अंतकरण की शुद्धि के बिना सुखानुभूति संभव नहीं
आत्मा संपूर्ण ब्रह्मांड में समाया एक चेतन तत्व है। यह नित्य, शाश्वत,
सत, चित् व आनंद स्वरूप है। यह न तो कभी जन्म लेता है और न कभी मरता है। यह
अकर्ता है। अकेला आत्मा कुछ भी नहीं करता। इसको क्रियाशील बनाने के लिए
प्रकृति की जरूरत पड़ती है। शास्त्रों में वर्णन आता है कि परमात्मा की
इच्छा होने पर प्रकृति आत्मा के साथ मिल कर सृष्टि का निर्माण करती है।
सृष्टि के निर्माण के समय प्रकृति के 25 तत्त्व बनते हैं। इन्हीं से 84 लाख
योनियां बनी हैं। इसी से हमारा शरीर भी बना है। प्रकृति के इन तत्वों में
से मन, बुद्धि, अहंकार व चित्त को अंतकरण कहा जाता है। इस अंतकरण को जीव
नाम से भी जाना जाता है। आत्मा सर्वव्यापक है। लेकिन जब इस आत्मा का एक अंश
अंतकरण से घिर जाता है, तब उसको जीवात्मा कहा जाता है। आत्मा की तरह यह
जीवात्मा भी कुछ नहीं कर सकता। इसलिए अंतकरण को क्रियाशील बनाने के लिए एक
शक्ति इसके साथ और जुड़ जाती है, जिसको प्राण कहा जाता है। प्राण भी एक
सर्वव्यापक तत्त्व है। इस व्यापक शक्ति को महाप्राण कहा जाता है, जो
संपूर्ण ब्रह्मांड में एनर्जी के रूप में मौजूद होता है। लेकिन जब यह
महाप्राण अंतकरण को गति देता है, तब इसको प्राण कहा जाता है। समझने के लिए
हम कह सकते हैं कि शिव सर्वव्यापी आत्मा है और उनकी शक्ति सर्वव्यापी
महाप्राण है। यह प्राण शरीर में दो प्रकार का होता है 1. नासिक्य प्राण,
जिसके अंदर पांच प्राण -प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान तथा पांच उप
प्राण -नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त एवं धनंजय आते हैं। ये सभी प्राण शरीर के
अलग-अलग हिस्सों में रह कर उसको चलाते रहते हैं। इसको नासिक्य प्राण इसलिए
कहा जाता है, क्योंकि शरीर में स्थित सभी प्राण अपने मूल स्त्रोत महाप्राण
से ही बल पाते हैं और यह कार्य नासिका से आती हुई सांस करती है। क्योंकि
नासिक्य प्राण इन सभी को बल देता है, इसलिए शरीर के सभी प्राणों को नासिक्य
प्राण कहा जाता है। 2. हमारी सभी इंद्रियों को भी प्राण ही कहा जाता है
क्योंकि प्राण और कुछ नहीं बल्कि एक शक्ति है। जब यही शक्ति देखने का कार्य
करती है तो आंख कहलाती है, सुनने का कार्य करती है तो कान कहलाती है। इस
प्रकार दसों इंद्रियों को भी प्राण में ही गिना जाता है। इस प्रकार प्राण
की सहायता से अंतकरण कार्य करने वाला बन जाता है। हम शरीर के द्वारा सभी
कार्य इसी प्राण की सहायता से करते हैं। असल में यह प्राण ही जीवात्मा को
इस शरीर में रहने के योग्य बनाता है। स्वस्थ बने रहने के लिए शरीर में
स्थित इस प्राण को बलिष्ठ बनाया जाता है, जिसके लिए अनेक उपाय बताए गए हैं।
लेकिन जब यह प्राण किन्हीं कारणों से शरीर में बहुत कम मात्रा में रह जाता
है, तब शरीर कार्य करने योग्य नहीं रह जाता और जीवात्मा उस शरीर का साथ
