कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में हिंदी पाठ का प्रसंस्करण

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Anunad Singh

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Jan 15, 2026, 1:33:06 AMJan 15
to Scientific and Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा तकनीकी हिन्दी)
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए आई) द्वारा किये  रहे कल तक असंभव लगने वाले कामों की गिनती करना कठिन हो गया है।

ए आई का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि जिन कामों  को करने के लिए कल तक  कोडिंग करना पड़ता था, वे ही काम आज साधारण भाषा में लिखकर या बोलकर कराये जा सकते हैं।  

यदि आपको प्रूफरीडिंग करना हो तो आप यह काम जेमिनी या किसी अन्य ए.आई. को दे सकते हैं।  इसी तरह के अनेकानेक कार्य ए आई से कराया जा सकता है, या उस कार्य को करने की विस्तृत विधि उससे पूछी जा सकती है।  

देखिये कि  कहीं  आप अनावश्यक अपनी आँखों को कष्ट तो नहीं दे रहे , या अनावश्यक समय बर्बाद तो नहीं कर रहे ? औजार मनुष्य के सबसे अच्छे मित्र हैं।  आपका औजार अद्यतन हो, तेज धार वाला हो, चलाने में आसान हो , और निःशुल्क हो तो क्या कहने ? 
  

Narayan Prasad

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Jan 15, 2026, 3:12:45 AMJan 15
to technic...@googlegroups.com

लेकिन एक भाषा से दूसरी भाषा में गूगल translate की अपेक्षा अब का अनुवाद बहुत घटिया होता है। जहांँ पहले बहुत कुछ हिंदी के उचित शब्द आते थे, आजकल अंग्रेजी शब्दों से भरे होते हैं।


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Anunad Singh

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Jan 15, 2026, 7:01:17 AMJan 15
to technic...@googlegroups.com
ए.आई.  का उपयोग करते समय आपको अपनी इच्छा/आवश्यकता  उसे ठीक-ठीक बताना चाहिए।  उदाहरण के लिए, " नीचे लिखे वाक्यों का हिंदी में अनुवाद करो "  का प्रांप्ट लिखने के बजाय " नीचे लिखे वाक्यों का संस्कृतनिष्ठ हिंदी में अनुवाद करो"  लिखकर देखिये।  या, "नीचे लिखे वाक्यों का हिंदी में अनुवाद करो।  ध्यान रखना कि  अंग्रेजी या फारसी के शब्दों के स्थान पर तत्सम शब्दों का प्रयोग हो " लिखकर देखिये।  

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विजय प्रभाकर नगरकर Vijay Prabhakar Nagarkar

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Jan 15, 2026, 7:54:08 AMJan 15
to technic...@googlegroups.com
भाषा शिक्षण में कृत्रिम बुद्धि आधारित टूल्स महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है,हमारे प्रांप्ट सटीक होने चाहिए। एक सवाल तुम करो,एक सवाल हम करेंगे तो कृत्रिम बुद्धि  अच्छी तरहबात करने लगेगी। 

विजय प्रभाकर नगरकर
सेवानिवृत्त राजभाषा अधिकारी
बीएसएनएल, अहमदनगर,महाराष्ट्र
◆पूर्व सदस्य- नराकास,अहमदनगर,राजभाषा विभाग,भारत सरकार (2000-2020)
◆पूर्व सदस्य- हिंदी अध्यापन मंडल
पुणे विश्वविद्यालय (1995-2000)
औरंगाबाद मराठवाड़ा विश्वविद्यालय (2000-2005)
◆उत्कृष्ट हिंदी कार्य हेतु मा राष्ट्रपति जी द्वारा प्रमाणपत्र
◆ डिजिटल हिंदी की यात्रा पुस्तक को महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी मुंबई द्वारा पुरस्कार 2023

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V S Rawat

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Jan 15, 2026, 8:26:43 AMJan 15
to technic...@googlegroups.com
> औजार मनुष्य के सबसे अच्छे मित्र हैं। आपका औजार अद्यतन हो, तेज
> धार वाला हो, चलाने में आसान हो , और निःशुल्क हो तो क्या कहने ?

