> एक व्यंग : एक ग़ज़ल की मौत ......
> विवाहित कवियों को जो एक सुविधा सर्वदा उपलब्ध रहती है और अविवाहित कवियों को
> नहीं - वह है एक अदद श्रोता | और वह श्रोता होती है उनकी श्रीमती जी -अभागिन|
> अभागिन इसलिए कि वह हमारे जैसे चिरकुट कवि की धर्मपत्नी होती है | अगर वह किसी
> हवलदार की पत्नी होती तो वह हमसे ज्यादा ही कमा कर लाता | इसीलिए वह आजीवन अपने
> भाग्य को कोसती रहती हैं | एक वह दिन कि आज का दिन |वह तो विधि का विधान था कि
> इस कलम घिसुए कवि से शादी हुई | कौन मिटा सकता है इसे.!हर कवि की आदि श्रोता
> वही होती है और अंतिम श्रोता भी वही -बेचारी |उधर किसी गीत का मुखडा बना नहीं
> कि कवि महोदय के पेट में प्रसव-पीडा शुरू हो जाती है- कब सुनाए ,किसे सुनाए |उस
> समय तो कोई मिलता है नहीं अत: पत्नी को ही आवाज़ लगाते हैं -'अरे ! भाग्यवान !
> इधर तो आना एक गीत सुनाता हूँ -
> 'रोटी कपडा और मकान
> कवियों का इस से काम
> रोटी कपडा और मकान "
> 'बोलो कैसी लगी ?'- कवि महोदय ने समर्थन माँगा
> पत्नी इस कविता का अर्थ नहीं ,मर्म समझती है -अपना निठ्ठ्ल्लापन ढांप रहा है
> यह आदमी.जल्दी रसोई घर में भागती है .तवे पर रोटी छोड़ कर आई थी. रोटी पलटनी थी
> . देखा रोटी जल गई . सोचती है -क्या जला? रोटी ,दिल या अपना भाग्य? इनकी कविता
> सुनते-सुनते | काश ! कि हम बहरे होते |
> ऐसी ही एक प्रसव-पीडा एक कवि जी को रात २ बजे हुई कि सोती हुई पत्नी को
> जगा कर एक अंतरा सुनाने की चेष्टा की थी.पत्नी ने उनके मुख पर तकिया रख कर दबा
> दिया फिर सारे अंतरा-मुखडा सुप्त हो गए |कहते हैं कि वह एक
> विदुषी महिला थीं |
> परन्तु अविवाहित कवियों को एक जो सुविधा सर्वदा उपलब्ध होती है वह विवाहित
> कवियों को आजीवन उपलब्ध नहीं होती . चाहें तो वाजपेई जी से पूछ सकते हैं | और
> वह सुविधा है रात्रि शयन में खाट से उतरना| अविवाहित कवि स्वेच्छा से जिस तरफ
> से चाहें उतर सकता है | वह स्वतंत्र है | स्वतंत्र लेखन करता है| यह
> स्वतंत्रता विवाहित कवियों को नहीं है | यही कारण है की विवाहित कवि या तो
> 'वाम-पंथी' विचारधारा के होते हैं या फिर 'दक्षिण-पंथी' विचारधारा के होते है |
> जो खाट से उतरते ही नहीं वह 'निठ्ठल्ले" कवि होते हैं -नाम बताऊँ?
> मगर शायरों की बात अलग है. एक बार ऐसा ही जच्चा वाला दर्द मुझे भी हुआ था .
> शे'र बाहर आने के लिए कुलांचे मार रहा था' 'मतला' हो गया (मिचली नहीं)
> .सोचा नई ग़ज़ल है .बेगम को सुनाते है -
> तुमको न हो यकीं मगर मुझको यकीन है
> रहता है दिल में कोई तुझ-सा मकीन है
> 'यह यकीन कौन है?कोई कमीन तो नहीं ? -बेगम ने शक की निगाह से पूछा
> दिलखुश हो गया. चलो एक लफ्ज़ तो ऐसा लिखा जिसका मायने इन्हें नहीं मालूम.