छोड़ देती है, जिसको मृत्यु कहा जाता है। मृत्यु के पश्चात आत्मा
सर्वव्यापक होने के कारण उस शरीर में भी विद्यमान रहती है, लेकिन उसकी
अंतकरण मिश्रित आत्मा जिसको जीवात्मा कहते हैं, वह प्राण के सहयोग से शरीर
से निकल जाती है। जीवात्मा में ही अंतकरण, इंद्रियां, नासिक्य प्राण -तीनों
सम्मिलित हो जाते हैं। एक शरीर से दूसरे शरीर तक अंतकरण को ले जाने का
कार्य यही प्राण करता है, जो जीवात्मा का ही एक अंग होता है। इस प्रकार इस
जन्म में किए गए अच्छे, बुरे कर्मों का फल भी जीवात्मा के साथ चला जाता है
और उनका फल उसी को भोगना पड़ता है। जीवात्मा हर जन्म में एक ही रहता है,
लेकिन अभ्यास और वैराग्य के द्वारा साधक के अहंकार के साथ-साथ उसके सभी
विकार भी खुद ब खुद नष्ट होते हैं। फिर योगी में इच्छा और आसक्ति नहीं रहती
और चित्त में पड़े हुए पिछले सभी जन्मों के संस्कारों का नाश होने लगता
है। उस अवस्था को मुक्ति कहते हैं। योगी इसी मुक्त भाव में रहते हैं और
शरीर त्याग के बाद उनका जीवात्मा सर्वव्यापक आत्मा में लीन हो जाता है,
प्राण अपने मूल महाप्राण में लीन हो जाता है। इस प्रकार योगी का पुनर्जन्म
नहीं होता।
व्यासजी कहेते की, शुद्ध में शुद्धहैपरमात्माकाप्रकाश, तोजिससेअंतकरण मेंपरमात्माकाप्रकाशहोतावोधर्महै, प्याऊलगातेतोभीभगवानकेलिए, पति परायण रहेते तो भी भगवान के लिए तो अंतकरण शुध्द होगा और अंतकरण शुध्द होगा तो शुध्द तत्व का साक्षात्कार होगा,
जिन साधनोसे अंतकरण शुध्द होता है, वे सभी साधन धर्म है।
एक मछवारा मछलियों को सताके निकाल रहा था.. साधूने देखा तो पूछा की क्यों इतनी मछालियां मार रहा है
बोला, ‘अकेला हूँ,पेटके लिए मार रहा हूँ। साधू बोला, ‘एकका पेट भरने के
लिए इतनी मछलियाँ मत मार चलो आश्रम में रहो ,तुझे खाना मिल जाया करेगा.’
मछ्वारेका आश्रम के माहोल से मन बदला गया साधूके पास जाके बोला की मुझे भी मन्त्र दो..दीक्षादो..
साधू बोला, ‘अभी तेरा अंतकरणशुद्ध नहीं हुआ है, अंतकरण शुध्द नहीं है और दीक्षा देते तो जैसे सड़क पर बिज नहीं उगता ऐसे अभी दीक्षा से तुम्हे उतना लाभ नहीं होगा. तो मछवारा बोला की, ‘अंतकरण को कैसे शुध्द करू?’ साधू बोले, ‘यात्रा कर!’ मछवारा ने पूछा, ‘ठीक है.. मैं जाता हूँ यात्रा करने, लेकिन मुझे पता कैसे चले की अंतकरण शुध्द हुआ की नहीं..कब लौटना है’, साधू बाबा ने एक
पेड़का लठ्ठा दिया, बोले.‘ये अभी गिला है, हरा है…ये जब सुख के पिला हो जाये तो आ जाना…’
मछवारा निकला यात्रा पर।
यात्रा करते करते एक गाँव के बाहर पेड़ के निचे सोया था. नींद तो नहीं आ रही थी मध्य रात्री को कुछ लुटेरे आये , उसी पेड़ पर बैठके लुटेरे लोग प्लानिंग बनारहेथे की गाँवको ऐसा लूटेंगे ,
गड़बड़ हुयी तो तुम इधरसे आग लगाना, तुम उधरसे लगाना.. गाँववाले जल मरेंगे आग की लपेटमें…
मछवारेने सोचा.. यूँ तो मैंने पाप बहोत किया है, थोडा और सही..’
