आदिवासी असुर सम्राट रावण
आयुर्वेद और ज्योतिष का पंडित था रावण-(दैनिक भास्कर)
रावण न सिर्फ एक कुशल योद्धा था, बल्कि वह चिकित्सकों, ऋषियों, ज्योतिषियों, नेताओं और संगीतज्ञों में भी सर्वश्रेष्ठ था। उसने कई किताबें लिखीं, जो चिकित्सा और ज्योतिष शास्त्र का अद्भुत संगम है। रावण का ज्योतिष ज्ञान आज भी प्रभावी है, तो उसका लिखा 'शिवतांडवस्त्रोतम्' आज भी शिव-आराधना का अनुपम ग्रंथ है। इसके अलावा 'चातुर्ज्ञानम्' नामक एक पुस्तक संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से प्रकाशित हुई है, जिसका प्रणेता रावण को माना जाता है। यह वैदिक टीका के साथ प्रकाशित है और बैठ संप्रदाय का प्रारंभिक ग्रंथ भी माना गया है। रावण का चिकित्सा शास्त्र भी अद्भुत था। इस ग्रंथ में रावण ने चेचक जैसी परेशानी से तंग होकर लंका में बच्चो को इससे मुक्ति दिलाने का प्रारंभिक प्रयास किया था। इस व्याधि को 'पूतना' के नाम से जाना जाता है। पूतना की परेशानी कृष्ण को भी हुई, मगर हमने पूतना वध की कहानी मानकर एक व्याधि की ओर निगाह ही नहीं डाली...आज चेचक का इलाज आसान हो गया, जबकि इस दिशा में पहली सोच और अनुसंधान रावण का ही था। रावण ने बाल मातृका दोषों (एक तरह की बच्चों को होने वाली बीमारी) के निवारण के लिए ग्रंथ भी लिखवाए थे। यह ग्रंथ आयुर्वेद में भी पढ़ाया जाता है। कहा जाता है कि रावण ने ही तंत्र की लाल किताब लिखी, लेकिन इसका कोई प्रमाण नहीं है।
वैमानिकी पर कराए शोध-
उसने पहली बार विमान विद्या पर अनुसंधान करवाया और मय जैसे विज्ञानी को अपने ससुर के साथ-साथ अपने राज्य में वास्तु और विमान विद्या की खोज के लिए नियुक्त किया, पुष्पक जैसा विमान उसने कुबेर से छीन लिया और अन्य विमान भी बनाएं जो इच्छा शक्ति से संचालित होते थे। 'बृहदविमानशास्त्रं' में मय के विमान संबंधी विचारों को लिखा गया है। उसने वैरिमारण कवच, इंद्रजाल जैसी विद्या, यक्षिणी साधना, मृत संजीवनी विद्या आदि दर्जनों विद्याओं पर कार्य करवाया, इतना कार्य न कंस ने किया, न ही अन्य किसी असुर ने... रावण सच में रावण ही था। (दैनिक भास्कर)
हजारों साल पहले रावण ने लिखी थी यह बात..जानें क्या था किताब में
नई दिल्ली। वेद, ग्रंथ और साहित्य के मामले में हम बेहद समृद्ध हैं। प्राचीन समय से लेकर आज तक साहित्य और खासकर किताबों को हम बतौर धरोहर महत्व देते हैं। दुनिया भर में भले ही कितनी ही बड़ी से बड़ी लाइब्रेरी क्यों न हो, हम भी इस मामले में पीछे नहीं।
भारतीय ज्ञान का लोहा समय-समय पर दुनिया ने भी माना है। बिहार की नालंदा यूनिवर्सिटी, जो दुनिया की पहली रेसीडेंशियल यूनिवर्सिटी थी, में 10 हजार छात्र पढ़ते थे, तो यहां की लाइब्रेरी में ऐसी किताबें भी सुरक्षित थीं, जो शायद और कहीं नहीं मिलीं, आज भी। इससे पहले पुरातन काल में जाएं...तो लंका का राजा रावण प्रकांड पंडित होने के साथ-साथ एक अच्छा लेखक भी था। रावण की लिखी किताबें आज भी विश्व साहित्य की धरोहर है। ज्योतिष, आयुर्वेद में रावण का लिखा आज भी सर्वप्रथम माना गया है। ऐसे तमाम उदाहरण हैं, जो किताबों की दुनिया में भारत को फलक पर ले जाते हैं।
वर्ल्ड बुक डे पर हम उन्हीं यादों को ताजा कर रहे हैं। हम नालंदा में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी द्वारा जलाई गई किताबों को भी आज याद करेंगे और रावण की उन किताबों को भी, जो अपने आप में अप्रतिम थीं। तो चलिए हमारे साथ ..किताबों के इस ऐतिहासिक सफर पर...
