Mridula Pradhan
unread,Nov 25, 2009, 11:43:50 PM11/25/09Sign in to reply to author
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उठाओ अपना सर
वसंत मालती……..
समय की
विपरीत चलती हुई
धारा में,
पाँच पंखुड़ियों के
सौंदर्य से आभूषित,
कोमल
तुम्हारी काया,
धूमिल नहीं हो ,
गुलाबी से
रक्तिम होता हुआ
यह
नैसर्गिक स्वरूप,
रह सके आम्लान,
नत-मस्तक
सरल छवि पर
भारी नहीं पड़ जाये,
किसी
अभिशाप का भार
और
कर्तव्य-बोध की
शाखाओं, उप-शाखाओं में
विभाजित
सलज्ज मुस्कान,
रहे चिरंजीवी
इसीलिये,
उठाओ अपना सर
वसंत मालती
कि
समय की
विपरीत चलती हुई
धारा
वापस लौट जाये,
परंपराओं की लीक पर
खींची हुई
तुम्हारी सीमा रेखा से ।