मछ्वाराने डंडा उठाया और धाड़ धाड़ मारना शुरू कर दिया चोरों को 3-4 को गिरा दिया बाकि भाग गए..गाँववाले बच गए
सुबह हुयी तो मछ्वारा सोचा डंडा तो अब बहोत ज्यादा
हरा हो गया होगा….देखातो डानडा सुखकर पिला हो गया था..
मछवारा साधूबाबा के पास वापस आया , सब बताया की ये डंडा हरा होना चाहिए था, मैंने इतनो को मारा..
साधूबाबा बोले, ‘बहुतो की रक्षा से , और दूसरो की हीत की भावना से तेरी पहेली की सारी गड़बड़ माफ हुयी है.इसलिए डंडा पिला हो गया..अब तू दीक्षा का अधिकारी हुआ ह। ’
मन के विकार न छूटे तो धर्म साधना भी पाखंड है। समस्त भक्ति धर्म की
समस्त साधनाओं का उद्देश्य इतना ही है कि अंतकरण में मन बुद्धि में जो
गंदगी आ गई है वह धुल जाए। दर्पण की मलिनता धूलते ही उसमें स्वयं को सत्य
दिखाई पड़ने लग जाएगा। धर्म के नाम पर होने वाले किसी भी कार्य के बाद
व्यक्ति का अंतकरण: शुद्ध होना चाहिए। क्रोध, लोभ, निंदा, चुगली छूटनी
चाहिए। अन्यथा कर्मकांड भी मात्र पाखंड बनकर रह जाएगा। दर्पण ही स्वच्छ
नहीं तो आत्मदर्शन कैसी। मन मलिन है, तब स्वयं का सत्य का साक्षात्कार कैसे
होगा। सेवा करने से तो मन शुद्ध होना चाहिए। न कि सेवादारों को अभिमान की
मैल चढ़ जाए। हाथी चार चार घंटे स्नान करता है इसका क्या लाभ। नदी के बाहर
आकर वह अपनी सूंढ़ से मिट्टी डालता रहता है। धर्म को बड़ी कठिनाई का सामना
करना पड़ता है। धर्म के नाम पर मन की मलिनता मिटने की बजाए और बढ़ने लगती
है। चित्त शुद्धि ही अहंकार मिटे, यही साधना का
फल है।
हमारे अंतकरण में तीन दोष है। एक मल, दूसरा
विक्षेप, और तीसरा आवरण है। जहाँ भी माया है वही ये तीनो दोष अवश्य
रहेंगे। कामना, वासना, या चाह ही
मल है। इच्छाए अनंत है, और समपूर्ण जगत इनमे अँधा हो रहा है। विक्षेप
चंचलता है। साधन कर रहे है और मन इधर उधर दौड़ रहा है। आवरण यानि अज्ञान
का पर्दा। भगवान है लेकिन अज्ञान के पर्दे के कारण हमे दिखायी नही दे रहे।
इन तीनो दोषों से बचने के लिए हर कर्म को निष्काम होकर अर्थात कामना रहित
हो कर करना होगा। अपने मन को स्वयम टटोलते रहना कि मन में कोई चाह तो नही
पैदा हो
रही, उसे तुंरत रोक देना पड़ेगा। राग, द्वेष और कपट आदि विकारों का नाश होकर अन्तःकरण का स्वच्छ हो जाना भीतर
की शुद्धि कही जाती है। नित्य एवं अनित्य तत्त्व का विवेक
ज्ञान, जागतिक एवं स्वार्गिक दोनों प्रकार
के भोग-ऐश्वर्यों से अनासक्ति, शम, दम, श्रद्धा, समाधान, उपरति, तितिक्षा, आदि छः
साधान सम्पत्तियों से युक्त होना, इन सबको अपनके अंतकरण को शुद्ध किया जा सकता है।
सांसारिक आवश्यकता है, जितनी बढ़ाई जाएगी उतनी ही कम पड़ जाएगी।
श्रीकृष्ण का स्मरण किए बिना मनुष्य सुखों के लिए आवश्यकताओं की पूर्ति में
अनमोल जीवन की सार्थकता को भूल दु:खी रहता है क्योंकि अंतकरण की शुद्धि
बिना सुखानुभूति संभव नहीं है। भगवान का मन भक्तों में ही रहता है।
उदाहरणार्थ श्रीकृष्ण संधिकाल में हस्तिनापुर पहुंचे तो उन्होंने कौरव राज
