Atmakatha path me se marksvadi ki janakari..

14 views
Skip to first unread message

chalawadirenu331

unread,
Nov 20, 2016, 8:49:06 PM11/20/16
to HindiSTF
[05/11 11:32 am] ‪+91 97412 44343‬: कार्ल मार्क्स एक जर्मन दार्शनिक और क्रांतिकारी थे, जिनका जन्‍म 1818 में और मृत्‍यु 1883 में हुई थी। उनके लेखन ने दुनिया में कम्‍युनिस्‍ट आंदोलन के लिए वैचारिक जमीन तैयार की। वे एक किताबी दार्शनिक नहीं थे। उन्‍होंने अपने विचारों को स्‍वयं अपने जीवन में उतारा। अपने दौर के मजदूर आंदोलनों और क्रांतिकारी आंदोलनों के साथ वे करीब से जुड़े हुए थे। चूंकि शासक वर्गों को चुनौती देने वाले उनके विचार इतने असरदार और 'खतरनाक' थे, कि उन्‍हें कई देशों की सरकारों ने देश से निकाल दिया था और उनके लिखे लेखों व विचारों पर प्रतिबंध लगा दिया था। उन्‍होंने बेहद गरीबी में अपना जीवन बिताया। 
[05/11 11:33 am] ‪+91 97412 44343‬: मार्क्‍स ने करीब 150 साल पहले जो लिखा था, वह 21वीं शताब्‍दी के भारत में कितना सार्थक और प्रासंगिक है, इस पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं। लेकिन हमें देखना होगा कि मार्क्‍स का उनके तत्कालीन समाज के बारे में क्‍या कहना है और क्या उनके विचार अभी भी हमारी दुनिया और हमारे संघर्षों को समझने में मददगार हैं? जब हम आसपास के समाज पर निगाह डालते हैं तो हमें गैर बराबरी और शोषण ही दिखाई पड़ता है। अमीर और गरीब के बीच, औरत और मर्द के बीच, ‘ऊपरी’ और ‘निचली’ जातियों के बीच। इस समाज में हमें जिंदा रहने के लिए होड़ करनी पड़ती है।

अक्सर कहा जाता है कि ऐसा समाज ‘स्वाभाविक’ या ‘ईश्वर का बनाया हुआ’ है। पर जब हम पूछते हैं कि ऐसा क्यों है कि जो लोग काम नहीं करते उनके पास तो अथाह संपत्ति है, लेकिन जो लोग सबसे कठिन काम करते हैं, वे सबसे गरीब हैं। तब कहा जाता है कि भगवान की यही मर्जी है। या कि काम न करने वाले अधिक कुशल हैं या ज्यादा मेहनत करते हैं। या फिर प्रकृति का नियम ही है कि कुछ लोग कमजोर और कुछ लोग बलवान हों।

जब हम पूछते हैं कि हमारे समाज में औरतें मर्दों के अधीन क्यों हैं तो कहा जाता है कि इसका कारण औरतों का ‘प्राकृतिक रूप से’ कमजोर होना है। या कि उनके लिए बच्चों की देखभाल करना या घरेलू काम आदि करना ‘प्राकृतिक’ है। पर मार्क्सवाद हमें बताता है कि यह समाज ‘प्राकृतिक’ या शाश्वत/अपरिवर्तनीय नहीं है। हमेशा से समाज ऐसा नहीं रहा है और इसीलिए हमेशा ऐसा ही नहीं बना रहना चाहिए। समाज और सामाजिक संबंध लोगों द्वारा बनाए हुए हैं और अगर उन्हें लोगों ने बनाया है तो वे इसे बदल भी सकते हैं। इन्हें बदला कैसे जाए? अलग और बेहतर समाज कैसे बनेगा?
[05/11 11:33 am] ‪+91 97412 44343‬: कुछ लोग कहते हैं कि अगर व्यक्ति कम भ्रष्ट, कम दुष्ट होने का फैसला कर ले तो समाज में सुधार हो सकता है। लेकिन मार्क्सवाद कहता है कि ऐसी निजी कोशिश ही काफी नहीं है और हमें समाज को बदलना होगा। लेकिन सवाल है कि समाज को कैसे बदलें। इस सत्य की खोज के बाद यह संभव हो जाता है कि मानव समाज के बारे में एक ऐसे वैज्ञानिक सिद्धांत का निरूपण किया जाए, जो मनुष्य जाति के वास्तविक अनुभवों पर आधारित हो और धार्मिक विश्वासों, नस्ली अहंकार और हीरो वरशिप, व्यक्तिगत भावनाओं या काल्पनिक स्वप्नों के आधार पर बने हुए समाज के बारे में पहले ही अस्पष्ट धारणाओं (जो आज भी हैं) से भिन्न हो।

