हर बार आता है दशहरा
और हर बार मनाया जाता है दशहरा
हर बार जलाया जाता है
बांस की खपच्चियों पर खड़ा निरीह रावण
पर सशक्त स्थिर रहता है
मन के भीतर का दशानन
हर साल आती है दीवाली
और हर बार मनाई जाती है दीवाली
हर बार जलाये जाते हैं दीपगण
पर नहीं पहुँच पाती मन के भीतर
कभी भी एक उज्ज्वल किरण
क्यों किये जाते हैं, वे वायु व् ध्वनि
प्रदुषण जनक, विध्वंसक धमाके
क्यों जलाए जाते हैं वे बेकसूर और
चुप कराये जाते हैं पोपले ठहाके
क्यों किये जाते हैं वे बीमार परेशान
जिन्होंने नहीं किया होता कोई नुकसान
क्यों किये जाते हैं वे बे-जुबान परेशान
जिन्होंने हमेशा रक्षक की तरह कल्याण
क्या नहीं हमें इसका कारण पता
की है ये सिर्फ हमारे दिल की खता
करना होगा अब हमें खुद को संयमित
ताकि न हो और कोई कुंठित
दीपावली पर घर-घर दीप जलें
और हर मन के भीतर का रावण भी जले
- जितेन्द्र कुमार 'गगन'
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Jitender Kumar
N.I.T. kurukshetra.
Bas ab kitna lge rahoge
On 20 Oct 2010 13:37, "ikjot kaur" <ikjot...@gmail.com> wrote:@jitender- super duper like it.. mast h boss......
2010/10/20 jitender madaan <jitenderma...@gmail.com>
>
> hmmm
> sabhi ko shubh-kamnayen
> or ek kavita yaad aati h diwali se
>
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> हर बार आता है दशहरा
>...
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Jitender Kumar
N.I.T. kurukshetra.