न्यायिक व्यवस्था : अनेकों सुधार अनिवार्य

2 views
Skip to first unread message

Dr amitabh Shukla

unread,
Feb 26, 2026, 11:49:38 AMFeb 26
to Manish Saandilya, Kumar Kalanand Mani, Junny kumari, Late Night Raagas देर रात के राग, Nidhi Sadana, Joshi Sopan Nd, divya...@gmail.com, Veena Goel, arti...@hotmail.com, amarnath tripathi, Dr. Arti Smit, Bhartendu Chaturvedi, bhartithakur1985, Techno-Gandhian Forum, Pradesh Today Vijay Pratap Baghel, ruma...@yahoo.co.in, Subhash Dhuliya, Astrologer D k Puranik Agra

---------- Forwarded message ---------
From: amitabh shukla <amitabhs...@gmail.com>
Date: Thu, 26 Feb, 2026, 10:12 pm
Subject: न्यायिक व्यवस्था : अनेकों सुधार अनिवार्य
To: Ram Kumar Mishra <ramkuma...@gmail.com>, Sandeep Pandey <ashaa...@yahoo.com>, JAVED ALAM KHAN <JAVEDALA...@gmail.com>, Arun Tiwari <ameth...@gmail.com>, Dr. Vijay Tiwari <shandily...@gmail.com>, Techno-Gandhian Forum <TechnoGan...@googlegroups.com>, Raghuraman N <ra...@dbcorp.in>, Debasri Mukherjee <debasri....@wmich.edu>, Kriti Trivedi <kriti....@iidmindia.com>, Hippu Salk Kristle Nathan <happy...@gmail.com>, Dr. Krishna Sharma <krishnas...@gmail.com>, Deepti Taneja <deeptit...@gmail.com>, Ram Dutt Tripathi <RamDutt....@gmail.com>, Prof. Nageshwar Dubey <ndub...@gmail.com>, ggiirish Mohan dubey <gmdu...@gmail.com>, Sandeepa Malhotra <malhotra...@gmail.com>, <sanjoyd...@gmail.com>, sanjaysingh033 <sanjays...@gmail.com>, Sandeep Dikshit <sande...@gmail.com>, Santosh Kumar Dwivedi <santos...@gmail.com>, <vivekta...@gmail.com>, vivek shukla <vivekshu...@gmail.com>, vikram chadha <vikra...@yahoo.com>, <vikas...@gmail.com>, <sona....@aitgurgaon.com>, Dr Vidyut joshi <vid...@gmail.com>, S. Behar <shara...@gmail.com>, <ashishd...@sansad.nic.in>, <abhil...@gmail.com>, Abhishek Shrivastava <abhis...@gmail.com>, amitabh shukla <amitab...@gmail.com>, Advocate Amitabh Gupta <aaav....@gmail.com>, Dr amitabh Shukla <amitabhs...@gmail.com>


@ देश की न्यायिक व्यवस्था : धीमी गति ( पेंडेंसी ) , खर्चीली और अव्यावहारिक प्रक्रिया : जनता के कष्टों का एक प्रमुख कारण :

                  * डॉ.अमिताभ शुक्ल 

      भारत में न्यायिक प्रणाली श्रेष्ठ संवैधानिक प्रावधानों पर आधारित होने के कारण एक श्रेष्ठ न्यायिक प्रणाली मानी जाती रही थी! इन्हीं कारणों से जनता का भी न्याय प्राप्त करने हेतु इस व्यवस्था पर पूर्ण विश्वास था । 

    लेकिन , शनै: शनै: इस व्यवस्था में जो खामियां जुड़ती गईं उनसे देश में न्याय व्यवस्था के चरमरा जाने से आम जनता का जीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है।

    न्यायपालिका लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण और सशक्त अंग / खंभा ( Pole) रही है / है लेकिन , अनेकों कारणों से इस सशक्त भूमिका के निष्पादन में बाधा वर्तमान भारत का सर्वाधिक चिंताजनक पहलू है!

