सबसे बड़ी आयु इस बनन ट्री की होती है । तो इसमें सबसे बड़ी आयु है आदि सनातन देवी-देवता धर्म की । वह जब प्राय: लोप हो तब तो बाप आकर कहे कि अभी एक धर्म की स्थापना और अनेक धर्मों का विनाश होना है, इसलिए त्रिमूर्ति भी बनाया है । परन्तु अर्थ नहीं समझते हैं । तुम बच्चे जानते हो ऊंच ते ऊंच भगवान् है फिर ब्रह्मा-विष्णु-शंकर, फिर सृष्टि पर आते हैं तो देवी-देवताओं के सिवाए और कोई धर्म है नहीं । भक्ति मार्ग की भी ड्रामा में नूंध है । पहले शिव की भक्ति करते फिर देवताओं की । भारत की ही तो बात है । बाकी तो समझते हैं हमारा धर्म, मठ, पंथ कब स्थापन होता है । जैसे आर्य लोग कहते हैं हम बहुत पुराने हैं । वास्तव में सबसे पुराना तो है ही आदि सनातन देवी-देवता धर्म । तुम जब झाड़ पर समझाते हो तो खुद भी समझ लेंगे कि हमारा धर्म फलाने समय पर आयेगा । सबको जो अनादि अविनाशी पार्ट मिला हुआ है सो बजाना है, इसमें कोई का दोष वा भूल नहीं कह सकते हैं । यह तो सिर्फ समझाया जाता है पाप आत्मा क्यों बने हैं । मनुष्य कहेंगे हम बेहद के बाप के सब बच्चे हैं, फिर सब ब्रदर्स सतयुग में क्यों नहीं हैं? परन्तु ड्रामा में पार्ट ही नहीं है । यह अनादि ड्रामा बना हुआ है, इसमें निश्चय रखो, और कोई बात बोलो नहीं । चक्र भी दिखाया है-कैसे यह फिरता है । कल्प वृक्ष का भी चित्र है । परन्तु यह कोई जानते नहीं कि इनकी आयु कितनी है । बाप कोई की निंदा नहीं करते हैं । यह तो समझाया जाता है, तुमको भी समझाते हैं तुम कितने पावन थे, अभी पतित बने हो तो पुकारते हो-हे पतित- पावन आओ । पहले तो तुम सबको पावन बनना है । फिर नम्बरवार पार्ट बजाने आना है । आत्मायें सब ऊपर में रहती हैं । बाप भी ऊपर में रहते हैं, फिर उनको बुलाते हैं कि आओ । ऐसे वह बुलाने से आते नहीं हैं । बाप कहते हैं मेरा भी ड्रामा में पार्ट नूँधा हुआ है । जैसे हद के ड्रामा में भी बड़े-बड़े मुख्य एक्टर्स का पार्ट होता है, यह फिर है बेहद का ड्रामा । सब ड्रामा के बधन में बांधे हुए हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि धागे में बांधे हुए हो । नहीं । यह बाप समझाते हैं । वह है जड़ झाड़ । अगर बीज चैतन्य होता तो उसको मालूम होता ना कि यह कैसे झाड़ बड़ा हो फिर फल देंगे । यह तो है चैतन्य बीज इस मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ का, इसको उल्टा झाड़ कहा जाता है । बाप तो है नॉलेजफुल, उनको सारे झाड़ की नॉलज है । यह है वही गीता की नॉलेज । कोई नई बात नहीं है । यहाँ बाबा कोई श्लोक आदि नहीं उच्चारते हैं । वो लोग ग्रंथ पढ़कर फिर अर्थ बैठ समझाते हैं । बाप समझाते हैं यह है पढ़ाई, इसमें श्लोक आदि की दरकार नहीं । उन शास्त्रों की पढ़ाई में कोई एम- ऑबजेक्ट है नहीं । कहते भी हैं ज्ञान, भक्ति, वैराग्य । यह पुरानी दुनिया विनाश होती है । सन्यासियों का है हद का वैराग्य, तुम्हारा है बेहद का वैराग्य । शंकराचार्य आते हैं तब वह बैठ सिखलाते हैं घर बार से वैराग्य । वह भी शुरू में शास्त्र आदि नहीं सिखाते । जब बहुत वृद्धि होती जाती है तब शास्त्र बनाने शुरू करते हैं । पहले-पहले तो धर्म स्थापन करने वाला एक ही होता है फिर आहिस्ते- आहिस्ते वृद्धि को पाते हैं । यह भी समझना