आज क्रांतिवीर बिरसा मुंडा की १३९ जन्मतिथी के अवसर पर मै अपनी और आयुश परिवारकी ओर से आप सभी भाई बहनोको जो अपने तन मन धन से आदिवासी समाजके उन्नति के लिये कार्यबद्ध है, उन्हें हार्दिक शुभकामनाये देता हू। बिरसा मुंडा यह एक क्रांति की ज्वाला नाम है। उनसे ही प्रेरणा हम सब अपने अपने क्षेत्र अपने आदिवासी बांधवोके प्रगति के लिए कार्यरत है।
हमारे सामने अनेक समस्याए खड़ी है जिनसे लढने के लिए हम एकत्रित होना जरुरी है। आज भी हम पुरे भारतके आदिवासी एकत्रित नहीं है इसीके कारण स्थानीय संघठनोका संघर्ष सिमित रूपमे रह है। और न्याय पानेमे देरी होती है या तो वो संघर्ष दबा दिया जाता है।
आयुश माध्यमसे भारतमे फ़ैलेहुए बहोतसारे संघठनोंमें सुचनाका (information) आदान प्रदान में सहायता हुई है। ऐसी तरहसे हम नई तकनीकी जैसे internet, facebook तथा whatsup जैसे माध्यम से जुड़े हुए है। इन माध्यमोंका हमें और प्रभावी उपयोग करना चाहिए।
हमारे आदिवासी भारत तःथा विश्वभरमे विभिन्न क्षेत्रोंमें अपना और समाजका नाम ऊँचा रहे है। इनमे सबसे आगे है मेरी कोम, कविता राउत, ललिता बाबर (sports ) जिव्या म्हसे, चित्रगन्धा सुतार (painting) आदि लोगोने अलग profession अपनाकर अपना एक अलग स्थान निर्माण किया है। बहोत सरे डॉक्टर्स, इंजीनियर, वकील तथा अन्य सरकारी और प्राइवेट जगहपर अपनी सेवाए अर्पित कर रहे है।
हमारी कोशिश है भारत के सभी अदिवसिओको एक किया जाए। सभी संघठन जो स्थानीय (local) लेवल पर कार्यरत है उन्हें उनकी आइडेंटिटी बिना गवाए एक किया जाये जिससेके समस्याओको सुलज़ानेमे गति प्राप्त हो, देशके सभी आदिवासी एक होके सम्मिलित हो, अपना प्रेशर बना रहे और हम सब एक परिवारकी तरह रहने मददगार हो। भले ही हम अलग अलग जमातियोमे बाटे हो लेकिन आदिवासी होनेके नाते हमारी संस्कृति मिलती जुलती है। हम सब इस संस्कृति पर होने वाले आक्रमण से वाक़िब है।
हमारे सामने खड़ी समस्याए इस प्रकार है
गरीबी, डिग्री है लेकिन उचित ज्ञान और आत्मविश्वास का अभाव, अंधश्रद्धाए, बुरी आदते (शराब, गुटका, तम्बाकू, बीड़ी), सरकारी योजनाए कागजपर ही रहना, नए तकनिकी का खेतमे तथा घरो में उपयोग, बिजली तथा रस्ते, हमारे ज्ञान का सिमित प्रसार तथा मिसयूज, हमारे क्रांतिकारिओके जीवनी का किताबोमे न होना, विभिन्न जमातियोमे जो कहनिया और गीत है वो लिखित स्वरूपमें लाना और अन्य भाषाओमे रूपांतरण, बोगस आदिवसिओने हमारी नौकरियां छिन के जो शोषण किया है उसके खिलाफ आवाज उठाना, योग्य नेतृत्व का अभाव तथा आनेवाले पीढियोमे नेतृत्वगुण निर्माण करना, पापुलेशन (अंडमान निकोबार के आदिवासी काम हो रहे है), मेडिकल फैसिलिटी, संस्कृति पर हो रहा आक्रमण तथा कन्वर्शन, जुठे NGO जो हमारी गलत तस्वीर दिखाकर तथा गुमराह कर पैसे कम रहे है, जंगल, जमीन (resources ) रक्षण तथा वर्धन, सरकारी कानून, आश्रम स्कुलोमे होने वाले problems , भुखमरी (malnutrition), डिग्निटी तथा स्त्रियोंपर होने वाले अत्याचार, मुलभुत सुविधाए होना जैसे पिने का पानी, टॉयलेट बाथरूम इत्यादि, अन्य जातिके लोगोका (सवर्ण) हमारे प्रति देखने का तरीका (mindset), स्टेटस ऑफ़ लिविंग.