दुर्योधन का राजसी आतिथ्य स्वीकार नहीं करते हुए परम भक्त विदुरजी की
झोपड़ी में आतिथ्य स्वीकार किया। उ'च श्रेणी भक्त जब भगवान को प्राप्त कर
लेते है तो तन की सुधि भी खो देते है। विधुरानी ने श्रीकृष्ण को अचानक अपने
निवास में पाकर अपनी सुध खोकर दिगंबर वेश में ही स्वागत कर दिया।
राजा दक्ष प्रजापति के बारे में बताया कि बिना उचित आमंत्रण के कहीं भी
किसी के यहां नहीं जाना चाहिए। चाहे वो कितना भी निकट संबंधी क्यों न हो।
मनुष्य को भावना से ही भगवान की पूजा कर लेनी चाहिए क्योंकि मन चंगा तो
कठौती में गंगा। गुरू चरित्र, भक्त प्रहलाद चरित्र का भी अति सुंदर वर्णन
मय झांकी के प्रस्तुत किया। नरसिंह अवतार का वर्णन करते हुए बताया कि एक
होनहार भक्त भागवत भक्ति से हिरणाकश्यप जैसे क्रूर राक्षस का उद्धार करा
सकता है तो मनुष्य को भी अपनी गलतियों पर पश्चाताप करके अपने को ईश्वर को
समर्पित करने में संकोच नहीं करना चाहिए। आसार संसार मे क्षण भंगुर मानव
शरीर को पाकर अविनाशी तत्व परमात्मा को जानना ही मनुष्य का मोक्ष का
उद्देश्य है मनुष्य को परमात्मा की भक्ति करनी चाहिए अंतकरण की शुद्धि से
की गई भक्ति से भगवान की प्राप्ति होती है। भगवान कहते है गीता में :
श्रीभगवानुवाच
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।
योगिन: कर्म कुर्वन्ति संगं त्यक्त्वात्मशुद्धये ।
कर्मयोगी आसक्ति का त्याग करके केवल (ममता रहित )इन्द्रियां , शरीर
, मन और बुद्धि के द्वारा अंत:करण की शुद्धि के लिए ही कर्म करते हैं ।
ममता का सर्वथा नाश होना ही अंत:करण की शुद्धि है । कर्मयोगी साधक शरीर
-इन्द्रियाँ -मन -बुद्धि को अपना तथा अपने लिए मानते हुए , प्रत्युत संसार
का तथा संसार के लिए मानते हुए ही कर्म करते हैं । इस प्रकार कर्म करते –
करते जब ममता का सर्वथा अभाव हो जाता है , तब अंत:करण पवित्र हो जाता है ।
शौचात्स्वांगजुगुप्सापरैरसंसर्गः।। शौच करने से अपने अंगों में वैराग्य तथा दूसरों से संपर्क न रखने की इच्छा पैदा होती है।
सत्त्वशुद्धिसौमनरस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानिच।। इसके
सिवा अंतकरण की शुद्धि, मन में प्रसन्नता, चित की एकाग्रता, इंद्रियों का
वश में होना और आत्मसाक्षात्कार की योग्यता की अनुभूति भी होती है।
संतोषादनुत्तसुखलाभः।। संतोष से उत्तम दूसरा कोई सुख या लाभ नहीं है।
हम जब योग साधना करते हैं तब अपनी देह के समस्त अंगों की क्रियाओं को
देख सकते हैं। हम अपनी खाने पीने तथा शौच की क्रियाओं को सामान्य बात समझ
कर टालते हैं जबकि जीवन के आनंद का उनसे घनिष्ठ सम्बंध है। इसका अनुभव तभी
किया जा सकता है जब हम योगासन, प्राणायाम, ध्यान तथा मंत्र जाप करें। हम जब
शौच करते हैं तब अपनी देह से गंदगी निकलने के साथ ही अपने अंदर सुख का
अनुभव करें। अगर ऐसा न हो तो समझ लेना चाहिए कि अभी हमारी देह में अनेक
प्रकार के विकार रह गये हैं। जब हम शौच के समय अपने अंदर से विकार निकलने