> वज़नदार शे'र वही जिसका न तासीर समझ में आये न अल्फाज़ .लगता है शे"र अच्छा बना
> है| मैंने बड़े प्यार से समझाया- 'मकीन माने जो घर में रहता है मकान वाला
> -उर्दू में मकीन बोलते हैं . उन्हें मेरे उर्दू की जानकारी पर फक्र हुआ हो या न
> हुआ हो मगर शुबहा ज़रूर हो गया की हो न हो मेरे दिल में उनके अलावा और भी कोई
> रहता है .मेरा कहीं लफडा ज़रूर है
> यकायक चिल्ला उठी - मुझे तो पहले से ही यकीन था की ज़रूर तुम्हारा कहीं लफडा
> है | आपा ठीक ही कहती थी कि ये शायर बड़े रोमानी आशिकाना मिजाज़ के होते हैं
> .इश्किया शायरी की आड़ में क्या क्या गुल खिलाते है | ज़रा इन पर कड़ी नज़र
> रखना | लगता है आपा ने ठीक ही कहा था
> ' बेगम तुम औरतों के दिमाग में बस एक ही बात घूमती रहती है अरे! इस शे'र का
> मतलब समझो ,शे'र का वज़न देखो -शायर कहना चाहता है की या अल्लाह ,परवरदिगार मेरे
> ,आप को यकीन हो न हो परन्तु हमें पूरा यकीन है की मेरे दिल में आप की मानिंद
> एक साया इधर भी रहता है |
> अभी मैं समझा ही रहा था की बेगम साहिबा बीच में ही चीख उठी -" चुप रहिए! हमें
> चराने की कोशिश न कीजिए .हम वो बकरियां नहीं कि आप चराएं और हम चर जाएँ. आप
> क्या समझते हैं की हमे आप की नियत नहीं मालूम !,नज़र किधर है नहीं मालूम !हमे सब
> मालूम्हें .अरे! यह शायर लिखते तो है अपने उस 'छमक-छल्लो' के लिए और नाम लेते
> है 'खुदा' का . अल्लाह का > अरे कमज़र्फ़ आदमी !शर्म नहीं आती परवरदिगार को बीच
> में लाने पर.
> " कौन है वह?'-उन्होंने गुस्से में आँख तरेरते हुए पूछा
> 'कौन? -मैंने सकपकाते हुए पूछा
> ' अरे! वही कलमुंही ,मकीन,कमीन यकीन जो भी नाम हो उसका जो तुम्हारे दिलमें
> दिल-ओ-जान से रहती है ?'
> 'लाहौल विला कूवत. लानत है तुम्हारी समझदारी पर '
> 'हाँ हाँ !अब तो लानत भेजोगे ही मुझ पर| जब शादी कर के लाए थे तब लानत नहीं
> भेजी थी '
> 'बेगम साहिबा ! तुम तो समझती ही नहीं '
> 'हाँ हाँ अब मैं क्यों समझने लगूं. तुम क्या समझते हो कि हमें शे'र समझने की
> तमीज नहीं !अरे! हमने भी कमेस्ट्री से एम० ए० किया है हम ने भी हाई स्कूल तक
> हिंदी पढ़ी है .खूब समझती हूँ तुम्हारी ग़ज़ल और ग़ज़ल की असल ....
> फिर क्या होना था .वही हुआ जो ऐसे मौके पर हर पत्नी करती है -रोना-धोना सर
> पीटना (अपना) अचूक अस्त्र अचूक निशाना
> अब ग़ज़ल का अगला शे'र क्या सुनाना
> ०० ०० ००००००
> शायरों की यही तो कमज़ोरी है .इस तरह की दाद पर मायूस हो जाएं तो हो चुकी शायरी
> | अरे! शायरी तो दीवानापन है ,बेखुदी है.सड़े अंडे-टमाटर की परवाह कौन करे |
> मजनू ने की थी क्या? महीने गुज़र गए | अब तक तो बेगम का गुस्सा भी ठंडा हो गया
> होगा | चलते हैं दूसरा शे'र सुनाते हैं -
> ताउम्र इसी बात की जद्द-ओ-ज़हद रही
> अपनी ज़मीन है या उनकी ज़मीन है
> अभी शे'र का काफिया ख़त्म भी न हुआ था की बेगम साहिबा एक बार फिर भड़क उठी
> -"हाय अलाह !अब ज़मीन जायदाद भी उसके नाम कर दिया क्या! "
> "अरे! चुप ,किस की बात कर रही हो तुम?"
> "अरे! तुम्हारे कमीन - मकीन की "
> "या अल्लाह इस नाशुक्री बीवी को थोडा-सा अक्ल अता कर वरना तुम्हारा यह शायर इस
> कमज़र्फ़ बीवी के हाथों ख्वामख्वाह मारा जाएगा | मैंने तो यह शे"र तुम्हारी
> शान में पढा था यह जिस्म यह जान किस की है ..अपनी या तुम्हारी ...."
