उत्तर प्रदेश में महिलाओं के उत्पीड़न को रोकने एंव न्याय दिलाने सम्बन्धी विवरण
महिलाओं के आर्थिक, सामाजिक एवं शारीरिक शोषण सम्बन्धी अपराधों तथा उनके उत्पीड़न को त्वरित गति से रोकने एवं न्याय दिलाने के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु शासन द्वारा अपराध शाखा, अपराध अनुसंधान विभाग ,उ0प्र0 लखनऊ के अन्तर्गत दिनांक 2/10/88 को महिला सहायता प्रकोष्ठ की स्थापना की गयी ।
महिला सहायता प्रकोष्ठ अपराध शाखा, अपराध अनुसंधान विभाग, एक अपर पुलिस अधीक्षक के अधीन कार्यरत है, जिसके जोनल कार्यालय जनपद, लखनऊ, कानपुर, गोरखपुर, बरेली तथा मेरठ है। इन जोनल कायालयों में सहवर्ती स्टॉफ सहित एक पुलिस उपाधीक्षक के पद स्वीकृत है। महिला सहायता प्रकोष्ठ, अपराध अनुसंधान विभाग के मुख्य कर्तव्य निम्नवत् है:-
(1) महिला उत्पीड़न के अभियोगो/प्रकरणों के संबंध में पुलिस कर्मचारियों का मार्गदर्शन करना एवं जनपदीय पुलिस कार्यवाही का अनुश्रवण एवं आकलन करना और इस कार्य के लिए आवश्यक सूचना, विवरणों को प्राप्त/संकलित करना।
(2) कतिपय महत्वपूर्ण प्रकरणों की जॉच/विवेचना ।
(3) पुलिस जन/अधिकारियों को महिला उत्पीडन एवं महिलाओं के अधिकारों/संरक्षण से सम्बन्धित कानूनों, नियमों आदि की जानकारी देना ।
(4) उत्पीड़न की शिकार महिलाओं को विभिन्न प्रकार की सहायता/सम्बल उपलब्ध कराने में योगदान देना।
(5) महिला उत्पीड़न सम्बन्धी सामाजिक चेतना विकसित करने के लिए समाज सेवी संगठनों/व्यक्तियों के सहयोग से कार्यवाही करना। सम्पूर्ण प्रदेश में 11 जनपदों यथा लखनऊ, कानपुर नगर, वाराणसी, आगरा, इलाहाबाद, मेरठ, बरेली, मुरादाबाद, झाँसी, गोरखपुर तथा फैजाबाद में शासन द्वारा एक-एक महिला थाने की स्थापना की गयी है। इन महिला थानों का कार्य महिला स्टॉफ द्वारा ही किया जाता है। समय-समय पर महिला सहायता प्रकोष्ठ, अपराध अनुसंधान विभाग के राजपत्रित अधिकारियों द्वारा इन थानो का निरीक्षण किया जाता है तथा उचित मार्गदर्शन किया जाता है। वहॉ पर महिला प्रकोष्ठ स्थापित है, जहॉ पर शिकायत कर्ता अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। इन महिला प्रकोष्ठों का संचालन सम्बन्धित जनपदों के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक/पुलिस अधीक्षक द्वारा किया जाता है ।
इसके अतिरिक्त अपराध अनुसंधान विभाग, उ0प्र0 के महिला सहायता प्रकोष्ठ के अधीन केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड, नई दिल्ली की स्वीकृत योजना के अन्तर्गत उ0प्र0 राज्य समाज कल्याण सलाहकार बोर्ड लखनऊ के सहयोग से एक परिवार परामर्श केन्द्र की स्थापना भी दिनांक 31-12-1993 से की गयी है। यह परिवार परामर्श केन्द्र परिवारों को टूटने से बचाने के लिए समुचित योगदान दे रहा है। आवश्यकतानुसार निर्बल महिलाओं को राज्य नि:शुल्क कानूनी सहायता समिति, जवाहरभवन, लखनऊ को सन्दर्भित करके उनकी नि:शुल्क कानूनी सहायता भी आवश्यकता पड़ने पर उपलब्ध करायी जाती है।
माननीय उच्चतम न्यायालय ने रिट पिटीशन (क्रिमिनल) संख्या 362/93 जिला डोमेस्टिक वर्किग वूमेन्स फोरम बनाम यूनियन आफ इण्डिया में पारित बलात्कार से पीड़ित महिलाओं को कानूनी सहायता व क्षतिपूर्ति दिये जाने सम्बन्धी निर्देश दिये हैं। तत्कालीन पुलिस महानिदेशक, उ0प्र0 श्री विजय शंकर माथुर द्वारा अपने अर्धशास0 पत्रांक:डीजी-सात-107(102)94 दिनांक 16-1-95 द्वारा माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय की छायाप्रति समस्त वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक/पुलिस अधीक्षक को प्रेषित करते हुए उक्त निर्देशो का अनुपालन करने हेतु निम्नलिखित कार्यवाही सुनिश्चित कराने के निर्देश दिये गये थे :-
