कड़वा सच : ब्राह्मण वर्ग की सांस्कृतिक गुलामी में डूबता जा रहा बहुजन समाज

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Sanjeev Khudshah

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May 9, 2024, 11:37:17 AM5/9/24
to Dalit Movement Association
कड़वा सच : ब्राह्मण वर्ग की सांस्कृतिक गुलामी में डूबता जा रहा बहुजन समाज
सरल शब्दों में कहें तो सत्ताधारी ब्राह्मण वर्ग कहता है कि हमें कोट-पैंट छोड़कर धोती-कुर्ता पहनना चाहिए। वह कहता है कि हमें अंग्रेजी छोड़कर हिंदी को अपनाना चाहिए। वह कहता है कि हमें विज्ञान के बजाय धर्म की ओर जाना चाहिए। लेकिन यह सत्ताधारी ब्राह्मण वर्ग खुद इससे उल्टा करता है। बता रहे हैं संजीव खुदशाह
संजीव खुदशाह May 9, 2024
FORWARD Press
गुलामी कई प्रकार की होती है। जैसे– भौतिक गुलामी, मानसिक गुलामी, आर्थिक गुलामी, राजनीतिक गुलामी और सांस्कृतिक गुलामी। वर्तमान में बहुजन समाज कुछ हद तक भौतिक गुलामी, आर्थिक गुलामी और राजनीतिक गुलामी से कुछ हद तक आजाद हो गया है। लेकिन आज भी पूरी तरह सांस्कृतिक गुलामी और इसके फलस्वरूप मानसिक गुलामी में जी रहा है।


डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सांस्कृतिक गुलामी की उस स्थिति का वर्णन किया है, जब किसी समाज या समूह के लोग अपनी स्वतंत्रता और स्वाधीनता के बजाय अन्य समाजों या व्यक्तियों की सांस्कृतिक मान्यताओं, मूल्यों, और नियमों का अनुसरण करने को मजबूर होते हैं। इसका मतलब है कि वे अपनी सांस्कृतिक विविधता और स्वतंत्रता को त्यागकर दूसरों की सांस्कृतिक मान्यताओं का अनुसरण करते हैं। डॉ. आंबेडकर ने इसे एक प्रकार की गुलामी या उत्पीड़न के रूप में देखा था, जो व्यक्ति व समाज की स्वतंत्रता का अपहरण कर लेती है।

सर्वविदित है कि जब कोई सत्ताधारी समाज किसी समाज को गुलाम बनाने की कोशिश करता है तो उसकी पहली कोशिश यही होती है कि उसे आहिस्ता-आहिस्ता सांस्कृतिक गुलाम बनाया जाए। इसलिए वह धार्मिक किताबें लिखता है। जैसे मनुस्मृति, वेद, पुराण, रामायण, महाभारत और गीता लिखे गए। ब्राह्मण वर्ग इन किताबों में बहुजन जातियों को नीच बताता है। और यह कहता है कि यह किताबें ईश्वर ने लिखी है। वह कहता है कि आपका जन्म पैरों से हुआ है। इसीलिए आप शूद्र हो। इन किताबों में ऐसा सिर्फ इसीलिए लिखा गया है ताकि एक बड़े समाज को सांस्कृतिक गुलाम बनाया जा सके। और इस काम में सत्ताधारी वर्ग लगभग सफल हो चुका है। अगर ऐसा नहीं होता तो यह कैसे संभव हो सकता था कि महिलाएं उस रामायण के कांड का पाठ खुद करतीं, जिसमें यह कहा गया है– “ढोर गंवार शुद्र पशु और नारी, यह हैं ताड़न के अधिकारी।” आज सांस्कृतिक गुलामी का आलम यह है कि दलित-ओबीसी भी उस भागवत कथा का आयोजन खुद करता है, जिसमें उसे नीच बताया गया है।


बिहार के गया जिले में फल्गू नदी के किनारे पिंडदान का दृश्य। ब्राह्मण वर्ग मानता है कि यहां पिंड अर्पण करने से मृतकों को शांति मिलती है
कहने की आवश्यकता नहीं कि आज बहुजन समाज या कोई भी सर्वहारा समाज, संभ्रांत समाज के संस्कृति की नकल कर रहा है। जब भी बहुजन समाज का व्यक्ति संविधान से दिए आरक्षण का लाभ लेकर किसी बड़े पद या बड़े बिजनेस में आ जाता है तो वह अपने आप को संभ्रांत दिखाने की कोशिश करता है। इस कोशिश में वह संभ्रांत वर्ग के त्योहारों और आडंबरों को भी अपनाने लगता है। उसे अपने पूर्वजों महापुरुषों को तथा उनके योगदानों को याद करने में शर्म आती है। अपनी संस्कृति को कमतर समझता है। देखा जाय तो दरअसल यह पढ़ा-लिखा व्यक्ति ब्राह्मण वर्ग का सांस्कृतिक गुलाम है। भले ही उसे इस गुलामी का एहसास ना हो।

