६०१०. ख़्वाब में आ कर किसीने एक दिन मुझसे कहा – २४ अगस्त २०१७

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Dr.M.C. Gupta

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Aug 23, 2017, 12:11:56 PM8/23/17
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६०१०. ख़्वाब में आ कर किसीने एक दिन मुझसे कहा२४ अगस्त २०१७


 

ख़्वाब में आ कर किसीने एक दिन मुझसे कहा

जी चुका काफ़ी, नहीं जीने का अब मतलब रहा

 

आँख जब मेरी खुली मैं बात ये भूला नहीं

बस यही पैग़ाम दिल में उठ रहा था बारहा

 

जांचने बैठा ज़रा फ़ुर्सत से उस पैग़ाम को

है सही, वाजिब बहुत, दिल ने मेरे यकदम कहा

 

काम कर पाया नहीं कुछ, ख़्वाब ही देखे हैं बस

ख़्वाब का जो भी चिना तूने महल वो ही ढहा 

 

आज तक जीना ख़लिश तेरा रहा नाकाम है

 ज्यों निकम्मेपन की तेरी हो चुकी है इंतिहा. 



इंतिहा – पराकाष्ठा, आख़िरी हद, बहुत ज़्यादा 


बहर --- २१२२  २१२२  २१२२  २१२

 

महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’

२६ मार्च २०१७


--
(Ex)Prof. M C Gupta
MD (Medicine), MPH, LL.M.,
Advocate & Medico-legal Consultant
www.writing.com/authors/mcgupta44

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