जय जिनेन्द्र!
प्रस्तुत शृंखला मुनिवर क्षमासागरजी महाराज के दश धर्म पर दिए गए प्रवचनों का
सारांश रूप है. पूर्ण प्रवचन "गुरुवाणी" शीर्षक से प्रेषित पुस्तक में उपलब्ध
हैं. हमें आशा है की इस छोटे से प्रयास से आप लाभ उठा रहे होंगे और इसे पसंद भी
कर रहे होंगे.
इसी शृंखला में आज "उत्तम संयम" धर्म पर यह झलकी प्रस्तुत कर रहे हैं:
जीवन को अनुशाषित करना एवं उसको विभिन्न संकल्पों द्वारा संयमित करना , उत्तम
संयम कहलाता है. जैसे कांच की चिमनी रखने से दीपक की लौ हवा से नहीं बुझेगी उसी
प्रकार संयम की चिमनी रखने से सच्चाई की ज्योति कभी नहीं बुझेगी.
संयम कभी भी बंधन नहीं होता. अगर किसी बेल या लता को ऊंचाई छूना हो तो उसे किसी
वृक्ष या लकड़ी का सहारा देते हैं. आवश्यकता पढने पर उसे उस वृक्ष या लकड़ी से
बाँध भी देते हैं. परन्तु वह बंधन कभी भी बेल या लता के विकास में अवरोध नहीं
करता अपितु सहायता ही करता है. उसी प्रकार संयम भी बंधन नहीं सहारा है. जीवन को
ऊँचा उठाना है, जीवन को अच्छा बनाना है तो थोडा सा बंधन आवश्यक है. बंधन वो हो
जो जीवन को उठाने वाला हो.
यदि नदी के दोनों किनारे मजबूत न हों तो वह नदी यहाँ फ़ैल कर नष्ट हो जाती है और
अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच पाती. ऐसे ही यदि हम अपने जीवन को अनुशाषित करें ,
व्यवस्थित करें तभी हमारा जीवन ऊंचा उठ सकता है.
संयम के मायने हैं - जीवन को अनुशाषित करना, अपनी संकल्प शक्ति, इच्छा शक्ति को
बढ़ाना. परन्तु संयम के मायने केवल अनुशाशन ही नहीं है - आत्मनुशाशन है,
आत्मनियंत्रण है. हम सब चीज़ें शरीर की सुरक्षा के लिए करते हैं . यदि वही सब
चीज़ इस द्रष्टि से करें की इससे मेरी आत्मा का उठान होगा तो वह अनुशाशन
वास्तविक होगा.
संयम से क्या होता है ? हमारे भीतर असंयम के, असावधानी के, लापरवाही के,
अव्यवस्थित जीवन जीने के जो भी संस्कार पड़े हुए हैं वे सब व्यवस्थित हो जाएँ -
ये संयम का काम है. व्रत और समिती का पालन करना, अपने मन-वचन और इन्द्रियों को
संयमित कर लेना, नियमित कर लेना, नियंत्रित कर लेना इसी का नाम संयम धर्म है.
भ्रत्र्हरी का उदाहरण प्रस्तुत है. वे विरक्त हो गए और जंगल में साधना करने
लगे. एक दिन जब ध्यान के बाद आँख खुली तो सामने चमचमाता हुआ बेशकीमती हीरा पड़ा
दिखा. एक क्षण को मुनि होते हुए भी उनका मन डोल गया. लेकिन अगले ही क्षण देखा
की दो घुड़सवार आये और दोनों ने हीरे को देखा. हीरा पाने के लिए दोनों में
लड़ाई और तलवारबाजी हो गयी और दो मिनट में ही उन्होंने एक दूसरे को मौत के घाट
उतार दिया. वह हीरा ज्यों का त्यों ज़मीन पर पड़ा था. भ्रत्रहरी ये सब देखकर
फिर ध्यान में लीं हो गए. वे सोचने लगे की जैसा की मेरा मन डोल गया था और अगर
मैंने संयम नहीं किया होता और चूक गया होता तो मेरी भी यही दशा होने वाली थी.
ऐसा विश्वास हमारे भीतर भी तभी आएगा जब हम अपने जीवन में इस तरह के संयम को
अपनी इच्छा से, स्वेच्छा से अंगीकार करेंगे.
Regards,
Maitree Samooh
P.S. Maitree Samooh thanks Reshu and Sujeet for compiling it so nicely