हिन्दी संस्मरण का इतिहास
संस्मरण और रेखाचित्र में बहुत सूक्ष्म अंतर है। कुछ विद्वानों ने तो इन दोनों विधाओं को एक-दूसरे की पूरक विधा भी कहा है। संस्मरण का सामान्य अर्थ होता है सम्यक् स्मरण। सामान्यतः इसमें चारित्रिक गुणों से युक्त किसी महान व्यक्ति को याद करते हुए उसके परिवेश के साथ उसका प्रभावशाली वर्णन किया जाता है। इसमें लेखक स्वानुभूत विषय का यथावत अंकन न करके उसका पुनर्सृजन करता है। रेखाचित्र की तरह यह वर्ण्य विषय के प्रति तटस्थ नहीं होता। आत्मकथात्मक विधा होते हुए भी संस्मरण आत्मकथा से पर्याप्त भिन्नता रखता है।
आरंभिक युग:-
बालमुकुंद गुप्त द्वारा सन् 1907 में प्रतापनारायण मिश्र पर लिखे संस्मरण को हिंदी का प्रथम संस्मरण माना जाता है। बाद में इस काल की एकमात्र संस्मरण पुस्तक ‘हरिऔध’ पर केंद्रित गुप्त जी द्वारा लिखित ‘हरिऔध’ के संस्मरण’ के नाम से प्रकाशित हुई। इसमें हरिऔध को वर्ण्य विषय बनाकर पंद्रह संस्मरणों की रचना की गई है।
द्विवेदी युग:-
हिंदी की पत्र-पत्रिकाओं ने गद्य विधाओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। ‘सरस्वती’ में स्वयं महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कई संस्मरण लिखे। उन्होंने अपने साथी लेखकों को नई गद्य विधाओं के लिए प्रेरित भी किया। इस समय के प्रमुख संस्मरण लेखकों में द्विवेदी जी के अतिरिक्त रामकुमार खेमका, काशीप्रसाद जायसवाल और श्यामसुंदर दास हैं। श्यामसुंदर दास ने लाला भगवानदीन पर रोचक संस्मरण लिखे। अपने समकालीन साहित्यकारों पर उस समय से आरंभ हुई परंपरा आज तक लगातार चल रही है।
छायावादोत्तर युग:-
रेखाचित्र की तरह ही संस्मरण को गद्य की विशिष्ट विधा के रूप में स्थापित करने की दिशा में भी पद्म सिंह शर्मा (1876-1932) का महत्त्वपूर्ण योगदान माना जाता है। इनके संस्मरण ‘प्रबंध मंजरी’ और ‘पद्म पराग’ में संकलित हैं। महाकवि अकबर, सत्यनारायण कविरत्न और भीमसेन शर्मा आदि पर लिखे हुए इनके संस्मरणों ने इस विधा को स्थिरता प्रदान करने में मदद की। विनोद की एक हल्की रेखा इनकी पूरी रचनाओं के भीतर देखी जा सकती है।
महादेवी वर्मा ने अपने संस्मरणों में अपने जीवन में आए अनमोल पलों को अपने ‘पथ के साथी’ में संकलित किया है। अपने समकालीन साहित्यकारों पर इन रेखाचित्रों में अब तक किसी भी लेखक द्वारा लिखी गई सर्वश्रेष्ठ टिप्पणी कहें तो इसमें कोई अतिशयोक्ति की बात न होगी।
निराला के ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ और ‘कुल्लीभाट’ में संस्मरण और रेखाचित्र का अनुपम संयोग हुआ है। इन्हें किसी एक विधा के अन्तर्गत रखना संभव नहीं है लेकिन अपनी सजीवता और व्यंग्य के कारण इन्हें अप्रतिम कहा जा सकता है।
प्रकाशचंद गुप्त ने ‘पुरानी स्मृतियाँ’ नामक संग्रह में अपने संस्मरणों को लिपिबद्ध किया। इलाचंद्र जोशी कृत ‘मेरे प्राथमिक जीवन की स्मृतियाँ’ और वृंदावनलाल वर्मा कृत ‘कुछ संस्मरण’ इस काल की उल्लेखनीय रचनाएँ हैं।
स्वातंत्रयोत्तर युग:-
