Fwd: {हिंदी-विमर्श:6007} और सुप्रीम कोर्ट में जीत गई हिंदीः हिंदी अनुवादक से साभार

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Vijay Prabhakar Nagarkar

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May 13, 2013, 6:44:04 AM5/13/13
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 सुप्रीम कोर्ट में जीत गई हिंदीः हिंदी अनुवादक से साभार

राजभाषा का तमगा रखने वाली सब जगह से हार चुकी हिंदी आखिरकार सुप्रीम कोर्ट में जीत गई। सुप्रीम कोर्ट ने विभागीय कार्यवाही और सजा का आदेश सिर्फ इसलिए निरस्त कर दिया कि कर्मचारी द्वारा मांगे जाने पर भी उसे हिंदी में आरोपपत्र नहीं दिया गया, जबकि कानूनन केंद्रीय कर्मचारी हिंदी या अंग्रेजी जिस भाषा में चाहे आदेश या पत्र की प्रति मांग सकता है। साल में एक बार हिंदी पखवाड़ा मनाकर हिंदी के प्रति कर्तव्य की इतिश्री समझने वाले अंग्रेजी दां अफसरों के लिए ये फैसला बड़ी नसीहत है।

सुप्रीम कोर्ट से मुकदमा जीतने वाले नौसेना के कर्मचारी मिथलेश कुमार सिंह की याचिका केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) व बांबे हाई कोर्ट ने खारिज कर दी थी। कैट और हाई कोर्ट ने नौसेना की यह दलील मान ली थी कि कर्मचारी अनपढ़ नहीं है। वह स्नातक है और उसने अपना फार्म अंग्रेजी में भरा था, इसलिए आरोपपत्र हिंदी में न दिये जाने के आधार पर विभागीय जांच रद नहीं की जा सकती। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एचएल दत्तू और जस्टिस जेएस खेहर की पीठ ने कर्मचारी के हक में फैसला देते हुए वेतनमान में कटौती का 4 जनवरी 2005 का नौसेना का आदेश निरस्त कर दिया। पीठ ने कैट और हाई कोर्ट का फैसला भी खारिज कर दिया।

केंद्रीय कर्मचारियों के सर्विस रूल 1976 के नियमों का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि अगर केंद्र सरकार किसी कर्मचारी की अर्जी, जवाब या ज्ञापन हिंदी में प्राप्त करती है तो उसे उसका उत्तर हिंदी में ही देना होगा। नियम 7 कहता है कि अगर कोई कर्मचारी सेवा से संबंधित किसी नोटिस या आर्डर की प्रति जिसमें विभागीय जांच की कार्यवाही भी शामिल है, हिंदी या अंग्रेजी जिस भाषा में मांगता है उसे बिना देरी वह दी जाएगी। कोर्ट ने कहा कि यह नियम इसलिए बनाया गया, ताकि किसी भी कर्मचारी को हिंदी या अंग्रेजी में निपुण न होने का नुकसान न उठाना पड़े। नेवल डाकयार्ड का 29 जनवरी 2002 का आदेश भी कहता है कि अगर कर्मचारी हिंदी में अर्जी या जवाब देता है और हिंदी में उस पर हस्ताक्षर करता है तो उसका जवाब भी हिंदी में ही दिया जाएगा। लेकिन इस मामले में मांगने पर भी याची को हिंदी में आरोपपत्र की प्रति नहीं दी गई। कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी जिस भाषा में चाहे उसे दस्तावेज मुहैया कराना सरकार (नियोक्ता) की जिम्मेदारी है। आरोपपत्र हिंदी में न देने से याचिकाकर्ता को मिले निष्पक्ष सुनवाई एवं नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन हुआ है, जिससे वह अपना बचाव ठीक से नहीं कर पाया।

जानिए, क्या था मामला

मुंबई नेवल डाकयार्ड में काम करने वाले मिथलेश को काम के दौरान नाश्ता करने, उच्चाधिकारियों के साथ दु‌र्व्यवहार और उनका आदेश न मानने पर विभागीय जांच में आरोपपत्र दिया गया। विभाग ने हिंदी में आरोपपत्र की प्रति देने की मांग खारिज कर दी। इस पर मिथलेश ने विभागीय जांच में भाग नहीं लिया। जांच के बाद वेतनमान में कटौती की सजा मिलने पर मिथिलेश ने हिंदी में आरोपपत्र न मिलने को आधार बनाकर विभागीय जांच को रद करने की मांग की थी।

