भारतीय भाषाओं को कितना खतरा
Joga Singh Virk
अंग्रेजों के भारत छोड़ने के 65 वर्ष पशचात भी भारत में अभी भी उन मुद्दों पर बहस करनी पड़ रही है जो मुद्दे स्वतंत्रता आन्दोलन की अगुवाई कर रहे सेनानी स्वतंत्रता से पहले ही निपटा चुके थे और उन पर स्पष्ट नीतियों का ऐलान कर चुके थे। इन नीतियों में से एक क्षेत्र भाषा नीती का था। कांग्रेस पार्टी ने 1929 में अपने लाहौर सैशन में ही इस बारे में स्पष्ट एलान किया था कि स्वतंत्रता के पशचात भारत में मातृ भाषाओं को शिक्षा और प्रशासन का आधार बनाया जाएगा और भारतीय भाषाओं को उच्च स्तरीय कार्यों के लिए सक्षम बनाने के लिए आवश्यक कदम उठाये जाएँगे। शहीद भगत सिंह तो 15 वर्ष की उम्र में ही यह समझ प्राप्त कर चुके थे और लिख चुके थे कि 'पंजाब में पंजाबी भाषा के बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता'। गाँधी जी ने तो 1938 में ही स्पष्ट कहा था कि "क्षेत्रीय भाषाओं को उन का आधिकारिक स्थान देते हुए शिक्षा का माध्यम हर अवस्था में तुरंत बदला जाना चाहिए।" एक और अवसर पर उन्होने कहा था कि‘अंग्रेज़ी भाषा के मोह से निजात पाना स्वाधीनता के सब से ज़रूरी उद्देश्यों में से एक है। स्वतंत्रता के पशचात कुछ भारतीय भाषाओं के विकास के लिए कुछ प्रयत्न भी हुए और इस से शिक्षा इत्यादि में अच्छे नतीजे भी प्राप्त हुए।
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http://www.hindicenter.com/hindi-translation-research/119-dangers-for-indian-languages
आपका
रवि कुमार
हिन्दी सेंटर
ओट्टावा, कनाडा