सन् 1950 के आस-पास का समय संस्मरण लेखन की दृष्टि से विशेष महत्त्व का है। इस समय अनेक लेखक संस्मरणों की रचना कर रहे थे। बनारसीदास चतुर्वेदी को संस्मरण लेखन के क्षेत्र में विशेष सफलता मिली। पेशे से साहित्यिक पत्रकार होने के कारण इनके संस्मरणों के विषय बहुत व्यापक हैं। अपनी कृति ‘संस्मरण’ में संकलित रचनाओं की शैली पर इनके मानवीय पक्ष की प्रबलता को साफ देखा जा सकता है। इनके संस्मरण रोचकता के लिए विशेष प्रसिद्ध हुए। शैली वर्णनात्मक है और भाषा अत्यंत सरल है। कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर ने अपनी कृतियों ‘भूले हुए चेहरे’ तथा ‘दीप जले शंख बजे’ के कारण इस समय के एक अन्य महत्त्वपूर्ण संस्मरण लेखक हैं। लगभग इसी समय उपेंद्रनाथ अश्क का ‘मंटो मेरा दुश्मन’ प्रकाशित हुआ जिसका साहित्यिक और गैर-साहित्यिक दोनों स्थानों पर भरपूर स्वागत हुआ। जगदीशचंद्र माथुर ने ‘दस तस्वीरें’ और ‘जिन्होंने जीना जाना’ के माध्यम से अपने समय की महत्वपूर्ण संस्मरणात्मक चित्र प्रस्तुत किए।
संस्मरण और रेखाचित्रों में कोई भी तात्विक भेद नहीं मानने वाले आलोचक डा. नगेन्द्र ने ‘चेतना के बिंब’ नाम की कृति के माध्यम से इसविधा को समृद्ध किया। प्रभाकर माचवे, विष्णु प्रभाकर, अज्ञेय और कमलेश्वर इस समय के अन्य प्रमुख संस्मरण लेखक रहे हैं।
समकालीन युग :-
समकालीन लेखन में आत्मकथात्मक विधाओं की भरमार है। संस्मरण आज बहुतायत में लिखे जा रहे हैं। अपने अतीत को बयान करने की ललक हर आदमी के भीतर होती है और उसकी अभिव्यक्ति करना अन्य विधाओं की तुलना में काफी आसान होता है। डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा नामवर सिंह पर लिखित संस्मरण ‘हक अदा न हुआ’ ने इस विधा को नई ताजगी से भर दिया है और इससे प्रभावित होकर कई नए और पुराने लेखक इस ओर मुड़े हैं। इनकी सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘नंगातलाई का गांव’ (2004) को उन्होंने स्मृति आख्यान कहा है। वर्तमान समय के संस्मरण लेखकों में काशीनाथ सिंह, कांतिकुमार जैन, राजेंद्र यादव, रवीन्द्र कालिया, ममता कालिया अखिलेश का नाम काफी प्रमुखता से ले सकते हैं।
हिन्दी में यात्रा संस्मरण तो बहुत हैं. उनमें से श्रेष्ठ दस कृतियां चुनना बहुत मुश्किल काम था. लेकिन मैंने अपने विवेक से जो रचनाएं चुनीं, वे इस प्रकार हैं :
1. यात्रा का आनंदः दत्तात्रेय बालकृष्ण 'काका' कालेलकर
काका कालेलकर शुरू में गुजराती में लिखते थे. उनकी 'हिमालय यात्रा' अनुदित होकर हिंदी में छपी थी. बाद में वो हिंदी में ही लिखने लगे.
उन्हें यात्राओं में बहुत आनंद आता था. देश और विदेश में अनेक प्रवास उन्होंने लिपिबद्ध किए. भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के उपाध्यक्ष होने पर सुदूर विदेश यात्राओं का सुयोग भी मिला.
उनका कोई साढ़े तीन सौ पृष्ठों का संकलन 'यात्रा का आनंद' बहुत महत्त्वपूर्ण कृति है. वह बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से छपी थी.
संकलित यात्रा-वृत्तांत विभिन्न रूपों में हैं - संस्मरण की शैली में, लेख रूप में, पत्रों की शक्ल में.
करसियांग, नीलगिरि, अजंता, सतपुड़ा, गंगोत्री आदि की भारतीय यात्राओं के साथ अफ्रीका, यूरोप, उत्तरी और दक्षिणी अमरीका आदि की कोई सौ यात्राओं का ब्योरा हमें इस पुस्तक में मिलता है - जमैका, त्रिनिदाद और (ब्रिटिश) गयाना तक का.
लेखक की जिज्ञासु वृत्ति इन संस्मरणों की विशेषता है और जानकारी साझा करने की ललक भी. विदेश में अक्सर वो बाहर की प्रगति के बरअक्स भारतीय संस्कृति की निरंतरता को याद करते हैं.
