द्वन्द में मार्गदर्शन

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Yogesh Kumar

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Apr 23, 2011, 6:17:01 AM4/23/11
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श्रद्धेय स्वामी जी, 
राधे - राधे,
 आपके समक्ष अपना एक आन्तरिक द्वन्द निवारण हेतु रखना चाहता हूँ| आशा हैं कि आप अपना मार्गदर्शन देकर कृतार्थ करेंगे |
कल मैंने एक घायल कपोत, जो कि उड़ पाने में भी असमर्थ था, की मरहम पट्टी की ताकि वह जल्द स्वस्थ हो कर अपना प्राकृतिक जीवन जी पाए | परन्तु मैंने उस कपोत को एक ऐसे स्थान पर रख छोड़ा जहा पर वह सुरक्षित नहीं था| मुझे इस का पूरा एहसास होते हुए भी मैंने उसे सुरक्षित स्थान पर नहीं रखा|
   और  जिस  बात  का  डर था  वही  हुआ | वो  कपोत उसी दिन  बिल्ली  का  शिकार  बन  गया | जब से मुझे इस दुर्घटना  का पता चला मेरे मन में एक से अधिक रूप में प्रतिकिर्या हुई|
१. सर्वप्रथम तो मुझे कपोत की मौत का बेहद अफ़सोस हुआ| एवं इस मौत के लिए मैं अपराध बोध से घिर गया| 
२. दूसरे ही पल मैंने ये सोच कर राहत की सास ली कि कपोत को कष्टों से मुक्ति मिल गयी एवं ये प्रभु की कपोत पर कृपा थी|
३. फिर लगा  कि दूसरा विचार  मन की चालाकी हैं स्वयं को अपराध बोध से मुक्त करने की| कर्तव्य  का  पूर्ण  निर्वाह  नहीं  करने का अपराध हुआ हैं एवं इसके लिए उपयुक्त प्रायश्चित किया जाना चाहिए|
४. फिर विचार आने लगा कि न तो कोई मरता न कोई मारता | इस मरने वाली देह के पीछे का सत्य तो मरा नहीं फिर क्यों अफ़सोस और कैसा प्रायश्चित|
   आपसे निवेदन हैं कि इस द्वन्द में आप मेरा मार्गदर्शन कर कृतार्थ करे| 

श्री   चरणों  में  कोटिश:  नमन

--
योगेश कुमार
या 
सत्यबोधानंद


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