(1) बलात्कार से पीड़ित महिलाओं को अधिवक्ता की सहायता उपलब्ध कराई जाय, जो न्यायालय में की जाने वाली कार्यवाही के अतिरिक्त यह भी परामर्श दे सके कि उसे विभिन्न इकाइयों से किस प्रकार की सहायता प्राप्त हो सकती है। यह आवश्यक है कि थाना स्तर पर जिस अधिवक्ता द्वारा पीड़ित महिला को सहायता प्रदान की जाय, वही अधिवक्ता न्यायालय में होने वाली कार्यवाही के समापन तक इस कार्य हेतु सम्बध्द रहे।
(2) बलात्कार से पीड़ित महिला के थाने पर आने के समय ही उसे कानूनी सहायता उपलब्ध करा दी जाय, ताकि उसका कथन अंकित करते समय उसे अधिवक्ता की सहायता व मार्गदर्शन उपलब्ध रहे।
(3) पीड़ित महिला से पूछ-ताछ करने के पूर्व उसे यह अवगत करा दिया जाय कि उसे अधिवक्ता की सहायता लेने का अधिकार प्राप्त हैं। केस डायरी में इस तथ्य का उल्लेख किया जाय कि पीड़ित महिला का कथन लेने के पूर्व उसे अपने अधिकार के संबंध में अवगत करा दिया गया था।
(4) प्रत्येक थाने पर ऐसे अधिवक्ताओं की सूची रखी जाय जो पीड़ित महिलाओं को कानूनी सहायता प्रदान करने हेतु तैयार हों, ताकि यदि पीड़ित महिला का पक्ष प्रस्तुत करने के लिए उसका कोई अपना अधिवक्ता नहीं है, तो सूची में अंकित अधिवक्ता से उसे कानूनी सहायता प्राप्त करा दी जाय।
(5) इन अधिवक्ता की नियुक्ति पुलिस के प्रार्थनापत्र पर न्यायालय द्वारा की जायेगी, परन्तु पीड़ित महिला से पूछ-ताछ में विलम्ब न हो, इस उद्देश्य से न्यायालय की अनुमति से पूर्व थाना स्तर पर कार्यवाही करने हेतु अधिवक्ताओ को अधिकृत किया जायगा ।
(6) बलात्कार से पीड़ित महिलाओ के नाम, पते एवं अभिज्ञान, जहॉ तक सम्भव हो, गोपनीय रखा जाय।
(7) बालात्कार सम्बन्धीे अपराधो की विवेचना प्राथमिकता के आधार पर एक माह के अन्दर सम्पन्न कर ली जॉय।
(8) प्रत्येक अपराध गोष्ठी में बलात्कार सम्बन्धी अपराधों की विवेचनाओं का अनुश्रवण किया जाय एवं विवेचनाओं में अनुचित विलम्ब करने वाले दोषी विवेचको के विरूद्व प्रभावी कार्यवाही की जाय।
इसके अतिरिक्त समय-समय पर कार्यशाला/प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित कर पुलिस अधिकारियों को मानवाधिकार आयोग व प्रदेश सरकार द्वारा निर्गत दिशा-निर्देशो, विधिक प्रावधानों के सम्बन्ध में जानकारी देते हुए संवेदनशील व जागरूक करने का प्रयास किया जा रहा हेै तथा अनैतिक देह व्यापार(निवारण) अधिनियम 1956 को लागू करने पर सर्वाधिक जोर दिया गया तथा तलाशी के दौरान वेश्यालयों अथवा इस प्रकार के अड्डो से पकड़े गये पुरूषो व महिलाओ/लड़कियो में से महिलाओ व लड़कियों को अपराधी के बजाय उत्पीड़ित समझते हुए अग्रिम कार्यवाही किये जाने के निर्देंश दिये गये। शासन के गृह (पुलिस) अनुभाग-15 से जारी पत्र संख्या-01/6-पु-15/04-म0उ0-20/2001 दिनांकित 30-7-2004 द्वारा प्रदेश के समस्त जिला अधिकारियों तथा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक/पुलिस अधीक्षकों को निर्देंश दिया गया है कि अनैतिक देह व्यापार में संलिप्त होने की दशा में पकड़े जाने वाले व्यक्तियों को आई0पी0सी0 की धाराओं के साथ-साथ अनैतिक देह व्यापार (निरोधक) अधिनियम,1956 की धाराओं में भी अपराध पंजीकृत कर विवेचना की जाय। इससे संबंधित अधिनियम में उपलब्ध दण्ड प्रावधानो का समुचित उपयोग हो सकेगा एवं उद्देश्यो की पूर्ति हो सकेगी ।