आदिवासी साहित्य - Adivasi Literature

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AYUSH Adivasi Yuva Shakti

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Mar 2, 2015, 11:55:28 AM3/2/15
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आप विचार-दर्शन स्वीकार कर मार्क्सवादी हो सकते हैं, गांधीवादी हो सकते हैं, लोहियावादी हो सकते हैं, फिर आदिवासी दर्शन को स्वीकारने में हिचक क्यों? अन्य विचार की सीमाएं हैं तो आदिवासियत में भी शायद कमियां हों. पर वह दर्शन है ही नहीं ऐसा फतवा क्यों?

- कृष्ण मोहन सिंह मुण्डा
(झारखंड के युवा आदिवासी रचनाकार)






मुंडारी आधुनिक साहित्य के विकास में डॉ. सिकरा दास तिर्की का योगदान उल्लेखनीय है। छात्र-जीवन से ही मुंडारी भाषा-साहित्य, संस्कृति एवं इतिहास के प्रति अगाध जिज्ञासा रखने वाले श्री तिर्की उरांव आदिवासी समुदाय से आते हैं, परंतु मुंडा क्षेत्र में पुरखौती निवास होने के कारण इनकी मातृभाषा मुंडारी है। साहित्य की सभी विधाओं में इनकी रचनाएं स्थानीय, क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। मुंडारी एवं हिंदी दोनों ही भाषाओं में। वर्तमान में आप रामलखन सिंह यादव महाविद्यालय, राँची (झारखण्ड) में व्याख्याता हैं और मुण्डारी भाषा-साहित्य, संस्कृति, इतिहास पर चिंतन-मनन, लेखन व शोध निर्देशन के क्षेत्र में सक्रिय हैं.

प्रकाशित पुस्तकें: बा चण्डुअ आन तोअउ, झारखण्ड के आदिवासी और उनके गोत्र, वन अधिनियम 2006 (अनुवाद), मुण्डारी लोक साहित्य में इतिहास, मरङ गोमके जयपाल सिंह मुण्डा (अनुवादित नाटक) और कानि सड़गिर (मुण्डारी-हिंदी कहानी संग्रह)





आपकी अपनी लिपि है. भाषा है. 
अगर लिपि नहीं रहेगी, भाषा नहीं 
बचेगी तो आप भी नहीं बचोगे. 
आपका आदिवासी अस्तित्व मिट जाएगा.
गैर आदिवासियों द्वारा रचित आदिवासी विषयक साहित्य में शिल्प है परन्तु आदिवासी आत्मा नहीं है। उसमें सर्जक अपनी दृष्टि से अच्छाई-बुराई का कलात्मक विवरण रखता है। लेकिन आदिवासियों का सच उससे अलग है।



- गुरु गोमके रघुनाथ मुर्मू
5 मई 1905-1 फरवरी 1982

(आदिवासी सांस्कृतिक पुनर्जागरण के अगुआ जिन्होंने लिपि अविष्कृत की. भाषा और साहित्य के विकास के लिए गांव-गांव पढ़ने-पढ़ाने की व्यवस्था की. छपाई के लिए अक्षर ढाले और 40-50 के दशक में लेखक संगठन बनाया, प्रिंटिंग प्रेस डाली.)






जैसे खेत में खड़े होकर फोटो खिंचा लेने से कोई किसान नहीं बन जाता, वैसे ही आदिवासी क्षेत्र में घूम लेने भर से कोई आदिवासी जीवन का लेखक नहीं हो जाता. गंवई जीवन पर प्रेमचंद और रेणु दोनों ने हिंदी में लिखा है. पर जो गांव रेणु (मैला आंचल) के उपन्यासों में है वह प्रेमचंद (गोदान) में नहीं. यहां तक कि प्रेमचंद का ग्राम्य जीवन बांग्ला के ताराशंकर बंदोपाध्याय (गणदेवता) की तुलना में उन्नीस ही है. 

अपने ही बच्चे की भाषा हम तब तक नहीं समझ पाते जब तक कि वह हमारी तरह बोलने नहीं लगता. इसके पहले हम सिर्फ उसकी आंगिक क्रियाओं और अपने अनुभव के आधार पर उसकी अभिव्यक्ति का अनुमान लगाते हैं. अनुमान को प्रमाणिक नहीं माना जा सकता क्योंकि उसमें 100 फीसदी एरर की गुंजाइश रहती है. इसी तरह से आदिवासी भाषा-संस्कृति को नहीं जाननेवाले गैर-आदिवासी लेखकों के अनुमान पर रचित साहित्य को आदिवासी जीवन की सटीक अभिव्यक्ति नहीं माना जा सकता है.




नेहरु युग के औद्योगीकरण से कोई लाभ नहीं हुआ आदिवासी समाज का. ऐसा मंदिर बनवाया जिसमें भगवान तो नहीं ही मिला, प्रसाद भी नहीं. विकल्प खड़ा करना होगा, वह भी हमारी संस्कृति और बुद्धिमत्ता के साथ. 

- डॉ. राम दयाल मुण्डा
(देशज स्वर के संपादक और उपन्यासकार विनोद कुमार को दिये गये एक साक्षात्कार में)

AYUSH Adivasi Yuva Shakti

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Mar 24, 2015, 10:28:01 AM3/24/15
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AYUSH Adivasi Yuva Shakti

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Apr 7, 2015, 11:15:24 AM4/7/15
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On Monday, March 2, 2015 at 10:25:28 PM UTC+5:30, AYUSH Adivasi Yuva Shakti wrote:
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