ये औज़ार अभी इसलिए निशुल्क हैं, क्योंकि इन्हें बनाने वाली कम्पनियाँ उन
औज़ारों की मुफ़्त में टेस्टिंग होने दे रही हैं। इससे कम्पनियों को अपने
औज़ारों की बग रिपोर्ट मिलती है, या असुविधाओं या कमियों या नये नज़रियों के
बारे में पता चलता है, जिससे वो औज़ारों को इम्प्रूव कर रही हैं।

निःशुल्क होने की वजह से उस औज़ार से हुई किसी ग़लती से आपको हुए नुक़सान का
आपको कोई मुआवज़ा नहीं मिलता है।

यह सब हमेशा निःशुल्क नहीं रहने वाला है।

जिस दिन कम्पनी को लग गया कि उनका औज़ार पर्याप्त विकसित हो चुका है, उस दिन
वो इन औज़ारों को बहुत ऊँच - महँगे या अनाप-शनाप दामों पर बेचेंगी और यह आम
आदमी की पहुँच से बाहर निकल जाएँगे।

इसलिए अगर आप आज एआई का उपयोग कर रहे हैं, तो आप उस काम को अपने मैनुअल
तरीक़े से करने का अपना कौशल-हुनर और कमिटमेण्ट खो रहे हैं। फिर जिस दिन वो
औज़ार लाखों-करोड़ों रुपये में बिकने लगेगा उस दिन आप उसे ख़रीद नहीं पाएँगे
और आप उस काम को मैनुअली करना भूल चुके होंगे, या आपमें उतना सब्र और लगन
नहीं बचा होगा कि आप उसे मैनुअली करें। तो एक तरह से आपका काम-धन्धा बन्द
हो जाएगा और आप बेरोजगार हो जाएँगे।

इसलिए मेरा सुझाव है कि आप निःशुल्क के लालच में आकर अपने जीवन भर के हुनर
को बरबाद न कर बैठे और एआई का उपयोग करते समय इन सारी बातों को भी ध्यान में रखें।

धन्यवाद
रावत

विजय प्रभाकर नगरकर Vijay Prabhakar Nagarkar

unread,
Jan 15, 2026, 9:17:35 AMJan 15
to technic...@googlegroups.com
कृत्रिम बुद्धि का जवाब