2. किन्नर देश में: राहुल सांकृत्यायन
महापंडित राहुल सांकृत्यायन हिंदी में 'घुमक्कड़-शास्त्र' के प्रणेता थे. वो जीवन-भर भ्रमणशील रहे.
ज्ञान के अर्जन में उन्होंने सुदूर अंचलों की यात्राएं कीं. उन पर अनेक किताबें लिखीं.
'किन्नर देश में' हिमाचल प्रदेश में तिब्बत सीमा पर सतलुज नदी की उपत्यका में बसे सुरम्य इलाक़े किन्नौर की यात्रा-कथा है.
यह यात्रा उन्होंने साल 1948 में की थी. मूल शब्द 'किन्नर' है, इसलिए राहुलजी सर्वत्र इसी नाम का प्रयोग करते हैं.
कभी बस और घोड़े के सहारे और कभी कई दफ़ा पैदल भी की गई यात्रा का वर्णन करते हुए राहुलजी क्षेत्र के इतिहास, भूगोल, वनस्पति, लोक-संस्कृति आदि अनेक पहलुओं की जानकारी जुटाते हैं.
किताब का सबसे दिलचस्प पहलू वह है जहां वे अपने जैसे घुमक्कड़ों की खोज कर उनका संक्षिप्त जीवन-चरित भी लिखते हैं.
उन्हें एक ऐसा यात्री मिला जो पांच बार कैलाश-मानसरोवर हो आया था. उसने सैकड़ों यात्राएं कीं और डाकुओं ही नहीं, मौत से दो-चार हुआ और बच आया.
पुस्तक का अंतिम हिस्सा सूचनाओं से भरा है, जहां वो किन्नौर के अतीत, लोक-काव्य और उसका हिंदी अनुवाद, किन्नर भाषा का व्याकरण और शब्दावली समझाते हैं.
3. अरे यायावर रहेगा यादः सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'
हिंदी साहित्य में रचनात्मक यात्रा-वृत्तांत की लीक डालने वाली कृति अब कमोबेश क्लासिक का स्थान पा चुकी है.
अज्ञेय की एक कविता ('दूर्वाचल') की पंक्ति इस यात्रा-वृत्तांत का नाम बनकर अपने आप में एक मुहावरा-सा बन चुकी है और 'यायावर' नाम लगभग 'अज्ञेय' का पर्याय.
दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जापान के भारत पर हमले की आशंका में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, मुश्ताक़ अली आदि की तरह अज्ञेय भी देश-रक्षा में मित्र (अलाइड) देशों की फ़ौज में शामिल हो गए थे.
युद्ध ख़त्म होने पर लौट आए. फ़ौजी जीवन से आम जीवन में वापसी तक अज्ञेय ने अनेक भारतीय स्थलों की जो यात्राएं कीं, वे इस किताब में लिपिबद्ध हैं.
पूर्वोत्तर के जिन क़स्बों, जंगलों, माझुली जैसे द्वीप के बारे में उत्तर भारत का निवासी जहां आज भी बहुत नहीं जानता, अज्ञेय ने चालीस के दशक में उन्हें फ़ौजी ट्रक हांकते हुए नापा.
असम से बंगाल, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, तक्षशिला (अब पाकिस्तान में), एबटाबाद (जहां हाल में ओसामा बिन लादेन को मारा गया था), हसन अब्दाल, नौशेरा, पेशावर और अंत में खैबर - यानी भारत की एक सीमा से दूसरी सीमा की यात्रा; उसमें तरह-तरह के अनुभव, दृश्य, लोग और हादसे.
इस यात्रा के अलावा कुल्लू-रोहतांग जोत की यात्रा भी इस कृति में है, जब लेखक ने मौत को क़रीब से देखा.
उस संस्मरण का नाम ही है, 'मौत की घाटी में'. अब रोहतांग न मौत की घाटी रहा, न यात्रा उतनी दुगर्म. 'एलुरा' और 'कन्याकुमारी से नंदा देवी' वृत्तांत भी कृति में बहुत दिलचस्प हैं.
दक्षिण के बारे में भी उस ज़माने में यह यात्रा-वृत्तांत हिंदी पाठक समाज के लिए जानकारी की परतें खोलने वाला साबित हुआ था.
