कहां है जाति????
खाने की खाना को जो नहीं है,
पीने का पानी को जो नहीं है,
सांस देनेवाले हवा को जो नहीं है,
जलानेवाले आग को जो नहीं है,
पहनने के कपड़े को जो नहीं है,
देनेवाला दाता को जो नहीं है,
प्राणी-पक्षियों को जो नहीं है,
फिर तुच्छ मानव को क्यों?????
खाने के अन्न से पूछेंगे क्या तुम्हें किस जाति के किसान ने उगाया है?
बहनेवाली हवा से पूछेंगे क्या तुम्हारे जाति कौन सी है?
पीने के पानी से पूछेंगे क्या तुम किस जाति के किसान के कूए का है?
पहनने के कपड़े से पूछेंगे क्या तुम किस जाति के जुलाह की कला है?
बस पेट भर जाए,
प्यास भुज जाए,
मान की रक्षा हो जाए,
बस्, गर्म से रहे,,,,,,,,,,
फिर हमें क्यों चाहिए
ये जाति नामक शब्द????
( कन्नड से अनुवाद,,,,, श्रीनिवास नायक)
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