आपका यह प्रश्न अत्यंत सामयिक है और एआई (AI) के भविष्य को लेकर वैश्विक स्तर पर चल रही चिंताओं को दर्शाता है। 2026 की शुरुआत तक, एआई परिदृश्य में कुछ स्पष्ट रुझान उभर रहे हैं जो आपके तीनों सवालों का उत्तर देते हैं।
यहाँ इसका विस्तृत विश्लेषण है:
1. क्या मुफ्त टूल्स आगे चलकर सशुल्क (Paid) हो जाएंगे?
वर्तमान में एआई उद्योग एक "फ्रीमियम" (Freemium) मॉडल की ओर बढ़ रहा है। इसके पीछे मुख्य कारण 'कंप्यूटिंग लागत' है।
 * लागत का दबाव: एआई मॉडल को चलाने के लिए बहुत महंगे GPU (ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट) और भारी बिजली की आवश्यकता होती है। शुरुआती दौर में कंपनियां बाजार में अपनी पकड़ बनाने और डेटा एकत्र करने के लिए सेवाएं मुफ्त देती हैं, लेकिन लंबी अवधि में लागत वसूलने के लिए उन्हें सशुल्क मॉडल अपनाना ही पड़ता है।
 * स्तरीकृत सेवाएं (Tiered Services): भविष्य में "पूर्णतः मुफ्त" के बजाय "सीमित मुफ्त" (Limited Free) का चलन बढ़ेगा। उदाहरण के लिए, बुनियादी काम मुफ्त होंगे, लेकिन उच्च गति, अधिक सटीकता और व्यावसायिक उपयोग के लिए पैसे देने होंगे।
 * अपवाद: कुछ मामलों में तकनीक सस्ती होने पर सशुल्क टूल्स मुफ्त भी हुए हैं (जैसे 2025 में चीन के 'Ernie' एआई का कुछ हिस्सा मुफ्त किया गया), लेकिन यह केवल बहुत बड़ी कंपनियों द्वारा प्रतिस्पर्धा के लिए किया जाता है।
2. क्या ओपन सोर्स डेटा सशुल्क टूल्स में मिलेगा?
हाँ, और यह पहले से ही हो रहा है। ओपन सोर्स डेटा और सशुल्क टूल्स के बीच का संबंध कुछ इस प्रकार है:
 * हाइब्रिड मॉडल: सशुल्क टूल्स अक्सर 'ओपन सोर्स' डेटा (जैसे विकिपीडिया, सार्वजनिक शोध पत्र, कॉमन क्रॉल) को आधार बनाकर प्रशिक्षित किए जाते हैं।
 * मूल्य संवर्धन (Value Addition): सशुल्क टूल्स केवल डेटा नहीं देते, बल्कि उस डेटा को 'साफ़' (Clean) करने, उसे व्यवस्थित करने और उस पर बेहतर 'तर्क' (Reasoning) करने की क्षमता के पैसे लेते हैं।
 * डेटा की सुलभता: ओपन सोर्स डेटा हमेशा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रहेगा, लेकिन उसे समझने और उपयोग करने के लिए जिस "बुद्धि" (एआई मॉडल) की आवश्यकता होती है, वह सशुल्क हो सकती है।
3. क्या ये टूल्स सिर्फ अमीरों की संपत्ति बन जाएंगे?
यह "डिजिटल डिवाइड" (Digital Divide) या "एआई डिवाइड" की एक गंभीर चिंता है। पूंजीवादी दृष्टिकोण से देखें तो जिसके पास अधिक पैसा है, उसके पास सबसे शक्तिशाली एआई टूल्स और डेटा होंगे, जो उन्हें प्रतिस्पर्धा में बहुत आगे ले जा सकते हैं।
हालाँकि, इस "एकाधिकार" को रोकने के लिए तीन बड़े प्रयास चल रहे हैं:
 * ओपन सोर्स क्रांति: 'Llama' और 'Mistral' जैसे ओपन-सोर्स मॉडल दुनिया भर के डेवलपर्स के लिए मुफ्त उपलब्ध हैं। यह किसी एक कंपनी की संपत्ति नहीं हैं।
 * सरकारी हस्तक्षेप: भारत सरकार का 'इंडियाएआई मिशन' (IndiaAI Mission) इसी दिशा में एक कदम है। इसका उद्देश्य सरकारी स्तर पर 'कंप्यूट पावर' (GPU क्लस्टर) स्थापित करना है ताकि आम स्टार्टअप और शोधकर्ता बिना बड़ी पूंजी के एआई का उपयोग कर सकें।
 * लोकतंत्रीकरण: जैसे-जैसे तकनीक पुरानी होती है, वह सस्ती होती जाती है। जो एआई आज करोड़ों की लागत से चल रहा है, वह कुछ वर्षों में सामान्य स्मार्टफोन पर भी चल पाएगा।
एआई भविष्य का एक तुलनात्मक सारांश
| विशेषता | सशुल्क एआई (Proprietary) | ओपन सोर्स एआई (Open Source) |
|---|---|---|
| पहुँच | केवल सशुल्क ग्राहकों के लिए | सभी के लिए मुफ्त/सस्ती |
| डेटा नियंत्रण | कंपनी के पास सुरक्षित | सार्वजनिक और पारदर्शी |
| उपयोग | व्यावसायिक और उच्च स्तरीय शोध | स्टार्टअप, छात्र और सामान्य उपयोग |
| मुख्य खिलाड़ी | OpenAI, Google, Microsoft | Meta, Hugging Face, सरकारी मिशन |
> विशेष नोट: फरवरी 2026 में भारत में होने वाला 'एआई इम्पैक्ट समिट' (AI Impact Summit) इसी विषय पर केंद्रित है कि एआई को कैसे आम आदमी तक पहुँचाया जाए और इसे केवल अमीरों की संपत्ति बनने से कैसे रोका जाए।



विजय प्रभाकर नगरकर
सेवानिवृत्त राजभाषा अधिकारी
बीएसएनएल, अहमदनगर,महाराष्ट्र
◆पूर्व सदस्य- नराकास,अहमदनगर,राजभाषा विभाग,भारत सरकार (2000-2020)
◆पूर्व सदस्य- हिंदी अध्यापन मंडल
पुणे विश्वविद्यालय (1995-2000)
औरंगाबाद मराठवाड़ा विश्वविद्यालय (2000-2005)
◆उत्कृष्ट हिंदी कार्य हेतु मा राष्ट्रपति जी द्वारा प्रमाणपत्र
◆ डिजिटल हिंदी की यात्रा पुस्तक को महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी मुंबई द्वारा पुरस्कार 2023