है । सृष्टि में पहले-पहले कौन-सा धर्म था । अभी तो अनेक धर्म हैं । आदि सनातन देवी-देवता धर्म था, जिसको स्वर्ग हेविन कहते हैं । तुम बच्चे रचयिता और रचना को जानने से आस्तिक बन जाते हो । नास्तिकपने का कितना दुःख होता है, निधनके बन पड़ते हैं, आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं । कहते हैं ना तुम आपस में लड़ते रहते हो, तुम्हारा कोई धनी धोणी नहीं है क्या? इस समय सब निधनके बन पड़ते हैं । नई दुनिया में पवित्रता, सुख, शान्ति सब था, अपार सुख थे । यहाँ अपरमअपार दु :ख हैं । वह है सतयुग के, यह है कलियुग के, अभी तुम्हारा है पुरूषोत्तम संगमयुग । यह पुरूषोत्तम संगमयुग एक ही होता है । सतयुग-त्रेता के संगम को पुरूषोत्तम नहीं कहेंगे । यहाँ हैं असुर, वहाँ हैं देवतायें । तुम जानते हो यह रावण राज्य है । रावण के ऊपर गधे का शीश दिखाते हैं । गधे को कितना भी साफ कर उस पर कपड़े रखो, गधा फिर भी मिट्टी में लेटकर कपड़े खराब कर देगा । बाप तुम्हारे कपड़े साफ गुल-गुल बनाते हैं, फिर रावण राज्य में कर, लिथड़ अपवित्र बन जाते हो । आत्मा और शरीर दोनों अपवित्र बन जाते हैं । बाप कहते हैं तुमने सारा श्रृंगार गँवा दिया । बाप को पतित-पावन कहते हैं, तुम भरी सभा में कह सकते हो कि हम गोल्डन एज में कितने श्रृंगारे हुए थे, कितना फर्स्टक्लास राज्य- भाग्य था । फिर माया रूपी धूल में लिथड़ कर मैंले हो गये ।
बाप कहते हैं यह अन्धेरी नगरी है । भगवान् को सर्वव्यापी कह दिया है, जो कुछ हुआ वह हूबहू रिपीट होगा, इसमें मूँझने की दरकार नहीं है । 5 हजार वर्ष में कितने मिनट, घण्टे, सेकण्ड हैं, एक बच्चे ने सब धर्म वालों का हिसाब निकालकर भेजा था, इसमें भी बुद्धि व्यर्थ की होगी । बाबा तो ऐसे ही समझाते हैं कि दुनिया कैसे चलती है । प्रजापिता ब्रह्मा है ग्रेट-ग्रेट ग्रैण्ड फादर । उनका आक्यूपेशन कोई नहीं जानते । विराट रूप बनाया है तो प्रजापिता ब्रह्मा को भी उड़ा दिया है । बाप और ब्राह्मणों को यथार्थ रीति जानते नहीं हैं । उनको कहते भी हैं आदि देव । बाप समझाते हैं मैं इस झाड़ का चैतन्य बीजरूप हूँ । यह उल्टा झाड़ है । बाप जो सत्य है, चैतन्य है, ज्ञान का सागर है, उनकी ही महिमा की जाती है । आत्मा न हो तो चल फिर भी न सकें । गर्भ में भी 5 - 6 मास के बाद आत्मा प्रवेश करती है । यह भी ड्रामा बना हुआ है । फिर आत्मा निकल जाती है तो खलास । आत्मा अविनाशी है, वह पार्ट बजाती है, यह बाप आकर रियलाइज़ कराते हैं । आत्मा इतनी छोटी बिन्दी है, उसमें अविनाशी पार्ट भरा हुआ है । परमपिता भी आत्मा है, उनको ज्ञान का सागर कहा जाता है । वही आत्मा का रियलाइजेशन कराते हैं । वह तो सिर्फ कह देते परमात्मा सर्व शक्तिमान्, हजारों सूर्य से तेजोमय है । परन्तु समझते कुछ नहीं । बाप कहते हैं यह सब भक्ति मार्ग में वर्णन किया हुआ है और शास्त्रों में लिख दिया है । अर्जुन को साक्षात्कार हुआ तो कहा मैं इतना तेज सहन नहीं कर सकता हूँ, तो वह बात मनुष्यों की बुद्धि में बैठी हुई है । इतना तेजोमय किसके अन्दर प्रवेश करे तो फट जाए । ज्ञान तो नहीं है ना । तो समझते हैं परमात्मा तो हजार सूर्य से तेजोमय है, हमको उनका साक्षात्कार चाहिए । भक्ति की भावना बैठी हुई