कई बार ब्राह्मण वर्ग जो कि शासक वर्ग है, बहुजन समाज के त्योहारों को अपनाकर उसमें फेर-बदल करके परोसता है। इसके पीछे पूंजी और चेतना (गुलाम बनाने की कहानी) जैसे कारण मौजूद होते हैं। जैसे भारत की फसल और मौसम आधारित त्योहार। यह त्योहार यहां के बहुजन समाज मूलनिवासियों का त्योहार है। इसे काल्पनिक, धार्मिक भगवानों के नाम की कहानियां गढ़कर परिवर्तित कर दिया गया है।  फसल और मौसम आधारित त्योहार आज भेदभाव और ऊंच-नीच का प्रतीक बन चुके हैं। यह त्योहार ब्राह्मण वर्ग के आय का साधन बनकर रह गए हैं और वे उन्हीं पर निर्भर हैं।

सवाल है कि सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता के लिए किस तरह के प्रयासों की आवश्यकता है? मसलन, पहले तो यह की अपनी खोई हुई संस्कृति को वापस ले। यह समाज अपने सांस्कृतिक मूल्यों को खुद पहचाने और इसमें ब्राह्मण वर्ग द्वारा किए गए फेर-बदल को खरिज करे। यदि बहुजन समाज ऐसा कर सका तब यह अपने गुलामी वाले पाखंड, रीति-रिवाज और आडंबर को उखाड़ फेंक सकेगा। इसके अलावा ऐसे त्योहारों का बहिष्कार किया जाना चाहिए, जिसमें ब्राह्मणों की जरूरत पड़ती है। या किसी जाति विशेष की जरूरत पड़ती है।  उन नए त्योहारों का आगाज करें जो जोतीराव फुले, डॉ. आंबेडकर और रामस्वरूप वर्मा जैसे महापुरुषों ने बताएं हैं। या उन महापुरुषों के संबंध में विशेष घटना घटित हुई हो। जैसे उनका जन्मदिन, परिनिर्वाण दिन। या फिर कोई विशेष घटना जैसे चावदार तालाब सत्याग्रह  दिवस आदि।

सरल शब्दों में कहें तो सत्ताधारी ब्राह्मण वर्ग कहता है कि हमें कोट-पैंट छोड़कर धोती-कुर्ता पहनना चाहिए। वह कहता है कि हमें अंग्रेजी छोड़कर हिंदी को अपनाना चाहिए। वह कहता है कि हमें आधुनिक दवाइयां एलोपैथी छोड़कर आयुर्वेदिक अपनाना चाहिए‌। वह कहता है कि हमें विज्ञान के बजाय धर्म की ओर जाना चाहिए। लेकिन यह सत्ताधारी ब्राह्मण वर्ग खुद इससे उल्टा करता है। वह ऐसा इसलिए कहता है, क्योंकि सत्ताधारी वर्ग को विज्ञान और आधुनिकता से डर है। उसे लगता है कि उसके गुलाम यदि विज्ञान और आधुनिकताओं से लैस हो जाएंगे तो उनकी गुलामी छोड़ देंगे, उनकी उच्चता को चुनौती देंगे।

एक सवाल यह भी कि बहुजन समाज सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता का लक्ष्य कैसे प्राप्त करे। इस बारे में बहुजन महापुरुषों ने पहले ही बता रखा है। मसलन, हम अंतर्जातीय अंतर-धार्मिक विवाह करके सांस्कृतिक गुलामी को तोड़ सकते हैं। हम पूंजीवाद के गिरफ्त में आ चुके त्योहारों को छोड़कर आर्थिक गुलामी की जंजीर तोड़ सकते हैं। हम ब्राह्मणों पर निर्भर त्योहारों का बहिष्कार करके सांस्कृतिक गुलामी की जंजीरें तोड़ सकते हैं। सरकार के स्तर पर बात करें तो अत्यंत पिछड़ी जातियों को प्रतिनिधित्व (आरक्षण या मौका) का अधिकार देकर नई संस्कृति शुरू कर सकते हैं। हमें बहुजन समाज में ऊंच-नीच के सारे भेद खत्म करने होंगे। इसके अलावा हम अपने पूर्वजों की श्रमण संस्कृति को अपनाकर सांस्कृतिक आत्मनिर्भर बन सकते हैं।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)

TCS Nasim

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May 10, 2024, 5:49:00 AM5/10/24
to dalit-movemen...@googlegroups.com
बहुत ही सटीक विश्लेषण किया है आपने इस लेख में.
आभार

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sanjeev khudshah

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May 12, 2024, 9:35:30 AM5/12/24
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Yogesh Prashad

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May 12, 2024, 9:37:02 AM5/12/24
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निश्चय ही आपका विश्लेषण बेहद महत्वपूर्ण है संजीव जी

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