4. ऋणजल धनजलः फ़णीश्वरनाथ रेणु
यात्राएं केवल तफ़रीह के लिए नहीं होतीं. 'मैला आंचल' और 'परती परिकथा' जैसी ज़मीनी कृतियों के रचयिता रेणु ने दो संस्मरण लिखे, जो इस विधा को नई भंगिमा देते हैं.
दोनों में उनके अपने बिहार की जानी-पहचानी जगहों की यात्रा है, लेकिन नितांत भयावह दिनों की.
साल1966 में दक्षिणी बिहार में पड़े सूखे के वक्त उस क्षेत्र की यात्रा उन्होंने दिनमान-संपादक और कवि-कथाकार 'अज्ञेय' के साथ की.
बाद में साल 1975 में पटना और आसपास के क्षेत्र में बाढ़ की लीला को उन्होंने क़रीब से देखा. दोनों जगह उनके साथ उनकी नज़र विपरीत परिस्थितियों में भी मानवीय करुणा को चीन्हती है.
बाढ़ का इलाक़ा हो या सूखा क्षेत्र, उनका वर्णन हर जगह संवेदनशील कथाकार का रहता है. गंभीर पर्यवेक्षण, जो उनकी चिर-परिचित ठिठोली को भी उन हालात में भूलने नहीं देता.
संस्मरणों में पीड़ित तो आते ही हैं फ़ौजी, राहतकर्मी, पत्रकार, मित्र, पत्नी लतिकाजी की उपस्थिति उनको और जीवंत बनाती है. और तो और राहत सामग्री गिराता हेलिकॉप्टर भी जैसे कथा का एक चरित्र बनकर उपस्थित होता है.
5. आख़िरी चट्टान तकः मोहन राकेश
गोवा से कन्याकुमारी तक की यह यात्रा कथाकार और नाटककार मोहन राकेश ने सन् 1952-53 में की थी कोई तीन महीने में.
किताब उन्होंने ‘रास्ते के दोस्तों’ को समर्पित की, साथ में यह जोड़ते हुएः "पश्चिमी समुद्र-तट के साथ-साथ एक यात्रा".
देश के दक्षिण और समुद्र क्षेत्र की मोहन राकेश की यह पहली यात्रा थी.
जैसा कि रेल का ब्योरा लिखने से पहले वे चार पन्नों में कुछ पूर्व-पीठिका-सी बनाते हुए कहते हैं: "एक घने शहर (अमृतसर) की तंग गली में पैदा हुए व्यक्ति के लिए उस विस्तार के प्रति ऐसी आत्मीयता का अनुभव होने का आधार क्या हो सकता था?
केवल विपरीत का आकर्षण?" नए संसार को जानने की यह ललक उन्हें मालाबार की लाल ज़मीन, घनी हरियाली और नारियल वृक्षों से लेकर कन्याकुमारी की चट्टान तक लिए जाती है.
बीच-बीच में अनेक दिलचस्प हमसफ़र चरित्रों से दो-चार करते हुए. इस यात्रा-वृत्तांत को हम एक कहानी की तरह पढ़ सकते हैं.
6. चीड़ों पर चांदनीः निर्मल वर्मा
हिंदी लेखकों को तब विदेश यात्राओं का बहुत सुयोग नहीं मिलता था. अज्ञेय के बाद निर्मल वर्मा इस मामले में बहुत भाग्यशाली रहे.
अज्ञेय ने जैसे विदेश यात्राओं के संस्मरण 'एक बूंद सहसा उछली' में लिखे, निर्मल वर्मा 'चीड़ों पर चांदनी' के साथ इस विधा में सामने आए.
हालांकि इस पुस्तक में एक संस्मरण उनके जन्मस्थल शिमला पर भी है. पहले-पहल यह कृति साल 1962 में छपी थी.
विदेश यात्रा निर्मल वर्मा के लिए महज़ पर्यटकों की सैर नहीं रही. वे जर्मनी जाते हैं तो नाटककार ब्रेख्त उनके साथ चलते दिखाई देते हैं.
कोपनहेगन में दूसरे यूरोपीय देशों की मौजूदगी भी साथ रहती है. सबसे महत्त्वपूर्ण दो यात्रा-संस्मरण आइसलैंड के हैं.
आइसलैंड की हिमनदियों (ग्लेशियर) और क्षेत्र की साहित्यिक संस्कृति का आंखों देखा वर्णन हिंदी में इससे पहले शायद ही देखने में आया हो.