है तो उनको वह साक्षात्कार भी होता है । शुरू-शुरू में तुम्हारे पास भी ऐसे बहुत साक्षात्कार करते थे, आँखें लाल हो जाती थी । साक्षात्कार किया फिर आज वह कहाँ हैं । वह सभी हैं भक्ति मार्ग की बातें । तो यह सब बाप समझाते हैं, इसमें ग्लानि की कोई बात नहीं है । बच्चों को सदैव हर्षित रहना है । यह तो ड्रामा बना हुआ है । मुझे इतनी गालियां देते हैं, फिर मैं क्या करता हूँ? गुस्सा आता है क्या! समझता हूँ ड्रामा अनुसार यह सब भक्ति मार्ग में फँसे हुए हैं । नाराज होने की बात ही नहीं है । ड्रामा ऐसा बना हुआ है । प्यार से समझानी देनी होती है । बिचारे अज्ञान अन्धेरे में पड़े हैं, नहीं समझते हैं तो तरस भी पड़ता है । सदैव मुस्कराते रहना चाहिए । यह बिचारे स्वर्ग के द्वारे आ नहीं सकेंगे, यह सब शान्तिधाम में जाने वाले हैं । सब चाहते भी शान्ति ही हैं । तो बाप ही रीयल समझाते हैं । अभी तुम जानते हो कि यह खेल बना हुआ है । ड्रामा में हर एक को पार्ट मिला हुआ है, इसमें बडी अचल, स्थेरियम बुद्धि चाहिए । जब तक अचल, अडोल, एकरस अवस्था नहीं तब तक पुरूषार्थ कैसे करेंगे । कुछ भी हो, भल तूफान आये परन्तु स्थेरियम रहना है । माया के तूफान तो ढेर आयेंगे और पिछाड़ी तक आयेंगे । अवस्था मजबूत चाहिए । यह है गुप्त मेहनत । कई बच्चे पुरूषार्थ कर तूफान को उड़ाते रहते हैं । जितना जो पास होगा उतना ऊंच पद पायेगा । राजधानी में पद तो बहुत हैं ना | सबसे अच्छे चित्र हैं त्रिमूर्ति गोला और झाड़ । यह शुरू के बने हुए हैं । विलायत में सर्विस के लिए भी यह दो चित्र ले जाने हैं । इन पर ही वह अच्छी रीति समझ सकेंगे। आहिस्ते- आहिस्ते बाबा जो चाहते हैं कि यह चित्र कपड़े पर हों, वह भी बनते जायेंगे । तुम समझायेंगे कि यह कैसे स्थापना हो रही है । तुम भी इसको समझेंगे तो अपने धर्म में ऊच पद पायेंगे । क्रिश्चियन धर्म में तुम ऊँच पद पाना चाहते हो तो यह अच्छी रीति समझो । अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग । रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते ।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1. इस पुरूषोत्तम संगमयुग पर पवित्र बन स्वयं का श्रृंगार करना है । कभी भी माया की धूल में लिथड़ कर श्रृंगार बिगाड़ना नहीं है ।
2. इस ड्रामा को यथार्थ रीति समझकर अपनी अवस्था अचल, अडोल, स्थेरियम बनानी है । कभी भी मूँझना नहीं है, सदैव हर्षित रहना है ।
वरदान:-
भगवान और भाग्य की स्मृति से औरों का भी भाग्य बनाने वाले खुशनुम: खुशनसीब भव !
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अमृतवेले से लेकर रात तक अपने भिन्न-भिन्न भाग्य को स्मृति में लाओ और यही गीत गाते रहो वाह मेरा श्रेष्ठ भाग्य । जो भगवान और भाग्य की स्मृति में रहते हैं वही औरों को भाग्यवान बना सकते हैं । ब्राह्मण माना ही सदा भाग्यवान, सदा खुशनसीब । किसी की हिम्मत नहीं जो ब्राह्मण आत्मा की खुशी कम कर सके । हर एक खुशनुम:, खुशनसीब हो । ब्राह्मण जीवन में खुशी का जाना असम्भव है, भल शरीर चला जाए लेकिन खुशी जा नहीं सकती ।
स्लोगन:-
माया के झूले को छोड़ अतीन्द्रिय सुख के झूले में सदा झूलते रहो ।
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