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Naina Patel

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Jul 23, 2014, 2:54:04 PM7/23/14
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Date: 2014-07-23 13:16 GMT-04:00
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 24-07-14          प्रातः मुरली         ओम् शान्ति        “बापदादा”          मधुबन


मीठे बच्चे - माया रावण के संग में आकर तुम भटक गये, पवित्र पौधे अपवित्र बन गये, अब फिर पवित्र बनो ।“   

प्रश्न:-   
हर एक बच्चे को अपने ऊपर कौन-सा वन्डर लगता है? बाप को बच्चों पर कौन-सा वन्डर लगता है?

उत्तर:-
बच्चों को वन्डर लगता कि हम क्या थे, किसके बच्चे थे, ऐसे बाप का हमें वर्सा मिला था, उस बाप को ही हम भूल गये । रावण आया इतनी फागी आ गई जो रचयिता और रचना सब भूल गया । बाप को बच्चों पर वन्डर लगता, जिन बच्चों को मैंने इतना ऊंच बनाया, राज्य- भाग्य दिया, वही बच्चे मेरी ग्लानि करने लगे । रावण के संग में आकर सब कुछ गँवा दिया ।

ओम् शान्ति |

क्या सोच रहे हो? नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार हर एक की जीव आत्मा अब अपने ऊपर वन्डर खा रही है कि हम क्या थे, किसके बच्चे थे और बरोबर बाप से वर्सा मिला था, फिर कैसे हम भूल गये! हम सतोप्रधान दुनिया में सारे विश्व के मालिक थे, बहुत सुखी थे । फिर हम सीढ़ी उतरे । रावण आया गोया इतनी फागी आ गई जो रचता और रचना को हम भूल गये । फागी में मनुष्य रास्ता आदि भूल जाते हैं ना । तो हम भी भूल गये-हमारा घर कहाँ है, कहाँ के रहने वाले थे । अब बाबा देख रहे हैं हमारे बच्चे, जिन्हें हम आज से 5 हजार वर्ष पहले राज्य- भाग्य देकर गये, बड़े आनन्द मौज में थे, यह भूमि फिर क्या हो गई! कैसे रावण के राज्य में आ गये! पराये राज्य में तो जरूर दुःख ही मिलेगा । कितने तुम भटके! अन्धश्रधा में बाप को ढूँढते रहे परन्तु मिले कहाँ । जिसको पत्थर-ठिक्कर में डाल दिया तो मिलेगा फिर कैसे । आधाकल्प तुम भटक- भटक कर जैसे फाँ हो गये । अपने ही अज्ञान के कारण रावण राज्य में तुमने कितना दु :ख उठाया है । भारत भक्ति मार्ग में कितना गरीब बन गया है । बाप बच्चों की तरफ देखते हैं तो ख्याल होता है भक्ति मार्ग में कितना भटके हैं! आधाकल्प भक्ति की है, किसलिए? भगवान् से मिलने लिए । भक्ति के बाद ही भगवान् फल देते हैं । क्या देते हैं? वह तो कोई जानते नहीं, बिल्कुल बुद्धु बन गये हैं । यह सब बातें बुद्धि में आनी चाहिए-हम क्या थे फिर कैसे राज्य- भाग्य करते थे फिर कैसे सीढ़ी नीचे उतरते-उतरते रावण की जंजीरों में बंधते गये । अपरमअपार दुःख थे । पहले-पहले तुम अपरमअपार सुख में थे । तो दिल में आना चाहिए, अपने राज्य में कितना सुख था फिर पराये राज्य में कितना दु :ख उठाया । जैसे वो लोग समझते हैं अंग्रेजों के राज्य में हमने दु :ख उठाया है । अब तुम बैठे हो, अन्दर में यह ख्याल आना चाहिए हम कौन थे, किसके बच्चे थे? बाप ने हमको सारे विश्व का राज्य दिया फिर कैसे हम रावण राज्य में जकड़ गये । कितने दुःख देखे, कितने गन्दे कर्म किये । सृष्टि दिन-प्रतिदिन गिरती ही गई है । मनुष्यों के संस्कार दिन-प्रतिदिन क्रिमिनल होते गये हैं । तो बच्चों को स्मृति में आना चाहिए । बाप देखते हैं यह पवित्र पौधे थे, जिसको राज्य- भाग्य दिया वह फिर मेरे आक्यूपेशन को ही भूल गये । अब फिर तुम तमोप्रधान से सतोप्रधान बनना चाहते हो तो मुझ बाप को याद करो तो सब पाप कट जायें । परन्तु याद भी नहीं कर सकते, घड़ी-घड़ी कहते हैं बाबा हम भूल जाते हैं । अरे, तुम याद नहीं करेंगे तो पाप कैसे कटेंगे? एक तो तुम विकारों में गिर पतित बने और दूसरा फिर बाप को गाली देने लगे । माया के संग में तुम इतना गिर पड़े जो जिसने तुमको आसमान में चढ़ाया उनको ठिक्कर-भित्तर में ले गये । माया के संग में तुमने ऐसा काम किया है! बुद्धि में आना चाहिए ना । एकदम पत्थरबुद्धि तो नहीं बनना चाहिए । बाप रोज़-रोज़ कहते हैं मैं फर्स्टक्लास प्वाइंट तुमको सुनाता हूँ । 

जैसे बाम्बे में संगठन हुआ तो उसमें बतला सकते हैं कि बाप कहते हैं-हे भारत-वासियों, तुमको हमने राज्य- भाग्य दिया । तुम देवतायें हेविन में थे फिर तुम रावण राज्य में कैसे आये, यह भी ड्रामा में पार्ट है । तुम रचता और रचना के आदि-मध्य- अन्त को समझो तब ऊँच पद पा सको । और मेरे को याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश हो । यहाँ भल सब बैठे हैं फिर भी किसकी बुद्धि कहाँ, किसकी बुद्धि कहाँ है । बुद्धि में आना चाहिए - हम कहाँ थे, अब हम पराये रावण राज्य में आकर पड़े हैं, तो कितने दु :खी हुए हैं । हम शिवालय में तो बहुत सुखी थे । अब बाप आये हैं वेश्यालय से निकालने, तो भी निकलते ही नहीं । बाप कहते हैं तुम शिवालय चलेंगे फिर वहाँ यह विष नहीं मिलेगा । यहाँ का गन्दा खान-पान नहीं मिलेगा । यह तो विश्व के मालिक थे ना । फिर यह कहाँ गये? फिर से अपना राज्य- भाग्य ले रहे हैं । कितना सहज है । यह तो बाप समझाते हैं, सब सर्विसएबुल नहीं होंगे । नम्बरवार राजधानी स्थापन करनी है, जैसे 5 हजार वर्ष पहले की थी । सतोप्रधान बनना है, बाप कहते हैं यह है तमोप्रधान पुरानी दुनिया । एक्यूरेट पुरानी जब होगी तब तो बाप आयेंगे ना । बाप बिगर तो कोई समझा न सके । भगवान् इस रथ द्वारा हमको पढ़ा रहे हैं, यह याद रहे तो भी बुद्धि में ज्ञान हो । फिर औरों को बताकर आपसमान भी बनाये । बाप समझाते हैं पहले तो तुम्हारे क्रिमिनल कैरेक्टर्स थे, जो मुश्किल सुधरते हैं । आँखों की क्रिमिनलिटी निकलती नहीं है । एक तो काम की क्रिमिनलिटी वह मुश्किल छूटती है फिर साथ में 5 विकार हैं । क्रोध की क्रिमिनलिटी भी कितनी है । बैठे-बैठे भूत आ जाता है । यह भी क्रिमिनलिटी हुई । सिविलाइज्ड तो हुए नहीं । नतीजा क्या होगा! सौ गुणा पाप चढ़ जायेगा । घड़ी-घड़ी क्रोध करते रहेंगे । बाप समझाते हैं तुम अभी रावण राज्य में तो नहीं हो ना । तुम तो ईश्वर के पास बैठे हुए हो । तो इन विकारों से छूटने की प्रतिज्ञा करनी है । बाप कहते हैं अब मुझे याद करो । क्रोध मत करो । 5 विकार तुमको आधाकल्प गिराते आये हैं । सबसे ऊंच भी तुम थे । सबसे जास्ती गिरे भी तुम हो । इन 5 भूतों ने तुमको गिराया है । अब शिवालय में जाने के लिए इन विकारों को निकालना है । इस वेश्यालय से दिल हटाते रहो । बाप को याद करो तो अन्त मती सो गति हो जायेगी । तुम घर में पहुँच जायेंगे और कोई यह रास्ता बता नहीं सकते । भगवानुवाच, मैंने तो कभी भी कहा नहीं है कि मैं सर्वव्यापी हूँ । मैंने तो राजयोग सिखाया और कहा तुमको विश्व का मालिक बनाता हूँ फिर वहाँ तो इस नॉलेज की दरकार ही नहीं रहती । मनुष्य से देवता बन जाते हैं, तुम वर्सा पा लेते हो । इसमें हठयोग आदि की बात नहीं । अपने को आत्मा समझो, अपने को शरीर क्यों समझते हो । शरीर समझने से फिर ज्ञान उठा नहीं सकते । यह भी भावी । तुम समझते हो हम रावणराज्य में थे, अब रामराज्य में जाने के लिए पुरूषार्थ कर रहे हैं । अभी हम पुरूषोत्तम संगमयुग वासी हैं । 

भल गृहस्थ में रहो । इतने सब यहाँ कहाँ रहेंगे । ब्राह्मण बनकर सब यहाँ ब्रह्मा के पास भी नहीं रह सकते हैं । रहना भी अपने घर में है और बुद्धि से समझना है - हम शूद्र नहीं, हम ब्राह्मण हैं । ब्राह्मणों की चोटी कितनी छोटी है । तो गृहस्थ में रहते, शरीर निर्वाह लिए धन्धा आदि करते सिर्फ बाप को याद करो । हम क्या थे, अब हम पराये राज्य में बैठे हैं । कितना हम दु :खी थे । अब बाबा हमको फिर ले जाते हैं तो गृहस्थ व्यवहार में रहते वह अवस्था जमानी है । शुरू में कितने बड़े-बड़े झाड़ आये, फिर उनसे कोई रहे, बाकी चले गये । तुम्हारी बुद्धि में है हम अपने राज्य में थे फिर अभी कहाँ आकर पड़े हैं । फिर अपने राज्य में जाते हैं । तुम लिखते हो, कहते हो बाबा फलाना बहुत अच्छा रेग्युलर था फिर आते नहीं । नहीं आते हैं तो गोया विकार में गिरे । फिर ज्ञान की धारणा हो न सके । उन्नति के बदले गिरते-गिरते पाई पैसे का पद पा लेंगे । कहाँ राजा, कहाँ नीच पद! भल सुख तो वहाँ है ही परन्तु पुरूषार्थ किया जाता है ऊंच पद पाने का । बड़ा मर्तबा कौन पा सकते हैं? यह तो सभी समझ सकते हैं, अभी सब पुरूषार्थ कर रहे हैं । किंग महेन्द्र (भोपाल के) भी पुरूषार्थ कर रहा है । वह किंग तो पाई पैसे के हैं, यह तो सूर्यवंशी राजधानी में जाने वाला है । पुरूषार्थ ऐसा हो जो विजय माला में जा सकें । बाप बच्चों को समझाते हैं- अपने दिल में जांच करते रहना है - हमारी आँखें कहाँ क्रिमिनल तो नहीं होती हैं? अगर सिविलाइज़ हो जाए तो बाकी क्या चाहिए । भल विकार में नहीं जायेंगे परन्तु कुछ न कुछ आँखें धोखा देती रहती हैं । नम्बरवन है काम, क्रिमिनल आई बड़ी खराब है इसलिए नाम ही है क्रिमिनल- आइज्ड, सिविल- आइज्ड । बेहद का बाप बच्चों को जानते तो हैं ना-यह क्या कर्म करते हैं, कितनी सर्विस करते हैं? फलाने की क्रिमिनल- आइज अभी तक गई नहीं है, अभी तक ऐसे गुप्त समाचार आते हैं । आगे चल और भी एक्यूरेट लिखेंगे । खुद भी फील करेंगे हम तो इतना समय झूठ बोलते, गिरते आये हैं । ज्ञान पूरा बुद्धि में बैठा नहीं था । यही कारण था जो हमारी अवस्था नहीं बनी । बाप से हम छिपाते थे । ऐसे बहुत छिपाते हैं । सर्जन से 5 विकारों की बीमारी छिपानी नहीं है, सच बताना चाहिए-हमारी बुद्धि इस तरफ जाती है, शिवबाबा तरफ नहीं जाती । बताते नहीं हैं तो वह वृद्धि को पाती रहती है । अब बाप समझाते हैं-बच्चे, देही- अभिमानी बनो, अपने को आत्मा समझो । आत्मा भाई- भाई है । तुम कितने सुखी थे जब पूज्य थे । अब तुम पुजारी दु :खी बन पड़े हो । तुमको क्या हो गया! सब कहते हैं यह गृहस्थ आश्रम तो परमपरा से चला आया है । क्या राम-सीता को बच्चे नहीं थे! लेकिन वहाँ विकार से बच्चे नहीं होते । अरे, वह तो है ही सम्पूर्ण निर्विकारी दुनिया । वहाँ भ्रष्टाचार से पैदाइस नहीं होती, विकार नहीं था । वहाँ यह रावण राज्य होता ही नहीं, वह तो राम राज्य है । वहाँ रावण कहाँ से आया । मनुष्यों की बुद्धि बिल्कुल चट खाते में हैं । किसने की? मैंने तुमको सतोप्रधान बनाया था, तुम्हारा बेड़ा पार किया था फिर तुमको तमोप्रधान किसने बनाया? रावण ने । यह भी तुम भूल गये हो । कहते हैं यह तो परम्परा से चला आता है, अरे, परम्परा कब से? कोई हिसाब तो बताओ । कुछ भी समझते नहीं । बाप समझाते हैं-तुमको कितना राज्य- भाग्य देकर गये । तुम भारतवासी बहुत ही खुशी में थे, और कोई था ही नहीं । क्रिस्चियन भी कहते हैं पैराडाइज था, चित्र भी देवताओं के हैं, उनसे कोई पुरानी चीज़ तो है नहीं । पुराने ते पुराने यह लक्ष्मी-नारायण होंगे या इन्हों की कोई वस्तु होगी । सबसे पुराने ते पुराना है श्रीकृष्ण । नये से नया भी श्रीकृष्ण था । पुराना क्यों कहते? क्योंकि पास्ट हो गया ना । तुम ही गोरे थे फिर सांवरे बने । सांवरे कृष्ण को भी देखकर बड़ा खुश होते हैं । झूले में भी सांवरे को झुलायेगे । उनको क्या पता कि गोरा कब था । कृष्ण को कितना प्यार करते हैं! राधे ने क्या किया

बाप कहते हैं तुम यहाँ सत के संग में बैठे हो, बाहर कुसंग में जाने से फिर भूल जाते हो । माया बड़ी प्रबल है, गज को ग्राह हप कर लेते हैं । ऐसे भी हैं - अभी भागे कि भागे । थोड़ा भी अपना अहंकार आने से और ही सत्यानाश कर लेते हैं । बेहद का बाप तो समझाते रहेंगे । इसमें फंक नहीं होना चाहिए । बाबा ने ऐसे क्यों कहा, हमारी इज्जत गई! अरे इज्जत तो रावण राज्य में चट हो ही गई है । देह- अभिमान में आने से अपना ही नुकसान कर देंगे । पद भ्रष्ट हो पड़ेगा । क्रोध, लोभ भी क्रिमिनल आई है । आँखों से चीज देखते हैं, तब तो लोभ होता है । 

बाप आकर अपना बगीचा देखते हैं किस-किस किस्म के फूल हैं । यहाँ से जाकर फिर उस बगीचे में फूलों को देखते हैं । शिवबाबा को फूल भी बरोबर चढ़ाते हैं । वह तो है निराकार, चैतन्य फूल । तुम अभी पुरूषार्थ कर ऐसा फूल बनते हो । बाबा कहते हैं-मीठे-मीठे बच्चों, जो कुछ बीता, उसको ड्रामा समझो । सोचो नहीं । कितनी मेहनत करते हैं, होता तो कुछ नहीं, ठहरता नहीं । अरे, प्रजा भी तो चाहिए ना । थोड़ा भी सुना तो वह प्रजा हो गई । प्रजा तो ढेर बननी है । ज्ञान कभी विनाश को नहीं पाता है । एक बार सुना-शिवबाबा है, तो भी बस, प्रजा में आ जायेंगे । अन्दर में तुम्हें यह स्मृति आनी चाहिए हम जिस राज्य में थे, वह फिर से अब पा रहे हैं । उसके लिए पूरा पुरूषार्थ करना चाहिए । बिल्कुल एक्यूरेट सर्विस चल रही है । अच्छा! 

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग । रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते ।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1. शिवालय में जाने के लिए इन विकारों को निकालना है । इस वेश्यालय से दिल हटाते जाना है । शूद्रों के संग से किनारा कर लेना है । 

2. जो कुछ बीता उसे ड्रामा समझ कोई भी विचार नहीं करना है । अहंकार में कभी नहीं आना है । कभी शिक्षा मिलने पर फंक नहीं होना है ।

वरदान:-

कर्म और योग के बैलेन्स द्वारा ब्लैसिंग का अनुभव करने वाले कर्मयोगी भव !   