अगली स्लाइड में पढ़ें रावण का लेखन और उसके प्रयास

आयुर्वेद और ज्योतिष का पंडित था रावण-
रावण न सिर्फ एक कुशल योद्धा था, बल्कि वह चिकित्सकों, ऋषियों, ज्योतिषियों, नेताओं और संगीतज्ञों में भी सर्वश्रेष्ठ था। उसने कई किताबें लिखीं, जो चिकित्सा और ज्योतिष शास्त्र का अद्भुत संगम है। रावण का ज्योतिष ज्ञान आज भी प्रभावी है, तो उसका लिखा 'शिवतांडवस्त्रोतम्' आज भी शिव-आराधना का अनुपम ग्रंथ है। इसके अलावा 'चातुर्ज्ञानम्' नामक एक पुस्तक संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से प्रकाशित हुई है, जिसका प्रणेता रावण को माना जाता है। यह वैदिक टीका के साथ प्रकाशित है और बैठ संप्रदाय का प्रारंभिक ग्रंथ भी माना गया है। रावण का चिकित्सा शास्त्र भी अद्भुत था। इस ग्रंथ में रावण ने चेचक जैसी परेशानी से तंग होकर लंका में बच्चों को इससे मुक्ति दिलाने का प्रारंभिक प्रयास किया था। इस व्याधि को 'पूतना' के नाम से जाना जाता है। पूतना की परेशानी कृष्ण को भी हुई, मगर हमने पूतना वध की कहानी मानकर एक व्याधि की ओर निगाह ही नहीं डाली...आज चेचक का इलाज आसान हो गया, जबकि इस दिशा में पहली सोच और अनुसंधान रावण का ही था। रावण ने बाल मातृका दोषों (एक तरह की बच्चों को होने वाली बीमारी) के निवारण के लिए ग्रंथ भी लिखवाए थे। यह ग्रंथ आयुर्वेद में भी पढ़ाया जाता है। कहा जाता है कि रावण ने ही तंत्र की लाल किताब लिखी, लेकिन इसका कोई प्रमाण नहीं है।
वैमानिकी पर कराए शोध-
उसने पहली बार विमान विद्या पर अनुसंधान करवाया और मय जैसे विज्ञानी को अपने ससुर के साथ-साथ अपने राज्य में वास्तु और विमान विद्या की खोज के लिए नियुक्त किया, पुष्पक जैसा विमान उसने कुबेर से छीन लिया और अन्य विमान भी बनाएं जो इच्छा शक्ति से संचालित होते थे। 'बृहदविमानशास्त्रं' में मय के विमान संबंधी विचारों को लिखा गया है। उसने वैरिमारण कवच, इंद्रजाल जैसी विद्या, यक्षिणी साधना, मृत संजीवनी विद्या आदि दर्जनों विद्याओं पर कार्य करवाया, इतना कार्य न कंस ने किया, न ही अन्य किसी असुर ने... रावण सच में रावण ही था।

नालंदा, जहां दुनिया भर से ज्ञान की खोज में आते थे छात्र-
आज भले ही ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय शिक्षा और ज्ञान का केंद्र माने जाते हैं, लेकिन कई सदी पहले बिहार में नालंदा विश्वविद्यालय पूरी दुनिया में शिक्षा और ज्ञान का केंद्र था। नालंदा दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय था, जहां 10 हजार से ज्यादा छात्र और 2 हजार से ज्यादा शिक्षक साथ रहते थे। इसकी स्थापना 470 ई./450 ई. में गुप्त साम्राज्य के राजा कुमार गुप्त ने की थी। संस्कृत में नालंदा का अर्थ होता है “ज्ञान देने वाला” (ना लम = कमल, जो ज्ञान का प्रतीक है; दा = देना)। यहां छात्र विज्ञान, खगोलशास्त्र, चिकित्सा, तर्कशास्त्र, गणित, दर्शन, तथा हिंदू और बौद्ध धर्मों का अध्ययन करते थे। चौथी से सातवीं ईसवी सदी के बीच नालंदा का उत्कर्ष हुआ। अध्ययन करने के लिए चीन, जापान, कोरिया, तिब्बत, इंडोनेशिया, ईरान और तुर्की आदि देशों से छात्र आते थे। