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Gurumurthy Kasinathan

unread,
Sep 20, 2016, 8:24:05 AM9/20/16
to hind...@googlegroups.com, ko...@karnatakaeducation.org.in
​चाकू, खंजर, तीर और तलवार लड़ रहे थे,
कि कौन ज्यादा गहरा घाव देता है,
*"शब्द"* पीछे बैठे.. मुस्कुरा रहे थे..!!!🍂

अपनी सारी उदासियाँ तू मुझे दे दे...
पर मेरे हिस्से का तू मुस्कुरा लिया कर!

तेरी बात "ख़ामोशी" से मान लेना...
यह भी अन्दाज़ है मेरी नाराज़गी का...!!

गज़ब का शौक है आजकल उन्हें हरियाली का...
रोज आकर मेरे ज़ख़्मों को हरा कर जाते हैं...

शिकायतो की पाई पाई जोड़ कर रखी थी मैंने।
दोस्त ने गले लगा कर सारा हिसाब बिगाड़ दिया।।

नफ़रतों के बाज़ार में जीने का अलग ही मज़ा है।
लोग रुलाना नहीं छोड़ते और हम हंसना नहीं छोड़ते।

इल्ज़ाम तो हर हाल में काँटों पे ही लगेगा,
ये सोचकर अक्सर फूल भी
चुपचाप ज़ख्म दे जातें हैं !

बिना नक्शे के भी पँछी पहुँच जाते हैं अपने मुकाम तक
हम तो दिल से दिल तक पहुंचने में भी नाकाम होते हैं.

हवा की तरह होती है मुसीबतें भी,
कितनी भी खिडकिया बंद कर लो अंदर आ ही जाती है !!

गुरु

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