विषय : पेंशन संबंधित मुद्दे
संबंधित विभाग : वित्त मंत्रालय
(1) पुत्रियों कोआजीवन पेंशन: वर्तमान नियमों के अनुसार, मृत सरकारी कार्मिक की अविवाहित कन्या आजीवन पारिवारिक पेंशन प्राप्त करने की हकदार होती है। सातवें वेतन आयोग की अनुशंसाओं के परिणामस्वरूप मासिक पेंशन की राशि में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वर्तमान में एक लाख रुपये या सत्तर–अस्सी हजार रुपये प्रतिमाह पेंशन पाने वाले बहुतायत में हैं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि अविवाहित कन्या को आजीवन पारिवारिक पेंशन देने का औचित्य क्या है?
आज के समय में समाज और शासन दोनों स्तरों पर पुत्र और पुत्री को समान अधिकार प्रदान किए जा रहे हैं। महिलाएँ स्वयं न्यायालयों में जाकर समानता से संबंधित निर्णय प्राप्त कर चुकी हैं। सेना, अखिल भारतीय सेवाएँ, विधि, चिकित्सा, लेखांकन, व्यापार, उड्डयन सहित लगभग सभी क्षेत्रों में महिलाएँ पुरुषों के समकक्ष कार्य कर रही हैं। कन्याओं के लिए सरकारी शिक्षा पूर्णतः निःशुल्क है, भर्तियों में उन्हें आरक्षण एवं प्राथमिकता प्रदान की जाती है। ऐसी स्थिति में केवल अविवाहित होने के आधार पर आजीवन पेंशन प्रदान करना, सरकारी नीतियों में स्पष्ट विरोधाभास को दर्शाता है।
वर्तमान व्यवस्था के अंतर्गत पेंशन प्राप्त करने हेतु वर्ष में मात्र एक बार एक घोषणा पत्र देना होता है, जिसमें यह घोषित किया जाता है कि किसी भी अन्य स्रोत से आय ₹9,000 प्रतिमाह से अधिक नहीं है। यह व्यवस्था अपने आप में एक विचित्र विरोधाभास उत्पन्न करती है—जहाँ ₹80,000 प्रतिमाह की पेंशन इस शर्त पर दी जा रही है कि आपकी अन्य आय ₹9,000 से अधिक न हो? ऐसी व्यवस्था न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि यह अप्रत्यक्ष रूप से भ्रष्टाचार को भी प्रोत्साहित करती है। यह अपेक्षा करना कि लाभार्थी स्वेच्छा से सही आय की घोषणा करेंगे, व्यवहारिक प्रतीत नहीं होता।
इसके अतिरिक्त, जिन अविवाहित कन्याओं के पास पर्याप्त चल-अचल संपत्ति है, वे भी आय कम होने की घोषणा कर सकती हैं, क्योंकि इस संबंध में किसी प्रकार की प्रभावी जांच व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। परिणामस्वरूप यह व्यवस्था लोगों को कार्य करने के बजाय केवल खाली बैठ कर पेंशन पर निर्भर रहने के लिए प्रेरित करती है। जब देश की 70–80 प्रतिशत जनसंख्या आज भी ₹25,000–₹30,000 प्रतिमाह में जीवन यापन कर रही है, तब सरकार द्वारा बिना कार्य किए इतनी अधिक पेंशन देना सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के सर्वथा विपरीत है।
जिस प्रकार अन्य पिछड़ा वर्ग में आर्थिक रूप से उन्नत वर्ग को आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाता, उसी प्रकार आर्थिक स्थिति के आधार पर पारिवारिक पेंशन की पात्रता भी निर्धारित की जानी चाहिए। पेंशन का उद्देश्य जीवन-यापन में सहायता करना है, न कि किसी को आजीवन आश्रित बनाना। अतः पारिवारिक पेंशन की राशि न्यूनतम वेतन के स्तर तक ही सीमित होनी चाहिए।
अतः निम्न बिंदुओं पर पुनर्विचार किया जाना आवश्यक है—
1. पच्चीस वर्ष से अधिक आयु की अविवाहित कन्याओं को पारिवारिक पेंशन की पात्रता समाप्त की जाए।
2. वार्षिक जीवन प्रमाण पत्र के साथ चल-अचल संपत्ति का विवरण तथा आयकर विभाग द्वारा जारी पिछले दो वर्षों का TIS (Taxpayer Information Summary) प्रपत्र अनिवार्य रूप से प्रस्तुत किया जाए।
3. यदि विवाह तक पारिवारिक पेंशन देने की व्यवस्था रखी भी जाती है, तो उसकी अधिकतम सीमा न्यूनतम वेतन के बराबर निर्धारित की जाए।
4. पेंशन भोगी पुत्रियों के लिए सामाजिक सेवा अनिवार्य की जाए।
एक समाज का तौर पर हमें यह निर्णय करना है की हम अपनी बेटियों को क्या शिक्षा देना चाहते हैं आत्म-निर्भरता या निर्भरता?