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन्सांग ने भी ईस्वी सन् 629 से 645 तक यहां अध्ययन किया था तथा अपनी यात्रा वृतांतों में उसने इसका विस्तृत वर्णन किया है। सन् 672 ईस्वी में चीनी इत्सिंग ने यहां शिक्षा प्राप्त की।
आर्यभट्ट भी थे कुलपति-
कहा जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय में चालीस हजार पांडुलिपियों सहित अन्य हजारों दुर्लभ हस्त लिखित पुस्तकें थीं। खगोलशास्त्र के अध्ययन के लिए भी एक विशेष विभाग था। एक प्राचीन श्लोक के अनुसार आर्यभट्ट नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति भी थे। आर्यभट्ट के लिखे तीन ग्रंथों की जानकारी आज भी उपलब्ध है। दश गीतिका, आर्यभट्टीय और तंत्र। यहां के तीन बड़े पुस्तकालयों के नाम थे - रत्न सागर, विद्यासागर और ग्रंथागार।
कुरान नहीं मिली, तो जला डालीं बेशकीमती किताबें-
1193 में तुर्क मुस्लिम सेनापति बख्तियार खिलजी ने बिहार पर आक्रमण किया। जब वह नालंदा पहुंचा, तो उसने नालंदा विश्वविद्यालय के शिक्षकों से पूछा कि यहां पवित्र ग्रन्थ कुरान है या नहीं। जवाब 'नहीं' मिलने पर उसने नालंदा विश्वविद्यालय को तहस-नहस कर दिया और पुस्तकालय में आग लगा दी। कहते हैं यह किताबें लगातार 6 माह तक जलती रहीं और खिलजी के सैनिक इस आग में नहाने का पानी गर्म करते थे। अंदाजा लगाइए कि इन 6 महीनों में कितने बहुमूल्य ग्रंथ और साहित्य जल गए होंगे।
ऋषियों के शोध सुरक्षित थे-
ये कहा जाता है कि ऋषि-मुनियों द्वारा किए सभी शोध इन पुस्तकालयों में सुरक्षित थे। जो आज हम टेक्नोलॉजी देख रहे है वो यहां पहले है बन चुकी थी। आज भी पुष्पक विमान बन सकता है जिसकी संरचना रावण संहिता में दी गई है। और सभी चिकित्सा के शोध भी।

ऐसा है वास्तु और निर्माण-
नालंदा विश्वविद्यालय के मठों का निर्माण प्राचीन कुषाण वास्तुशैली से हुआ था। यह किसी आंगन के चारों ओर लगे कक्षों की पंक्ति के समान दिखाई देते थे। सम्राट अशोक तथा हर्षवर्धन ने यहां सबसे ज्यादा मठों, विहार तथा मंदिरों का निर्माण करवाया। इस प्रकार यह बारहवीं शताब्दी तक सफलतापूर्वक संचालित होता रहा, परंतु तुर्क आक्रमण में तबाह होने के बाद यह दोबारा स्थापित नहीं हो पाया। खुदाई के बाद इसकी संरचनाओं का पता लगा। 14 हेक्टेयर क्षेत्र में इस विश्वविद्यालय के अवशेष मिले हैं।