 






पूर्व निदेशक (राजभाषा),
रेल मंत्रालय,भारत सरकार
Vijay K Malhotra
Former Director (Hindi),
Ministry of Railways,
Govt. of India
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विजय प्रभाकर नगरकर
Vijay Prabhakar Nagarkar
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Padma R

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May 14, 2013, 4:26:51 AM5/14/13
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this is a victory for Indian languages whether it helps the person or
not but he has aright to know what is given in the letter. mere
reading and writing of English does not mean or prove that one is
proficient in English. Hence, his request was genuine and SC has
followed OL Rulings verbatim.
Kudoos to OL Policy.
padma bsnl
bangalore
14-05-2013
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sharmaji

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May 15, 2013, 1:04:50 AM5/15/13
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sharmaji

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May 15, 2013, 1:12:58 AM5/15/13
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On Monday, May 13, 2013 4:14:04 PM UTC+5:30, Vijay Prabhakar Nagarkar wrote:

janaki s

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May 15, 2013, 1:19:50 AM5/15/13
to rajb...@googlegroups.com
प्रिय मित्रों

राजभाषा विभाग से ज़ारिइ एक पत्र संलग्न करती हुं जो self explanatory है.


जानकी



2013/5/15 sharmaji <rk.shar...@gmail.com>

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नरेन्द्र सहारकर

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May 17, 2013, 3:34:05 AM5/17/13
to Vijay Prabhakar Nagarkar, rajb...@googlegroups.com, Rajbhasha Sangh, राजभाषा विभाग RajbhashaVibhag - भाषायी कंप्यूटरीकरण, राजभाषा सेवक
हम राजभाषा हिन्दी से जुड़े अधिकारीवृंद का यही हाल है कि उन्हें अकेले ही जंग प्रारंभ करनी, लड़नी और पूर्ण करनी होती है |  अनेकों धन्यवाद अभिनन्दन के क़ाबिल है !

मुझे याद है कि ऐसा ही वेतन-मान से संबंधित मामला केट में कोई अधिकारी जीत गया था किंतु | संबधित अधिकारी का विभाग सर्वोच्च न्यायालय में पहुँच गया |  सर्वोच्च न्यायालय ने विभाग से रिपोर्ट माँगी किंतु अभी तक कोई रिपोर्ट ………………॥
मालूम नहीँ हुआ कि वेतन-मान से संबधित मामले का क्या हुआ !


2013/5/13 Vijay Prabhakar Nagarkar <vpnag...@gmail.com>

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Dr Rajeev kumar Rawat

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May 17, 2013, 6:02:41 AM5/17/13
to rajb...@googlegroups.com
माननीय मित्रो,

यह हर्ष का विषय है कि हमारे राजभाषा विभाग के सचिव आदरणीय
श्री अरुण  कुमार जैन जी ने यह पत्र जारी किया है।

मेरे लिए यह विशेष हर्ष की बात है कि पूर्व और पूर्वोत्तर क्षेत्र के कोलकाता
सम्मेलन में 18 अप्रेल 2013 को यह मसला मैंने उनसे व्यक्तिगत रुप से 
भोजनावकाश में उठाया था और फिर मंच पर जाने का अवसर मिला तो वहां 
से भी मैंने अपनी कई शिकायतों में इस विषय को उठाया था। सचिव महोदय ने
इस विषय पर तभी निदेशक श्री हरिन्दर कुमार जी से आवश्यक कार्रवाई हेतु निदेशित किया था।


मैं आभारी हूं सचिव महोदय का कि उन्होंने इस विषय की गंभीरता को समझा
और आवश्यक निदेश जारी किए। यद्यपि इस विषय में जारी पहले के भी सभी आदेश
स्वयं स्पष्ट एवं वाध्यकारी थे तथापि कई विभागों में लागू नहीं किए गए थे।
हमारा  विश्‍वास है कि अब सभी विभाग इस आदेश का गंभीरता से पालन करेंगे
और राजभाषा कर्मियों की वेतन संबंधी विसंगतियों को शीघ्र दूर करने संबंधी कार्रवाई करेंगे। 

सादर



2013/5/15 janaki s <janas...@gmail.com>



--
डॉ. राजीव कुमार रावत,हिंदी अधिकारी
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर-721302
09641049944,09564156315
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