> "पहले ज़मीन-जायदाद का कागज़ दिखाओ ..ज़रूर उस सौतन को लिखने का इरादा होगा
> ...." बेगम साहिबा ने मेरा हाथ ही पकड़ लिया
> अब इस शे'र के मानी क्या समझाते अगला शे'र क्या सुनाते | चुप ही रहना बेहतर
> समझा |
> ०० ०००००००००
> अब मैंने यह तय कर लिया की अब इस औरत को न कोई शे'र सुनाना, न कोई ग़ज़ल| इस
> से अच्छा तो किसी चाय की दुकान पे सुनाते तो कम से कम चाय तो मिलती.घर की
> मुर्गी साग बराबर .इस औरत के लिए तो घर का जोगी जोगडा ...|इसे मेरी औकात का
> क्या पता |आज शाम नखास पर मुशायरा है |बड़े अदब से बुलाया है उन लोगो ने | अपनी
> शेरवानी निकाली.चूडीदार पायजामा पहना,फर की टोपी पहनी ,आँखों में सुरमा लगाया
> ,कानो के पास इतर लगाया ,करीने से रुमाल रखा.फिल्मवालों ने यही ड्रेस कोड तय कर
> रखा है हम जैसे शायरों के लिए .शायरी में दम हो न हो मगर ड्रेस में तो दम हो .
> कवि की बात अलग है ,शायरी की बात अलग |वीर रस के कवि हैं तो मंच पर आये
> ,हाथ-पैर पटक गए,श्रृंगार रस के कवि हैं तो आए और लिपट गए, रस के कवि हैं तो
> रो-धो कर निपट गए | मगर शायरी ! शायर को एक एक शे'र तीन-तीन बार पढ़ना पड़ता है
> फिर देखना पड़ता है किधर से गालियाँ आ रही है ,किधर से तालियाँ .हम गुमनाम
> शायरों के लिए सड़े अंडे-टमाटर तो छोड़ दीजिए | यहाँ भी 'ब्रांड-वैल्यू' बिकता है
> |नामचीन शायर है तो मंच पर आने से पहले 'तालियाँ बजती हैं ,हम जैसों के लिए
> जाने के बाद 'तालियाँ' बजती है -गया मुआ ! पता नहीं कहाँ -कहाँ से पकड़ लाते हैं
> यह प्रोग्राम वाले.
> अब तो ड्रेस पर ही भरोसा था .शीशे के सामने खड़े हो कर शे'र अदायगी का
> रिहर्सल कर रहा था -
> दीदार तो नहीं है चर्चे मगर सुने -
> वह भी किसी हसीं से ज्यादा हसीन हैं
> पीछे से किसी ने ताली बजाई ,सामने से मैंने शुक्रिया अदा किया .मुड़ कर देखा
> बेगम साहिबा हैं.-'वाह ! वाह ! सुभान अल्लाह !सुभान अल्लाह !क्या शे'र मारा है
> .अब जाओ दीदार भी कर लो ,बेकरार होगी .कब्र में पाँव लटकाए बैठे है ज़नाब की न
> जाने कब फाख्ता उड़ जाय ...वह भी हसरत पूरी कर लो ....'-बेगम साहिबा ने भडास
> निकाली .
> 'बेगम ! किसकी बात कर रही हो?'
> 'अरे! उसी कलमुंही कमीन मकीन की.हसीन हैं न ! हम से भी ज्यादा हसीन है न '
> 'लाहौल विला कूवत ! कमज़र्फ़ औरत! शे'र समझने की तमीज नहीं| तमीज होगी भी कैसे
> -सास बहू सीरियल देखने से.टेसूए बहाने से .किट्टी पार्टी करने से फुरसत होगी
> तब न ,शायरी समझने की तमीज आयेगी '
> 'हाँ हाँ ,हमें क्यों तमीज आयेगी ! सारी तमीज या तो उस छमकछल्लो के पास है या
> आप के पास है '
> 'बेगम ! इस शे'र का मतलब तुम नहीं समझती हो ,इस का मतलब है या मेरे मौला
> ,परवरदिगार जिन्दगी गुजर गयी मगर आज तक दीदार नहीं हो सका ,मगर खुदा के
> बन्दे बताते है की आप इस ज़हान के सब से खूबसूरत हसीन .....'
> देखिए जी .कहे देती हूँ !हमें इतनी भोली मत समझिए ,हमारे अब्बा ने मुझे भी
> तालीम दी है ,हमें भी अदीब की जानकारी है हम उड़ती चिडिया के पर गिन सकते
> हैं ,खुली आँखों से सुरमा चुरा सकते हैं आप हम से नज़रें नहीं चुरा सकते हैं
> .....वो तो मेरे करम ही फूटे थे की......'-कहते -कहते रो पडी
> फिर उसके बाद क्या हुआ ,विवाहित पाठकों की कल्पना पर छोड़ देता हूँ | वहां से जो
> भागा तो मुशायरे में जा कर ही दम लिया .पूरी ग़ज़ल वहीँ पढ़ी -गालियाँ मिली या
> तालियाँ आप स्वयं ही समझ लें
> अस्तु |
> -आनंद --