दूसरे शब्दों में इन्हीं सामान्य नियमों को, जिनकी सत्ता सार्वभौमिक है और जो इंसानों तथा वस्तुओं, दोनों का ही निर्देशन करते हैं, मार्क्सवादी दर्शन अथवा संसार का मार्क्सवादी दृष्टिकोण कहा जा सकता है। मार्क्सवाद नैतिकता के किन्हीं काल्पनिक सिद्धांतों पर आधारित होने के कारण मान्यता का दावा नहीं करता, बल्कि मान्यता का दावा वह इसलिए करता है कि वह सच्चाई पर आधारित है। और चूंकि वह सच्चाई पर आधारित है, इसलिए आज के समाज में सबको परेशान करने वाली बुराइयों और तकलीफों से मानवता को हमेशा के लिए छुटकारा दिलाने तथा समाज के एक उच्चतर रूप की स्थापना करके सभी स्त्री–पुरुषों को अपना पूर्ण विकास करने में मदद देने के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है और ऐसा करना हमारा कर्तव्य है।

मार्क्सवाद के मूलभूत सिद्धांत : मार्क्सवाद बीसवीं सदी में दुनिया के एक बड़े हिस्से को प्रभावित करने वाली विचारधारा तो है ही, लेकिन सोवियत संघ के विघटन, चीन के धीरे-धीरे एक पूंजीवादी तानाशाही में तब्दील होते जाने, दुनिया भर के कई देशों, जैसे रोमानिया में चाउसेस्कू जैसे तानाशाहों को जन्म देने और एक शासन व्यवस्था के रूप में विरोधियों द्वारा पूरे जोर-शोर से खारिज किए जाने के बावजूद आज भी न केवल बौद्धिक अपितु राजनैतिक दुनिया में भी बहस का विषय बनी हुई है।

एक तरफ इसे एक मृत विचारधारा घोषित करने में पूंजीवादी प्रचार तंत्र अपना पूरा जोर लगा देता है तो दूसरी तरफ अपनी हालिया हार के बावजूद दुनिया भर में वाम बुद्धिजीवी तथा वामपंथी राजनैतिक दल अपने-अपने तरीके से वर्तमान संदर्भों में इसकी प्रासंगिकता सिद्ध करने के साथ-साथ नई परिस्थितियों के अनुसार एक वामपंथी राजनैतिक-आर्थिक व्यवस्था को परिभाषित करने में लगे हैं।

कम्युनिज्म के स्वप्न का सबसे बड़ा पक्ष है बराबरी पर आधारित सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व्यवस्था की स्थापना। आज अपने प्रचंड प्रभाव के बावजूद पूंजीवाद जो एक चीज़ कभी नहीं दे सकता वह है समानता। इसके विकास के मूल में ही गैर बराबरी की अवधारणा अन्तर्निहित है। लाभ की लगातार वृद्धि के उद्देश्य से संचालित इसका कार्य व्यापार मुनाफे की एक ऐसी हवस को जन्म देता है जो एक तरफ नए-नए और उन्नत उत्पादों की भीड़ लगाता जाता है तो दूसरी तरफ उन्हें खरीदने की ताकत को लगातार कुछ हाथों में सीमित कर बाकी बहुसंख्या को उत्तरोत्तर वंचितों के खांचे में डालता चला जाता है। दुनिया के पैमाने पर अमीर-गरीब देश बनते जाते हैं, देशों के पैमाने पर अमीर-गरीब लोग। सत्ता इन्हीं प्रभावशाली वर्गों के व्यापारिक और सामाजिक हितों की रक्षा का काम करती है। 

पर्यावरण की उस हद तक लूट की जाती है, जहां जमीनें बंजर होती जाती हैं, नदियां सूखती जाती हैं और जंगल तबाह होते जाते हैं। मुनाफा ही सबकुछ है। जाहिर है कि जहां इतनी असमानता होगी वहां असंतोष होगा, अशांति होगी और युद्ध भी होंगे। जहां मुनाफे की ऐसी हवस होगी वहां मानवीय संबंध भी बाजार से निर्धारित होंगे। स्वार्थ ही सबसे बड़ा सिद्धांत होगा और अन्याय ताकतवर का हथियार होगा तो कमजोर विद्रोह पर उतरेंगे ही।

मार्क्सवाद इसके बरक्स एक ऐसे समाज का स्वप्न दिखाता है जहां मुनाफे की यह अंधी हवस न हो। जहां आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक प्रक्रियाएं समानता की ओर अग्रसर होंगी। इस समानता में शांति के बीज अपने आप अंकुरित होंगे। यानि समाजवाद का एक नारा हो सकता है – शान्ति, समाजवाद, समृद्धि। आज किसी भी समाजवादी मॉडल को इन तीनों ही उद्देश्यों को एक साथ साधना होगा। साथ ही इसे वर्तमान पूंजीवाद से अधिक लोकतांत्रिक भी होना ही होगा। तभी यह समाज के व्यापक हिस्से को अपने साथ ले पाएगा।  
आत्मकथा पाठ में मार्क्सवादी विचारधारा के बारे में थोडा-बहुत जानाकारी ॥


Sent from my Samsung Galaxy smartphone.
Reply all
Reply to author
Forward
0 new messages