की अनुभूति होती है तब मन में एक तरह से वैराग्य भाव आता है और साथ ही मन
में यह भी भाव आता है कि जितना हो सके अपने खान पान में सात्विक भाव का
पालन किया जाये। ऐसी वस्तुऐं ग्रहण की जायें जो सुपाच्य तथा देह के लिये कम
तकलीफदेह हों। इतना ही नहंी कम से कम भोजन किया जाये ताकि देह और मन में
विकार न रहें यह अनुभूति भी होती है। कहने का अभिप्राय यह है कि शौच से
निवृत होने पर देह के स्वस्थ होने की अनुभूति होना चाहिए। इसके विपरीत अगर
शरीर में थकावट या कमजोरी के साथ मानसिक तनाव का अनुभव तो समझ लेना चाहिए
कि हमारी देह बिना योगसाधना के विकार नहीं निकाल सकती। इतना ही नहीं अपनी
देह की हर शारीरिक क्रिया के साथ हमें अपने अंदर संतोष का अनुभव हो तभी यह
मानना चाहिए कि हम स्वस्थ हैं। इस संसार में संतोष ही सुख का रूप है। अपने
मन में असंतोष से अपना ही खून जलाकर कोई सुखी नहीं रह सकता।
तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानक्रियायोगः।।तप, स्वाध्याये तथा ईश्वर के प्रति प्राण केंद्रित करना तीनों ही क्रियायोग हैं।
समाधिभावनार्थःक्लेशतनुरणर्थश्च।।समाधि में प्राप्त सिद्धि से अज्ञान तथा अविद्या के कारण होने वाले क्लेशों का नाश होता है।
अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाःक्लेशा।।अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश यह पांचों क्लेश है।
योग साधना के आठ भाग हैं जिसमें समाधि का अत्यंत महत्व है। समाधि ध्यान
का वह चरम शिखर है जहां मनुष्य इस दैहिक संसार से ईश्वरीय लोक में
स्थित हो जाता है। उसका अपने अध्यात्म से इस तरह योग हो जाता है
कि उसकी देह में स्थित इंद्रिया निष्क्रिय और शिथिल हो जाती हैं और जब योगी
समाधि से वापस लौटता है तो उसके लिये पूरा संसार फिर नवीन हो जाता है
क्योंकि वह मन के सारे विकारों से निवृत होता है।
योगासन तथा प्राणायाम के बाद परम पिता परमात्मा के प्रति ध्यान लगाना भी
योग हैं और इनको क्रियायोग कहा जाता है। इसमे सिद्धि होने पर किसी विषय का
अध्ययन न करने या उसमें जानकारी का अभाव होने पर भी उसको जाना जा सकता है।
ऐसे में अविद्या और अज्ञान से उत्पन्न क्लेश नहीं रह जाता है। इस तरह यह
कहा जा सकता है कि योग साधना की सीमा केवल योगासन और प्राणायाम तक ही
केंद्रित नहीं है बल्कि ध्यान और समाधि भी उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा है।
मनुष्य का अपना संकल्प भी इसमें महत्व रखता है।
सच तो यह है कि मनुष्य मन के इस संसार में दो ही मार्ग हैं एक तो है सहज
योग जिसमें मनुष्य स्वयं संचालित होता है। दूसरा है असहज योग जिसमें
मनुष्य अज्ञान तथा अविद्या के कारण इधर उधर प्रसन्नता तलाश करते हुए केवल
तनाव ही पाता है। पूर्ण रूप से योग साधना का ज्ञान प्राप्त करने वाले
मनुष्य तत्व ज्ञान की तरफ आकर्षित होते हैं तब उनका प्रयोजन इस नश्वर संसार
से अधिक नहीं रह जाता है।
हरी ॐ .