अंबेडकरी आंदोलन में दोगले लोगों की मौज क्यों है?

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Dr. Sanjeev Khudshah

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Jul 18, 2026, 1:06:22 PM (7 days ago) Jul 18
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अंबेडकरी आंदोलन में दोगले लोगों की मौज क्यों है?

डॉ. संजीव खुदशाह

भगवान बुद्ध, कबीर, रविदास, गुरु घासीदास, महात्मा फुले, पेरियार और बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर से लेकर बहुजन महापुरुषों की एक लंबी फेहरिस्त है, जिन्होंने समाज को जगाने और उसका मार्गदर्शन करने में अपना पूरा जीवन न्योछावर कर दिया। उन्हें भी अपने जीवन में पथभ्रष्ट होने के अनेक अवसर मिले होंगे, लेकिन उन्होंने कभी अपना आत्मसम्मान नहीं बेचा।

लेकिन आज के अंबेडकरवादी और बहुजनवादी आंदोलन तथा उसके प्रमुख नेताओं को देखें, तो पाएंगे कि वे चंद रुपयों, कुछ सुविधाओं या थोड़े-से राजनीतिक लाभ के लिए अपनी जमीर बेचने को तत्पर हो जाते हैं। ऐसे लोगों की सूची लंबी है। यदि मुझसे कुछ प्रमुख नाम पूछे जाएँ, तो मैं रामदास आठवले, उदित राज, मायावती, जीतन राम मांझी, रामविलास पासवान आदि के नाम लूँगा। ये वे लोग हैं जिन्होंने स्वयं को दलित-बहुजन आंदोलन का नेता बताया, उसके नाम पर राजनीति की, बड़े-बड़े वादे किए और सिद्धांतों पर अडिग रहने का दावा किया। लेकिन थोड़े-से फायदे के लिए इन्होंने पूरे दलित-बहुजन समाज के साथ विश्वासघात किया।

लेकिन ये लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं? आज की इस चर्चा का सबसे बड़ा प्रश्न यही है। इस प्रकार के दगाबाज़ों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। इसके कारणों की पड़ताल करना समय की आवश्यकता है।

यदि मैं आपसे पूछूँ कि इसका कारण क्या है, तो आप कहेंगे कि निजी फायदे के लिए, चंद रुपयों के लिए या कोई पद पाने के लिए ये नेता ऐसा करते हैं। लेकिन यह केवल आधा सच है। वास्तविकता इससे कहीं अधिक गहरी है। दरअसल, किसी वैचारिक संगठन से जुड़े व्यक्ति को विचारधारा के साथ विश्वासघात करने की हिम्मत आसानी से नहीं होती। लेकिन अंबेडकरवादी विचारधारा में ऐसा अक्सर देखने को मिलता है, जबकि अन्य विचारधाराओं में यह अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है।

इसका कारण स्वयं दलित-बहुजन समाज, अंबेडकरवादी और अपने आपको बौद्ध कहने वाले लोग भी हैं। विशेष रूप से वे लोग अधिक जिम्मेदार हैं जो कहते हैं कि "यह हमारी जाति का नेता है।"

दरअसल, नेता कहीं और से पैदा नहीं होते; वे हमारे बीच से ही निकलते हैं। ऊँचाई पर पहुँचने के बाद वे वही करते हैं, जो उन्होंने समाज से सीखा होता है। कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि सिद्धांतों के साथ विश्वासघात करना दलित-बहुजन समाज की एक गंभीर कमजोरी बन गया है। हो सकता है कि मेरी इन पंक्तियों को पढ़कर आप मुझसे नाराज़ हों, लेकिन धैर्य रखिए, मैं बताता हूँ कि ऐसा क्यों होता है।

जो नेता अपने समाज और अपनी विचारधारा से गद्दारी करता है, उसके समर्थकों की संख्या भी कम नहीं होती। वे केवल इसलिए उसका समर्थन करते रहते हैं क्योंकि वह उनकी जाति का है, उनका व्यक्तिगत परिचित है या उन्हें उससे कोई निजी लाभ मिलता है। यही सबसे बड़ा कारण है कि कोई नेता गद्दारी करने से नहीं रुकता। अर्थात्, उस नेता को गद्दार बनाने में उसके अंध-समर्थकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

वे उसकी गलतियों का भी समर्थन करते हैं, उसके पक्ष में कुतर्क देते हैं और उसे यह एहसास नहीं होने देते कि वह गलत कर रहा है। वे उसे यह महसूस ही नहीं होने देते कि वह अपने सिद्धांतों से विश्वासघात कर रहा है। परिणामस्वरूप, ऐसा प्रतीत होता है मानो पूरा दलित-बहुजन समाज गद्दारों के साथ खड़ा है।

जब ऐसे नेता सार्वजनिक स्थानों पर जाते हैं, तो उनके विरुद्ध विरोध के स्वर क्यों नहीं उठते? उनका सामाजिक बहिष्कार क्यों नहीं किया जाता?

जबकि जिन महापुरुषों का नाम मैंने शुरुआत में लिया, उन्होंने अपने प्राणों की भी परवाह नहीं की। अत्यंत विषम परिस्थितियों में भी वे अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे।

आखिर रामदास आठवले को यह हिम्मत कहाँ से मिली कि वे उन मनुवादी शक्तियों के साथ खड़े हो गए, जिन्होंने खुलेआम मनुस्मृति का समर्थन किया?

आखिर उदित राज को यह हौसला कहाँ से मिला कि जिस मनुवादी पार्टी की वे वर्षों तक आलोचना करते रहे, उसी में टिकट और सत्ता की खातिर शामिल हो गए?

आखिर मायावती को यह ताकत कहाँ से मिली कि वे गुजरात में उस नेता के समर्थन में चुनाव प्रचार करने गईं, जिस पर उनके विरोधियों ने गंभीर आरोप लगाए थे? आज भी वे बार-बार उस पार्टी की प्रशंसा करती हैं और ईडब्ल्यूएस आरक्षण के समर्थन में बयान देती हैं। आखिर उन्हें किसी जन-आलोचना का भय क्यों नहीं है?

आखिर रामविलास पासवान को यह हौसला कहाँ से मिला कि वे स्वयं को एक विशेष तबके का नेता बताते रहे, विरोधी दलों की आलोचना करते रहे, लेकिन सत्ता में भागीदारी के लिए किसी भी दल के साथ गठबंधन करने को तैयार हो गए?

यदि लोग उनका साथ न दें, यदि अंबेडकरवादी उनका बहिष्कार कर दें और उनकी चापलूसी करना बंद कर दें, तो किसी भी दलित-बहुजन नेता की मजाल नहीं कि वह अपने सिद्धांतों से गद्दारी करे।

अर्थात्, यदि दलित-बहुजन नेता अपने समाज और विचारधारा से विश्वासघात कर रहे हैं, तो उसके पीछे एक महत्वपूर्ण कारण उनके समर्थक और उनका समाज भी है। वही लोग चाहें तो उन्हें सबक सिखा सकते हैं। यदि एक भी ऐसे नेता को समाज स्पष्ट संदेश दे दे, तो बाकी सभी अपने आप सावधान हो जाएंगे।

 

Buddhdev Pandya

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Jul 18, 2026, 9:56:30 PM (6 days ago) Jul 18
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