६१३५. इंसान का दुनिया में इतना ही फ़साना है – १८ अगस्त २०१७
इंसान का दुनिया में इतना ही फ़साना है
कुछ रोज़ फ़क़त जी कर हस्ती को मिटाना है
पल तो हैं हुआ करते उजले भी, अंधेरे भी
उजलों को दिखाना है, बाकी को छिपाना है
समझे है ज़माने में हर शख़्स अहम ख़ुद को
ज़र्रा है मगर वो इक, कोई न ठिकाना है
दुनिया ये समंदर है, जलस्फोट है मानव ये
मत गर्व करो ख़ुद पर इंसां को बताना है
भूले है सदा रब को, मालिक जो सभीका है
खुदगर्ज़, बहुत निष्ठुर, ज़ालिम ये ज़माना है
इस जन्म के चक्कर से आना है अगर बाहर
मौला में ख़लिश हर दम इस दिल को लगाना है.
बहर --- २२११ – २२२ // २२११ – २२२
महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’
२४ जुलाई २०१७