PMOPG/E/2026/0018575
संबंधित मंत्रालय : शहरी विकास
दिल्ली नगर निगम ने एक बहुत सामयिक कदम उठाते हुए अपने नियंत्रण वाले सभी 400 श्मशान घाटों पर लकड़ी के स्थान पर गोबर से निर्मित उपलों के प्रयोग तो प्राथमिकता देने का निर्णय लिया है। यह अनेक लाभों से युक्त एक चिर प्रतीक्षित प्रकृति अनुकूल कदम है। इस कदम से सब ओर लाभ ही लाभ हैं। पर्यावरण संरक्षण के अतिरिक्त यह प्रयास गौशालाओं को स्वायत्त बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा। जो गोबर अब तक जल कुंडों को दूषित कर रहा था अब वो कंडों के रूप में ईंधन की भांति उपयोग में लाया जाएगा। चूंकि हमारे राष्ट्र में पालतू पशु धन की विश्व की सर्वाधिक संख्या है, यह गहन चिंतन का विषय है कि पर्यावरण के सतत ह्रास विनाश के उपरांत भी की इस सामान्य सी दिखने वाले निर्णय में वर्षों लग गए ? मरघट में लकड़ी का प्रयोग प्रायः शहरों में अधिक होता है, ग्रामीण क्षेत्रों में गोसे/कंडों का प्रयोग प्रचुर मात्रा में होता है।
अब जबकि दिल्ली जैसा नगर, जो भारत वर्ष का सर्वाधिक गहन आबादी वाला क्षेत्र होने के साथ-साथ राष्ट्रीय राजधानी होने का गौरव भी सँजोय है, इस कदम के लिए दशकों लगा सकता है, पिछले लगभग पाँच वर्षों से तो में ही इस बारे में लिख रहा था, और भी न जाने कितने व्यक्ति इस हेतु प्रयासरत होंगे।देश के अन्य शहर भी प्रशासनिक उदासीनता के इसका अनुगमन करने के लिए अगले बीस वर्ष तक सोच विचार कर सकते हैं। अभी तो सरकार ने निर्णय भर लिया है , इसे मूर्त रूप देने में संभवतया अभी कुछ वर्ष और लगेंगे। एतदर्थ अनुरोध है कि देश के सभी नगर निगमों को इस संदर्भ में सूचित कर निर्देश दिया जाए के वे भी अपने क्षेत्र में इस प्रकार के व्यवस्था स्थापित करने लिए समय बद्ध योजना का निर्माण कर पर्यावरण संरक्षण में सहयोग करें ।