संध्या का महत्व
*विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम्।*
*तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम्॥*
*भावार्थ -*
ब्राह्मण रूपी वृक्ष की जड़ तो सन्ध्या है, और ब्राह्मण रूपी वृक्ष की डालियाँ वेद हैं, धर्म कर्म आदि उस वृक्ष के पत्ते हैं, इसलिए जड़ की बड़े यत्नो से रक्षा करनी चाहिए क्योंकि जड़ के नष्ट हो जाने से न तो पत्ते रहते हैं और नाहीं डालियाँ आदि। ब्राह्मण रूपी वृक्ष की जड़ सन्ध्या है धर्म के लिए उसकी रक्षा करें!
*सन्ध्या येन न विज्ञाता सन्ध्या येनानुपासिता।*
*जीवन्नेव भवेच्छूद्रो मृतः श्वा चाभिजायते ॥*
(देवीभागवत १ । १६ ।६)
*भावार्थ -*
जो द्विज सन्ध्या नहीं जानता और सन्ध्योपासन नहीं करता वह जीता हुआ ही शूद्र हो जाता है और मरनेपर कुत्तेकी योनिको प्राप्त होता है।
*सन्ध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु ।*
*यदन्यत् कुरुते कर्म न तस्य फलभाग्भवेत्॥*
(दक्षस्मृति २ । २०)
*भावार्थ -*
संध्याहीन द्विज नित्य ही अपवित्र है और सम्पूर्ण धर्मकार्य करने में अयोग्य है। वह जो कुछ अन्य कर्म करता है उसका फल उसे नहीं मिलता ।
*न तिष्ठति तु यः पूर्वां नोपास्ते यश्च पश्चिमाम्।*
*स शूद्रवद्बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः ॥*
(मनु० २ । १०३)
*भावार्थ -*
जो द्विज प्रातःकाल और सांयकालकी सन्ध्या नहीं करता, उसे शूद्रकी भाँति द्विजातियोंके करनेयोग्य सभी कर्मोंसे अलग कर देना चाहिए।
*सन्ध्यामुपासते ये तु सततं शंसितव्रताः।*
*विधूतपासते यान्ति ब्रह्मलकं सनातनम्॥*
(अत्रि)
*भावार्थ -*
जो प्रशंसितव्रती सदा संध्योपासन करते हैं, उनके पाप नष्ट हो जाते हैं और वे सनातन ब्रह्मलोकको प्राप्त करते हैं।
*यावन्तोऽस्यां पृथिव्यां हि विकर्मस्थास्तु वै द्विजाः।*
*तेषां वै पावनार्थाय सन्ध्या सृष्टा स्वयंभुवा ॥*
(याज्ञवल्क्य)
*भावार्थ -*
इस पृथ्वीपर निषिद्ध कर्म करनेवाले जितने भी द्विज हैं, उन सबको पवित्र करने के लिए स्वयं ब्रह्माजीने सन्ध्या का निर्माण किया ।
*निशायां वा दिवा वापि यदज्ञानकृतं भवेत्।*
*त्रिकालसन्ध्याकरणात् तत्सर्वं हि प्रणश्यति॥*
(याज्ञवल्क्य)
*भावार्थ -*
रातमें या दिनमें जिस किसी समय अज्ञानके कारण जो भी अनुचित कर्म घटित हो जाते हैं, वे सब त्रिकाल - सन्ध्या करनेसे नष्ट हो जाते हैं ।
*सन्ध्यालोपस्य चाकर्ता स्नानशीलश्च यः सदा।*
*तं दोषा नोपसर्पन्ति गरुत्मन्तमिवोरगाः॥*
(कात्यायन)
*भावार्थ -*
जो कभी सन्ध्याका लोप नहीं करता अर्थात् नित्य सन्ध्या करता है और जो सदा स्नानशील है, उसके पास दोष उसी तरह नहीं रहते जैसे गरुड के सान्निध्यमें साँप॥