◆अनुवादक,लेखक, ब्लॉगर
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विजय प्रभाकर नगरकर Vijay Prabhakar Nagarkar

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Jan 15, 2026, 9:52:40 AMJan 15
to technic...@googlegroups.com




विजय प्रभाकर नगरकर
सेवानिवृत्त राजभाषा अधिकारी
बीएसएनएल, अहमदनगर,महाराष्ट्र
◆पूर्व सदस्य- नराकास,अहमदनगर,राजभाषा विभाग,भारत सरकार (2000-2020)
◆पूर्व सदस्य- हिंदी अध्यापन मंडल
पुणे विश्वविद्यालय (1995-2000)
औरंगाबाद मराठवाड़ा विश्वविद्यालय (2000-2005)
◆उत्कृष्ट हिंदी कार्य हेतु मा राष्ट्रपति जी द्वारा प्रमाणपत्र
◆ डिजिटल हिंदी की यात्रा पुस्तक को महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी मुंबई द्वारा पुरस्कार 2023

◆अनुवादक,लेखक, ब्लॉगर
On Thu, 15 Jan, 2026, 18:56 V S Rawat, <vsr...@gmail.com> wrote:

Anunad Singh

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Jan 15, 2026, 11:07:16 AMJan 15
to technic...@googlegroups.com
ये औज़ार अभी इसलिए निशुल्क हैं, क्योंकि इन्हें बनाने वाली कम्पनियाँ उन औज़ारों की मुफ़्त में टेस्टिंग होने दे रही हैं। 

इसमें सच्चाई १० प्रतिशत भी नहीं है।  
वास्तविक कारण यह है कि प्रतिस्पर्धा बहुत अधिक है। इस क्षेत्र में बीसों नामी कम्पनियाँ हैं, और छोटी-मोटी  कंपनियों की  गिनती करना असंभव  जैसा है। सब कम्पनियाँ डरी हुईं हैं कि प्रयोक्ता कहीं उन्हें छोड़  कही और न चले जांय।

यह सब हमेशा निःशुल्क नहीं रहने वाला है।

मुझे लगता है कि वह दिन कभी नहीं आएगा। ये  सदा निःशुल्क रहेंगे और दिन-प्रतिदिन (वर्ष दर वर्ष नहीं)   अच्छे  से  अच्छा होते चले जायेंगे। 



इसलिए अगर आप आज एआई का उपयोग कर रहे हैं, तो आप उस काम को अपने मैनुअल तरीक़े से करने का अपना कौशल-हुनर और कमिटमेण्ट खो रहे हैं।

बिलकुल नहीं।  एआई के क्षेत्र में एक से एक चुनौतीपूर्ण कार्य आ गए हैं।  उन्हें कीजिये। ये कथन बहुत प्रसिद्ध हो रहा है - "AI won't replace you, but a person using AI will."

और अंत में ,  
आप ए आई के क्षेत्र में मध्यम या उन्नत स्तर का काम  निःशुल्क करना चाहते हैं  तो Google colab (https://colab.research.google.com/)  का उपयोग किया कीजिये।  आपके पास केवल जी-मेल होना पर्याप्त है।  
सब कुछ निःशुल्क : CPU/GPU/TPU,  code assistant, example notebooks for various applications, python और उसका पूर्णतः कार्यशील परिवेश (environment) , कोई भी पाइथन पैकेज इनस्टॉल कीजिये।  सब कुछ ऑटोमेटिक!

कुछ काम जो आप यहाँ कर सकते हैं - 
(१) लाखों मॉडल्स में से कोई भी चुनिए, डाउनलोड कीजिये , रन कीजिये।  
(२) कोई मॉडल चुनिए , उसे फाइन-ट्यून  कीजिये।  अपने लिए अपने  विशेषज्ञता के क्षेत्र में एआई औजार बनाइये।  



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V S Rawat

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Jan 16, 2026, 2:40:25 AMJan 16
to technic...@googlegroups.com


On 15-Jan-26 9:36 PM, Anunad Singh wrote:
> ये कथन बहुत प्रसिद्ध हो रहा है - "AI won't replace you, but a person using AI
> will."