     इन दोषों को समय ,समय पर सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के जिम्मेदार न्यायाधीश भी रेखांकित करते हुए चिंता प्रगट करते रहे हैं।

    इन बाधाओं में सर्वाधिक प्रमुख दो कारण हैं: प्रथम : इसका अत्यधिक खर्चीला होते जाना और द्वितीय : विलंब होना ।

पेंडेंसी : दिसंबर 2025 में सरकार द्वारा राज्यसभा में प्रदत्त आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में देश की अदालतों में 5 करोड़ ,50 लाख मुकदमे पेंडिंग हैं।

सर्वोच्च न्यायालय में :90,987
देश के 25 उच्च न्यायालयों में; 63,63,406 ,
जिला एवं सत्र न्यायालयों में :4,84,57,343.

सर्वोच्च और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया का  " कालेजियम सिस्टम" विगत कुछ वर्षों में  सर्वाधिक विवाद और चर्चा का विषय रहा है। 

अपील संबंधी प्रश्न: एक ओर जहां  अपील व्यवस्था भारतीय न्यायिक व्यवस्था का एक सुदृढ़ पक्ष रहा है लेकिन , दूसरी ओर इसमें लगने वाले समय के कारण इसे त्वरित न्याय में बाधा  भी माना जाने लगा है।

न्यायाधीशों के रिक्त पद : एक बड़ी संख्या में जिला ,सत्र ,उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के पद रिक्त होने से भी केसों की पेंडेंसी में वृद्धि हुई हैं।

अवमानना प्रकरणों का प्रभावी न होना : ऐसा अनुभव किया जा रहा है कि , न्यायिक व्यवस्था को अत्यंत प्रभावशाली बनाने के इस उपकरण में किन्हीं कारणों से वह धार अब नहीं रह गई है। कारण यह कि , माननीय न्यायालयों में पारित आदेशों का पालन न होने पर यदि , प्रावधानों अनुसार और फरियादी की पीड़ा और क्षति के अनुसार दंड की व्यवस्था का पालन होने लगे ,तब ही आदेशों का पालन और न्याय सुनिश्चित हो सकेगा । यह न्यायालयों और न्याय व्यवस्था की गरिमा को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए भी बहुत आवश्यक है।

निर्णयों का पालन नहीं होना : यह एक अत्यंत सामान्य पहलू हो चुका है कि , किसी भी स्तर की कोर्ट के किसी भी आदेश का पालन उसमें निहित स्वर ( स्पिरिट )  के अनुसार नहीं हो पाता है । काश , न्याय प्रणाली में आदेशों के  समय बद्ध क्रियान्वयन के पक्ष को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता ।

   अब तक अनेकों न्यायिक सुधार आयोग ( Judiciary Reforms Commissions ) बन चुके हैं लेकिन उनकी सिफारिशों का भी पालन न हो पाने से न्यायिक प्रक्रिया को अधिक समयबद्ध , सुलभ , पारदर्शी और प्रभावी बनाया जाना संभव नहीं हो पा रहा है।

         जाहिर है कि , देश में व्यापक रूप से व्याप्त भयंकर भ्रष्टाचार , दोष पूर्ण प्रशासनिक व्यवस्थाओं , शोषण , असमानताओं ,  कानून ,व्यवस्था के उल्लंघन की प्रवृतियों में अत्यधिक वृद्धि , अपराधियों के कार्टेलस और सामूहिक ,सुनियोजित और व्यवस्थित  अपराधों की संख्या में वृद्धि आदि के परिप्रेक्ष्य में आम जनता केवल न्याय व्यवस्था के प्रत्येक दृष्टि से प्रभावी होने पर ही न्याय प्राप्त कर सकती है।

     लेकिन , अनेकानेक दृश्य और अदृश्य बाधाएं और दोष इस व्यवस्था को कमजोर करती जा रही हैं जबकि , भारत के शेष रहे लोकतंत्र और बड़ी आबादी का भविष्य न्याय तंत्र के सुदृढ़ होने पर ही निर्भर करता है।
IMG-20260226-WA0041.jpg
Reply all
Reply to author
Forward
0 new messages