कर्मयोगी अर्थात् हर कर्म योगयुक्त हो । कर्मयोगी आत्मा सदा ही कर्म और योग का साथ अर्थात् बैलेन्स रखने वाली होगी । कर्म और योग का बैलेन्स होने से हर कर्म में बाप द्वारा तो ब्लैसिंग मिलती ही है लेकिन जिसके भी सम्बन्ध-सम्पर्क में आते हैं उनसे भी दुआयें मिलती हैं । कोई अच्छा काम करता है तो दिल से उसके लिए दुआयें निकलती हैं कि बहुत अच्छा है । बहुत अच्छा मानना ही दुआयें हैं ।

स्लोगन:- 

सेकेण्ड में संकल्पों को स्टॉप करने का अभ्यास ही कर्मातीत अवस्था के समीप लायेगा ।     

ओम् शान्ति |


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Naina Patel

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Jul 24, 2014, 3:36:12 PM7/24/14
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Date: 2014-07-24 13:40 GMT-04:00
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  25-07-14          प्रातः मुरली         ओम् शान्ति        “बापदादा”          मधुबन


"मीठे बच्चे - देह- अभिमान आसुरी कैरेक्टर है, उसे बदल दैवी कैरेक्टर्स धारण करो तो रावण की जेल से छूट जायेंगे"   

प्रश्न:-   
हर एक आत्मा अपने पाप कर्मों की सजा कैसे भोगती है
, उससे बचने का साधन क्या है?

उत्तर:-
हर एक अपने पापों की सजा एक तो गर्भ जेल में भोगते हैं, दूसरा रावण की जेल में अनेक प्रकार के दु:ख उठाते हैं । बाबा आया है तुम बच्चों को इन जेलों से छुड़ाने । इनसे बचने के लिए सिविलाइज्ड बनो ।

 

ओम् शान्ति |

ड्रामा के प्लैन अनुसार बाप बैठ समझाते हैं । बाप ही आकर रावण की जेल से छुड़ाते हैं क्योंकि सब क्रिमिनल, पाप आत्मायें हैं । सारी दुनिया के मनुष्य मात्र क्रिमिनल होने के कारण रावण की जेल में हैं । फिर जब शरीर छोड़ते हैं तो भी गर्भ जेल में जाते हैं । बाप आकर दोनों जेल से छुड़ाते हैं फिर तुम आधाकल्प रावण की जेल में भी नहीं और गर्भ जेल में भी नहीं जायेंगे । तुम जानते हो बाप धीरे- धीरे पुरुषार्थ अनुसार हमें रावण की जेल से और गर्भ जेल से छुड़ाते रहते हैं । बाप बताते हैं तुम सब क्रिमिनल हो रावण राज्य में । फिर राम राज्य में सब सिविलाइज्ड होते हैं । कोई भी भूत की प्रवेशता नहीं होती है । देह का अहंकार आने से ही फिर और भूतों की प्रवेशता होती है । अब तुम बच्चों को पुरुषार्थ कर देही- अभिमानी बनना है । जब ऐसे (लक्ष्मी-नारायण) बन जायेंगे तब ही देवता कहलायेंगे । अभी तो तुम ब्राह्मण कहलाते हो । रावण की जेल से छुड़ाने लिए बाप आकर पढ़ाते भी हैं और जो सबके कैरेक्टर्स बिगड़े हुए हैं वह सुधारते भी हैं । आधाकल्प से कैरेक्टर्स बिगड़ते-बिगड़ते बहुत बिगड़ गये है । इस समय है तमोप्रधान कैरेक्टर्स । दैवी और आसुरी कैरेक्टर्स में बरोबर रात-दिन का फर्क है । बाप समझाते हैं अब पुरुषार्थ कर अपना दैवी कैरेक्टर्स बनाना है, तब ही आसुरी कैरेक्टर्स से छूटते जायेंगे । आसुरी कैरेक्टर्स में देह- अभिमान है नम्बरवन । देही- अभिमानी के कैरेक्टर्स कभी बिगड़ते नहीं हैं । सारा मदार कैरेक्टर्स पर है । देवताओं का कैरेक्टर कैसे बिगड़ता है । जब वे वाम मार्ग में जाते हैं अर्थात्( विकारी बनते हैं तब कैरेक्टर्स बिगड़ते हैं । जगन्नाथ के मन्दिर में ऐसे चित्र दिखाये हैं वाम मार्ग के । यह तो बहुत वर्षों का पुराना मन्दिर है, ड्रेस आदि देवताओं की ही है । दिखाते हैं देवता वाम मार्ग में कैसे जाते हैं । पहली-पहली क्रिमिनलिटी है ही यह । काम चिता पर चढ़ते हैं, फिर रंग बदलते-बदलते बिल्कुल काले हो जाते हैं ।  

पहले-पहले गोल्डन एज़ में हैं सम्पूर्ण गोरे, फिर दो कला कम हो जाती हैं । त्रेता को स्वर्ग नहीं कहेंगे, वह है सेमी स्वर्ग । बाप ने समझाया है रावण के आने से ही तुम्हारे ऊपर कट चढ़ना शुरू हुई है । पूरे क्रिमिनल अन्त में बनते हो । अभी 100 परसेन्ट क्रिमिनल कहेंगे । 100 परसेन्ट वाइसलेस थे फिर 100 परसेन्ट विशश बने । अब बाप कहते हैं सुधरते जाओ, यह रावण का जेल बहुत बड़ा है । सबको क्रिमिनल ही कहेंगे क्योंकि रावण के राज्य में हैं ना । राम राज्य और रावण राज्य का तो उनको पता ही नहीं है । अभी तुम पुरुषार्थ कर रहे हो रामराज्य में जाने का । सम्पूर्ण तो कोई बना नहीं है । कोई फर्स्ट, कोई सेकण्ड, कोई थर्ड में है । अब बाप पढ़ाते हैं, दैवीगुण धारण कराते हैं । देह- अभिमान तो सबमें है । जितना-जितना तुम सर्विस में लगे रहेंगे उतना देह- अभिमान कम होता जायेगा । सर्विस करने से ही देह- अभिमान कम होगा । देही- अभिमानी बड़ी-बड़ी सर्विस करेंगे । बाबा देही- अभिमानी है तो कितनी अच्छी सर्विस करते हैं । सभी को क्रिमिनल रावण की जेल से छुड़ाए सद्गति प्राप्त करा देते हैं, वहाँ फिर दोनों जेल नहीं होगी । यहाँ डबल जेल है, सतयुग में न कोर्ट है, न पाप आत्मायें हैं, न तो रावण की जेल ही है । रावण की है बेहद की जेल । सभी 5 विकारों की रस्सियों में बंधे हुए हैं । अपरमअपार दुःख हैं । दिन-प्रतिदिन दु :ख वृद्धि को पाता रहता है । सतयुग को कहा जाता है गोल्डन एज, त्रेता को सिलवर एज । सतयुग वाला सुख त्रेता में नहीं हो सकता क्योंकि आत्मा की दो कला कम हो जाती है । आत्मा की कला कम होने से शरीर भी ऐसे हो जाते हैं, तो यह समझना चाहिए कि बरोबर हम रावण के राज्य में देह- अभिमानी बन पड़े हैं । अब बाप आया है रावण की जेल से छुड़ाने के लिए । आधाकल्प का देह- अभिमान निकलने में देरी तो लगती है । बहुत मेहनत करनी पड़ती है । जल्दी में जो शरीर छोड़ गये वह फिर भी बड़े होकर आए कुछ ज्ञान उठा सकते हैं । जितना देरी होती जाती है तो फिर पुरुषार्थ तो कर न सकें । कोई मरे फिर आकर पुरुषार्थ करे सो तो जब आरगन्स बड़े हों, समझदार हों तब कुछ कर भी सकें । देरी से जाने वाले तो कुछ सीख नहीं सकेंगे । जितना सीखे उतना सीखे इसलिए मरने से पहले पुरुषार्थ करना चाहिए, जितना हो सके इस तरफ आने की कोशिश जरूर करेंगे । इस हालत में बहुत आयेंगे । झाड़ वृद्धि को पायेगा । समझानी तो बहुत सहज है । बाम्बे में बाप का परिचय देने के लिए चांस बहुत अच्छा है - यह हम सबका बाप है, बाप से वर्सा तो जरूर स्वर्ग का ही चाहिए । कितना सहज है । दिल अन्दर गद्गद् होना चाहिए, यह हमको पढ़ाने वाला है । यह हमारी एम ऑबजेक्ट है । हम पहले सद्गति में थे फिर दुर्गति में आये अब फिर दुर्गति से सद्गति में जाना है । शिवबाबा कहते हैं मामेकम् याद करो तो तुम्हारे जन्म-जन्मान्तर के पाप कट जायेंगे । तुम बच्चे जानते हो - जब द्वापर में रावण राज्य होता है तो 5 विकार रूपी रावण सर्वव्यापी हो जाता है । जहाँ विकार सर्वव्यापी है वहाँ बाप सर्वव्यापी कैसे हो सकता है । सभी मनुष्य पाप आत्मायें हैं ना । बाप सम्मुख है तब तो ऐसे कहते हैं कि मैंने कहा ही नहीं है, उल्टा समझ गये हैं । उल्टा समझते, विकारों में गिरते-गिरते, गालियां देते-देते भारत का यह हाल हुआ है । क्रिस्चियन लोग भी जानते हैं कि 5 हजार वर्ष पहले भारत स्वर्ग था, सभी सतोप्रधान थे । भारतवासी तो लाखों वर्ष कह देते हैं क्योंकि तमोप्रधान बुद्धि बन पड़े है । वह फिर न इतना ऊंच बने, न इतना नींच बने हैं । वह तो समझते हैं बरोबर स्वर्ग था । बाप कहते हैं यह ठीक कहते हैं- 5 हजार वर्ष पहले भी मैं तुम बच्चों को रावण की जेल से छुड़ाने आया था, अब फिर छुड़ाने आया हूँ । आधाकल्प है राम राज्य, आधाकल्प है रावण राज्य । बच्चों को चांस मिलता है तो समझाना चाहिए । 

बाबा भी तुम बच्चों को समझाते हैं - बच्चे, ऐसे-ऐसे समझाओ । इतने अपरमअपार दुःख क्यों हुए हैं? पहले तो अपरमअपार सुख थे जब इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था । यह सर्वगुण सम्पन्न थे, अब यह नॉलेज है ही नर से नारायण बनने की । पढ़ाई है, इनसे दैवी कैरेक्टर्स बनते हैं । इस समय रावण के राज्य में सभी के कैरेक्टर्स बिगड़े हुए हैं । सबके कैरेक्टर्स सुधारने वाला तो एक ही राम है । इस समय कितने धर्म हैं, मनुष्यों की कितनी वृद्धि होती रहती है, ऐसे ही वृद्धि होती रहेगी तो फिर खाना भी कहाँ से मिलेगा! सतयुग में तो ऐसी बातें होती नहीं हैं । वहाँ दुःख की कोई बात ही नहीं । यह कलियुग है दुःखधाम, सब विकारी हैं । वह है सुखधाम, सभी सम्पूर्ण निर्विकारी हैं । घड़ी-घड़ी उन्हों को यह बतलाना चाहिए तो कुछ समझ जाएं । बाप कहते हैं मैं पतित-पावन हूँ, मुझे याद करने से तुम्हारे जन्म-जन्मान्तर के पाप कट जायेंगे । अब बाप कैसे कहेंगे! जरूर शरीर धारण कर बोलेंगे ना । पतित-पावन सर्व का सद्गति दाता एक बाप है, जरूर वह किसी रथ में आया होगा । बाप कहते हैं मैं इस रथ में आता हूँ, जो अपने जन्मों को नहीं जानते हैं । बाप समझाते हैं यह 84 जन्मों का खेल है, जो पहले- पहले आये होंगे वही आयेंगे, उनके ही बहुत जन्म होंगे फिर कम होते जायेंगे । सबसे पहले देवताये आये । बाबा बच्चों को भाषण करना सिखलाते हैं-ऐसे-ऐसे समझाना चाहिए । अच्छी रीति याद में रहेंगे, देह- अभिमान नहीं होगा तो भाषण अच्छा करेंगे । शिवबाबा देही- अभिमानी है ना । कहते रहते हैं-बच्चे, देही- अभिमानी भव । कोई विकार न रहे, अन्दर में कोई शैतानी न रहे । तुम्हें किसको भी दु :ख नहीं देना है, किसकी निंदा नहीं करनी है । तुम बच्चों को कभी भी सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास नहीं करना चाहिए । बाप से पूछो-यह ऐसे कहते हैं, क्या सत्य है? बाबा बता देंगे । नहीं तो बहुत हैं जो झूठी बातें बनाने में देरी नहीं करते हैं-फलाने ने तुम्हारे लिए ऐसे-ऐसे कहा, सुनाकर उनको ही खाक कर देंगे । बाबा जानते हैं, ऐसे बहुत होता है । उल्टी-सुल्टी बातें सुनाकर दिल को खराब कर देते हैं इसलिए कभी भी झूठी बातें सुनकर अन्दर में जलना नहीं चाहिए । पूछो फलाने ने मेरे लिए ऐसे कहा है? अन्दर सफाई होनी चाहिए । कई बच्चे सुनी-सुनाई बातों पर भी आपस में दुश्मनी रख देते हैं । बाप मिला है तो बाप से पूछना चाहिए ना । ब्रह्मा बाबा पर भी बहुतों को विश्वास नहीं होता है । शिवबाबा को भी भूल जाते हैं । बाप तो आये हैं सबको ऊंच बनाने । प्यार से उठाते रहते हैं । ईश्वरीय मत लेनी चाहिए । निश्चय ही नहीं होगा तो पूछेंगे ही नहीं तो रेसपान्ड भी नहीं मिलेगा । बाप जो समझाते हैं उसको धारण करना चाहिए । 

तुम बच्चे श्रीमत पर विश्व में शान्ति स्थापन करने के निमित्त बने हो । एक बाप के सिवाए और कोई की मत ऊँच ते ऊँच हो नहीं सकती । ऊँच ते ऊँच मत है ही भगवान् की । जिससे मर्तबा भी कितना ऊँचा मिलता है । बाप कहते हैं अपना कल्याण कर ऊँच पद पाओ, महारथी बनो । पढ़ेंगे ही नहीं तो क्या पद पायेंगे । यह है कल्प-कल्पान्तर की बात । सतयुग में दास- दासियां भी नम्बरवार होते हैं । बाप तो आये है ऊँच बनाने परन्तु पढ़ते ही नहीं हैं तो क्या पद पायेंगे । प्रजा में भी तो ऊँच-नीच पद होते हैं ना, यह बुद्धि से समझना है । मनुष्यों को पता नहीं पड़ता है कि हम कहाँ जाते हैं । ऊपर जाते हैं या नीचे उतरते जाते हैं । बाप आकर तुम बच्चों को समझाते हैं कहाँ तुम गोल्डन, सिलवर एज में थे, कहाँ आइरन एज में आये हो । इस समय तो मनुष्य, मनुष्य को खा लेते हैं । अब यह सभी बातें जब समझें तब कहें कि ज्ञान किसको कहा जाता है । कई बच्चे एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देते हैं । अच्छे- अच्छे सेंटर्स के अच्छे- अच्छे बच्चों की क्रिमिनल आई रहती है । फायदा, नुकसान, इज्जत की परवाह थोड़ेही रखते हैं । मूल बात है ही क्रिमिनल आई की । बाप समझाते हैं काम महाशत्रु है, इनको जीतने के लिए कितना माथा मारते हैं । मूल बात है ही पवित्रता की । इस पर ही कितने झगड़े होते हैं । बाप कहते हैं यह काम महाशत्रु है, इन पर जीत पहनो तब ही जगत जीत बनेंगे । देवतायें सम्पूर्ण निर्विकारी हैं ना । आगे चल समझ ही जायेंगे । स्थापना हो ही जायेगी । अच्छा! 

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग । रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते ।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1. कभी भी सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करके अपनी स्थिति खराब नहीं करनी है । अन्दर में सफाई रखनी है । झूठी बातें सुनकर अन्दर में जलना नहीं है, ईश्वरीय मत ले लेनी है । 

2. देही- अभिमानी बनने का पूरा पुरुषार्थ करना है, किसी की भी निंदा नहीं करनी है । फायदा, नुकसान और इज्जत को ध्यान में रखते हुए क्रिमिनल आई को खत्म करना है । बाप जो सुनाते हैं उसे एक कान से सुनकर दूसरे से निकालना नहीं है ।

वरदान:-

श्रेष्ठ स्मृति द्वारा श्रेष्ठ स्थिति और श्रेष्ठ वायुमण्डल बनाने वाले सर्व के सहयोगी भव !   

