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mangesh <mangesh....@gmail.com>
Date: 2013/10/26
Subject: Share:गोंड(जनजाति), भारत क
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ay...@adiyuva.inगोंड(जनजाति), भारत की एकप्रमुख जनजाति हैं। गोंड भारत के कटि प्रदेश - विंध्यपर्वत, सतपुड़ा पठार, छत्तीसगढ़ मैदान में दक्षिण तथा दक्षिण-पश्चिम - में गोदावरी नदी तकफैले हुए पहाड़ों और जंगलों में रहनेवाली आस्ट्रोलायड नस्ल तथा द्रविड़ परिवार की एक जनजाति, जो संभवत: पाँचवीं-छठी शताब्दी मेंदक्षिण से गोदावरी के तट को पकड़कर मध्य भारत के पहाड़ों और जंगलों में फैल गई। आज भी मोदियाल गोंड जैसे समूह हैं जो जंगलोंमेंप्राय: नंगे घूमते और अपनी जीविका के लिये शिकार तथा वन्य फल मूल पर निर्भर हैं। गोंडों की जातीय भाषा गोंडी है जो द्रविड़ परिवारकी है और तेलुगु, कन्नड़, तमिल आदि से संबन्धित है।बूड़ादेव, दुल्लादेव, घनश्यामदेव, बूड़ापेन (सूर्य) और भीवासू गोंडों के मुख्य देवता हैं। इनके अतिरिक्त फसल, शिकार, बीमारियोंऔर वर्षा आदि के भिन्न भिन्न देवी देवता हैं। इन देवताओं को सूअर, बकरे और मुर्गे आदि की बलि देकर प्रसन्न किया जाता है। गोंडोंका भूत प्रेत और जादू टोने मेंअत्यधिकविश्वास है और इनके जीवन में जादू टोने की भरमार है। किंतुबाहरी जगत् के संपर्क के प्रभावस्वरूप इधर इसमें कुछ कमी हुई है। अनेकगोंड लंबे समय से हिंदू धर्म तथा संस्कृति के प्रभाव मेंहैं और कितनी ही जातियों तथा कबीलों ने बहुत से हिंदू विश्वासों, देवी देवताओं, रीति रिवाजों तथा वेशभूषा को अपना लिया है। पुरानी प्रथा के अनुसारमृतकों को दफनाया जाता है, किंतु बड़े और धनी लोगों के शव को जलाया जाने लगा है। स्त्रियाँ तथा बच्चे दफनाए जाते हैं।
आस्ट्रोलायड नस्ल की जनजातियों की भाँति विवाह संबंध के लिये गोंड भी सर्वत्र दो या अधिकबड़े समूहों में बंटे रहते हैं। एकसमूह के अंदर की सभी शांखाओंके लोग 'भाई बंद' कहलाते हैं और सब शाखाएँ मिलकरएक बहिर्विवाही समूह बनाती हैं। कुछ क्षेत्रोंसे पाँच, छह और सात देवताओं की पूजा करनेवालों के नाम से ऐसे तीन समूह मिलते हैं।विवाह के लिये लड़के द्वारा लड़की को भगाए जाने की प्रथा है। भीतरी भागों में विवाह पूरे ग्राम समुदाय द्वारा संपन्न होता है और वही सब विवाह संबंधी कार्यो के लिये जिम्मेदार होता है। ऐसे अवसर पर कई दिन तकसामूहिक भोजऔर सामूहिकनृत्यगान चलता है। हर त्यौहार तथा उत्सव का मद्यपान आवश्यकअंग है। वधूमूल्य की प्रथा है और इसके लिए सुअर या बैल तथा कपड़े दिए जाते हैं।
युवकों की मनोरंजन संस्था - गोतुल का गोंडों के जीवन पर बहुत प्रभाव है। बस्ती से दूर गाँव के अविवाहित युवक एक बड़ा घर बनाते हैं। जहाँवे रात्रि में नाचते, गाते और सोते हैं; एक ऐसा ही घर अविवाहित युवतियाँ भी तैयार करती हैं। बस्तरके भांड़िया गोंडोंमेंअविवाहित युवक और युवतियों का एक ही कक्ष होता है जहाँ वे मिलकर नाचगान करते हैं।
