६०७१. दिन जा रहे थे यूँ ही, दिल में था ग़म का साया – १२ अगस्त २०१७
दिन जा रहे थे यूँ ही, दिल में था ग़म का साया
ऐसे में कोई दिलबर मेरे क़रीब आया
मन को ख़ुशी मिली कुछ, तबियत हरी हुई कुछ
वीरान तप रहा था, पा ली हो जैसे छाया
मदहोश से वो पल थे, जग की नहीं ख़बर थी
दिल ने था शाद कोई, रंगीन गीत गाया
पर था भरम वो केवल, ज़्यादा न टिक सका वो
दिलबर पे दिल लुटाना मानो हुआ था ज़ाया
मनहूस दिन ख़लिश था, जब एक दिन चमन में
पहलू में ग़ैर के था हमने सनम को पाया.
बहर --- २२१२-१२२ // २२१२-१२२
महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’
२४ मई २०१७