लिनक्स के साथ अनुभव

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Ratan singh Shekhawat

unread,
Oct 18, 2011, 9:56:59 PM10/18/11
to हिन्दी लिनक्स प्रयोक्ता समूह [LUG-Hindi]
लिनक्स के प्रति बड़ी उत्सुकता थी पर लिनक्स का कोई ऐसा जानकर नहीं मिला
जो इसके बारे में जानकारी दे सके आखिर खुद ही लिनक्स से दो दो हाथ करने
की ठानी और नेहरु प्लेस से फेडोरा की एक डीवीडी ले आये| अपने पीसी में
संस्थापित कर लिया पर समुचित जानकारी न होने के चलते म्यूजिक व वीडियो
नहीं चला पाए,एक दिन नेट पर भ्रमण करते अंकुर गुप्ता का ब्लॉग मिला जिस
पर लिनक्स के बारे में काफी लिखा था,हमारे द्वारा अपनी प्रॉब्लम बताने पर
अंकुर गुप्ता ने हमें लिनक्स का उबुन्टू वितरण अपनाने की सलाह दी हमने
उबुन्टू का नाम पहली बार सुना था उबुन्टू की साईट पर गए और उनसे एक फ्री
सीडी भेजने का अनुरोध किया, सप्ताह के भीतर ही हमें कुरियर से एक सीडी
मिल गयी|
अपने पीसी में सस्थापित किया बडी आसानी उबुन्टू हमारे पीसी में
संस्थापित हो गया जब म्यूजिक,वीडियो चलाया तो उसे चलाने हेतु कोडेक भी
उबुन्टू महाराज ने नेट से स्वत: तलाश कर संस्थापित कर लिए| तब आज तक हम
उबुन्टू का इस्तेमाल कर रहे है, न वायरस आने का डर,न हेंग होने का डर, न
विंडो की तरह करप्ट होकर खराब होने का डर और न मन में ये आता कि हम
पायरेटेड विंडो का इस्तेमाल कर रहे है क्योंकि लिनक्स तो फ्री है|
लिनक्स को सीखते सीखते जो सीखा वह हमने ज्ञान दर्पण .कॉम पर भी लिख दिया
ताकि हिंदी भाषी लोगों को लिनक्स के बारे में हिंदी भाषा में सहायता मिल
जाये| जो आप इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते है http://www.gyandarpan.com/search/label/linux

कैसा रहा आपका लिनक्स के साथ अनुभव जरुर बताएं|

ePandit | ई-पण्डित

unread,
Oct 19, 2011, 8:53:54 AM10/19/11
to lug-...@googlegroups.com
आपके विपरीत हमारा लिनक्स के साथ पहला अनुभव बड़ा खराब रहा था। कुछ साल पहले एक मित्र से रैडहैट की सीडी लेकर इंस्टाल की। उसमें ऑडियो-वीडियो कुछ भी न चलता था, इसके अलावा फिल्म की अच्छी-भली नयी सीडी डालो वह करप्ट बताता था। ऍमपीथ्री तक चलाने के लिये तरस गये। डायलअप इंटरनेट कनैक्शन का जमाना था, नेट से उपयुक्त सॉफ्टवेयर भी न ढूँढ अथवा डाउनलोड कर पाते थे। उन दिनों डिजिट मैगजीन की सीडी के साथ आये लिनक्स के कुछ सॉफ्टवेयर इंस्टाल करने की कोशिश की तो डिपेंडेंसीज ने चकरा दिया, आज की तरह आसान सॉफ्टवेयर सैंटर जैसा सिस्टम न था। न ही उन दिनों नेट पर ऐसा सोशल नेटवर्किंग का जमाना था कि किसी से आज की तरह मदद मिल जाती। ऑफलाइन जिन्दगी के दोस्तों में किसी को इस नई "विण्डोज़" का कुछ पता न था। लिनक्स प्रयोग करने वाले बन्द को महान समझा जाता था। थक-हार कर हमने लिनक्स से तौबा कर ली, इस बारे में एक पोस्ट भी कभी लिखी थी जो आज भी लाइव राइटर के ड्राफ्ट में पड़ी थी, पब्लिश न हो पायी।

फिर अभी एक-दो साल पहले से उबुंटू का नाम सुना, वूबी के जरिये विण्डोज़ में ही आसान इंस्टालेशन का पता चला। उबुंटू सॉफ्टवेयर सैंटर की आसान ऍप स्टोर शैली की इंस्टालेशन ने लिनक्स की एकमात्र समस्या दूर कर दी। एकमात्र समस्या ये है कि यदि किसी पीसी पर नेट न उपलब्ध हो तो पैन ड्राइव आदि से दूसरे पीसी से सॉफ्टवेयर डाउनलोड कर लाने पर भी डिपेंडेंसीज की समस्या आती है। वरना आम तौर पर आज ब्रॉडबैंड के सुलभ होने से और सॉफ्टवेयर सैंटर के कारण लिनक्स की सॉफ्टवेयर इंस्टालेशन वाली दिक्कत दूर हो गयी है।

आज स्कूल में अपनी उबुंटू युक्त नेटबुक से ऍचपी का मल्टीपरपज प्रिंटर जोड़ा तो उसने बिना कुछ किये सीधे प्लग ऍण्ड प्ले से सब खुद ही कॉन्फिगर कर लिया, सामने कोई पॉपअप बॉक्स तक न आया जबकि मैं सोच रहा था कि सैटिंग्स में जाकर कुछ ताम-झाम करना होगा, इससे ज्यादा समय तो विण्डोज़ में इंस्टालेशन में समय लगा था।

आशा है भविष्य में लिनक्स और बेहतर होगी और ज्यादा लोगों तक पहुँचेगी।

१९ अक्तूबर २०११ ७:२६ पूर्वाह्न को, Ratan singh Shekhawat <ratansing...@gmail.com> ने लिखा:

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