६०१२. अब दिल में कुछ भाव नहीं, केवल चुप्पी सी छाई है– २७ अगस्त २०१७
अब दिल में कुछ भाव नहीं, केवल चुप्पी सी छाई है
लगता है सब ओर मेरे इक आलम-ए-तनहाई है
उठ जाता हूँ आँख खुले जब, दिन यूँ ही कट जाता है
आती है जब सांझ, लगे यादों की ढेरी लाई है
करने को कुछ काम नहीं, करना भी क्या अब बस का है
जिसकी ख़ातिर कुछ न किया वो अब बस इक परछाई है
जीवन के जो दिन हैं बचे उतना हमको जीना ही है
मांगे से है मौत न आती, लगता है हरजाई है
किस पर चलता ज़ोर भला, सुनता कब कोई है मेरी
इसमें क्या शक ख़लिश बुढ़ापा होता ही दुखदाई है.
बहर --- २२-२२ २११२ २२-२२ २२-२२
महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’
२८ मार्च २०१७
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