SRI BRAHMACHAITANYA PRAVACHAN, JANUARY 10,2014 IN HINDI.
नाम ही गृहस्थी सुखी करने का साधन
गृहस्थी का सार यही है कि हम रघुवीर को अपना बनाएँ। कली को नशा चढ गया है
इसके कारण हम नीति, कर्त्तव्य आदि भूल गए है। अनाचार बहुत बढ गया है, अत:
भगवान राम के सिवाय कोई सहारा ही नहीं है। चोरों ने सेंध मारकर चोरी की है,
अत: जागृत रहने का कोई कारण ही नहीं बचा है। ऐसा हम मानते हैं। वस्तुत:
हमें जागृत रहना चाहिए और निरंतर भगवान का ध्यान रखना चाहिए। भगवान से हम
एकरस होंगे तो दु:ख का कारण नहीं बचेगा। अहंकार छोडने पर ही सच्ची राम सेवा
हो पाती है। अंत:करण से अहंकार पूर्णतया नष्ट होगा तभी चराचर सृटफफफ में
स्थित ब्रंह्म रुप का अनुभव होगा। जिसने हमें जन्म दिया है, जिसने हमारा आज
तक रक्षण किया है, वही हमारा स्वामी है। यह ध्यान में रखकर उसकी अर्थात्
रघुपति की भक्ति करनी चाहिए। यदि हम गृहस्थी में सुख चाहते है तो राम में
रम जाना चाहिेए, राम को अपने साथ जोडना चाहिेए। यही गृहस्थी और जन्म का
मुख्य उद्देश्य है। ऐसा जो मानता है कि रघुपति के बिना कोई भाता नहीं है,
उसके माता-पिता धन्य है। सुहाग के बिना अलंकार का कोई महत्त्व नही है वैसे
ही परमात्मा के अनिष्ठान के बिना गृहस्थी का कोई मतलब नहीं हैं। अलंकार तो
पहने लेकिन सौभाग्य तिलक नहीं लगाया तो अलंकार व्यर्थ है, वैसे ही राम के
बिना जीवन व्यर्थ है। ऐहिक या परमार्थिक जो भी सुख हों एक से एक बढकर नही
है। यह ठीक से समझ लेना चाहिए कि चाहे ऐहिक सुख हों या परमार्थिक, राम की
कृपा के बिना सब व्यर्थ है। शुध्द आचरण, अंत:करण और भगवान का स्मरण यही
गृहस्थी को सुखी बनाने के साधन है। राम चरण के प्रति दृढ विश्वास ही
परमार्थ की असली पूंजी है। ऐहिक व्यवहार में राम का स्मरण ही परमार्थ के
लिए असली सीख है। मन की यही प्रवृत्ति होनी चाहिए कि मेरा हित भगवान के हाथ
में है। यह भावना हमारे मन में होनी चाहिए कि राम ही कर्त्ता-धर्त्ता है।
और राम जो करेगा वो मेरे हित का ही होगा। रामचरण के प्रति हमारी श्रध्दा
होनी चाहिए लेकिन व्यवहार कभी गलत नहीं करना चाहिए। राम की अनुभूति रखना ही
परमार्थ का प्रमुख पद है। बाहर से व्यवहार में गृहस्थी का काम करना चाहिए
लेकिन भीतर रघुपति के प्रति दृढ भाव हों। प्रयत्न करना हमारे हाथ में है,
सफलता भगवान के हाथ में है। जी-जान से प्रयत्न करना चाहिए, लेकिन यह भावना
दृढ होनी चाहिए कि हमारे आगे-पीछे भगवान खडा है। गृहस्थी में चतुराई से
व्यवहार करना चाहिए। कभी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। भगवान का आधार मानकर
निभ्रांत होना चाहिए। माता तो घर में काम में लगी रहती है लेकिन उसका चित्त
बालक में होता है वैसे ही हमें भी काम में लग जाना चाहिए, किंतु हमारा मन
भगवान के चिंतन में हो। सारी शक्ति से गृहस्थी संभालनी चाहिए लेकिन मन
रघुनाथ आराधना में लीन होना चाहिए। हमारा आचरण नीति धर्म के अनुसार होना
चाहिए। किंतु अंतकाल में पवित्र भाव हों। कर्त्तव्य तत्परता और भगवान की
अनुभूति रखना ही सच्चा परमार्थ हैं। व्यवहार दक्षता पूर्वक करने पर भी हम
यदि परमात्मा को भूल गये तो पूरा व्यवहार दुखदायक ही होगा। बोध वचन- हमेशा
सावधान रहना चाहिए और भगवान का अखंड स्मरण रखना चाहिए।
Ambadnya,
Srijaneeveera.
Ek Vishwaas Asava purta, karta harta Guru Aisa!