६१४६. ढलता सूरज और ढलेगा, आख़िर वो ढल जाएगा – ९ अगस्त २०१७
ढलता सूरज और ढलेगा, आख़िर वो ढल जाएगा
जो अंबर में आज उड़े, मिल मिट्टी में कल जाएगा
जो पौधा है आज लगाया, ऊँचा होगा बरसों में
चाहे जग में तू न रहे, पुत्रों को दे फल जाएगा
मेहनत कर जो जोड़ सका तू बच्चे उसको लूटेंगे
तेरे सीने एक दिवस बेटा दलिया दल जाएगा
क्या हिम्मत है ग़ैर कोई तेरे घर पे डाका डाले
होगा कोई दोस्त तेरा ही जो तुझको छल जाएगा
होता कब दीदार हसीनों का ख़तरे से है खाली
देखेगा तू हुस्न अगर तो भीतर तक जल जाएगा
तू आत्मा है, मर न सके, लेकिन ये तन तो नश्वर है
फूला है तू आज बदन पर, दो दिन में गल जाएगा
जब तेरा मन लग न सके, जग के झंझट में खोया हो
भज लेना हरि नाम, सुकूँ दे तुझको दो पल जाएगा
लेने आया कोई फ़रिश्ता गर इक दिन मेरी जाँ को
वक़्ते -रुख़्सत सुन कर मेरी ग़ज़ल ख़लिश टल जाएगा.
बहर --- २२-२२ २११२ २२-२२ २२-२२
महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’
२ अगस्त २०१७