योग का अर्थ है श्रेष्ठ स्मृति में रहना । मैं श्रेष्ठ आत्मा श्रेष्ठ बाप की सन्तान हूँ, जब ऐसी स्मृति रहती है तो स्थिति श्रेष्ठ हो जाती है । श्रेष्ठ स्थिति से श्रेष्ठ वायुमण्डल स्वत: बनता है जो अनेक आत्माओं को अपनी ओर आकर्षित करता है । जहाँ भी आप आत्मायें योग में रहकर कर्म करती हो वहाँ का वातावरण, वायुमण्डल औरों को भी सहयोग देता है । ऐसी सहयोगी आत्मायें बाप को और विश्व को प्रिय हो जाती हैं ।

स्लोगन:- 

अचल स्थिति के आसन पर बैठने से ही राज्य का सिंहासन मिलेगा ।     

ओम् शान्ति |


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Naina Patel

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 26-07-14          प्रातः मुरली         ओम् शान्ति        “बापदादा”          मधुबन


"मीठे बच्चे - ड्रामा की यथार्थ नॉलेज से ही तुम अचल, अडोल और एकरस रह सकते हो, माया के तूफान तुम्हें हिला नहीं सकते"   

                                                        
प्रश्न:-   
देवताओं का मुख्य एक कौन-सा गुण तुम बच्चों में सदा दिखाई देना चाहिए?


उत्तर:-
हर्षित रहना । देवताओं को सदा मुस्कराते हुए हर्षित दिखाते हैं । ऐसे तुम बच्चों को भी सदा हर्षित रहना है, कोई भी बात हो, मुस्कराते रहो । कभी भी उदासी या गुस्सा नहीं आना चाहिए । जैसे बाप तुम्हें राइट और रांग की समझानी देते हैं, कभी गुस्सा नहीं करते, उदास नहीं होते, ऐसे तुम बच्चों को भी उदास नहीं होना है ।

 

ओम् शान्ति |

बेहद के बच्चों को बेहद का बाप समझाते हैं । लौकिक बाप तो ऐसे नहीं कहेंगे । उनके तो करके 5 - 7 बच्चे होंगे । यह तो जो सभी आत्मायें हैं, आपस में ब्रदर्स हैं । उन सबका जरूर बाप होगा । कहते भी हैं हम सब भाई- भाई हैं । सबके लिए कहते हैं । जो भी आयेंगे, उनके लिए कहेंगे हम भाई- भाई हैं । ड्रामा में तो सभी बांधें हुए हैं, जिसको कोई नहीं जानते । यह न जानना भी ड्रामा में नूँध है । जो बाप ही आकर सुनाते हैं, कथायें आदि जब बैठ सुनाते हैं तो कहते हैं-परमपिता परमात्माए नम : । अब वह कौन है-यह जानते नहीं । कहते हैं ब्रह्मा देवता, विष्णु देवता, शंकर देवता परन्तु समझ से नहीं कहते हैं । ब्रह्मा को वास्तव में देवता नहीं कहेंगे । देवता विष्णु को कहा जाता है । ब्रह्मा का किसको भी पता नहीं है । विष्णु देवता ठीक है, शंकर का तो कुछ भी पार्ट है नहीं । उनकी बॉयोग्राफी नहीं है, शिवबाबा की तो बायोग्राफी है । वह आते ही हैं पतितों को पावन बनाने, नई दुनिया स्थापन करने । अभी एक आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना और सब धर्मों का विनाश होता है । सभी कहाँ जाते हैं? शान्तिधाम । शरीर तो सबके विनाश होने हैं । नई दुनिया में होंगे ही सिर्फ तुम । जो भी मुख्य धर्म हैं, उनको तुम जानते हो । सबके तो नाम ले नहीं सकेंगे । छोटी-छोटी टाल-टालियां तो बहुत हैं । पहले-पहले है डिटीज्म फिर इस्लामी । यह बातें सिवाए तुम बच्चों के और कोई की बुद्धि में नहीं हैं । अभी वह आदि सनातन देवी-देवता धर्म प्राय:लोप है इसलिए बनेन ट्री का मिसाल देते हैं । सारा झाड़ खडा है । फाउन्डेशन है नहीं । सबसे बड़ी आयु इस बनन ट्री की होती है । तो इसमें सबसे बड़ी आयु है आदि सनातन देवी-देवता धर्म की । वह जब प्राय: लोप हो तब तो बाप आकर कहे कि अभी एक धर्म की स्थापना और अनेक धर्मों का विनाश होना है, इसलिए त्रिमूर्ति भी बनाया है । परन्तु अर्थ नहीं समझते हैं । तुम बच्चे जानते हो ऊंच ते ऊंच भगवान् है फिर ब्रह्मा-विष्णु-शंकर, फिर सृष्टि पर आते हैं तो देवी-देवताओं के सिवाए और कोई धर्म है नहीं । भक्ति मार्ग की भी ड्रामा में नूंध है । पहले शिव की भक्ति करते फिर देवताओं की । भारत की ही तो बात है । बाकी तो समझते हैं हमारा धर्म, मठ, पंथ कब स्थापन होता है । जैसे आर्य लोग कहते हैं हम बहुत पुराने हैं । वास्तव में सबसे पुराना तो है ही आदि सनातन देवी-देवता धर्म । तुम जब झाड़ पर समझाते हो तो खुद भी समझ लेंगे कि हमारा धर्म फलाने समय पर आयेगा । सबको जो अनादि अविनाशी पार्ट मिला हुआ है सो बजाना है, इसमें कोई का दोष वा भूल नहीं कह सकते हैं । यह तो सिर्फ समझाया जाता है पाप आत्मा क्यों बने हैं । मनुष्य कहेंगे हम बेहद के बाप के सब बच्चे हैं, फिर सब ब्रदर्स सतयुग में क्यों नहीं हैं? परन्तु ड्रामा में पार्ट ही नहीं है । यह अनादि ड्रामा बना हुआ है, इसमें निश्चय रखो, और कोई बात बोलो नहीं । चक्र भी दिखाया है-कैसे यह फिरता है । कल्प वृक्ष का भी चित्र है । परन्तु यह कोई जानते नहीं कि इनकी आयु कितनी है । बाप कोई की निंदा नहीं करते हैं । यह तो समझाया जाता है, तुमको भी समझाते हैं तुम कितने पावन थे, अभी पतित बने हो तो पुकारते हो-हे पतित- पावन आओ । पहले तो तुम सबको पावन बनना है । फिर नम्बरवार पार्ट बजाने आना है । आत्मायें सब ऊपर में रहती हैं । बाप भी ऊपर में रहते हैं, फिर उनको बुलाते हैं कि आओ । ऐसे वह बुलाने से आते नहीं हैं । बाप कहते हैं मेरा भी ड्रामा में पार्ट नूँधा हुआ है । जैसे हद के ड्रामा में भी बड़े-बड़े मुख्य एक्टर्स का पार्ट होता है, यह फिर है बेहद का ड्रामा । सब ड्रामा के बधन में बांधे हुए हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि धागे में बांधे हुए हो । नहीं । यह बाप समझाते हैं । वह है जड़ झाड़ । अगर बीज चैतन्य होता तो उसको मालूम होता ना कि यह कैसे झाड़ बड़ा हो फिर फल देंगे । यह तो है चैतन्य बीज इस मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ का, इसको उल्टा झाड़ कहा जाता है । बाप तो है नॉलेजफुल, उनको सारे झाड़ की नॉलज है । यह है वही गीता की नॉलेज । कोई नई बात नहीं है । यहाँ बाबा कोई श्लोक आदि नहीं उच्चारते हैं । वो लोग ग्रंथ पढ़कर फिर अर्थ बैठ समझाते हैं । बाप समझाते हैं यह है पढ़ाई, इसमें श्लोक आदि की दरकार नहीं । उन शास्त्रों की पढ़ाई में कोई एम- ऑबजेक्ट है नहीं । कहते भी हैं ज्ञान, भक्ति, वैराग्य । यह पुरानी दुनिया विनाश होती है । सन्यासियों का है हद का वैराग्य, तुम्हारा है बेहद का वैराग्य । शंकराचार्य आते हैं तब वह बैठ सिखलाते हैं घर बार से वैराग्य । वह भी शुरू में शास्त्र आदि नहीं सिखाते । जब बहुत वृद्धि होती जाती है तब शास्त्र बनाने शुरू करते हैं । पहले-पहले तो धर्म स्थापन करने वाला एक ही होता है फिर आहिस्ते- आहिस्ते वृद्धि को पाते हैं । यह भी समझना है । सृष्टि में पहले-पहले कौन-सा धर्म था । अभी तो अनेक धर्म हैं । आदि सनातन देवी-देवता धर्म था, जिसको स्वर्ग हेविन कहते हैं । तुम बच्चे रचयिता और रचना को जानने से आस्तिक बन जाते हो । नास्तिकपने का कितना दुःख होता है, निधनके बन पड़ते हैं, आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं । कहते हैं ना तुम आपस में लड़ते रहते हो, तुम्हारा कोई धनी धोणी नहीं है क्या? इस समय सब निधनके बन पड़ते हैं । नई दुनिया में पवित्रता, सुख, शान्ति सब था, अपार सुख थे । यहाँ अपरमअपार दु :ख हैं । वह है सतयुग के, यह है कलियुग के, अभी तुम्हारा है पुरूषोत्तम संगमयुग । यह पुरूषोत्तम संगमयुग एक ही होता है । सतयुग-त्रेता के संगम को पुरूषोत्तम नहीं कहेंगे । यहाँ हैं असुर, वहाँ हैं देवतायें । तुम जानते हो यह रावण राज्य है । रावण के ऊपर गधे का शीश दिखाते हैं । गधे को कितना भी साफ कर उस पर कपड़े रखो, गधा फिर भी मिट्टी में लेटकर कपड़े खराब कर देगा । बाप तुम्हारे कपड़े साफ गुल-गुल बनाते हैं, फिर रावण राज्य में  कर, लिथड़ अपवित्र बन जाते हो । आत्मा और शरीर दोनों अपवित्र बन जाते हैं । बाप कहते हैं तुमने सारा श्रृंगार गँवा दिया । बाप को पतित-पावन कहते हैं, तुम भरी सभा में कह सकते हो कि हम गोल्डन एज में कितने श्रृंगारे हुए थे, कितना फर्स्टक्लास राज्य- भाग्य था । फिर माया रूपी धूल में लिथड़ कर मैंले हो गये । 

बाप कहते हैं यह अन्धेरी नगरी है । भगवान् को सर्वव्यापी कह दिया है, जो कुछ हुआ वह हूबहू रिपीट होगा, इसमें मूँझने की दरकार नहीं है । 5 हजार वर्ष में कितने मिनट, घण्टे, सेकण्ड हैं, एक बच्चे ने सब धर्म वालों का हिसाब निकालकर भेजा था, इसमें भी बुद्धि व्यर्थ की होगी । बाबा तो ऐसे ही समझाते हैं कि दुनिया कैसे चलती है । प्रजापिता ब्रह्मा है ग्रेट-ग्रेट ग्रैण्ड फादर । उनका आक्यूपेशन कोई नहीं जानते । विराट रूप बनाया है तो प्रजापिता ब्रह्मा को भी उड़ा दिया है । बाप और ब्राह्मणों को यथार्थ रीति जानते नहीं हैं । उनको कहते भी हैं आदि देव । बाप समझाते हैं मैं इस झाड़ का चैतन्य बीजरूप हूँ । यह उल्टा झाड़ है । बाप जो सत्य है, चैतन्य है, ज्ञान का सागर है, उनकी ही महिमा की जाती है । आत्मा न हो तो चल फिर भी न सकें । गर्भ में भी 5 - 6 मास के बाद आत्मा प्रवेश करती है । यह भी ड्रामा बना हुआ है । फिर आत्मा निकल जाती है तो खलास । आत्मा अविनाशी है, वह पार्ट बजाती है, यह बाप आकर रियलाइज़ कराते हैं । आत्मा इतनी छोटी बिन्दी है, उसमें अविनाशी पार्ट भरा हुआ है । परमपिता भी आत्मा है, उनको ज्ञान का सागर कहा जाता है । वही आत्मा का रियलाइजेशन कराते हैं । वह तो सिर्फ कह देते परमात्मा सर्व शक्तिमान्, हजारों सूर्य से तेजोमय है । परन्तु समझते कुछ नहीं । बाप कहते हैं यह सब भक्ति मार्ग में वर्णन किया हुआ है और शास्त्रों में लिख दिया है । अर्जुन को साक्षात्कार हुआ तो कहा मैं इतना तेज सहन नहीं कर सकता हूँ, तो वह बात मनुष्यों की बुद्धि में बैठी हुई है । इतना तेजोमय किसके अन्दर प्रवेश करे तो फट जाए । ज्ञान तो नहीं है ना । तो समझते हैं परमात्मा तो हजार सूर्य से तेजोमय है, हमको उनका साक्षात्कार चाहिए । भक्ति की भावना बैठी हुई है तो उनको वह साक्षात्कार भी होता है । शुरू-शुरू में तुम्हारे पास भी ऐसे बहुत साक्षात्कार करते थे, आँखें लाल हो जाती थी । साक्षात्कार किया फिर आज वह कहाँ हैं । वह सभी हैं भक्ति मार्ग की बातें । तो यह सब बाप समझाते हैं, इसमें ग्लानि की कोई बात नहीं है । बच्चों को सदैव हर्षित रहना है । यह तो ड्रामा बना हुआ है । मुझे इतनी गालियां देते हैं, फिर मैं क्या करता हूँ? गुस्सा आता है क्या! समझता हूँ ड्रामा अनुसार यह सब भक्ति मार्ग में फँसे हुए हैं । नाराज होने की बात ही नहीं है । ड्रामा ऐसा बना हुआ है । प्यार से समझानी देनी होती है । बिचारे अज्ञान अन्धेरे में पड़े हैं, नहीं समझते हैं तो तरस भी पड़ता है । सदैव मुस्कराते रहना चाहिए । यह बिचारे स्वर्ग के द्वारे आ नहीं सकेंगे, यह सब शान्तिधाम में जाने वाले हैं । सब चाहते भी शान्ति ही हैं । तो बाप ही रीयल समझाते हैं । अभी तुम जानते हो कि यह खेल बना हुआ है । ड्रामा में हर एक को पार्ट मिला हुआ है, इसमें बडी अचल, स्थेरियम बुद्धि चाहिए । जब तक अचल, अडोल, एकरस अवस्था नहीं तब तक पुरूषार्थ कैसे करेंगे । कुछ भी हो, भल तूफान आये परन्तु स्थेरियम रहना है । माया के तूफान तो ढेर आयेंगे और पिछाड़ी तक आयेंगे । अवस्था मजबूत चाहिए । यह है गुप्त मेहनत । कई बच्चे पुरूषार्थ कर तूफान को उड़ाते रहते हैं । जितना जो पास होगा उतना ऊंच पद पायेगा । राजधानी में पद तो बहुत हैं ना | सबसे अच्छे चित्र हैं त्रिमूर्ति गोला और झाड़ । यह शुरू के बने हुए हैं । विलायत में सर्विस के लिए भी यह दो चित्र ले जाने हैं । इन पर ही वह अच्छी रीति समझ सकेंगे। आहिस्ते- आहिस्ते बाबा जो चाहते हैं कि यह चित्र कपड़े पर हों, वह भी बनते जायेंगे । तुम समझायेंगे कि यह कैसे स्थापना हो रही है । तुम भी इसको समझेंगे तो अपने धर्म में ऊच पद पायेंगे । क्रिश्चियन धर्म में तुम ऊँच पद पाना चाहते हो तो यह अच्छी रीति समझो । अच्छा! 

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग । रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते ।

 

धारणा के लिए मुख्य सार:-
 

1. इस पुरूषोत्तम संगमयुग पर पवित्र बन स्वयं का श्रृंगार करना है । कभी भी माया की धूल में लिथड़ कर श्रृंगार बिगाड़ना नहीं है । 

2. इस ड्रामा को यथार्थ रीति समझकर अपनी अवस्था अचल, अडोल, स्थेरियम बनानी है । कभी भी मूँझना नहीं है, सदैव हर्षित रहना है ।

 

वरदान:-

भगवान और भाग्य की स्मृति से औरों का भी भाग्य बनाने वाले खुशनुम: खुशनसीब भव !   