क्या हम एक होकर इन सबका सामना नहीं कर सकते ? क्या हमारा ज्ञान अपने समाज के लिए हम नहीं इस्तमाल कर सकते? क्या जिस समाज में पैदा होके हमें मुफ्त शिक्षा और नौकरियां आसानी से प्राप्त हुई तो हमें अभी उस समाज को छोड़ देना चाहिए?
मुज़े लगता है की हम परेशान है की जिस समाजसे, उसकी सिखसे हम आगे चलके आये वो महान सांस्कृतिक धरोहर पर डट के खड़ा है उसकी नीव मजबूत है और हम उससे पर नहीं जा सकते। किसी भी संघठन को कार्यरत रहने के लिए कुछ महत्वपूर्ण चीजोंकी जरुरत होती है मैनपावर, टाइम तथा पैसा। आयुश की ओरसे यह कोशिश जारी है और आगे भी जारी रहेगी की हमारे पास जो भी टैलेंट, मैनपावर उपलब्ध है उसे सही समयपर और सही जगहपर पहुचने में मदद हो और इसके साथ ही पैसा भी निर्माण किया जाये (donations through ) जो की हमरे आदिवासी भाई बहनो को बेसिक फैसिलिटी पहुचने में मददगार हो।
हम भारतके सभी आदिवसिओका डेटाबेस बना रहे है जो हमारे एरिया, प्रोफेशन, स्किल के अधार पे वर्गीकृत होगा। इसमे आप सभीका सहयोग अभिप्रेत है। इससे हमें आप सभी को विभिन्न कार्यक्रम जैसे मेडिकल कैंप, करियर गाइडेंस, कल्चरल प्रोग्राम, डिजास्टर मैनेजमेंट आदि चीजो में सबसे नजदीकी संघटनोंसे सहायता प्राप्त होने में आसानी होगी। असेही आर्थिकस्तर से उचे भाई बहने से हम विनती करते है की आप अपनी कमाई का थोड़ा हिस्सा संघटनोको को आर्थिक दृस्टि से मजबूती प्राप्त करने के लिए दान करे। सोचो अगर भारत का हर आदिवासी सिर्फ १ रूपयाभी हमें दान करता है तो हमारी १० करोड़ की आबादी से यह टोटल १० करोड़ रुपये होगा। और अगर सब प्रण करे की हम रोज सिर्फ १ रूपया अपने समाज के लिए देंगे तोह यह कुलमिलाकर सालभरमे ३६५ * १० करोड़ रूपये = ३६५० करोड़ रुपये हो जाएगा। अब इससे हम अपना स्कुल, अस्पताल, यूनिवर्सिटी, बना सकते है। पानी पिने के लिए कुए, तालाब खोद सकते है, अपने आर्ट, हेंडीक्राफ्ट को आगे लाने के लिए इंडस्ट्री खोल सकते है।
आइए हम सब मिलके एक होकर एक ऐसी मिसाल कायम करे की हमारे देस में सब लोग यह सोचे की आदिवासी संस्कृति ही सबकी रक्षक संस्कृति है।
उलगुलान
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चेतन व. गुराडा.
Chetan V. Gurada.
Assistant Professor,
University Department of Physics (Autonomous),
University of Mumbai
Lokmanya Tilak Bhavan, Vidyanagari, Santacruz (E), Mumbai - 400 098.(India)
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