(2) असीमित पेंशन: वर्तमान नियमों के अनुसार, पारिवारिक पेंशन प्राप्त करने वाला व्यक्ति अपनी स्वयं की पेंशन भी पूर्ण रूप से प्राप्त कर सकता है, जिस पर कोई समग्र सीमा लागू नहीं होती। यद्यपि एकल पेंशन की अधिकतम सीमा ₹1,12,500/- (महंगाई भत्ता अतिरिक्त) निर्धारित है, तथापि जब कोई व्यक्ति एक से अधिक पेंशन प्राप्त करता है (जैसे स्वयं की पेंशन एवं पारिवारिक पेंशन), तब यह सीमा प्रभावी नहीं रहती। इसके अतिरिक्त, मूल पेंशन के साथ महंगाई राहत (DR) तथा महंगाई भत्ता (DA) दोनों का लाभ एक साथ लिया जा सकता है। इस संदर्भ में यह विचारणीय है कि क्या एक ही व्यक्ति को बिना किसी सीमा के दो पूर्ण पेंशन भुगतान प्राप्त करना न्यायसंगत एवं नीति की भावना के अनुरूप है।
(3) एक से अधिक पेंशन: वर्तमान प्रावधानों के अंतर्गत कोई व्यक्ति एक साथ दो पारिवारिक पेंशन (जैसे माता एवं पिता से संबंधित) प्राप्त कर सकता है। इतना ही नहीं, परिस्थितियों के अनुसार तीन या उससे अधिक पारिवारिक पेंशन (उदाहरणार्थ—सेना, केंद्र/राज्य सरकार तथा सार्वजनिक निकाय से) प्राप्त करना भी संभव है। यह प्रश्न गंभीरता से विचारणीय है कि क्या इस प्रकार के प्रावधान पेंशन की मूल अवधारणा के अनुरूप हैं। पेंशन का उद्देश्य लाभार्थी की न्यूनतम आजीविका सुनिश्चित करना है, न कि किसी व्यक्ति को अत्यधिक आर्थिक रूप से समृद्ध बनाना।
(4) जीवन प्रमाण पत्र की आवृत्ति: वर्तमान नियमों के अनुसार जीवन प्रमाण पत्र (Life Certificate) वार्षिक आधार पर लिया जाता है। परिणामस्वरूप, यदि जीवन प्रमाण प्रस्तुत करने के पश्चात किंतु अगले प्रमाण की तिथि से पूर्व पेंशनभोगी की मृत्यु हो जाती है, तो पेंशन का भुगतान अनावश्यक रूप से अधिकतम एक वर्ष तक जारी रह सकता है। यह भी उल्लेखनीय है कि सामान्य जीवन प्रत्याशा लगभग 75 वर्ष मानी जाती है, जबकि 80 वर्ष की आयु पूर्ण होते ही पेंशन में 20% की वृद्धि लागू हो जाती है। यह उपयुक्त प्रतीत होता है कि 75 वर्ष के पश्चात जीवन प्रमाण की प्रक्रिया को वार्षिक के स्थान पर अर्धवार्षिक (छह-माही) आधार पर किया जाए। वर्तमान में उपलब्ध डिजिटल एवं बैंकिंग सुविधाओं के माध्यम से बैंक अधिकारी घर जाकर जीवन प्रमाण प्राप्त कर रहे हैं, जिससे वरिष्ठ नागरिकों को किसी प्रकार की असुविधा भी नहीं होती।
(5) अधिवर्षिता के बाद परिवार वृद्धि: वर्तमान नियम अधिवर्षिता (सेवा निवृत्ति) के पश्चात भी परिवार की संरचना में परिवर्तन अथवा नए पारिवारिक सदस्यों को जोड़ने की अनुमति प्रदान करते हैं। इस विषय पर गंभीर पुनर्विचार की आवश्यकता है। यह प्रश्न उठता है कि सेवा निवृत्ति के पश्चात केवल पेंशन भुगतान के उद्देश्य से परिवार में नए सदस्यों को जोड़ने की अनुमति किस हद तक उचित है। इस प्रावधान के दुरुपयोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। उदाहरणस्वरूप, यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक वृद्धावस्था (जैसे 80 वर्ष) में विवाह कर ले अथवा दत्तक संतान ग्रहण कर ले, तो ऐसी परिस्थितियों में पेंशन से संबंधित पात्रता के निर्धारण हेतु स्पष्ट एवं सीमाबद्ध नियम आवश्यक प्रतीत होते हैं।