एकदम यही होगा।

"person using AI " वो व्यक्ति होगा जो लाखों रुपए का एआई टूल ख़रीदना वहन
कर सकेगा, जिसे ख़रीदना हम आम लोग वहन नहीं कर सकेंगे।

या फिर वो व्यक्ति किसी बड़े कॉरपोरेट का कर्मचारी होगा जो कॉरपोरेट करोड़ों
रुपए का एआई टूल ख़रीद सकेगा जो हम आम लोग नहीं ख़रीद सकेंगे।

लिहाज़ा एआई न ख़रीद सकने वाले लोग प्रतिस्पर्धा से बाहर कर दिए जाएँगे।

आज भी दुनिया में कई मुफ़्त सॉफ़्टवेयर हैं, उनमें से कुछ तो बहुत अच्छी हैं।
फिर भी मुफ़्त सॉफ़्टवेयर उतनी पॉपुलर नहीं हो पाती है। इसकी एक वजह है लोग
अपनी-अपनी पसन्द से मुफ़्त सॉफ़्टवेयर का यूज़ करते हैं जिससे
स्टैण्डर्डाइज़ेशन नहीं आ पाता है और वो सॉफ़्टवेयर हर जगह पर उपलब्ध नहीं हो पाती है।

और फिर जैसे ही आप कॉरपोरेट के लिए काम करना शुरू करते हैं, क्योंकि
कॉरपोरेट महँगी सॉफ़्टवेयर ख़रीद सकता है इसलिए कॉरपोरेट उन महँगी सॉफ़्टवेयर
पर आपसे काम करवाता है और कॉरपोरेट वो सॉफ़्टवेयर आपको ख़रीद कर नहीं देता
है, तो आपको ख़ुद ख़रीदना पड़ेगा और अगर आप नहीं ख़रीदेंगे या पायरेसी नहीं
करेंगे तो आपको काम नहीं मिलेगा।

जैसे एमएस ऑफ़िस - ऑफ़िस के आथा दर्जन अच्छे व्यापक मुफ़्त वर्जन उपलब्ध हैं
लेकिन कॉरपोरेट एमएस ऑफ़िस को ख़रीद कर आपसे उसमें ही काम करवाता है इसलिए
मुफ़्त वाले ऑफ़िस पर काम करने का आपका हुनर किसी काम नहीं आता है।

या विण्डोज़ - जिसके लिए लीनक्स उपलब्ध जो पूरी तरह मुफ़्त नहीं, लेकिन कुछ
संस्करण मुफ़्त भी हैं, या विण्डोज़ से बहुत सस्ते दाम पर मिलते हैं। लेकिन
कॉरपोरेट विण्डोज़ को ख़रीद कर आपसे उसमें ही काम करवाता है इसलिए मुफ़्त या
सस्ते वाले लीनक्स पर काम करने का आपका हुनर किसी काम नहीं आता है।

और कॉरपोरेट निजी मुफ़्त सॉफ़्टवेयर को ख़रीद कर अपनी प्रतिस्पर्धा कम करते
हैं, अगर आप उस मुफ्त सॉफ़्टेयर को सीखे हुए थे, तो आपका वो हुनर बेकार चला
जाता है। पहले वीडियो का सब कुछ फ़्लैश से चलता था, लेकिन फिर एक कॉरपोरेट
ने उसे ख़रीद कर उसको अपडेट करना बन्द कर दिया और आज फ़्लैश पूरी तरह से ग़ायब हो चुका है।

कॉरपोरेट निजी मुफ़्त सॉफ़्टवेयर के डेवलपर को साम-दाम-दण्ड-भेद से
इनफ़्ल्युएन्स भी करता है जिससे निजी मुफ़्त सॉफ़्टवेयर का विकास अवरुद्ध हो
जाता है। पहले नेटस्केप सबसे पॉपुलर ब्राउज़र और ईमेल रीडर था, वो ग़ायब हो
गया। फिर फ़ायरफ़ॉक्स और थण्डरबर्ड आए, वो भी ग़ायब होने की क़गार पर हैं। गूगल
क्रोम और माइक्रोसॉफ़्ट एज हर जगह छाए हुए हैं।

