६०६५. न जाने किसलिए हमसे मुहब्बत तुम न कर पाए – २२ जुलाई २०१७
न जाने किसलिए हमसे मुहब्बत तुम न कर पाए
लगाने के लिए दिल ग़ैर ही तुमको नज़र आए
बहुत उम्मीद थी हमको कभी तो पास आओगे
नहीं देखा हमारी ओर, भूले से न मुस्काए
यही क़िस्मत में था तुमसे कभी हम मिल नहीं पाएँ
नहीं थी कुछ कमी हममें मगर तुमको नहीं भाए
अगर होता कोई ऐसा निभाता जो वफ़ा हमसे
न होते आज इतने ज़िंदगी में ग़म भरे साए
चलो ऐसे सही, यूँ ही ख़लिश हम दिन बिता लेंगे
यही काफ़ी है दो दिन को तो थे जीवन में तुम आए.
बहर --- १२२२ १२२२ १२२२ १२२२
महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’
१८ मई २०१७