अमृतवेले से लेकर रात तक अपने भिन्न-भिन्न भाग्य को स्मृति में लाओ और यही गीत गाते रहो वाह मेरा श्रेष्ठ भाग्य । जो भगवान और भाग्य की स्मृति में रहते हैं वही औरों को भाग्यवान बना सकते हैं । ब्राह्मण माना ही सदा भाग्यवान, सदा खुशनसीब । किसी की हिम्मत नहीं जो ब्राह्मण आत्मा की खुशी कम कर सके । हर एक खुशनुम:, खुशनसीब हो । ब्राह्मण जीवन में खुशी का जाना असम्भव है, भल शरीर चला जाए लेकिन खुशी जा नहीं सकती ।

 

स्लोगन:- 

माया के झूले को छोड़ अतीन्द्रिय सुख के झूले में सदा झूलते रहो ।     

 

ओम् शान्ति |


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Jul 26, 2014, 11:00:03 AM7/26/14
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27-07-14    प्रातः मुरली   ओम् शान्ति  “अव्यक्त-बापदादा”   रिवाइज:29-11-78   मधुबन
 


सन्तुष्टता से प्रसन्नता और प्रशंसा की प्राप्ति

बापदादा आज अपने विश्व में चमकने वाली मणियों को देख रहे हैं । हरेक मणी की अपनी- अपनी चमक है । हरेक मणी अपने द्वारा बाप के गुणों और कर्तव्य को नम्बरवार प्रत्यक्ष कर रही है । हरेक मणी द्वारा बापदादा दिखाई देता है । इस विचित्र रंगत को भक्तों ने ' 'जहाँ देखें वहाँ तू ही तू' ' कह दिया है । महारथी में भी बापदादा दिखाई देता । हरेक के मुख से एक ही बाबा-बाबा शब्द का गीत सुनाई देता । सर्व ब्राह्मण आत्माओं के नयनों में एक बाप नूर के समान समाया हुआ है - इसीलिए ब्राह्मण संसार में जहाँ देखें वहाँ तू ही तू का प्रैक्टिकल अनुभव होता है । बच्चों के वर्तमान समय के अनुभव को भक्तों ने अपने शब्दों में सर्वव्यापी कहा है । परमधाम निवासी बाप है वा हर संकल्प और कर्म में सदा साथी बाप अनुभव होता है? क्या अनुभव होता है साक्षी वा साथी? सर्व का साथी है तो सर्वव्यापी नहीं हुआ? भक्तों ने शब्द कापी किया है लेकिन कब और कैसे का भावार्थ भूल जाने के कारण गायन बदल ग्लानि हो गई । 

बापदादा सर्व बच्चों के वर्तमान स्वरूप से धारणा स्वरूप को देखते विशेष एक बात देख रहे हैं । कौन सी? सर्व बच्चों में से सदा सन्तुष्ट मणियां कितनी हैं? सबसे विशेष गुण, जो चेहरे से चमके वह सन्तुष्टता है । सन्तुष्टता तीनों ही प्रकार की चाहिए । एक - बाप से सन्तुष्ट । दूसरा - सदा अपने आप से सन्तुष्ट । तीसरा - सर्व सम्बन्ध और सम्पर्क से सन्तुष्ट । इसमें चैतन्य आत्मायें और प्रकृति दोनों आ जाते हैं । सन्तुष्टता की निशानी प्रत्यक्ष रूप में प्रसन्नता दिखाई देगी । सदा प्रसन्नचित । इस प्रसन्नता के आधार पर प्रत्यक्ष फल ऐसी आत्मा की सदा स्वत: ही सर्व से प्रशन्सा होगी । विशेषता है सन्तुष्टता, उसकी निशानी प्रसन्नता, उसका प्रत्यक्षफल प्रशन्सा । अब अपने आपको देखो । प्रशन्सा को प्रसन्नता से ही प्राप्त कर सकते हो । जो सदा स्वयं सन्तुष्ट वा प्रसन्न रहते हैं, उसकी प्रशन्सा हरेक अवश्य करते हैं । चलते-चलते पुरुषार्थी जीवन में समस्यायें या परिस्थितियाँ तो ड्रामा अनुसार आनी ही है । जन्म लेते ही आगे बढ़ने का लक्ष्य रखना अर्थात् परीक्षाओं और समस्याओं का आवाहन करना । अपने किए हुए आवाहन को भूल जाते हो? जब रास्ता तय करना है तो रास्ते के नजारे न हो यह हो सकता है? नजारों को देखते रूक जाते हो इसलिए मंजिल दूर अनुभव करते हो । नजारे देखते हुए पार करते चलना है । लेकिन नजारों को देख यह क्यों, यह क्या, यह ऐसे नहीं - यह वैसे नहीं, इन बातों में रूक जाते हो । हर नजारे को करेक्शन करने लग जाते हो । पार करने के बजाए करेक्शन करने में बिजी हो जाते हो इसलिए बाप की याद का कनेक्शन लूज़ कर देते हो, मनोरंजन के बजाए मन को मुरझा देते हो । वाह नजारा वाह! वाह-वाह के बजाए अई बहुत कहते हो । अई अर्थात् आश्चर्यजनक इसलिए चलते-चलते रूक जाते हो । थकने के कारण कभी बाप से मीठे-मीठे उल्हनें देते हुए रॉयल रूप में बाप से भी असन्तुष्ट हो जाते हो । कई बच्चे कहते हैं इतना पहले क्यों नहीं बताया! सहज मार्ग कहा - सहन मार्ग तो कहा नहीं । सहज मार्ग के बजाए सहन करने का मार्ग अनुभव करते हैं । लेकिन सहन करना ही आगे बढ़ना है । वास्तव में सहन करना नहीं होता लेकिन अपनी कमजोरी के कारण सहन अनुभव होता है । जैसे आग का गुण है जलाना - लेकिन उसके गुण का ज्ञान न होने कारण उससे लाभ लेने के बजाए नुकसान कर देते तो सुख के बजाए सहन करना पड़ता है - क्योंकि वस्तु के बजाए स्वयं को जला देते । गुण का ज्ञान न होने के कारण सुख के बजाए सहन करना पड़ता । वैसे समस्यायें वा परिस्थिति आने के कारण का ज्ञान न होने के कारण आगे बढ़ने के सुख के अनुभव के बजाए सहन करने का अनुभव करते हैं इसलिए सहज मार्ग के बजाए सहन करने का मार्ग अनुभव करते हैं । ऐसे बच्चे बाप से अर्थात् बाप के ज्ञान से वा ज्ञान के धारणा मार्ग से असन्तुष्ट रहते हैं । साथ-साथ स्वयं से भी असन्तुष्ट रहते हैं - स्वयं से असन्तुष्ट तो सर्व के सम्बन्ध और सम्पर्क से भी असन्तुष्ट । इस कारण प्रसन्न अर्थात् सदा खुशी नहीं रहती । अभी- अभी सन्तुष्ट अर्थात् प्रसन्नचित । अभी- अभी असन्तुष्ट इसलिए संगमयुग का विशेष खजाना अतीन्द्रिय सुख का अनुभव नहीं कर पाते हो । 

तो आज से सदा सन्तुष्ट और प्रसन्नता का विशेष वरदान स्वयं भी लो और औरों को भी दो । ऐसे ही बाप की वा अपने आपकी प्रशन्सा कर सकेंगे । प्रशन्सा का श्रेष्ठ साधन भी हर ब्राह्मण की प्रसन्नता है । कोई भी कार्य की प्रशन्सा सर्व की प्रसन्नता पर आधार रखती है । इस यज्ञ की अन्तिम आहुति सर्व ब्राह्मणों की सदा प्रसन्नता । प्रत्यक्षता अर्थात् प्रशन्सा का आवाज गूँजेगा अर्थात् विजय का झण्डा लहरायेगा । समझा अब क्या करना है? सदा प्रसन्न रहो और सदा सर्व को प्रसन्न करो । अच्छा – 

ऐसे सदा बाप के आज्ञाकारी, सदा सन्तुष्ट और प्रसन्न रहने वाले, सर्व को सदा प्रसन्नता का वरदान देने वाले महादानी - वरदानी बच्चों को बापदादा का याद प्यार और नमस्ते । 

बाम्बे निवासियों को विशेष रूप से बापदादा याद प्यार दे रहे हैं - बाम्बे निवासियों में हिम्मत और उमंग बहुत अच्छा है । बाम्बे निवासियों को देख बाप के साथ प्रकृति ने भी स्वागत किया है (क्योंकि ठण्डी बहुत हो गई है) प्रकृति ने अभ्यास कराया है । अन्त में आने वाले पेपर का पहले से ही अनुभव कराके पक्का मजबूत बनाया है इसलिए घबराना नहीं । बाम्बे निवासियों का बाप से प्यार है ना । बापदादा का भी बच्चों से विशेष प्यार है । बाम्बे निवासी अब सदा सन्तुष्टता औ प्रसन्नता का पेपर नम्बरवन में पास करेंगे - बहुत अच्छा है । आप साथ छोड़ो तो भी बापदादा नहीं छोड़ेंगे । विशेष बाम्बे और देहली में आदि रत्न ज्यादा है विश्व सेवा की स्थापना के कार्य में बाम्बे और देहली का विशेष सहयोग है । समय पर सहयोगी बनने वालों का महत्व होता है - इसलिए सहयोगी बच्चों से बाप का भी स्नेह है । अच्छा

पार्टियों से :-

1. सदा “विजयी भव” के वरदानी मूर्त हो? वरदाता ने जो वरदान दिया उसी वरदान को सदा जीवन में लाना यह हरेक का अपना काम है । इस वरदान को जीवन में समाना अर्थात् वरदानी स्वरूप बनना । ऐसे बने हो? महावीर को भी वरदानी कहते हैं और शक्तियों को भी वरदानी कहते हैं । अब आपके जड़ चित्रों द्वारा अनेक भक्त वरदान प्राप्त कर लेते हैं तो चैतन्य में तो वरदानों से झोली भरने वाले हो ना? महावीर हो ना? महावीर अर्थात् सदा विजयी । जब अविनाशी बाप है तो वरदान भी अविनाशी है । अल्पकाल के लिए नहीं । सिर्फ सम्भालना आता है ना कि चोरी हो जाती है? सिर्फ एक बात याद रखो कि लेवता नहीं हूँ, लेकिन दाता हूँ । अभी लेने के दिन समाप्त हो गए अभी दाता बन देने का समय है । माँगना तो बचपन में होता, वानप्रस्थी कहे छोटा सा खिलौना दे दो - यह अच्छा लगेगा? थोड़ी शक्ति दे दो, थोड़ी मदद करो - यह खिलौना माँगते हो । अब स्वयं तृप्त आत्मा बनो । दाता के बच्चे और मांगते हो तो देखने वाले क्या कहेंगे? सफलता का साधन है स्वयं सदा सफलता मूर्त बनो । स्वयं की वृत्ति वायब्रेशन फैलाती है और वायब्रेशन के आधार पर सर्व को अनुभूति होगी इसलिए कार्य करने के पहले विशेष स्वयं की वृत्ति के अटेंशन की भट्ठी चाहिए, इससे ही वायब्रेशन द्वारा अनेकों की वृत्ति को परिवर्तन कर सकेंगे । पहले यह अटेंशन रखना - सदा खुशी के झूले में झूलते रहो । हर्षितमुख अनेकों को अपने तरफ आकर्षित करता है । 

कुमारियों को देखते हुए :-

कुमारियों पर बहुत बड़ी जिम्मेवारी है । एक अनेकों के कल्याण प्रति निमित्त बन सकती है । ब्रह्माकुमारियां वह जो विश्व के कल्याण के निमित्त बने । बेहद विश्व के कल्याणकारी न कि हद के । लगन में कमी है तो विघ्न अपना काम करेगा । अगर आग तेज है तो किचड़ा भस्म हो जायेगा । लगन है तो विघ्न नहीं रह सकता, कर्मयोग से कर्मभोग भी परिवर्तन हो जाता, परिवर्तन करना अपनी हिम्मत का काम है । कुमारियों में तो सदैव बापदादा की उम्मीद है । अच्छा 

अव्यक्त महावाक्य - परमात्म प्यार में सदा लवलीन रहो 

परमात्म प्यार आनंदमय झूला है, इस सुखदाई झूले में झूलते सदा परमात्म प्यार में लवलीन रहो तो कभी कोई परिस्थितियां माया की हलचल आ नहीं सकती । यह परमात्म-प्यार अखुट है, अटल है, इतना है जो सर्व को प्राप्त हो सकता है । लेकिन परमात्म-प्यार प्राप्त करने की विधि है-न्यारा बनना । जो जितना न्यारा है उतना वह परमात्म प्यार का अधिकारी है । परमात्म प्यार में समाई हुई आत्मायें कभी भी हद के प्रभाव में नहीं आ सकती, सदा बेहद की प्राप्तियों में मगन रहती हैं । उनसे सदा रूहानियत की खुशबू आती है । प्यार की निशानी है-जिससे प्यार होता है उस पर सब न्यौछावर कर देते हैं । बाप का बच्चों से इतना प्यार है जो रोज प्यार का रेसपान्ड देने के लिए इतना बड़ा पत्र लिखते हैं । यादप्यार देते हैं और साथी बन सदा साथ निभाते हैं । तो इस प्यार में अपनी सब कमजोरियां कुर्बान कर दो । बच्चों से बाप का प्यार है इसलिए सदा कहते हैं बच्चे जो हो, जैसे हो-मेरे हो । ऐसे आप भी सदा प्यार में लवलीन रहो, दिल से कहो बाबा जो हो वह सब आप ही हो । कभी असत्य के राज्य के प्रभाव में नहीं आओ । जो प्यारा होता है उसे याद किया नहीं जाता, उसकी याद स्वत आती है । सिर्फ प्यार दिल का हो, सच्चा और नि:स्वार्थ हो । जब कहते हो मेरा बाबा, प्यारा बाबा-तो प्यारे को कभी भूल नहीं सकते । और नि:स्वार्थ प्यार सिवाए बाप के किसी आत्मा से मिल नहीं सकता इसलिए कभी मतलब से याद नहीं करो, नि:स्वार्थ प्यार में लवलीन रहो । परमात्म-प्यार के अनुभवी बनो तो इसी अनुभव से सहजयोगी बन उड़ते रहेंगे । परमात्म-प्यार उड़ाने का साधन है । उड़ने वाले कभी धरनी की आकर्षण में आ नहीं सकते । माया का कितना भी आकर्षित रूप हो लेकिन वह आकर्षण उड़ती कला वालों के पास पहुँच नहीं सकती । यह परमात्म प्यार की डोर दूर-दूर से खींच कर ले आती है । यह ऐसा सुखदाई प्यार है जो इस प्यार में एक सेकण्ड भी खो जाते हैं उनके अनेक दुःख भूल जाते हैं और सदा के लिए सुख के झूले में झूलने लगते हैं । जीवन में जो चाहिए अगर वह कोई दे देता है तो यही प्यार की निशानी होती है । तो बाप का आप बच्चों से इतना प्यार है जो जीवन के सुख-शान्ति की सब कामनायें पूर्ण कर देते हैं । बाप सुख ही नहीं देते लेकिन सुख के भण्डार का मालिक बना देते हैं । साथ-साथ श्रेष्ठ भाग्य की लकीर खींचने का कलम भी देते हैं, जितना चाहे उतना भाग्य बना सकते हो - यही परमात्म प्यार है । जो बच्चे परमात्म प्यार में सदा लवलीन, खोये हुए रहते हैं उनकी झलक और फलक, अनुभूति की किरणें इतनी शक्तिशाली होती हैं जो कोई भी समस्या समीप आना तो दूर लेकिन आंख उठाकर भी नहीं देख सकती । उन्हें कभी भी किसी भी प्रकार की मेहनत हो नहीं सकती । बाप का बच्चों से इतना प्यार है जो अमृतवेले से ही बच्चों की पालना करते हैं । दिन का आरम्भ ही कितना श्रेष्ठ होता है! स्वयं भगवन मिलन मनाने के लिये बुलाते हैं, रूहरिहान करते हैं, शक्तियाँ भरते हैं! बाप की मोहब्बत के गीत आपको उठाते हैं । कितना स्नेह से बुलाते हैं, उठाते हैं - मीठे बच्चे, प्यारे बच्चे, आओ...... । तो इस प्यार की पालना का प्रैक्टिकल स्वरूप है 'सहज योगी जीवन' । अच्छा ।

 

वरदान:-

ब्राह्मण जन्म की जन्मपत्री को जान सदा खुशी में रहने बाले श्रेष्ठ भाग्यवान भव !   

ब्राह्मण जीवन नया जीवन है, ब्राह्मण आदि में देवी-देवता हैं और अभी बी के. हैं । ब्राह्मणों की जन्म पत्री में तीनों ही काल अच्छे से अच्छा है । जो हुआ वह भी अच्छा और जो हो रहा है वो और अच्छा और जो होने वाला है वह बहुत-बहुत अच्छा । ब्राह्मण जीवन की जन्मपत्री सदा ही अच्छी है, गारन्टी है । तो सदा इसी खुशी में रहो कि स्वयं भाग्य विधाता बाप ने भाग्य की श्रेष्ठ रेखा खींच दी, अपना बना लिया ।

 

स्लोगन:- 

एकरस स्थिति का अनुभव करना है तो एक बाप से सर्व संबंधों का रस लो ।     
 

ओम् शान्ति |

 


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Date: 2014-07-27 10:44 GMT-04:00
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28-07-14   प्रातः मुरली    ओम् शान्ति   “बापदादा”   मधुबन
 


"मीठे बच्चे - इस शरीर को न देख आत्मा को देखो, अपने को आत्मा समझ आत्मा से बात करो, इस अवस्था को जमाना है, यही ऊंची मंजिल है"   

                                                       
प्रश्न:-   
तुम बच्चे बाप के साथ ऊपर (घर में) कब जायेंगे?