गोंडखेतिहर हैंऔर परंपरा से दहिया खेती करते हैं जो जंगल को जलाकर उसकी राख मेंकी जाती है और जब एक स्थान की उर्वरता तथा जंगल समाप्त हो जाता है तब वहाँ से हटकर दूसरे स्थान को चुन लेते हैं। किंतु सरकारी निषेध के कारण यह प्रथा बहुत कमहो गई है। समस्त गाँव की भूमि समुदाय की सपत्ति होती है और खेती के लिये व्यक्तिगत परिवरोंको आवश्यकतानुसार दी जाती है। दहिया खेती पररोक लगने से और आबादी के दबाव के कारण अनेकसमूहों को बाहरी क्षेत्रोंतथा मैदानों की ओर आना पड़ा। किंतु वनप्रिय होने के कारण गोंडसमूह शुरू से खेती की उपजाऊ जमीन की ओर आकृष्ट न हो सके औरधीरे धीरे बाहरी लोगों ने इनके इलाकों की कृषियोग्य भूमि पर सहमतिपूर्ण अधिकारकर लिया।इसदृष्टि से दो प्रकार के गोंडमिलते हैं : एकतो वे हैं जो सामान्य किसान और भूमिधर हो गए हैं, जैसे राजगोंड, रघुवल, डडवे और कतुल्या गोंड। दूसरे वे हैं जो मिले जुले गाँवों में खेत मजदूरों, भाड़ झोंकने, पशु चराने और पालकी ढोने जैसे सेवकजातियों के काम करते हैं।
गोंडों का प्रदेश गोंडवाना के नामसे भी प्रसिद्ध है जहाँ 15वींतथा 17वीं शताब्दी के बीच गोंडराजवंशों के शासन स्थापित थे। किंतुगोंडों की छिटपुट आबादी समस्त मध्यप्रदेश मेंहै। उड़ीसा, आंध्र औरबिहार राज्यों में से प्रत्येकमें दो से लेकर चार लाखतकगोंड हैं। असम के चाय बगीचोंवाले क्षेत्र में 50 हजार से अधिक गोंड आबाद हैं। इनके अतिरिक्त महाराष्ट्र और राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में भी गोंडआबाद हैं। गोंडों की कुल आबादी 30 से 40 लाख के बीच आँकी जाती है, यद्यपि सन् 1941 की जनगणना के अनुसार यह संख्या 25 लाखहै। इसका कारण यह है कि अनेकगोंड जातियाँ अपने को हिंदू जातियों मेंगिनती हैं। बंगाल, बिहारऔर उत्तर प्रदेश के दक्षिणी भागोंमेंभी कुछ गोंड जातियाँ हैं जो हिंदूसमाज का अंग बन गई हैं। गोंड जातियाँ हिंदूजातीय समाज के प्राय: निम्न स्तर पर स्थित हैंऔर कुछ की गिनती अछूतोंमें भी होती है। गोंड लोग अपने को 12 जातियों में विभक्त मानते हैं। किंतु उनकी 50 से अधिकजातियाँ हैं जिनमें ऊँच नीच का भेदभाव भी है।
वास्तव में गोंडों को शुद्ध रूप में एकजनजाति कहना कठिन है। इनके विभिन्न समूह सभ्यता के विभिन्न स्तरों पर हैं और धर्म, भाषा तथा वेशभूषा संबंधी एकता भी उनमेंनहीं है; न कोई ऐसा जनजातीय संगठन है जो सब गोंडों को एकता के सूत्र में बाँधता हो। उदाहरणार्थ राजगोंडअपने को हिंदू और क्षत्रिय कहते हैं तथा उन्हीं की भाँति रहते हैं। अन्य अनेकसमूह गोंडी भाषा तथा पुराने जनजातीय धर्मको छोड़ चुके ह !गोडों का भारत की जनजातियों में महत्वपूर्ण स्थानहै जिसका मुख्य कारण उनका इतिहास है।15वींसे 17वीं शताब्दी के बीच गोंडवाना में अनेकगोंड राजवंशों का दृढ़ और सफल शासन स्थापित था। इन शासकोंने बहुत से दृढ़ दुर्ग, तालाब तथा स्मारक बनवाए और सफल शासकीय नीति तथा दक्षता का परिचय दिया। इनके शासन की परिधि मध्य भारत से पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार तक पहुँचती थी। अभी हाल तकइनके मंडला और गढ़मंडल नाम के दो राज्य रहे हैं। गोंडवाने की प्रसिद्ध रानी दुर्गावती गोंड जाति की ही थी।
गोंडों का नाम प्राय: खोंडों के साथलिया जाता है जैसे भीलों का कोलों के साथ। यह संभवत: उनके भौगोलिक सांन्निध्य के कारण है।
