६०५५. दिल में बहुत है चैन कोई लूट ले इसे – २२ जून २०१७
दिल में बहुत है चैन कोई लूट ले इसे
हलचल कभी इस ज़िंदगी में कोई तो उठे
हमराह कोई तो बने दुनिया की राह में
कोई तो हो जिससे वफ़ाओं के मिलें सिले
वो रात-दिन यूँ ही बिता देना बिना वजह
तनहाई के आलम में कोई कब तलक जिए
अपने से बातें रोज़ करके थक गया हूँ मैं
मैं गुफ़्तगू कुछ कर सकूँ ऐसा कोई मिले
ये ज़िंदगी बेकार सी लगती है अब ख़लिश
मायूसियाँ ये हर तरफ़ कब तक कोई सहे.
बहर --- २२१२ २२१२ २२१२ १२
महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’
८ मई २०१७