उत्तर:-
जब अपवित्रता की मात्रा रिंचक भी नहीं रहेगी । जैसे बाप प्योर है ऐसे तुम बच्चे भी प्योर बनेंगे तब ऊपर जा सकेंगे । अभी तुम बच्चे बाप के सम्मुख हो । ज्ञान सागर से ज्ञान सुन-सुन कर जब फुल हो जायेंगे, बाप को नॉलेज से खाली कर देंगे फिर वह भी शान्त हो जायेंगे और तुम बच्चे भी शान्तिधाम में चले जायेंगे । वहाँ ज्ञान टपकना बंद हो जाता । सब कुछ दे दिया फिर उनका पार्ट है साइलेन्स का ।

 

ओम् शान्ति |

शिव भगवानुवाच । जब शिव भगवानुवाच कहा जाता है तो समझ जाना चाहिए-एक शिव ही भगवान् वा परमपिता है । उनको ही तुम बच्चे वा आत्मा याद करती हो । परिचय तो मिला है रचता बाप से । यह तो जरूर है नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार ही याद करते होंगे । सब एकरस याद नहीं करेंगे । यह बहुत सूक्ष्म बात है । अपने को आत्मा समझ दूसरे को भी आत्मा समझें, यह अवस्था जमाने में टाइम लगता है । वह मनुष्य लोग तो कुछ भी नहीं जानते । न जानने कारण सर्वव्यापी कह देते । जिस प्रकार तुम बच्चे अपने को आत्मा समझते हो, बाप को याद करते हो, ऐसे और कोई याद नहीं कर सकते होंगे । कोई भी आत्मा का योग बाप के साथ है नहीं । यह बातें हैं बहुत गुह्य, महीन । अपन को आत्मा समझ बाप को याद करना है । कहते भी हैं हम भाई- भाई हैं तो आत्मा को ही देखना चाहिए । शरीर को नहीं देखना चाहिए । यह बहुत बड़ी मंजिल है । बहुत हैं जो बाप को कभी याद भी नहीं करते होंगे । आत्मा पर मैंल चढ़ी हुई है । मुख्य आत्मा की ही बात है । आत्मा ही अब तमोप्रधान बनी है, जो सतोप्रधान थी-यह आत्मा में ज्ञान है । ज्ञान का सागर परमात्मा ही है । तुम अपने को ज्ञान सागर नहीं कहेंगे । तुम जानते हो हमको बाबा से पूरा ही ज्ञान लेना है । वह अपने पास रखकर क्या करेंगे । अविनाशी ज्ञान रत्नों का धन तो बच्चों को देना ही है । बच्चे नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार उठाने वाले हैं । जो जास्ती उठाते हैं वही अच्छी सर्विस कर सकते हैं । बाबा को ज्ञान सागर कहा जाता है । वह भी आत्मा, तुम भी आत्मायें । तुम आत्मायें सारा ज्ञान ले लेती हो । जैसे वह एवर प्योर है, तुम भी एवर प्योर बनेंगे । फिर जब अपवित्रता की रिंचक भी नहीं रहेगी तब ऊपर चले जायेंगे । बाप याद के यात्रा की युक्ति सिखलाते हैं । यह तो जानते हैं सारा दिन याद नहीं रहती है । यहाँ तुम बच्चों को बाप सम्मुख बैठ समझाते हैं, और बच्चे तो सम्मुख नहीं सुनते । मुरली पढ़ते हैं । यहाँ तुम सम्मुख हो । अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो और ज्ञान भी धारण करो । हमको बाप जैसा सम्पूर्ण ज्ञान सागर बनना है । फुल नॉलेज समझ जायेंगे तो जैसेकि बाप को नॉलेज से खाली कर देंगे फिर वह शान्त हो जायेंगे । ऐसे नहीं, उनके अन्दर ज्ञान टपकता होगा । सब कुछ दे दिया फिर उनका पार्ट रहा साइलेन्स का । जैसे तुम साइलेन्स में रहेंगे तो ज्ञान थोड़ेही टपकेगा । यह भी बाप ने समझाया है आत्मा संस्कार ले जाती है । कोई सन्यासी की आत्मा होगी तो छोटेपन में ही उनको शास्त्र कण्ठ हो जायेंगे । फिर उनका नाम बहुत हो जाता है । अब तुम तो आये हो नई दुनिया में जाने लिए । वहाँ तो ज्ञान के संस्कार नहीं ले आ सकते । यह संस्कार मर्ज हो जाते हैं । बाकी आत्मा को अपनी सीट लेनी है नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार । फिर तुम्हारे शरीरों पर नाम पड़ते हैं । शिवबाबा तो है ही निराकार । कहते हैं मैं इन आरगन्स का लोन लेता हूँ । वह तो सिर्फ सुनाने ही आते हैं । वह कोई का ज्ञान सुनेंगे नहीं क्योंकि स्वयं ज्ञान का सागर है ना । सिर्फ मुख द्वारा ही वह मुख्य काम करते हैं । आते ही हैं सबको रास्ता बताने । बाकी सुनकर क्या करेंगे । वह सदैव सुनाते ही रहते है कि ऐसे-ऐसे करो । सारे झाड़ का राज़ सुनाते हैं । तुम बच्चों की बुद्धि में है कि नई दुनिया तो बहुत छोटी होगी । यह पुरानी दुनिया तो कितनी बड़ी है । सारी दुनिया में कितनी लाइट जलती है । लाइट द्वारा क्या-क्या होता है । वहाँ तो दुनिया भी छोटी, लाइट भी थोड़ी होगी । जैसे एक छोटा-सा गाँव होगा । अभी तो कितने बड़े-बड़े गाँव हैं । वहाँ इतने नहीं होंगे । थोड़े मुख्य-मुख्य अच्छे रास्ते होंगे । 5 तत्व भी वहाँ सतोप्रधान बन जाते हैं । कभी चंचलता नहीं करते । सुखधाम कहा जाता है । उसका नाम ही है हेवन । आगे चलकर तुम जितना नजदीक आते रहेंगे उतना वृद्धि को पाते रहेंगे । बाप भी साक्षात्कार कराते रहेंगे । फिर उस समय लड़ाई में भी लश्कर की अथवा एरौप्लेन आदि की दरकार नहीं रहेगी । वह तो कहते हम यहाँ बैठे सबको खत्म कर सकते हैं । फिर यह एरोप्लेन आदि थोड़ेही काम में आयेंगे । फिर यह चन्द्रमा आदि में प्लाट आदि देखने भी नहीं जायेंगे । यह सब फालतू साइंस का घमण्ड है । कितना शो कर रहे हैं । ज्ञान में कितनी साइलेन्स है इसको ईश्वरीय डात (देन) कहते हैं । साइंस में तो हंगामा ही हंगामा है । वह शान्ति को जानते ही नहीं ।

तुम समझते हो विश्व में शान्ति तो नई दुनिया में थी, वह है सुखधाम । अभी तो दुःख- अशान्ति है । यह भी समझाना है तुम शान्ति चाहते हो, कभी अशान्ति हो ही नहीं, वह तो है शान्तिधाम और सुखधाम में । स्वर्ग तो सब चाहते हैं । भारतवासी ही वैकुण्ठ स्वर्ग को याद करते हैं । और धर्म वाले वैकुण्ठ को याद नहीं करते । वह सिर्फ शान्ति को याद करेंगे । सुख को तो याद कर न सके । लॉ नहीं कहता । सुख को तो तुम ही याद करते हो इसलिए पुकारते हो हमें दुःख से लिबरेट करो । आत्मायें असुल शान्तिधाम में रहने वाली हैं । यह भी कोई जानते थोड़ेही हैं । बाप समझाते हैं तुम बेसमझ थे । कब से बेसमझ बने? 16 कला से 12 - 14 कला बनते जाते, माना बेसमझ बनते जाते । अभी कोई कला नहीं रही है । कान्फ्रेन्स करते रहते हैं । स्त्रियों को दु :ख क्यों है? अरे, दुःख तो सारी दुनिया में है । अथाह दु :ख हैं । अब विश्व में शान्ति कैसे हो? अब तो ढेर के ढेर धर्म हैं । सारे विश्व में शान्ति तो अब हो न सके । सुख को तो जानते ही नहीं । तुम बच्चियाँ बैठ समझायेंगी इस दुनिया में अनेक प्रकार के दुःख हैं, अशान्ति है! जहाँ से हम आत्मायें आई हैं वह है शान्तिधाम और जहाँ यह आदि सनातन देवी- देवता धर्म था, वह था सुखधाम । आदि सनातन हिन्दू धर्म नहीं कहेंगे । आदि माना प्राचीन । वह तो सतयुग में था । उस समय सब पवित्र थे । वह है ही निर्विकारी दुनिया, विकार का नाम नहीं । फर्क है ना । पहले-पहले तो निर्विकारीपना चाहिए ना इसलिए बाप कहते हैं मीठे-मीठे बच्चों, काम पर जीत पहनो । अपने को आत्मा समझो । अभी आत्मा अपवित्र है, आत्मा में खाद पड़ी है तब जेवर भी ऐसे बने हैं । आत्मा पवित्र तो जेवर भी पवित्र होगा, उनको ही वाइसलेस वर्ल्ड कहा जाता है । बड़ का मिसाल भी तुम दे सकते हो । सारा झाड़ खड़ा है, फाउन्डेशन है नहीं । यह आदि सनातन देवी-देवता धर्म है नहीं और सब खड़े हैं । सब अपवित्र हैं, इनको कहा जाता है मनुष्य । वह है देवतायें । मैं मनुष्य को देवता बनाने आया हूँ । 84 जन्म भी मनुष्य लेते हैं । सीढ़ी दिखानी है कि तमोप्रधान बनते हैं तो हिन्दू कह देते हैं । देवता कह न सकें क्योंकि पतित हैं । ड्रामा में यह राज़ है ना । नहीं तो हिन्दू धर्म कोई है नहीं । आदि सनातन हम ही देवी-देवता थे । भारत ही पवित्र था, अब अपवित्र है । तो अपने को हिन्दू कहलाते हैं । हिन्दू धर्म तो कोई ने स्थापन किया नहीं है । यह बच्चों को अच्छी रीति धारण कर समझाना है । आजकल तो इतना टाइम भी नहीं देते हैं । कम से कम आधा घण्टा दें तब प्याइंट सुनाई जाए । प्याइंट तो ढेर हैं । फिर उनसे मुख्य-मुख्य सुनाई जाती हैं । पढ़ाई में भी जैसे-जैसे पढ़ते जाते हैं तो फिर हल्की पढ़ाई अल्फ-बे आदि थोड़ेही याद रहती है । वह भूल जाती है । तुमको भी कहेंगे अभी तुम्हारा ज्ञान बदल गया है । अरे, पढ़ाई में ऊपर चढ़ते जाते हैं तो पहली पढ़ाई भूलती जाती है ना । बाप भी हमको नित्य नई-नई बातें सुनाते हैं । पहले हल्की पढ़ाई थी, अब बाप गुह्य-गुह्य बातें सुनाते रहते हैं । ज्ञान का सागर है ना । सुनाते-सुनाते फिर पिछाड़ी में दो अक्षर कह देते अल्फ को समझा तो भी काफी है । अल्फ को जानने से बे को जान ही लेंगे । इतना सिर्फ समझाओ तो भी ठीक है । जो जास्ती ज्ञान नहीं धारण कर सकते वह ऊंच पद भी पा नहीं सकते । पास विद् ऑनर हो न सके । कर्मातीत अवस्था को पा न सके, इसमें बड़ी मेहनत चाहिए । याद की भी मेहनत है । ज्ञान धारण करने की भी मेहनत है । दोनों में सब होशियार हो जाएं सो भी तो हो न सकें । राजधानी स्थापन हो रही है । सब नर से नारायण कैसे बनेंगे । इस गीता पाठशाला की एम ऑबजेक्ट तो यह है । वही गीता ज्ञान है । वह भी कौन देते हैं, यह तो सिवाए तुम्हारे कोई जानते ही नहीं । अभी है कब्रिस्तान फिर परिस्तान होने का है । 

अभी तुम्हें ज्ञान चिता पर बैठ पुजारी से पूज्य जरूर बनना है । साइंस वाले भी कितने होशियार होते जाते हैं । इन्वेंशन निकालते रहते हैं । भारतवासी हर बात का अक्ल वहाँ से सीखकर आते हैं । वह भी पिछाड़ी में आयेंगे तो इतना ज्ञान उठायेंगे नहीं । फिर वहाँ भी आकर यही इन्जीनियरिंग आदि का काम करेंगे । राजा-रानी तो बन न सके, राजा-रानी के आगे सर्विस में रहेंगे । ऐसी-ऐसी इन्वेंशन निकालते रहेंगे । राजा रानी बनते ही हैं सुख के लिए । वहाँ तो सब सुख मिल जाने हैं । तो बच्चों को पुरूषार्थ पूरा करना चाहिए । फुल पास होकर कर्मातीत अवस्था को पाना है । जल्दी जाने का ख्याल नहीं आना चाहिए । अभी तुम हो ईश्वरीय सन्तान । बाप पढ़ा रहे हैं । यह मिशन है मनुष्यों को चेन्ज करने की । जैसे बौद्धियों की, क्रिश्चियन की  मिशन होती है ना । कृष्ण और क्रिश्चियन की भी रास मिलती है । उन्हों के लेन-देन का भी बहुत कनेक्शन है । जो इतनी मदद करते हैं, उनकी भाषा आदि छोड़ देना यह भी एक इन्सल्ट है । वह तो आते ही पीछे हैं । न बहुत सुख, न बहुत दु :ख उठाते । सारी इन्वेंशन वे लोग निकालते हैं । यहाँ भल कोशिश करते हैं परन्तु एक्यूरेट कभी बना नहीं सकेंगे । विलायत की चीज़ अच्छी होती है । ऑनेस्टी से बनाते हैं । यहाँ तो डिस- ऑनेस्टी से बनाते हैं, अथाह दु :ख हैं । सबके दुःख दूर करने वाला एक बाप के सिवाए और कोई मनुष्य हो न सके । भल कितनी भी कान्फ्रेन्स करते हैं, विश्व में शान्ति हो, धक्का खाते रहते हैं । सिर्फ माताओं के दु :ख की बात नहीं, यहाँ तो अनेक प्रकार के दुःख हैं । सारी दुनिया में झगड़े मारामारी की ही बात है । पाई-पैसे की बात पर मारामारी कर देते हैं । वहाँ तो दुःख की बात नहीं होती । यह भी हिसाब निकालना चाहिए । लड़ाई कभी भी शुरू हो सकती है । भारत में रावण जब से आता है तो पहले-पहले घर में लडाई शुरू होती है । जुदा-जुदा हो जाते हैं, आपस में लड़ मरते हैं फिर बाहर वाले आते हैं । पहले ब्रिटिश थोड़ेही थे फिर वह आकर बीच में रिश्वत आदि देकर अपना राज्य कर लेते हैं । कितना रात-दिन का फर्क है । नया कोई भी समझ न सके । नई नॉलेज है ना, जो फिर प्राय: लोप हो जाती है । बाप नॉलेज देते हैं फिर वह गुम हो जाती है । यह एक ही पढ़ाई, एक ही बार, एक ही बाप से मिलती है । आगे चल तुम सबको साक्षात्कार होते रहेंगे कि तुम यह बनेंगे । परन्तु उस समय कर ही क्या सकेंगे । उन्नति को पा नहीं सकेंगे । रिजल्ट निकल चुकी फिर ट्रांसफर होने की बात हो जायेगी । फिर रोयेंगे, पीटेंगे । हम बदली हो जायेंगे नई दुनिया के लिए । तुम मेहनत करते हो, जल्दी चारों तरफ आवाज निकल जाये । फिर आपेही सेंटर्स पर भागते रहेंगे । परन्तु जितना देरी होती जायेगी, टू लेट होते रहेंगे । फिर कुछ जमा नहीं होगा । पैसे की दरकार नहीं रहेगी । तुमको समझाने लिए यह बैज़ ही काफी है । यह ब्रह्मा सो विष्णु, विष्णु सो ब्रह्मा । यह बैज ऐसा है जो सब शास्त्रों का तन्त (सार) इसमें है । बाबा बैज़ की बहुत महिमा करते हैं । वह समय आयेगा जो यह तुम्हारे बैज सब नयनों पर रखते रहेंगे । मनमनाभव, इसमें है-मुझे याद करो तो यह बनेंगे । फिर यही 84 जन्म लेते हैं । पुनर्जन्म न लेने वाला एक ही बाप है । अच्छा! 

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग । रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते ।

 

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1. याद की मेहनत और ज्ञान की धारणा से कर्मातीत अवस्था को पाने का पुरूषार्थ करना है । ज्ञान सागर की सम्पूर्ण नॉलेज स्वयं में धारण करनी है । 

2. आत्मा में जो खाद पड़ी है उसे निकाल सम्पूर्ण वाइसलेस बनना है । रिंचक मात्र भी अपवित्रता का अंश न रहे । हम आत्मा भाई- भाई हैं....... यह अभ्यास करना है ।

 

वरदान:-

ब्राह्मण जीवन में सर्व खजानों को सफल कर सदा प्राप्ति सम्पन्न बनने वाले सन्तुष्टमणि भव !   

ब्राह्मण जीवन का सबसे बड़े से बड़ा खजाना है सन्तुष्ट रहना । जहाँ सर्व प्राप्तियां हैं वहाँ सन्तुष्टता है और जहाँ सन्तुष्टता है वहाँ सब कुछ है । जो सन्तुष्टता के रत्न हैं वह सब प्राप्ति स्वरूप हैं, उनका गीत है पाना था वह पा लिया...... ऐसे सर्व प्राप्ति सम्पन्न बनने की विधि है - मिले हुए सर्व खजानों को यूज़ करना क्योंकि जितना सफल करेंगे उतना खजाने बढ़ते जायेंगे ।

 

स्लोगन:- 

होलीहंस उन्हें कहा जाता जो सदा अच्छाई रूपी मोती ही चुगते हैं, अवगुण रूपी कंकड़ नहीं ।     

 

ओम् शान्ति |

 


28.07.14-h.pdf

Naina Patel

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Jul 29, 2014, 4:55:19 AM7/29/14
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Date: 2014-07-28 12:06 GMT-04:00
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29-07-14    प्रातः मुरली    ओम् शान्ति   “बापदादा”      मधुबन
 


"मीठे बच्चे - सर्विस समाचार सुनने, पढ़ने का भी तुम्हें शौक चाहिए, क्योंकि इससे उमंग-उत्साह बढ़ता है, सर्विस करने का संकल्प उठता है"   

                                                        
प्रश्न:-   
संगमयुग पर बाप तुम्हें सुख नहीं देते हैं लेकिन सुख का रास्ता बताते हैं - क्यों?