आदिवासी गोंड का इतिहास उतना ही पुराना है जितना इस पृथ्वी -ग्रह पर मनुष्य, परन्तु लिखित इतिहास के प्रमाण के अभाव मेंखोज का विषय है। यहाँगोंड जनजाति के प्राचीन निवास के क्षेत्र मेंआदि के शाक्ष्य उपलब्ध है। गोंडसमुदाय द्रविढ़वर्ग के माने जाते है, जिनमे जाती व्यस्था नही थी। गहरे रंग के ये लोग इस देश मेंकोई ५-६ हजार वर्ष पूर्व से निवासरत है।एक प्रमाण के आधार पर कहा जा सकता है की गोंड जाती का सम्बन्ध सिन्धुघटी की सभ्यता से भी रहा है।गोंडवाना रानी दुर्गावती के शौर्य गाथाओं को आज भी गोंडी, हल्बी व भतरी लोकगीतोंमें बड़े गर्व के साथगया जाता है। आज भी कई पारंपरिक उत्सवों में गोंडवाना राज्य के किस्से कहानियो को बड़े चाव से सुनकर उनके वैभवशाली इतिहास की परम्परा को याद किया जाता है। प्राचीन भूगोलशास्त्र के अनुससारप्राचीनविश्व के दो भूभाग को गोंडवाना लैंडव अंगारा लैंड के नाम से जन जाता है। गोंडवाना लैंड आदिकाल से निवासरत गोंड जनजाति के कारण जन जाता था, कालांतर में गोंड जनजातियों ने विश्व के विभिन्न हिस्सों मेंअपने-अपने राज्य विकसित किए, जिनमे से नर्मदा नदी बेसिन पर स्थित गढ़मंडला एकप्रमुखगोंडवाना राज्य रहा है। रजा संग्रामशाह इस साम्राज्य के पराक्रमी राजाओं में से एक थे, जिन्होंने अपने पराक्रम के बल पर राज्य का विस्तार व नए-नए किलोंका निर्माण किया। १५४१ में राजा संग्रामकी मृत्युपश्चात् कुंवर दल्पत्शाह ने पूर्वजों के अनुरूप राज्य की विशाल सेना में इजाफा करने के साथ-साथ राज्य का सुनियोजित रूप से विस्तार व विकास किया।गोंडी धर्मं की स्थापना पारी कुपार लिंगो ने शम्भूशेकके युग में की थी। गोंडी धर्मंकथाकारों के अनुसार शम्भूशेक अर्थात महादेवजी का युग देश मेंआर्यों के आगमन से पहले हुआथा।इस काल से ही कोया पुनेम धर्मं का प्रचार हुआ था। गोंडी बोली में कोया का अर्थ मानव तथा पुनेम का अर्थ धर्मंअर्थात मानव धर्मं।आज से हजारों वर्ष पूर्व से गोंड जनजातियोंद्वारा मानव धर्मं का पालन किया जा रहा है। अर्थात गोंडी संस्कृति में वसुधैव कुटुम्बकम।भारतीय समाज के निर्माण में गोंड संस्कृति का बहुत बड़ा योगदान रहा है।गोंडी संस्कृति की नींव पर भारतीय संस्कृति खड़ी है। गोंडवाना भूभाग में निवासरत गोंड जनजाति की अदभुत चेतना उनकी सामाजिकप्रथाओं, मनोवृत्तियों, भावनाओंआचरणों तथा भौतिकपदार्थोंको आत्मसात करने की कला का परिचायकहै, जो विज्ञानं पर आधारित है। समस्त गोंड समुदाय को पहांदी कुपार लिंगो ने कोया पुनेम के मध्यम से एकसूत्र में बंधने का काम किया। धनिकसर (धन्वन्तरी) नामकगोंड विद्वान् ने रसायन विज्ञान अवंवनस्पति विज्ञानका तथा हीरा सुका ने सात सुरों का परिचय कराया था।गोंडी भाषा गोंडवाना साम्राज्य की मातृभाषा है।गोंडी भाषा अति पाचंभाषा होने के कारन अनेकदेशी -विदशी भाषाओं की जननी रही है। गोंडी धर्मं दर्शन के अनुसार गोंडी भाषा का निर्माण आराध्य देव शम्भू शेकके डमरू से हुई है, जिसे गोएन्दाधि वाणी या गोंदवानी कहा जाता है। अति प्राचीन भाषा होने की वजह से गोंडी भाषा अपने आप मेंपूरी तरह से पूर्ण है। गोंडी भाषा की अपनी लिपि है, व्याकरण है जिसे समय-समय पर गोंडी साहित्यकारों ने पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित किया है। गोंडवाना साम्राज्य के वंशजो को अपनी भाषा लिपि का ज्ञान होना अति आवश्यक है। भाSha समाज की माँ होती है, इसलिए इसे "मातृभाषा" के रूप मेंआदरभी दिया जाता है। गोंदियाँ समाज की अपनी मातृभाषा गोंडी है, जिसे आदर और सम्मान से भविष्यनिधि के रूप में संचय करना चाहिए।"Madhya Pradesh: Data Highlights the Scheduled Tribes" . Census of India 2001. Census Commission of India.
http://www.censusindia.gov.in/Tables_Published/SCST/dh_st_madhya_pradesh.pdf . अभिगमन तिथि: 2008-03-06.