बरसात पैसों की

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rajiv taneja

unread,
Jul 5, 2009, 2:18:54 PM7/5/09
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"बरसात पैसों की"

***राजीव तनेजा***

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"अरे तनेजा जी!...ये क्या?...मैँने सुना है कि आपकी पत्नि ने आपके ऊपर वित्तीय हिंसा का केस डाल दिया है"....

"हाँ यार!...सही सुना है तुमने"मैँने लम्बी साँस लेते हुए कहा

"आखिर ऐसा हुआ क्या कि नौबत कोर्ट-कचहरी तक की आ गई?"...

"यार!...होना क्या था?..एक दिन बीवी प्यार ही प्यार में मुझसे कहने लगी कि तुम्हें तो ऐसी होनहार....सुन्दर....सुघड़ और घरेलू पत्नि मिली है कि तुम्हें खुश हो कर मुझ पर पैसों की बरसात करनी चाहिए"...

"तो?"...

'"मैँने कहा ठीक है"...

"फिर?"...

"फिर क्या?...एक दिन जैसे ही मैँने देखा कि बीवी नीचे खड़ी सब्ज़ी खरीद रही है...मैँने आव देखा ना ताव और सीधा निशाना साध सिक्कों से भरी पोटली उसके सर पे दे मारी"...

***राजीव तनेजा***



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Posted By राजीव तनेजा to हँसते रहो Hanste Raho on 7/05/2009 09:41:00 AM



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राजीव तनेजा
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Arun Kumar Jha

unread,
Jul 5, 2009, 2:27:24 PM7/5/09
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"बरसात पैसों की"


बकवास सिर्फ बकवास. कुछ सकारात्मक सोचिय जनाब, इलेक्ट्रोनिक सुविधा का इस्तेमाल जनउपयोगी लेखन में करिय बकवास से लिखने से बचीय 

आपका शुभ चिन्तक मित्र 
अरुण कुमार jha  

kuldeep kumar mishra

unread,
Jul 7, 2009, 4:53:41 AM7/7/09
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"बरसात पैसों की"
ये आपने क्या किया
पैसों की बरसात कोई ऐसे करता है भला
अगर आप अपनी रचना को खुद दोबारा पढ़कर देखें तो
आपको खूब -ब- खुद पता चल जायेगा की
आपकी कल्पना, आपकी सोच , जो कि
इसको लिखने में इस्तेमाल हुई है
बिलकुल बकवास है.
प्लीज़
कुछ सही और sakaratmak sochiye 
***********************
५ जुलाई २००९ २३:४८ को, rajiv taneja <rajivta...@gmail.com> ने लिखा:

"बरसात पैसों की"

***राजीव तनेजा***

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"अरे तनेजा जी!...ये क्या?...मैँने सुना है कि आपकी पत्नि ने आपके ऊपर वित्तीय हिंसा का केस डाल दिया है"....

"हाँ यार!...सही सुना है तुमने"मैँने लम्बी साँस लेते हुए कहा

"आखिर ऐसा हुआ क्या कि नौबत कोर्ट-कचहरी तक की आ गई?"...

"यार!...होना क्या था?..एक दिन बीवी प्यार ही प्यार में मुझसे कहने लगी कि तुम्हें तो ऐसी होनहार....सुन्दर....सुघड़ और घरेलू पत्नि मिली है कि तुम्हें खुश हो कर मुझ पर पैसों की बरसात करनी चाहिए"...

"तो?"...

'"मैँने कहा ठीक है"...

"फिर?"...

"फिर क्या?...एक दिन जैसे ही मैँने देखा कि बीवी नीचे खड़ी सब्ज़ी खरीद रही है...मैँने आव देखा ना ताव और सीधा निशाना साध सिक्कों से भरी पोटली उसके सर पे दे मारी"...

***राजीव तनेजा***



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Posted By राजीव तनेजा to हँसते रहो Hanste Raho on 7/05/2009 09:41:00 AM



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rajiv taneja

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Jul 7, 2009, 10:35:48 AM7/7/09
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प्रिय अरुण कुमार जी,
नमस्कार, जैसा कि आपने बताया कि मेरा लिखा चुटकला "बरसात पैसों की" आपको पसन्द नहीं आया...तो इसके लिए मैँ आपसे क्षमा चाहता हूँ।आईन्दा कोशिश करूँगा कि कुछ ऐसा लिखूँ जो आपको रुचिकर लगे।फिलहाल इतना ही....बाकी फिर कभी
विनीत:
राजीव तनेजा


2009/7/5 Arun Kumar Jha <wgm...@gmail.com>

rajiv taneja

unread,
Jul 7, 2009, 10:37:04 AM7/7/09
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प्रिय कुलदीप जी,

नमस्कार, जैसा कि आपने बताया कि मेरा लिखा चुटकला "बरसात पैसों की" आपको पसन्द नहीं आया...तो इसके लिए मैँ आपसे क्षमा चाहता हूँ।आईन्दा कोशिश करूँगा कि कुछ ऐसा लिखूँ जो आपको रुचिकर लगे।फिलहाल इतना ही....बाकी फिर कभी
विनीत:
राजीव तनेजा
2009/7/7 kuldeep kumar mishra <kk.mi...@gmail.com>
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