उत्तर:-
क्योंकि बाप के सब बच्चे हैं, अगर एक बच्चे को सुख दें तो यह भी ठीक नहीं । लौकिक बाप से बच्चों को बराबर हिस्सा मिलता है, बेहद का बाप हिस्सा नहीं बाँटते, सुख का रास्ता बताते हैं । जो उस रास्ते पर चलते हैं, पुरूषार्थ करते हैं, उन्हे ऊंच पद मिलता है । बच्चों को पुरूषार्थ करना है, सारा मदार पुरूषार्थ पर है ।

 

ओम् शान्ति |

बच्चे जानते हैं बाप मुरली बजाते हैं । मुरली सबके पास जाती है और जो मुरली पढ़कर सर्विस करते हैं उन्हों का समाचार मैगजीन में आता है । अब जो बच्चे मैगजीन पढ़ते हैं, उन्हें सेन्टर्स के सर्विस समाचार का मालूम पड़ेगा-फलानी-फलानी जगह ऐसी सर्विस हो रही है । जो पढ़ेंगे ही नहीं तो उनको कुछ भी समाचार का मालूम नहीं पड़ेगा और पुरूषार्थ भी नहीं करेंगे । सर्विस का समाचार सुनकर दिल में आता है मैं भी ऐसी सर्विस करूँ । मैगजीन से मालूम पड़ता है, हमारे भाई-बहिन कितनी सर्विस करते हैं । यह तो बच्चे समझते हैं-जितनी सर्विस, उतना ऊंच पद मिलेगा । इसलिए मैगजीन भी उत्साह दिलाती है सर्विस के लिए । यह कोई फालतू नहीं बनती है । फालतू वह समझते हैं जो खुद पढ़ते नहीं हैं । कोई कहते हम अक्षर नहीं जानते, अरे रामायण, भागवत, गीता आदि सुनने के लिए जाते हैं, यह भी सुननी चाहिए । नहीं तो सर्विस का उमंग नहीं बढ़ेगा । फलानी जगह यह सर्विस हुई । शौक हो तो किसको कहें वह पढ़कर सुनाये । बहुत सेन्टर्स पर ऐसे भी होगा जो मैगजीन नहीं पढ़ते होंगे । बहुत हैं जिनके पास तो सर्विस का नाम-निशान भी नहीं रहता । तो पद भी ऐसा पाएंगे । यह तो समझते हैं राजधानी स्थापन हो रही है, उसमें जो जितनी मेहनत करते हैं, उतना पद पाते हैं । पढ़ाई में अटेंशन नहीं देंगे तो फेल हो जायेंगे । सारा मदार है इस समय की पढ़ाई पर । जितना पढ़ेंगे और पढ़ायेंगे उतना अपना ही फायदा है । बहुत बच्चे हैं जिनको मैगजीन पढ़ने का ख्याल भी नहीं आता है । वो पाई-पैसे का पद पा लेंगे । वहाँ यह ख्यालात नहीं रहती कि इसने पुरूषार्थ नहीं किया है तो यह पद मिला है । नहीं । कर्म-विकर्म की बातें सब यहाँ बुद्धि में हैं । कल्प के संगमयुग पर ही बाप समझाते हैं, जो नहीं समझते हैं वह तो जैसे पत्थरबुद्धि हैं । तुम भी समझते हो हम तुच्छ बुद्धि थे फिर उसमें भी परसेन्टेज होती है । बाबा बच्चों को समझाते रहते हैं, अभी कलियुग है, इनमें अपार दुःख होते हैं । यह- यह दु :ख है, जो सेन्सीबुल होंगे वह झट समझ जायेंगे कि यह तो ठीक बोलते हैं । तुम भी जानते हो कल हम कितने दु :खी थे, अपार दुःखों के बीच थे । अभी फिर अपार सुखों के बीच में जा रहे हैं । यह है ही रावण राज्य कलियुग-यह भी तुम जानते हो । जो जानते हैं लेकिन औरों को नहीं समझाते हैं तो बाबा कहेगा कुछ नहीं जानते हैं । जानते हैं तब कहें जब सर्विस करें, समाचार मैगजीन में आये । दिन-प्रतिदिन बाबा बहुत सहज प्याइंटस भी सुनाते रहते हैं । वो लोग तो समझते कलियुग अजुन बच्चा है, जब संगम समझे तब भेंट कर सकें-सतयुग और कलियुग में । कलियुग में अपार दु :ख हैं, सतयुग में अपार सुख हैं । बोलो, अपार सुख हम बच्चों को बाप दे रहे हैं जो हम वर्णन कर रहे हैं । और कोई ऐसे समझा न सके । तुम नई बातें सुनाते हो और कोई तो यह पूछ न सके कि तुम स्वर्गवासी हो या नर्कवासी हो? तुम बच्चों में भी नम्बरवार हैं, इतनी प्याइंट्स याद नहीं कर सकते हैं, समझाने समय देह- अभिमान आ जाता है । आत्मा ही सुनती वा धारण करती है । परन्तु अच्छे- अच्छे महारथी भी यह भूल जाते हैं । देह- अभिमान में आकर बोलने लग पड़ते हैं, ऐसे सबका होता है । बाप तो कहते हैं सब पुरूषार्थी हैं । ऐसे नहीं कि आत्मा समझ बात करते हैं । नहीं, बाप आत्मा समझ ज्ञान देते हैं । बाकी जो भाई- भाई हैं, वह पुरूषार्थ कर रहे हैं-ऐसी अवस्था में ठहरने का । तो बच्चों को भी समझाना है, कलियुग में अपार दु :ख हैं, सतयुग में अपार सुख हैं । अभी संगमयुग चल रहा है । बाप रास्ता बताते हैं, ऐसे नहीं बाप सुख देते हैं । सुख का रास्ता बताते हैं । रावण भी दु :ख देते नहीं हैं, दु :ख का उल्टा रास्ता बताते हैं । बाप न दुःख देते हैं, न सुख देते हैं, सुख का रास्ता बताते हैं । फिर जो जितना पुरूषार्थ करेंगे उतना सुख मिलेगा । सुख देते नहीं हैं । बाप की श्रीमत पर चलने से सुख पाते हैं । बाप तो सिर्फ रास्ता बताते हैं, रावण से दु:ख का रास्ता मिलता है । अगर बाप देता हो तो फिर सबको एक जैसा वर्सा मिलना चाहिए । जैसे लौकिक बाप भी वर्सा बांटते हैं । यहाँ तो जो जैसा पुरूषार्थ करे । बाप रास्ता बहुत सहज बताते हैं । ऐसे-ऐसे करेंगे तो इतना ऊंच पद पाएंगे । बच्चों को पुरूषार्थ करना होता है-हम सबसे जास्ती पद पायें, पढ़ना है । ऐसे नहीं यह भल ऊंच पद पायें, मैं बैठा रहूँ । नहीं, पुरूषार्थ फर्स्ट । ड्रामा अनुसार पुरूषार्थ जरूर करना होता है । कोई तीव्र पुरूषार्थ करते हैं, कोई डल । सारा पुरूषार्थ पर मदार है । बाप ने तो रास्ता बताया है-मुझे याद करो । जितना याद करेंगे उतना विकर्म विनाश होंगे । ड्रामा पर छोड़ नहीं देना है । यह तो समझ की बात है । 

वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी रिपीट होती है । तो जरूर जो पार्ट बजाया है वही बजाना पड़े । सब धर्म फिर से अपने समय पर आयेंगे । समझो क्रिस्चियन अब 100 करोड़ है फिर इतने ही पार्ट बजाने आयेंगे । न आत्मा विनाश होती, न उनका पार्ट कभी विनाश हो सकता है । यह समझने की बातें हैं । जो समझते हैं तो समझायेंगे भी जरूर । धन दिये धन ना खुटे । धारणा होती रहेगी, औरों को भी साहूकार बनाते रहेंगे लेकिन तकदीर में नहीं है तो फिर अपने को भी बेवश समझते हैं । टीचर कहेंगे तुम बोल नहीं सकते तो तुम्हारी तकदीर में पाई-पैसे का पद है । तकदीर में नहीं तो तदबीर क्या कर सकते । यह है बेहद की पाठशाला । हर एक टीचर की सब्जेक्ट अपनी होती है । बाप के पढ़ाने का तरीका बाप ही जाने और तुम बच्चे जानो, और कोई नहीं जान सकते । तुम बच्चे कितनी कोशिश करते हो तो भी जब कोई समझें । बुद्धि में बैठता ही नहीं है । जितना नजदीक होते जायेंगे, देखने में आता है होशियार होते जायेंगे । अब म्युजियम, रूहानी कॉलेज आदि भी खोलते हैं । तुम्हारा तो नाम ही न्यारा है रूहानी युनिवर्सिटी । गवर्मेन्ट भी देखेगी । बोलो तुम्हारी है जिस्मानी युनिवर्सिटी, यह है रूहानी । रूह पढ़ती है । सारे 84 के चक्र में एक ही बार रूहानी बाप आकर रूहानी बच्चों को पढ़ाते हैं । ड्रामा (फिल्म) तुम देखेंगे फिर 3 घण्टे बाद हूबहू रिपीट होगा । यह भी 5 हजार वर्ष का चक्र हूबहू रिपीट होता है । यह तुम बच्चे जानते हो । वह तो सिर्फ भक्ति में शास्त्रों को ही राइट समझते हैं । तुमको तो कोई शास्त्र नहीं है । बाप बैठ समझाते हैं, बाप कोई शास्त्र पढ़ा है क्या? वह तो गीता पढ़कर सुनायेंगे । पढ़ा हुआ तो माँ के पेट से नहीं निकलेगा । बेहद के बाप का पार्ट है पढ़ाने का । अपना परिचय देते हैं । दुनिया को तो पता ही नहीं । गाते भी हैं-बाप ज्ञान का सागर है । कृष्ण के लिए नहीं कहते ज्ञान का सागर है । यह लक्ष्मी-नारायण ज्ञान सागर हैं क्या? नहीं । यही वन्डर है, हम ब्राह्मण ही यह ज्ञान सुनाते हैं श्रीमत पर । तुम समझाते हो इस हिसाब से हम ब्राह्मण ही प्रजापिता ब्रह्मा की सन्तान ठहरे । अनेक बार बने थे, फिर होंगे । मनुष्यों की समझ में जब आयेगा तब मानेंगे । तुम जानते हो कल्प-कल्प हम प्रजापिता ब्रह्मा की सन्तान एडोपटेड बच्चे बनते हैं । जो समझते हैं वह निक्षयबुद्धि भी हो जाते हैं । ब्राह्मण बनने बिगर देवता कैसे बनेंगे । हर एक की बुद्धि पर है । स्कूल में ऐसा होता है-कोई तो स्कॉलरशिप लेते, कोई फेल हो पड़ते हैं । फिर नयेसिर पढ़ना पड़े । बाप कहते हैं विकार में गिरे तो की कमाई चट हुई, फिर बुद्धि में बैठेगा नहीं । अन्दर खाता रहेगा । 

तुम समझते हो इस जन्म में जो पाप किये हैं, उनका तो सबको पता है । बाकी आगे जन्मों में क्या किया है वह तो याद नहीं है । पाप किये जरूर हैं । जो पुण्य आत्मा थे वही फिर पाप आत्मा बनते हैं । हिसाब-किताब बाप बैठ समझाते हैं । बहुत बच्चे हैं, भूल जाते हैं, पढ़ते नहीं हैं । अगर पढ़ें तो जरूर पढ़ाये भी । कोई डल बुद्धि होशियार बुद्धि बन जाते, कितनी बड़ी पढ़ाई है । इस बाप की पढ़ाई से ही सूर्यवशी-चन्द्रवशी घराना बनने का है । वह इस जन्म में ही पढ़कर और मर्तबा पा लेते हैं । तुम तो जानते हो इस पढ़ाई का पद फिर नई दुनिया में मिलना है । वह कोई दूर नहीं है । जैसे कपड़ा बदला जाता है ऐसे ही पुरानी दुनिया को छोड़ जाना है नई दुनिया में । विनाश भी होगा जरूर । अब तुम नई दुनिया के बन रहे हो । फिर यह पुराना चोला छोड़ जाना है । नम्बरवार राजधानी स्थापन हो रही है, जो अच्छी रीति पके वही पहले स्वर्ग में आयेंगे । बाकी पीछे आयेंगे । स्वर्ग में थोड़ेही आ सकेंगे । स्वर्ग में जो दास-दासियां होंगे वह भी दिल पर चढ़े हुए होंगे । ऐसे नहीं कि सब आ जायेंगे । अब रूहानी कॉलेज आदि खोलते रहते हैं, सब आकर पुरूषार्थ करेंगे । जो पढ़ाई में ऊंचे तीखे जायेंगे, वह ऊंच पद पायेंगे । डल बुद्धि कम पद पायेंगे । हो सकता है, आगे चल डल बुद्धि भी अच्छा पुरूषार्थ करने लग पड़े । कोई समझदार बुद्धि नीचे भी चले जाते हैं । पुरूषार्थ से समझा जाता है । यह सारा ड्रामा चल रहा है । आत्मा शरीर धारण कर यहाँ पार्ट बजाती है, नया चोला धारण कर नया पार्ट बजाती है । कब क्या, कब क्या बनती है । संस्कार आत्मा में होते हैं । ज्ञान बाहर में ज़रा भी किसी के पास नहीं है । बाप जब आकर पढ़ायें तब ही ज्ञान मिले । टीचर ही नहीं तो ज्ञान कहाँ से आये । वह हैं भक्त । भक्ति में अपार दु :ख हैं, मीरा को भल साक्षात्कार हुआ परन्तु सुख थोड़ेही था । क्या बीमार नहीं पड़ी होगी । वहाँ तो कोई प्रकार के दु :ख की बात होती ही नहीं । यहाँ अपार दु :ख हैं, वहाँ अपार सुख हैं । यहाँ सब दु :खी होते हैं, राजाओं को भी दुःख है ना, नाम ही है दुःखधाम । वह है सुखधाम । सम्पूर्ण दुःख और सम्पूर्ण सुख का यह है संगमयुग । सतयुग में सम्पूर्ण सुख, कलियुग में सम्पूर्ण दु :ख । दुःख की जो वैराइटी है सब वृद्धि को पाती रहती है । आगे चल कितना दु :ख होता रहेगा । अथाह दुःख के पहाड़ गिरेंगे । 

वह लोग तो तुम्हें बोलने का टाइम बहुत थोड़ा देते हैं । दो मिनट देवे तो भी समझाओ, सतयुग में अपार सुख थे जो बाप देते हैं । रावण से अपार दुःख मिलते हैं । अब बाप कहते हैं काम पर जीत पहनो तो जगत जीत बनेंगे । इस ज्ञान का विनाश नहीं होता है । थोड़ा भी सुना तो स्वर्ग में आयेंगे । प्रजा तो बहुत बनती है । कहाँ राजा, कहाँ रंक । हर एक की बुद्धि अपनी- अपनी है । जो समझकर औरों को समझाते हैं, वही अच्छा पद पाते हैं । यह स्कूल भी मोस्ट अनकॉमन है । भगवान् आकर पढ़ाते हैं । श्रीकृष्ण तो फिर भी दैवी गुणों वाला देवता है । बाप कहते हैं मैं दैवी गुणों और आसुरी गुणों से न्यारा हूँ । मैं तुम्हारा बाप आता हूँ पढ़ाने । रूहानी नॉलेज सुप्रीम रूह ही देता है । गीता का ज्ञान कोई देहधारी मनुष्य वा देवता ने नहीं दिया । विष्णु देवता नम : कहते, तो कृष्ण कौन? देवता कृष्ण ही विष्णु है-यह कोई जानते नहीं । तुम्हारे में भी भूल जाते हैं । खुद पूरा समझा हुआ हो तो औरों को भी समझाये । सर्विस करके सबूत ले आये तब समझें कि सर्विस की इसलिए बाबा कहते हैं लम्बे-चौड़े समाचार न लिखो, वह फलाना आने वाला है, ऐसे कहकर गया है...... यह लिखने की दरकार नहीं है । कम लिखना होता है । देखो, आया, ठहरता है? समझकर और सर्विस करने लगे तब समाचार लिखो । कोई-कोई शो करके समाचार देते हैं । बाबा को हर बात की रिजल्ट चाहिए । ऐसे तो बहुत आते हैं बाबा के पास, फिर चले जाते हैं, उनसे क्या फायदा । उनको बाबा क्या करे । न उन्हें फायदा, न तुम्हें । तुम्हारे मिशन की वृद्धि तो हुई नहीं । अच्छा! 

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग । रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते ।

 

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1. किसी भी बात में बेवश नहीं होना है । स्वयं में ज्ञान को धारण कर दान करना है । औरों की भी तकदीर जगानी है । 

2. किसी से भी बात करते समय स्वयं को आत्मा समझ आत्मा से बात करनी है । जरा भी देह- अभिमान न आये । बाप से जो अपार सुख मिले हैं, वो दूसरों को बाँटने हैं ।

 

वरदान:-

नॉलेज की लाइट माइट से रांग को राइट में परिवर्तन करने वाले ज्ञानी तू आत्मा भव !   