यहां की सभी इमारतों का निर्माण लाल पत्थर से किया गया है। आज भी हम इस विश्वविद्यालय की मुख्य दो मंजिला इमारत देख सकते हैं। माना जाता है कि शायद यहीं शिक्षक अपने छात्रों को संबोधित किया करते थे। यहां एक प्रार्थना गृह आज भी सुरक्षित अवस्था में है। इसमें गौतम बुद्ध की प्रतिमा रखी हुई है, परंतु वह थोड़ी खंडित हो गई है। इसके अलावा भी यहां बहुत से मंदिर हैं। मंदिर नंबर 3 से इस पूरे क्षेत्र का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। यह गौतम बुद्ध का मंदिर है, जिसमें कई छोटे-बड़े स्तूप हैं तथा प्रत्येक में शाक्यमुनी गौतम बुद्ध की मूर्ति स्थापित है।

कई बार आए महात्मा बुद्ध-
ऐसा माना जाता है कि महात्मा बुद्ध कई बार यहां आए। इसी वजह से पांचवी शताब्दी से लेकर बारहवीं शताब्दी तक इसे बौद्ध शिक्षा के केंद्र के रूप में भी जाना जाता था। सातवीं शताब्दी में ह्वेनसांग भी यहां अध्ययन करने आया था। उसके कई लेखों में यहां की अध्ययन प्रणाली, अभ्यास और मठवासी जीवन की पवित्रता का उत्कर्ष वर्णन मिलता है।

इसी साल फिर से खुल जाएगा नालंदा विवि -
21वीं सदी में एक बार फिर इस प्राचीन अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की गरिमा को बहाल करने की योजना है। योजना के मुताबिक, इसी साल से इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई शुरू होने की संभावना है। प्राचीन विश्वविद्यालय के खंडहर से 10 किमी दूर राजगीर में एक अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय बनाने की योजना बनाई गई है, जहां दुनिया भर के छात्र और शिक्षक एक साथ मिलकर ज्ञान पा सकेंगे। इस नए विश्वविद्यालय में न केवल प्राचीन विषयों की, बल्कि आधुनिक विषयों की भी पढ़ाई होगी। अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गोपा सबरवाल ने कहा, 'शैक्षणिक सत्र सितंबर 2014 से शुरू हो जाएगा। इस सत्र में 40 विद्यार्थी प्रवेश पा सकेंगे।'
उन्होंने बताया कि शैक्षणिक सत्र 2014-15 में दो स्कूलों, इतिहास और पर्यावरण अध्ययन खुल जाएगा। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय की चारदीवारी का निर्माण कार्य पूरा कर लिया गया है। विश्वविद्यालय के भवन निर्माण का कार्य 2021 तक पूरा कर लेने का लक्ष्य रखा गया है।
बता दें कि इस नए विश्वविद्यालय की योजना की घोषणा वर्ष 2006 में भारत, चीन, सिंगापुर, जापान और थाइलैंड ने की थी और बाद में यूरोपीय संघ के देशों ने भी इसमें दिलचस्पी दिखाई। विश्वविद्यालय के आसपास के करीब 200 गांवों के भी विकास करने की योजना बनाई गई है। एक अनुमान के मुताबिक इस विश्वविद्यालय की आधारभूत संरचना के लिए करीब 1000 मिलियन डॉलर के खर्च होने की संभावना है।