इन संस्मरणों के कई साल बाद निर्मलजी ने 'सुलगती टहनी' (कुंभ यात्रा) और डायरी की शक्ल में अनेक दूसरे यात्रा-संस्मरण भी लिखे. पर 'चीड़ों पर चांदनी' इस विधा में उनकी अनूठी कृति के रूप में हमेशा पहचानी जाती रही है.
7. स्पीति में बारिशः कृष्णनाथ
कृष्णनाथ अर्थशास्त्र के शिक्षक रहे और बौद्ध धर्म के अध्येता. मगर उनकी यायावर-वृत्ति उन्हें बार-बार हिमालय ले जाती रही है.
बौद्ध धर्म का अन्वेषण ही नहीं, हिमालयी अंचल के लोक-जीवन को उन्होंने बहुत आत्मीय और सरस ढंग से अपने अनेक संस्मरणों में लिखा है.
साल 1974 की यात्रा को कवि कमलेश साल 1982 में यात्रा-त्रयी के रूप में प्रकाश में लाए थे. श्रृंखला में सबसे पहली कृति थी- 'स्पीति में बारिश'. फिर 'किन्नर धर्मलोक' और 'लद्दाख़ में राग-विराग' छपी.
कुछ वर्ष बाद कुमाऊं क्षेत्र पर भी उनकी ऐसी ही तीन किताबों का सिलसिला देखने में आया. लाहौल-स्पीति, रोटांग (रोहतांग) जोत के पार हिमाचल प्रदेश का सीमांत क्षेत्र है. लोक-जीवन तो हर जगह अपना होता ही है, पर इस क्षेत्र के पहाड़ और घाटियां बाक़ी हिमालय से बहुत जुदा हैं.
कहते हैं, स्पीति में कभी बारिश नहीं होती. उस दुनिया में कृष्णनाथ बारिश ढूंढते हैं और पाते हैं, स्नेह की, ज्ञान की, परंपरा और संस्कृति की, मानवीय रिश्तों की बारिश.
कृष्णनाथ का गद्य अप्रतिम है. सरस और लयपूर्ण. छोटे-छोटे वाक्यों में वे अपने देखे को हमसे बांटते नहीं, हम पर अपने गद्य का जैसे जादू चलाते हैं. चंद पंक्तियां देखिएः
"विपाशा को देखता रहा. सुनता रहा. फिर जैसे सब देखना-सुनना सुन्न हो गया. भीतर-बाहर सिर्फ हिमवान, वेगवान, प्रवाह रह गया. न नाम, न रूप, न गंध, न स्पर्श, न रस, न शब्द. सिर्फ सुन्न. प्रवाह, अंदर-बाहर प्रवाह. यह विपाशा क्या अपने प्रवाह के लिए है? क्या इसीलिए गंगा, यमुना, सरस्वती, सोन, नर्मदा, वितस्ता, चंद्रभागा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी की तरह विपाशा महानद है? पुण्यतमा है? क्या शीतल, नित्य गतिशील सिलसिले में ही ये पाश कटते हैं? विपाश होते हैं?"
8. यूरोप के स्केच: रामकुमार
रामकुमार की ख्याति एक चित्रकार के रूप में अंतरराष्ट्रीय है, लेकिन हिंदी में कथाकार के रूप में उनकी अपनी प्रतिष्ठा है.
साल 1950-51 में वे पेरिस के आर्ट स्कूल में रहे. उस वक़्त मौक़े-बेमौक़े वे यूरोप के देशों की सैर को निकलते रहे.
"नए-नए शहर, नई-नई भाषाएं, नए-नए लोग... और मैं अकेला निरुद्देश्य यात्री की भांति सुबह से शाम तक सड़कों, गलियों, कैफ़ों और कला-संग्रहालयों के चक्कर लगाया करता."
साल 1955 में वे फिर यूरोप गए. दोनों प्रवासों के कोई बीस यात्रा-संस्मरण इस पुस्तक में संकलित हैं.
क़ाहिरा की एक शाम, रोमा रोलां के घर में, फूचिक के देश में, टॉल्सटाय के घर में, दांते और माइकल एंजेलो का देश हर तरह से विशिष्ट यात्रा-वृत्तांत हैं.
कथाकार होने के बावजूद रामकुमार संस्मरण लिखते वक़्त तटस्थ रहते हैं और जानकारी और अनुभवों को किसी निबंध की तरह हमसे बांटते हैं. किताब में उनके बनाए रेखाचित्र पाठक के लिए एक अतिरिक्त उपलब्धि साबित होते हैं.