कहा जाता है नॉलेज इज लाइट, माइट । जहाँ लाइट अर्थात् रोशनी है कि ये रांग है, ये राइट है, ये अंधकार है, ये प्रकाश है, ये व्यर्थ है, यह समर्थ है - तो रांग समझने वाले रांग कर्मों वा संकल्पों के वशीभूत हो नहीं सकते । ज्ञानी तू आत्मा अर्थात् समझदार, ज्ञान स्वरूप, कभी यह नहीं कह सकते कि ऐसा होना तो चाहिए...... लेकिन उनके पास रांग को राइट में परिवर्तन करने की शक्ति होती है ।

 

स्लोगन:- 

जो सदा शुभ-चिन्तक और शुभ-चिन्तन में रहते हैं वह व्यर्थ चिन्तन से छूट जाते हैं ।     

 

ओम् शान्ति |

 


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Naina Patel

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Jul 29, 2014, 2:34:29 PM7/29/14
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30-07-14    प्रातः मुरली     ओम् शान्ति     “बापदादा”     मधुबन
 


"मीठे बच्चे - तुम्हें डबल सिरताज राजा बनना है तो खूब सर्विस करो, प्रजा बनाओ, संगम पर तुम्हें सर्विस ही करनी है, इसमें ही कल्याण है"   

                                                        
प्रश्न:-   
पुरानी दुनिया के विनाश के पहले हरेक को कौन-सा श्रृंगार करना है?


उत्तर:-
तुम बच्चे योगबल से अपना श्रृंगार करो, इस योगबल से ही सारा विश्व पावन बनेगा । तुमको अब वानप्रस्थ में जाना है इसलिए इस शरीर का श्रृंगार करने की जरूरत नहीं । यह तो वर्थ नाट पेनी है, इससे ममत्व निकाल दो । विनाश के पहले बाप समान रहमदिल बन अपना और दूसरों का श्रृंगार करो । अन्धों की लाठी बनो ।

 

ओम् शान्ति |

अब यह तो बच्चे अच्छी रीति समझ गये हैं कि बाप आते हैं पावन बनने का रास्ता बताने । उनको बुलाया जाता है इसी एक बात के लिए कि आकर हमको पतित से पावन बनाओ क्योंकि पावन दुनिया पास्ट हो गई, अब पतित दुनिया है । पावन दुनिया कब पास्ट हुई, कितना समय हुआ, यह कोई नहीं जानते । तुम बच्चे जानते हो बाप फिर इस तन में आया हुआ है । तुमने ही बुलाया है कि बाबा आकर हम पतितों को रास्ता बताओ, हम पावन कैसे बनें? यह तो जानते हो हम पावन दुनिया में थे, अभी पतित दुनिया में हैं । अभी यह दुनिया बदल रही है । नई दुनिया की आयु कितनी, पुरानी दुनिया की आयु कितनी है-यह कोई भी नहीं जानते । पक्का मकान बनाओ तो कहेंगे इसकी आयु इतने वर्ष होगी । कच्चा मकान बनायेंगे तो कहेंगे इसकी आयु इतने वर्ष होगी । समझ सकते हैं यह कितने वर्ष तक चल सकता है । मनुष्यों को यह पता ही नहीं कि यह जो सारी दुनिया है उनकी आयु कितनी है? तो जरूर बाप को आकर बताना पड़े । बाप कहते हैं-बच्चे, अब यह पुरानी पतित दुनिया पूरी होनी है । नई पावन दुनिया स्थापन हो रही है । नई दुनिया में बहुत थोड़े मनुष्य थे । नई दुनिया है सतयुग जिसको सुखधाम कहते हैं । यह है दु :खधाम, इसका अन्त जरूर आना है । फिर सुखधाम की हिस्ट्री रिपीट होनी है । सबको यह समझाना है । बाप डायरेक्शन देते हैं अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो और फिर औरों को भी यह रास्ता बताओ । लौकिक बाप को तो सब जानते हैं, पारलौकिक बाप को तो कोई जानते नहीं । सर्वव्यापी कह देते हैं । कच्छ- मच्छ अवतार या 84 लाख योनियों में ले गये हैं । दुनिया में कोई भी बाप को नहीं जानते । बाप को जानें तब समझें । अगर पत्थर ठिक्कर में है तो वर्से की बात ही नहीं ठहरती । देवताओं की भी पूजा करते हैं, परन्तु कोई का आक्यूपेशन नहीं जानते, बिल्कुल ही इन बातों में अन्जान हैं । तो पहली-पहली मूल बात समझानी चाहिए । सिर्फ चित्रों से कोई समझ न सके । मनुष्य बिचारे न बाप को जानते हैं, न रचना को जानते हैं कि शुरू से लेकर यह रचना कैसे रची । देवताओं का राज्य कब था, जिनको पूजते हैं, कुछ भी पता नहीं । समझते हैं लाखों वर्ष सूर्यवंशी राजधानी चली, फिर चन्द्रवंशी लाखो वर्ष चले, इसको कहा जाता है अज्ञान । अभी तुम बच्चों को बाप ने समझाया है, तुम फिर रिपीट करते हो । बाप भी रिपीट करते हैं ना । ऐसे समझाओ, पैगाम दो, नहीं तो राजधानी कैसे स्थापन होगी । यहाँ बैठ जाने से नहीं होगा । हाँ, घर में बैठने वाले भी चाहिए । वह तो ड्रामा अनुसार बैठे हैं । यज्ञ की सम्भाल करने वाले भी चाहिए । बाप के पास कितने बच्चे आते हैं मिलने के लिए क्योंकि शिवबाबा से ही वर्सा लेना है । लौकिक बाप के पास बच्चा आया तो वह समझेंगे हमको बाप से वर्सा लेना है । बच्ची तो जाकर हाफ पार्टनर बनती है । सतयुग में कभी मिलकियत आदि पर झगड़ा होता ही नहीं । यहाँ झगड़ा होता है काम विकार पर । वहाँ तो यह 5 भूत होते नहीं, तो दु :ख का नाम-निशान नहीं । सब नष्टोमोहा होते हैं । यह तो समझते हैं स्वर्ग था, जो पास्ट हो गया । चित्र भी है परन्तु यह ख्यालात तुम बच्चों को अभी आते हैं । तुम जानते हो यह चक्र हर 5 हजार वर्ष के बाद रिपीट होता है । शास्त्रों में कोई यह नहीं लिखा है कि सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी डिनायस्टी 2500 वर्ष चली । अखबार में पढ़ा था कि बड़ौदा के राजभवन में रामायण सुन रहे हैं । कुछ भी आफतें आती हैं तो मनुष्य भक्ति में लग जाते हैं, भगवान को राजी करने के लिए । ऐसे कोई भगवान राजी होता नहीं है । यह तो ड्रामा में नूँध है । भक्ति से कभी भगवान् राजी नहीं होता । तुम बच्चे जानते हो आधाकल्प भक्ति चलती है, खुद ही दु :ख उठाते रहते हैं । भक्ति करते-करते सब पैसे खलास कर देते हैं । यह बातें तो कोई विरले ही समझेंगे जो बच्चे सर्विस पर हैं, वह समाचार भी देते रहते हैं । समझाया जाता है यह ईश्वरीय परिवार है । ईश्वर तो दाता है, वह लेने वाला नहीं है । उनको तो कोई भी देते नहीं, और ही सब बरबाद करते रहते हैं । बाप तुम बच्चों से पूछते हैं, तुमको कितने अथाह पैसे दिये । तुमको स्वर्ग का मालिक बनाया फिर वह सब कहाँ गया? इतने कंगाल कैसे बने? अभी मैं फिर आया हूँ, तुम कितने पदमापदम् भाग्यवान बन रहे हो । मनुष्य तो इन बातों को कोई भी नहीं जानते । तुम जानते हो अभी इस पुरानी दुनिया में यहाँ रहना नहीं है । यह तो खलास हो जानी है । मनुष्यों के पास जो ढेर पैसे हैं वह किसी के हाथ आने नहीं हैं । विनाश होगा तो सब खलास हो जायेंगे । कितने माइल में बड़े-बड़े मकान आदि बने हुए हैं । ढेर की ढेर मिलकियत है, सब खत्म हो जायेगी क्योंकि तुम जानते हो जब हमारा राज्य था तो और कोई थे ही नहीं । वहाँ अथाह धन था । तुम आगे चल देखते रहेंगे क्या-क्या होता है । उनके पास कितना सोना, कितनी चांदी, नोट आदि हैं, वह सब बजट निकलता है, एनाउन्स करते हैं इतना बजट है तो इतना खर्चा है । बारूद पर कितना खर्चा है । अभी बारूद पर इतना खर्चा करते हैं । उससे आमदनी तो कुछ है नहीं । यह रखने की चीज तो है नहीं । रखने का होता है सोना और चांदी । दुनिया गोल्डन एजेड है तो सोने के सिक्के होते हैं । सिलवर एज में चांदी है । वहाँ तो अपार धन होता है, फिर कम होते-होते अभी देखो क्या निकला है! काग़ज़ के नोट । विलायत में भी काग़ज़ के निकले हैं । काग़ज़ तो काम की चीज नहीं । बाकी क्या रहेगा? यह बड़ी-बड़ी बिल्डिंग्स आदि सब खत्म हो जायेंगी इसलिए बाप कहते हैं-मीठे-मीठे बच्चे, यह जो कुछ देखते हो, ऐसे समझो यह है नहीं । यह तो सब खलास हो जाना है । शरीर भी पुराना वर्थ नाट ए पेनी है । भल कोई कितना भी सुन्दर हो । यह दुनिया ही बाकी थोड़ा समय है । कुछ ठिकाना थोड़ेही है । बैठे-बैठे मनुष्य का क्या हो जाता है । हार्ट फेल हो जाते हैं । मनुष्य का कोई भरोसा नहीं । सतयुग में थोड़ेही ऐसे होगा । वहाँ तो काया कल्पतरू समान होती है, योगबल से । अब तुम बच्चों को बाप मिला है, कहते हैं इस दुनिया में तुमको रहना नहीं है । यह छी-छी दुनिया है । अब तो योगबल से अपना श्रृंगार करना है । वहाँ तो बच्चे भी योगबल से होते हैं । विकार की बात ही वहाँ नहीं होती । योगबल से तुम सारे विश्व को पावन बनाते हो तो बाकी क्या बड़ी बात है । इन बातों को भी वही समझेंगे जो अपने घराने के होंगे । बाकी तो सबको शान्तिधाम में जाना है, वह तो है घर । परन्तु मनुष्य उसको घर भी नहीं समझते हैं । वो तो कहते हैं एक आत्मा जाती है, दूसरी आती रहती है । सृष्टि वृद्धि को पाती जाती है । रचयिता और रचना को तुम जानते हो, इसलिए कोशिश करते हो औरों को समझाने की । यह समझकर कि बाबा का स्टूडेंट बन जाए, सब कुछ जान जाए, खुशी में आ जाए । हम तो अब अमरलोक में जाते हैं । आधाकल्प तो झूठी कथायें सुनी हैं । अब तो बहुत खुशी होनी चाहिए- अमरलोक में हम जायेंगे । इस मृत्युलोक का अभी अन्त है । हम खुशी का खजाना यहाँ से भरकर जाते हैं । तो इस कमाई करने में, झोली भरने में अच्छी रीति लग जाना चाहिए । टाइम वेस्ट नहीं करना चाहिए । बस, अभी तो हमको औरों की सर्विस करनी है, झोली भरनी है । बाप सिखलाते हैं, रहमदिल कैसे बनो? अंधों की लाठी बनो । यह सवाल तो कोई सन्यासी, विद्वान आदि पूछ नहीं सकते । उनको क्या पता स्वर्ग कहाँ, नर्क कहाँ होता है । भल कितने भी बड़े-बड़े पोजीशन वाले हैं, कमान्डर चीफ एरोप्लेन्स के हैं, कमान्डर चीफ लड़ाई के हैं, स्टीमर के हैं, लेकिन तुम्हारे आगे यह सब क्या हैं! तुम जानते हो बाकी थोड़ा समय है । स्वर्ग का तो कोई को पता ही नहीं । इस समय तो सब तरफ मारामारी चल रही है, फिर उन्हों को एरोप्लेन्स अथवा लश्कर आदि की दरकार नहीं रहेगी । यह सब खलास हो जायेंगे । बाकी थोड़े मनुष्य रहेंगे । यह बत्तियां, एरोप्लेन आदि रहेंगे परन्तु दुनिया कितनी छोटी रहेगी, भारत ही रहेगा । जैसे मॉडल छोटा बनाते हैं ना । और कोई की भी बुद्धि में नहीं होगा कि मौत आखरीन कैसे आना है । तुम तो जानते हो मौत सामने खड़ा है । वह कहते हैं हम यहाँ बैठे ही बाम्ब्स छोड़ेंगे । जहाँ गिरेगा सब खत्म हो जायेंगे । कोई लश्कर आदि की दरकार नहीं है । एक-एक एरोप्लेन भी करोड़ो खर्चा खा जाता है । कितना सोना सबके पास रहता है । टन्स के टन्स सोना है, वह सब समुद्र में चला जायेगा । 

यह सारा रावण राज्य एक आइलैण्ड है । अनगिनत मनुष्य हैं । तुम सब अपना राज्य स्थापन कर रहे हो । तो सर्विस में बिजी रहना चाहिए । कहाँ बाढ़ आदि होती है तो देखो कैसे बिजी हो जाते हैं । सबको खाना आदि पहुँचाने की सर्विस में लग जाते हैं । पानी आता है तो पहले से ही भागना शुरू करते हैं । तो विचार करो सब कैसे खत्म होंगे । सृष्टि के आलराउन्ड सागर है । विनाश होगा तो जलमई हो जायेगी, पानी ही पानी । बुद्धि में रहता है हमारा राज्य था तो यह बाम्बे-कराची आदि तो थे नहीं । भारत कितना छोटा जाकर रहेगा, सो भी मीठे पानी पर । वहाँ कुएं आदि की दरकार नहीं | पानी बड़ा स्वच्छ पीने का रहता है । नदियों पर तो खेलपाल करते हैं । गन्दगी की कोई बात नहीं । नाम ही है स्वर्ग, अमरलोक । नाम सुनकर ही दिल होती है जल्दी-जल्दी बाप से पूरा पढ़कर वर्सा ले लेवें । पढ़कर और फिर पढ़ावें । सबको पैगाम दें । कल्प पहले जिन्होंने वर्सा लिया है वह ले लेंगे । पुरूषार्थ करते रहते हैं क्योंकि बिचारे बाप को नहीं जानते हैं । बाप कहते हैं पवित्र बनो । जिनको हथेली पर बहिश्त मिलेगा वह क्यों नहीं पवित्र रहेंगे । बोलो, हम क्यों नहीं एक जन्म पवित्र बनेंगे, जबकि हमें विश्व की बादशाही मिलती है । भगवानुवाच-तुम इस अन्तिम जन्म में पवित्र बनेंगे तो पवित्र दुनिया के मालिक बनेंगे, 21 जन्म के लिए । सिर्फ यह एक जन्म मेरी श्रीमत पर चलो | रक्षाबन्धन भी इसकी निशानी है । तो क्यों नहीं हम पवित्र रह सकेंगे । बेहद का बाप गैरेंटी करते हैं । बाप ने भारत को स्वर्ग का वर्सा दिया था, जिसको सुखधाम कहते हैं । अपार सुख थे, यह है दु :खधाम । एक कोई बड़े को तुम ऐसे समझाओ तो सब सुनते रहेंगे । योग में रह बताओ तो सबको टाइम आदि ही भूल जाए । कोई कुछ कह न सके । 15 - 20 मिनट के बदले घण्टा भी सुनते रहें । परन्तु वह ताकत चाहिए । देह- अभिमान नहीं होना चाहिए । यहाँ तो सर्विस ही सर्विस करनी है, तब ही कल्याण होगा । राजा बनना है तो प्रजा कहॉ बनाई है । ऐसे ही बाप थोड़ेही माथे पर पाग रख देंगे । प्रजा डबल सिरताज बनती है क्या? तुम्हारी एम ऑब्जेक्ट ही है डबल सिरताज बनने की । बाप तो बच्चों को हुल्लास दिलाते हैं । जन्म-जन्मान्तर के पाप सिर पर हैं, वह योगबल से ही कट सकते हैं । बाकी इस जन्म में क्या-क्या किया है वह तो तुम समझ सकते हो ना । पाप काटने के लिए योग आदि सिखाया जाता है । बाकी इस जन्म की तो कोई बात नहीं । तमोप्रधान से सतोप्रधान बनने की युक्ति बाप बैठ बतलाते हैं, बाकी कृपा आदि तो जाकर साधुओं से मांगो । अच्छा! 

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग । रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते ।

 

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1. अमरलोक में जाने के लिए संगम पर खुशी का खजाना भरना है । टाइम वेस्ट नहीं करना है । अपनी झोली भरकर रहमदिल बन अंधों की लाठी बनना है । 

2. हथेली पर बहिश्त लेने के लिए पवित्र जरूर बनना है । स्वयं को सतोप्रधान बनाने की युक्तियां रच अपने ऊपर आपेही कृपा करनी है । योगबल जमा करना है ।

 

वरदान:-

सदा केयरफुल रह माया के रॉयल रूप की छाया से सेफ रहने वाले मायाप्रूफ भव !   

