६०४७. आजकल ये ज़िंदगी बेकार सी लगती है कुछ – १६ जून २०१७

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Dr.M.C. Gupta

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Jun 15, 2017, 10:55:41 AM6/15/17
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६०४७. आजकल ये ज़िंदगी बेकार सी लगती है कुछ १६ जून २०१७  


 

आजकल ये ज़िंदगी बेकार सी लगती है कुछ

रूह मेरी अब ख़ुदा के ख़्याल में रमती है कुछ

 

मुश्किलों को देख कर दिल है परेशाँ किसलिए

मुश्किलों से ही गुज़र कर ज़िंदगी बनती है कुछ

 

जोड़ता दौलत रहेगा कब तलक संसार में

दौलतों का त्याग कर तू, साख तब रहती है कुछ

 

भोग भी है योग भी, है रास्ता चुनना तुझे

योग की राह एक आलिम को मगर जंचती है कुछ

 

एक तू ही तो नहीं जो काम सब करता है ख़ुद

कोई कर्ता है कहीं, उसकी ख़लिश हस्ती है कुछ.

 

बहर --- २१२२  २१२२  २१२२  २१२

 

महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’

३० अप्रेल २०१७


--
(Ex)Prof. M C Gupta
MD (Medicine), MPH, LL.M.,
Advocate & Medico-legal Consultant
www.writing.com/authors/mcgupta44

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