आदरणीय एम्. ए. सिद्दीकी जी,
जब आप यह गीत गा सकते हैं..
"मज़हब नही सिखाता आपस मे बेर रखना,
हिन्दी है हम वतन है हिन्दुस्ता हमारा |"
तो "वन्दे मातरम" से इतना गुरेज क्यों....
मैंने इससे पहले भी इसी तरह के किसी पोस्ट में कहा था की, "वन्दे मातरम" कहें
या "मादरे वतन" कहें दोनों का आशय एक ही है....
तो फिर अपने वतन परस्ती की भावना दर्शाने के के भाव को हम मजहब और भाषा के
झरोखों से क्यों देखते हैं यह कहाँ तक तर्क संगत लगता है??????
भावना, प्रेम और जज्बात दिल में दबा कर रखने के लिए नहीं होती है, उसे जताए
बिना आप उसको सम्पूर्णता नहीं दे सकते....
और बात यह नहीं है की आप यह गीत नहीं गायेंगे तो आप अपनी देशभक्ति साबित नहीं
कर रहे हैं..... एसे कई गैर मुस्लिम या मुस्लिम नेता आज भी हैं जिन्हें पूरा
"वन्दे मातरम" कंठस्त नहीं है.... इन नेताओं को कौन चुन कर भेजते हैं???? तो
यदि ये नेता देशभक्त नहीं येन तो इन्हें चुनकर भेजने वाले भी देश भक्त कटाई
नहीं हो सकते....!
और आप यह भूल रहे हैं की इसी "वन्देमातरम" गीत नें आजादी की क्रांति की लहर में
जान फूँक दी थी..... यह जान-मानस को देशभक्ति के जज्बे से ओत-प्रेत करने वाला
गीत हुआ करता था.... पर अफसोस की बात है की आज मजहब की खींचातानी में फँस कर रह
गया है..... और आप सवाल कर रहे हैं की क्या केवल गीत गाकर ही देश भक्ति जताई जा
सकती है....
यदि गीत गाकर अपनी भावनाओं को व्यक्त करना निरर्थक होता तो बॉलीवुड की फिल्मों
में गीत-संगीत के लिए कोई जगह नहीं होती..... कोई ऐसा पल नहीं हो गा जब कहीं न
कहीं या यूँ कहें की हर कही फिल्मों के गीत बज रहे हों, और उसे सुन कर लोग
मन्त्र-मुग्ध हो गीत की भावना अपने दिलों-दिमाग पर महसूस कर रहे हों,..... इन
फिल्मों के गीतों को सुनते समय कोई मजहब लोगों के आड़े नहीं आता...! अपने प्रेम
का इजहार करना किसी को काफ़िर नहीं बनाता... चाहे वो किसी व्यक्ति विशेष के लिए
हो या अपने वतन के लिए..... और यदि कोई प्रेम का इजहार करने से कतराता है या
मना करता है तो यकीनन वह प्रेम नहीं करता.....
और निश्चिंत रहे भारत देश का संविधान आजादी से लेकर आज तक धर्मनिरपेक्ष रहा है
और रहेगा.... पर क्या इस देश की जनता पूरी तरह से कभी भी धर्मनिरपेक्ष बन
पायेगी.... जरूर पर जब मजहबी लोग उन्हें बरगलाना बंद कर दें.....!!!
कृपया देश-प्रेम और मजहब को उनके विसुध्ध रूप में देखें उन्हें आपस में न टकराए
.........
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- दिनेश सरोज
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७ नवम्बर २००९ १:५७ AM को, Afaque Siddiqui <afaque.siddi...@gmail.com> ने
लिखा:
> मज़हब नही सिखाता आपस मे बेर रखाना ...
> मेरा सवाल उन लोगो से हे जो देवबन्द उलेमाओ द्वारा दिये गये फतवे (निदेश)
> की मुखालेफत कर रहे हे, खासकर उन लोगों से जो देश व किसी भी समाज मे होने
> वाली गतीविधि को लेकर बवाल खडा करते है?
> दिया गया फतवा केवल उस धर्म विशेष के अनुयायियो के लिए हे न कि सब के
> लिये फिर ये बवाल क्यो?
> क़्या इस लिये हमारा देश एक Democratic देश हे, क्या एक देश के प्रति
> समर्पण कि भावना केवल एक गीत को गाकर ही बताई जा सकती है क्या अब इस देश
> मे संविधान की यही हैसियत यही रह गयी है, जबकि उच्चतम न्ययालय ने भी कहा
> हे कि वन्दे मातरम गाना आवश्यक नही है.
> क़्या हम अपनी आज़ादी को इस तरह खत्म कर देंगे?
> क्या कोई भी मज़हब या देश का कानून इसकी इज़ाज़त देता है.
> मज़हब नही सिखाता आपस मे बेर रखना,
> हिन्दी है हम वतन है हिन्दुस्ता हमारा |
> एम. ए. सिद्दिक़ी.