वर्तमान समय माया रीयल समझ को, महसूसता की शक्ति को गायब कर रांग को राइट अनुभव कराती है । जैसे कोई जादूमंत्र करते हैं तो परवश हो जाते हैं, ऐसे रॉयल माया रीयल को समझने नहीं देती है । इसलिए बापदादा अटेंशन को डबल अन्डरलाइन करा रहे हैं । ऐसा केयरफुल रहो जो माया की छाया से सेफ मायाप्रूफ बन जाओ । विशेष मन-बुद्धि को बाप की छत्रछाया के सहारे में ले आओ ।

 

स्लोगन:- 

जो सहजयोगी हैं उनको देखकर दूसरों का भी योग सहज लग जाता है ।     

 

ओम् शान्ति |

 


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31-07-14  प्रातः मुरली  ओम् शान्ति  “बापदादा”   मधुबन
 


मीठे बच्चे - रक्षाबन्धन का पर्व प्रतिज्ञा का पर्व है, जो संगमयुग से ही शुरू होता है, अभी तुम पवित्र बनने और बनाने की प्रतिज्ञा करते हो”   

                             
प्रश्न:-    
तुम्हारे सब कार्य किस आधार पर सफल हो सकते हैं? नाम बाला कैसे होगा?


उत्तर:- 
ज्ञान बल के साथ योग का भी बल हो तो सब कार्य आपेही करने के लिए तैयार हो जायें । योग बहुत गुप्त है इससे तुम विश्व का मालिक बनते हो । योग में रहकर समझाओ तो अखबार वाले आपेही तुम्हारा सन्देश छापेंगे । अखबारों से ही नाम बाला होना है, इनसे ही बहुतों को सन्देश मिलेगा ।

 

ओम् शान्ति |

आज बच्चों को रक्षाबन्धन पर समझाते हैं क्योंकि अभी नजदीक है । बच्चे राखी बांधने के लिए जाते हैं । अब जो चीज़ होकर जाती है उनका पर्व मनाते हैं । यह तो बच्चों को मालूम है आज से 5 हजार वर्ष पहले भी यह प्रतिज्ञा पत्र लिखाया था, जिसको बहुत नाम दिये हैं । यह है पवित्रता की निशानी । सबको कहना होता है पवित्र बनने की राखी बांधों । यह भी जानते हो पवित्र दुनिया सतयुग आदि में ही होती है । इस पुरूषोत्तम संगमयुग पर ही राखी पर्व शुरू होता है, जो फिर मनाया जायेगा जब भक्ति शुरू होगी, इनको कहा जाता है अनादि पर्व । वह भी कब से शुरू होता है? भक्ति मार्ग से क्योंकि सतयुग में तो यह पर्व आदि होते ही नहीं । यह होते हैं यहाँ । सब त्योहार आदि संगम पर होते हैं, वही फिर भक्ति मार्ग से शुरू होते हैं । सतयुग में कोई त्योहार होता नहीं । तुम कहेंगे दीप माला होगी?नहीं । वह भी यहाँ मनाते हैं वहाँ नहीं होनी चाहिए । जो यहाँ मनाते हैं वह वहाँ नहीं मना सकते । यह सब कलियुग के पर्व हैं । रक्षा-बन्धन मनाते हैं, अब यह कैसे मालूम पड़े कि यह राखी क्यों मनाई जाती है? तुम सबको राखी बांधती हो, कहती हो पावन बनो क्योंकि अब पावन दुनिया स्थापन हो रही है । त्रिमूर्ति के चित्र में भी लिखा हुआ है-ब्रह्मा द्वारा स्थापना होती है पावन दुनिया की इसलिए पवित्र बनाने के लिए राखी बंधन मनाया जाता है । अभी है ज्ञान मार्ग का समय । तुम बच्चों को समझाया गया है भक्ति की कोई भी बात सुनाये तो उनको समझाना चाहिए हम अभी ज्ञान मार्ग में हैं । ज्ञान सागर एक ही भगवान है, जो सारी दुनिया को वाइसलेस बनाते हैं । भारत वाइसलेस था तो सारी दुनिया वाइसलेस थी । भारत को वाइसलेस बनाने से सारी दुनिया वाइसलेस हो जाती है । भारत को वर्ल्ड नहीं कहेंगे । भारत तो एक खण्ड है वर्ल्ड में । बच्चे जानते हैं नई दुनिया में सिर्फ एक भारत खण्ड होता है । भारत खण्ड में जरूर मनुष्य भी रहते होंगे । भारत सचखण्ड था, सृष्टि के आदि में देवता धर्म ही था,उसको ही कहा जाता है निर्विकारी पवित्र धर्म, जिसको 5 हजार वर्ष हुए । अभी यह पुरानी दुनिया बाकी थोड़े रोज है । कितना दिन वाइसलेस बनने में लगते हैं?

प्रतिज्ञा करनी चाहिए-बाबा, हम पवित्र तो जरूर बनेंगे । यह उत्सव सबसे बड़ा समझना चाहिए । सब पुकारते भी हैं हे परमपिता परमात्मा, यह कहते हुए भी परमपिता बुद्धि में नहीं आता । तुम जानते हो परमपिता परमात्मा आते हैं जीव आत्माओं को ज्ञान देने । आत्मा-परमात्मा अलग रहे....... यह मेला इस संगमयुग पर ही होता है । कुम्भ का मेला भी इसको कहा जाता है, जो हर 5 हजार वर्ष बाद एक ही बार होता है । वह पानी में स्नान करने का मेला तो अनेक बार मनाते आये हो, वह है भक्ति मार्ग । यह है ज्ञान मार्ग । संगम को भी कुम्भ कहा जाता है । तीन नदियां वास्तव में हैं नहीं, गुप्त नदी पानी की कैसे हो सकती है! बाप कहते हैं तुम्हारी यह गीता गुप्त है । तो यह समझाया जाता है तुम योगबल से विश्व की बादशाही लेते हो, इसमें नाच-तमाशा आदि कुछ भी नहीं है । वह भक्ति मार्ग पूरा आधाकल्प चलता है और यह ज्ञान चलता है एक लाइफ । फिर दो युग है ज्ञान की प्रालब्ध, ज्ञान नहीं चलता है । भक्ति तो द्वापर-कलियुग से चली आई है । ज्ञान सिर्फ एक ही बार मिलता है फिर उसकी प्रालब्ध 21 जन्म चलती है । अभी तुम्हारी आँखें खुली हैं । आगे तुम अज्ञान नींद में थे । अब राखी बंधन पर ब्राह्मण लोग राखी बांधते हैं । तुम भी ब्राह्मण हो । वह है कुख वंशवाली, तुम हो मुख वंशावली । भक्ति मार्ग में कितनी अन्धश्रधा है । दुबन में फंसे हुए हैं । दुबन (दलदल) में पांव फँस पड़ते हैं ना । तो भक्ति के दुबन में मनुष्य फँस जाते हैं और एकदम गले तक आ जाते हैं । तब बाप फिर आते हैं बचाने । जब बाकी चोटी रहती है, पकड़ने लिए तो चाहिए ना । बच्चे बहुत मेहनत करते हैं समझाने की । करोड़ो मनुष्य हैं, एक-एक के पास जाना मेहनत लगती है । तुम्हारी बदनामी अखबारों द्वारा हुई है कि यह भगाते हैं, घरबार छुड़ाते हैं, बहन- भाई बनाते हैं । शुरू की बात कितनी फैल गई । अखबारों में धूम मच गई । अब एक-एक को तो समझा नहीं सकते । फिर तुम्हें अखबारें ही काम में आयेंगी । अखबारों द्वारा ही तुम्हारा नाम बाला होगा । अभी विचार करना है-क्या करें जो समझें । रक्षाबंधन का अर्थ क्या है?जबकि बाप आये हैं पावन बनाने, तब बाप ने बच्चों से पवित्रता की प्रतिज्ञा ली है । पतितों को पावन बनाने वाले ने राखी बांधी है । 

कृष्ण का जन्म मनाते हैं फिर जरूर गद्दी पर बैठा होगा । कारोनेशन कभी दिखाते नहीं हैं । सतयुग आदि में लक्ष्मी-नारायण थे । उनका कारोनेशन हुआ होगा । प्रिन्स का जन्म मनाते हैं फिर कारोनेशन कहाँ? दीवाली पर कारोनेशन होती है, बड़ा भभका होता है, वह है सतयुग का । संगम की जो बात है वह वहाँ होती नहीं । घर-घर में रोशनी यहाँ होने की है । वहाँ दीपमाला आदि नहीं मनाते हैं । वहाँ तो आत्माओं की ज्योत जगी हुई है । वहाँ फिर कारोनेशन मनाया जाता है, न कि दीपमाला । जब तक आत्माओं की ज्योत नहीं जगी है तो वापिस जा नहीं सकते । तो अब यह तो सब पतित हैं, उनको पावन बनाने के लिए सोच करना है । बच्चे सोचकर जाते हैं बड़े-बड़े आदमियों के पास । बच्चों की बदनामी हुई अखबारों द्वारा, फिर नाम भी इन द्वारा होगा । थोड़ा पैसा दो तो अच्छा डालेंगे । अब तुम पैसे कहाँ तक देंगे । पैसे देना भी रिश्वत है । बेकायदे हो जाता । आजकल रिश्वत बिगर तो काम ही नहीं होता है । तुम भी रिश्वत दो, वो लोग भी रिश्वत दें तो दोनों एक हो जायें । तुम्हारी बात है योगबल की । योगबल इतना चाहिए जो तुम कोई से भी काम करा सको । भूँ- भूँ करते रहना है । ज्ञान का बल तो तुम्हारे में भी है । इन चित्रों आदि में ज्ञान है, योग गुप्त है । अपने को आत्मा समझ बाप को याद करना है, बेहद का वर्सा लेने के लिए । वह है ही गुप्त, जिससे तुम विश्व के मालिक बनते हो, कहाँ भी बैठ तुम याद कर सकते हो । सिर्फ यहाँ बैठकर योग नहीं साधना है । ज्ञान और याद दोनों सहज हैं । सिर्फ 7 दिन का कोर्स लिया, बस । जास्ती दरकार नहीं । फिर तुम जाकर औरों को आपसमान बनाओ । बाप ज्ञान का, शान्ति का सागर है । यह दो बातें हैं मुख्य । इनसे तुम शान्ति का वर्सा ले रहे हो । याद भी बड़ी सूक्ष्म है । 

तुम बच्चे भल बाहर में चक्र लगाओ, बाप को याद करो । पवित्र बनना है, दैवीगुण भी धारण करना है । कोई भी अवगुण नहीं होना चाहिए । काम का भी भारी अवगुण है । बाप कहते हैं अब तुम पतित मत बनो । भल स्त्री सामने हो, तुम अपने को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो । देखते हुए न देखो । हम तो अपने बाप को याद करते हैं,वह ज्ञान का सागर है । तुमको आपसमान बनाते हैं तो तुम भी ज्ञान सागर बनते हो । इसमें मूँझना नहीं चाहिए । वह है परम आत्मा । परमधाम में रहते हैं इसलिए परम कहा जाता है । वह तो तुम भी रहते हो । अब नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार तुम ज्ञान ले रहे हो । पास विद् ऑनर जो होते हैं उनको कहेंगे पूरा ज्ञान सागर बने हैं । बाप भी ज्ञान सागर, तुम भी ज्ञान के सागर । आत्मा कोई छोटी-बड़ी नहीं होती है । परमपिता भी कोई बड़ा नहीं होता । यह जो कहते हैं हजारों सूर्य से तेजोमय-यह सब हैं गपोड़े । बुद्धि में जिस रूप से याद करते हैं वह साक्षात्कार हो जाता है । इसमें समझ चाहिए । आत्मा का साक्षात्कार वा परमात्मा का साक्षात्कार, बात एक हो जायेगी । बाप ने रियलाइज कराया है - मैं ही पतित-पावन, ज्ञान का सागर हूँ । समय पर आकर सबकी सद्गति करता हूँ । सबसे जास्ती भक्ति तुमने की है फिर बाप तुमको ही पढ़ाते हैं । रक्षाबधन के बाद कृष्ण जन्माष्टमी होती है । फिर है दशहरा । वास्तव में दशहरे के पहले तो कृष्ण आ न सके । दशहरा पहले होना चाहिए फिर कृष्ण आना चाहिए । यह हिसाब भी तुम निकालेंगे । पहले तो तुम कुछ भी नहीं समझते थे । अभी बाप कितना समझदार बनाते हैं । टीचर समझदार बनाते हैं ना । अभी तुम जानते हो कि भगवान बिन्दू स्वरूप है । झाड़ कितना बड़ा है । आत्मायें ऊपर में बिन्दी रूप में रहती हैं । मीठे-मीठे बच्चों को समझाया जाता है, वास्तव में एक सेकण्ड में समझदार बनना चाहिए । परन्तु पत्थरबुद्धि ऐसे हैं जो समझते ही नहीं । नहीं तो है एक सेकण्ड की बात । हद का बाप तो जन्म बाई जन्म नया मिलता है । यह बेहद का बाप तो एक ही बार आकर 21 जन्मों का वर्सा देते हैं । अभी तुम बेहद के बाप से बेहद का वर्सा ले रहे हो । आयु भी बड़ी हो जाती है । ऐसे भी नहीं 21 जन्म कोई एक बाप रहेगा । नहीं, तुम्हारी आयु बड़ी हो जाती है । तुम कभी दु :ख नहीं देखते हो । पिछाड़ी में तुम्हारी बुद्धि में यह ज्ञान जाकर रहेगा । बाप को याद करना और वर्सा लेना है । बस, बच्चा पैदा हुआ और वारिस बना । बाप को जाना तो बस बाप और वर्से को याद करो, पवित्र बनो । दैवीगुण धारण करो । बाप और वर्सा कितना सहज है । एम ऑबजेक्ट भी सामने है । अब बच्चों को विचार करना है - हम अखबार द्वारा कैसे समझायें । त्रिमूर्ति भी देना पड़े क्योंकि समझाया जाता है ब्रह्मा द्वारा स्थापना । ब्राह्मणों को पावन बनाने बाप आया है इसलिए राखी बंधवाते हैं । पतित पावन, भारत को पावन बना रहे हैं, हर एक को पावन बनना है क्योंकि अब पावन दुनिया स्थापन होती है । अभी तुम्हारे 84 जन्म पूरे हुए हैं । जिसने बहुत जन्म लिये होंगे वह अच्छी रीति समझते रहेंगे । पिछाड़ी में आने वाले को इतनी खुशी नहीं होगी क्योंकि भक्ति कम की है । भक्ति का फल देने बाप आता है । भक्ति किसने जास्ती की है यह भी अब तुम जानते हो । पहले नम्बर में तुम ही आये हो, तुमने ही अव्यभिचारी भक्ति की है । तुम भी अपने से पूछो हमने जास्ती भक्ति की है या इसने? सबसे तीखी जो सर्विस करते हैं जरूर उसने जास्ती भक्ति भी की है । बाबा नाम तो लिखते हैं-कुमारका है, जनक है, मनोहर है, गुलज़ार है । नम्बरवार तो होते हैं । यहाँ नम्बरवार बिठा नहीं सकते । तो विचार करना है-रक्षा बन्धन का अखबार में कैसे डालें । वह तो ठीक है, मिनिस्टर आदि के पास जाते हैं, राखी बांधते हैं परन्तु पवित्र तो बनते नहीं हैं । तुम कहते हो पवित्र बनो तो पवित्र दुनिया स्थापन हो जाए । 63 जन्म विकारी बनें, अब बाप कहते हैं यह अन्तिम जन्म पवित्र बनो । खुदा को याद करो तो तुम्हारे सिर पर जो पाप हैं वह उतर जाएं । अच्छा! 

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमॉर्निंग | रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते |

 

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1. पास विद् ऑनर होने के लिए बाप समान ज्ञान सागर बनना है । कोई भी अवगुण अन्दर है तो उसकी जांच कर निकाल देना है । शरीर को देखते हुए न देख, आत्मा निश्चय कर आत्मा से बात करनी है । 

2. योगबल इतना जमा करना है जो अपना हर काम सहज हो जाए । अखबारों द्वारा हरेक को पावन बनने का सन्देश देना है । आप समान बनाने की सेवा करनी है ।

 

वरदान:-

प्याइंट स्वरूप में स्थित हो मन बुद्धि को निगेटिव के प्रभाव से सेफ रखने वाले विशेष आत्मा भव !    

जैसे कोई सीजन होती है तो सीजन से बचने के लिए उसी प्रमाण अटेंशन रखा जाता है । बारिश आयेगी तो छाते,रेनकोट आदि का अटेंशन रखेंगे । सर्दी आयेगी तो गर्म कपड़े रखेंगे.....ऐसे वर्तमान समय मन बुद्धि में निगेटिव भाव और भावना पैदा करने का विशेष कार्य माया कर रही है इसलिए विशेष सेफ्टी के साधन अपनाओ । इसका सहज साधन है - एक प्याइंट स्वरूप में स्थित होना । आश्चर्य और क्वेश्चनमार्क के बजाए बिन्दु लगाना अर्थात् विशेष आत्मा बनना ।

 

स्लोगन:- 

आज्ञाकारी वह है जो हर संकल्प, बोल और कर्म में जी हज़ूर करता है ।     

 

ओम् शान्ति |

 

 


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