[श्रीचरक] मैं भी पी लूँ

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Nov 28, 2009, 3:00:50 AM11/28/09
to hindi...@googlegroups.com
मैं भी पी लूँ
_____________
वे पीते हैं , मैं भी पी लूँ
सोचा था ऐसे ही जी लूँ
मेरी जान की दुश्मन दुनिया
यूँ ही कब जीने देती है
चुपचाप कहाँ पीने देती है...?

प्याले से कोई मदिरालय में
कोई पीता देवालय में
ज्ञान की सरिता बहाने वाला
देखो पीता विद्यालय में

मंत्री मंत्रालय में पीता
कोई पीता सचिवालय में
चपरासी बाहर ही पीता
अफसर पीता कार्यालय में

सेठ चोर साहूकार दरोगा
नैनों ही नैनों से पीते
अबला की योवन रस गगरी
पीते देखे वैशालयों में

लेकिन मैनें भी पीना चाहा
नये सिरे से जीन चाहा
तुम बोल उठे कि मैं पीता हूँ
तुम सा ही जीवन जीता हूँ

रक्त रूप योवन और मदिरा
तुम पीते मैं कब पीता हूँ
जब भी हुआ विवाद
सदा ही तुम जीते मैं कब जीता हूँ

अपनी ही सूनी आँखों के
केवल अश्रु नीर पीता हूँ
खुशियों की छितराई गुदडी
गम की सूंई से सीता हूँ

सोचा था ऐसे ही जी लूँ

वे पीते हैं मैं भी पी लूँ....॥


डॉ. योगेन्द्र मणि

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Posted By ड़ा.योगेन्द्र मणि कौशिक to श्रीचरक at 11/27/2009 11:57:00 PM

Brajesh Tripathi

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Nov 28, 2009, 4:52:29 AM11/28/09
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very good written like 'madhushala'

2009/11/28 ??.????????? ??? ????? <drymk...@gmail.com>
Posted By ड़ा.योगेन्द्र मणि कौशिक to श्रीचरक at 11/27/2009 11:57:00 PM




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Dr Brajesh Tripathi (PT)
Sr Physiotherapist,
SGPGIMS, Lucknow
Mob 09415084339
bktp...@gmail.com

dinesh kandpal

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Nov 28, 2009, 10:36:06 AM11/28/09
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बधाई... शानदार कविता है..सरस..गूढ़..
दिनेश कण्डपाल

2009/11/28 Brajesh Tripathi <bktp...@gmail.com>

राजीव तनेजा

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Nov 29, 2009, 8:52:41 AM11/29/09
to hindi...@googlegroups.com
बहुत ही बढिया...लाजवाब

2009/11/28 Brajesh Tripathi <bktp...@gmail.com>



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राजीव तनेजा
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Hari Om

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Dec 8, 2009, 6:08:08 AM12/8/09
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thanks

2009/11/29 राजीव तनेजा <rajivta...@gmail.com>
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