कॉरपोरेट जो टूल फ़ीअल्हाल मुफ़्त में देते भी हैं, बाद को उन्हें चार्जेबल
कर दे देते हैं या उनके काम को सीमित कर देते हैं। जैसे गूगल ट्रान्सलेट
पहले अनलिमिटेड फ़्री था, लेकिन फिर उसमें 5000 कैरेक्टर की लिमिट डाल कर
यूज़र का काम बहुत बढ़ा दिया या असम्भव कर दिया। इस चक्कर में जिन लोगों को
गूगल ट्रान्सलेट या अन्य कम्प्यूटर ऐडेड ट्रान्सलेशन की लत पड़ चुकी थी, अब
उनमें मैनुअली ट्रान्सलेट करने की इच्छा बची ही नहीं और वो मैदान से बाहर हो गए हैं।

या फिर कॉरपोरेट अपने टूल्स में बेहूदे अन्तहीन विज्ञापन दिखाएगा जिसमें
आपका समय और बैण्डविड्थ बरबाद होगा, और आज लगभग सभी वेबसाइटें विज्ञापन
दिखाती हैं वरना आपको साइट को देखने ही नहीं देती हैं।

मेरा तो पूरा जीवन ही कम्प्यूटर पर बीता है, मैं कम्प्यूटर या ऑटोमेशन या
मशीनों का विरोध नहीं करता हूँ। लेकिन हमें कम्प्यूटर या ऑटोमेशन या मशीनों
का उपयोग एक सुविधा-सहायता-असिस्टैण्ट के लिए ही करना चाहिए, न ही उन पर
पूरी तरह निर्भर होकर उन टूल्स के बिना काम कर सकने की अपनी क्षमता को गँवा देना चाहिए।

यही बात एआई पर लागू होती है, कॉरपोरेट हमें एआई का एडिक्ट बना कर हमारे
हुनर की हत्या कर रहे हैं।

--
रावत

Anunad Singh

unread,
Jan 17, 2026, 9:32:35 AMJan 17
to technic...@googlegroups.com

V S Rawat

Jan 16, 2026, 1:10 PM (1 day ago)



to technical-hindi


On 15-
"person using AI " वो व्यक्ति होगा जो लाखों रुपए का एआई टूल ख़रीदना वहन
कर सकेगा, जिसे ख़रीदना हम आम लोग वहन नहीं कर सकेंगे।
या फिर वो व्यक्ति किसी बड़े कॉरपोरेट का कर्मचारी होगा जो कॉरपोरेट करोड़ों
रुपए का एआई टूल ख़रीद सकेगा जो हम आम लोग नहीं ख़रीद सकेंगे।
यह सब तथ्यों से कोसों  दूर है। अपने पहले के मेल मेल में मैं इसका संकेत दे चुका हूँ और फिर कह रहा हूँ कि कोई भी बिना एक पैसा खर्च किये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से सम्बंधित काम शुरू सकता है;  नाममात्र (trivial) का ए आई नहीं , बल्कि मध्यम और उच्च स्तर का।  गूगल का कोलैब (https://colab.research.google.com/) , huggingface  (https://huggingface.co/) आदि कुछ उदहारण हैं।

--
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Anunad Singh

unread,
Jan 17, 2026, 9:59:52 AMJan 17
to technic...@googlegroups.com
एक छोटी सी बात और कह दूँ कि बिना एक पैसा खर्च किये ए.आई. में काम तो शुरू कर सकते हैं तो और क्या चाहिए ? मेरे विचार से 'कल्पना की उड़ान' .  आपको सोचना है कि कौन सा काम एआई से करना अधिक उपयोगी होगा और इसके लिए कौन से मॉडेल  को आधार बनाकर आगे बढ़ा जाय ; ट्रेनिंग के लिए डाटासेट कैसे तैयार किया जाय आदि।   

विजय प्रभाकर नगरकर Vijay Prabhakar Nagarkar

unread,
Jan 17, 2026, 10:43:56 AMJan 17
to technic...@googlegroups.com
सहमत,आज के इस आधुनिक युग में कृत्रिम बुद्धि सभी क्षेत्रों व्याप्त है।महाराष्ट्र के बारामती ने किसानों के लिए कुछ प्रयोग शुरू कर दिए है जो फायदेमंद साबित हो रहे है। साहित्य सृजन के आगे भी एक नई दुनिया है।अगर आम आदमी का जीवन सुधर जाए तो क्या हर्ज है?

विजय प्रभाकर नगरकर
सेवानिवृत्त राजभाषा अधिकारी
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◆उत्कृष्ट हिंदी कार्य हेतु मा राष्ट्रपति जी द्वारा प्रमाणपत्र
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