9. बुद्ध का कमण्डल लद्दाखः कृष्णा सोबती
कृष्णा सोबती अपनी अनूठी कलम लिए एक रोज़ दिल्ली से लेह को चल दीं. यह किताब उस यात्रा की डायरी समझिए.
इसका प्रकाशन इतना सुरुचिपूर्ण है कि हिंदी में शायद ही कोई और यात्रा-संस्मरण इस रूप में छपा होगा.
हर पन्ने पर रंगीन तस्वीरें, रेखांकन, वाक्यांश कृष्णाजी के गद्य की शोभा बढ़ाते हैं. वे अपनी पैनी और सहृदय नज़र से लेह के बाज़ार, महल, दुकानें, लोग, गुरुद्वारे, पुस्तकालय, प्रशासन, प्रकृति सबको निहारती चलती हैं.
सबसे ज्यादा उनकी नज़र टिकती है बौद्ध-विहारों के भव्य और कलापूर्ण एकांत पर. वे फियांग, हैमिस, लामायूरू, आलची, थिकसे के गोम्पा देखती चलती हैं.
जांसकर घाटी की परिक्रमा करती हैं और हमारे सम्मुख लद्दाख़ की संस्कृति, भाषा, लिपि, रीति-रिवाज, नदियों और दर्रों को हाथ की रेखाओं की तरह बड़ी आत्मीयता से परोसती चलती हैं.
करगिल को हमने भारत-पाक संघर्ष से पहचाना है. कृष्णा सोबती हमारे सामने उस करगिल का चेहरा ही बदल देती हैं.
10. तीरे तीरे नर्मदाः अमृतलाल वेगड़
सैलानी की यात्रा का तेवर अलग होता है और यात्री का अलग. अमृतलाल वेगड़ नर्मदा की विकट मगर सरस यात्राओं के लिए पहचाने गए हैं.
वे चित्रकार भी हैं और कला-शिक्षक भी. यात्रा के रेखांकनों-चित्रों से सुसज्जित उनकी यात्रा-त्रयी इस किताब के साथ पूर्णता पाती हैः सौंदर्य की नदी नर्मदा, अमृतस्य नर्मदा, तीरे-तीरे नर्मदा.
यात्राओं का यह सिलसिला वेगड़जी ने पत्नी कांताजी के साथ विवाह की पचासवीं सालगिरह के मौके पर शुरू किया था.
अंतराल में नर्मदा जैसे उन्हें फिर बुलाती रही और वे वृद्धावस्था में भी अपने सहयात्रियों के साथ निकल-निकल जाते रहे.
हम इन संस्मरणों में कदम-कदम पर नर्मदा के इर्द-गिर्द के लोकजीवन से दो-चार होते हैं. वेगड़जी के संस्मरणों में नदी नदी नहीं रहती, एक जीवंत शख्सियत बन जाती है जो हज़ारों-हज़ार वर्षों से अपने प्रवाह में जीवन को रूपायित और आलोकित करती आई है.
वेगड़जी का विनय देखिए, फिर भी कहते क्या हैं, "कोई वादक बजाने से पहले देर तक अपने साज का सुर मिलाता है, उसी प्रकार इस जनम में तो हम नर्मदा परिक्रमा का सुर ही मिलाते रहे. परिक्रमा तो अगले जनम से करेंगे."
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अन्य पठनीय यात्रा-संस्मरणः राह बीती: यशपाल; सफ़रनामा पाकिस्तान: देवेंद्र सत्यार्थी; यात्रा-चक्र: धर्मवीर भारती; अपोलो का रथः श्रीकांत वर्मा; सफ़री झोले में: अजित कुमार; कश्मीर से कच्छ तक: मनोहरश्याम जोशी; एक लंबी छांहः रमेशचंद्र शाह; रंगों की गंधः गोविंद मिश्र; नए चीन में दस दिनः गिरधर राठी; यूरोप में अंतर्यात्राएं: कर्ण सिंह चौहान; अफ़ग़ानिस्तानः बुज़कशी का मैदानः नासिरा शर्मा; सम पर सूर्यास्तः प्रयाग शुक्ल; एक बार आयोवाः मंगलेश डबराल; अवाक: गगन गिल; चलते तो अच्छा थाः असग़र वजाहत; नीले बर्फीले स्वप्नलोक में: शेखर पाठक; कहानियां सुनाती यात्राएं: कुसुम खेमानी; वह भी कोई देश है महाराजः अनिल यादव; दर दर गंगेः अभय मिश्र/पंकज रामेंदु
Sir thank u.
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