*From:* RASHTRAWADI SENA *Subject:* : Prayer or show of force * नमाज या शक्ति प्रदर्शन * *दिल्ली गुडगाँव एक्सप्रेस वे एन .एच 8 पर मुसलमानों द्वारा पढ़ी गई नमाज के सन्दर्भ में आज (22-09-2009) के विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचार व फोटो देखकर एहसास हुआ कि मुस्लिम समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग या यूँ कहें कि पूरा मुस्लिम समाज कट्टरवाद का शिकार हो रहा है l आज से कुछ वर्ष पूर्व गली मुहल्लों की मस्जिदों में पढ़ी जाने वाली नमाज अब सडको , मुख्या मार्गो में पढ़ी जा रही है .
आखिर इससे क्या साबित किया जा रहा है ? कही यह हिंदुस्तान में तालिबान की संरचना का एक अंग तो नहीं ? हिन्दुओ के धार्मिक आयोजनों के लिए प्रशासनिक अनुमति की अनिवार्यता , इनके लिए कोई कानून नहीं ?
ये सब होता रहा और प्रशासन मूक बनकर देखता रहा .
हिंदुस्तान को पाकिस्तान , साउदी अरब बनने से रोकने के लिए हमे ऐसे आयोजनों (कट्टरता) का विरोध करना होगा अन्यथा वह समय दूर नहीं जब रोज नमाज के समय हमे अपने घरो में ही रहना पड़ेगा .
संलग्न - टाईम्स ऑफ़ इंडिया एवं दैनिक जागरण में प्रकाशित समाचार.
*
*Prayer or show of force*
News and photos published in various newspapers today (22-09-2009) shows the prays of muslim community on Delhi Gurgaon National Highway no – 8 , Which shows that Whole muslim society is following fundamentalism and Jihad under proper planning, by showing their unwanted strength.
What they want to prove?
Is this a India or Pakistan?
Number of permissions are required for Shree Ram leelas or for any jagran, chonki , but there is not a single law for these people ?
We have to stop this by strongly oppsosing it and to save our country from becoming next Pakistan.
Attached - Published news in Times of India and Dainik Jagran. ------------- WRONG WRONG WRONG...all so called secular countries do have a religion, but it is kept away from politics. Only India is stupid to abolish ..erode...supress Hinduism and promote Islam and Christianity. India is a country with NO religion !!
R.M.Jhalla *2 attachments* — Download all attachments<?ui=2&ik=bd660975b1&view=att&th=123e4dcd557517fa&disp=zip> View all images <?ui=2&ik=bd660975b1&view=att&th=123e4dcd557517fa&disp=imgs>
[image: Dainik jagran.jpg]<?ui=2&ik=bd660975b1&view=att&th=123e4dcd557517fa&attid=0.1&disp =inline&zw> *Dainik jagran.jpg* 310K View<?ui=2&ik=bd660975b1&view=att&th=123e4dcd557517fa&attid=0.1&disp=inline &zw> Download<?ui=2&ik=bd660975b1&view=att&th=123e4dcd557517fa&attid=0.1&disp=at td&zw> [image: Times of inda.jpg]<?ui=2&ik=bd660975b1&view=att&th=123e4dcd557517fa&attid=0.2&disp=i nline&zw> *Times of inda.jpg*
आज सुबह की शुरुआत एक कट्टरवादी को समझाने की कोशिश से हुई, और अब दिन का समापन भी उसी अंदाज में करना पड़ रहा है, पर मैं उदार भारतीय संस्किति को नमन करता हूँ...
मुस्लिमों नें रेलगाडी में नमाज़ क्या पढ़ लिया, साम्प्रदायीक मुद्दा बन समाचार पत्रों की एवं चिठ्ठाजगत की सुर्खियाँ बन बैठीं... क्या अपने ईश्वर की स्तुति करना जेहाद कहलाता है.....
क्या कभी किसी पत्रकार नें नवरात्रि, दशहरा, दीपावली के दौरान कभी भी रेलगाडी में सफर नहीं किया....? यकीनन नहीं ही किया होगा.... शायद इसीलिए हिन्दू यात्रियों द्बारा रेलगाडी में हिन्दू धार्मिक त्यौहार जोर-शोर एवं हर्षोल्हास के साथ मनाने की खबर भी किसी न किसी अखबार में जरूर छपती.....
पत्रकारिता की ऐसी व्यवसायीकरण एवं तथाकथित कट्टरवाद ने ही भारतवर्ष को साम्प्रदायीक तनावों में उलझाए रखा है!!!
बस अब और ज्यादा नहीं लिखा सकता.... निन्द्रासन में जाना भी जरूरी हो रहा है....
------------------------------ With Best Regards, Dinesh Saroj Desktop Engineer --------------------------------------------------------------- आओ हिंदी में कम्प्युटर सीखें http://learncomputersinhindi.blogspot.com/ --------------------------------------------------------------- मेरी रचनाएँ http://merirachanaein.blogspot.com/ ----------------------------------------------------------------
२३ सितम्बर २००९ ५:५४ PM को, (swamee shree ji ) swamee shree param chetana nand ji <natarajkriya...@gmail.com> ने लिखा:
> *From:* RASHTRAWADI SENA > *Subject:* : Prayer or show of force > * नमाज या शक्ति प्रदर्शन * > *दिल्ली गुडगाँव एक्सप्रेस वे एन .एच 8 पर मुसलमानों द्वारा पढ़ी गई नमाज के > सन्दर्भ में आज (22-09-2009) के विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचार व > फोटो देखकर एहसास हुआ कि मुस्लिम समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग या यूँ कहें कि > पूरा मुस्लिम समाज कट्टरवाद का शिकार हो रहा है l आज से कुछ वर्ष पूर्व > गली मुहल्लों की मस्जिदों में पढ़ी जाने वाली नमाज अब सडको , मुख्या मार्गो > में पढ़ी जा रही है .
> आखिर इससे क्या साबित किया जा रहा है ? > कही यह हिंदुस्तान में तालिबान की संरचना का एक अंग तो नहीं ? > हिन्दुओ के धार्मिक आयोजनों के लिए प्रशासनिक अनुमति की अनिवार्यता , इनके लिए > कोई कानून नहीं ?
> ये सब होता रहा और प्रशासन मूक बनकर देखता रहा .
> हिंदुस्तान को पाकिस्तान , साउदी अरब बनने से रोकने के लिए हमे ऐसे आयोजनों > (कट्टरता) का विरोध करना होगा अन्यथा वह समय दूर नहीं जब रोज नमाज के समय हमे > अपने घरो में ही रहना पड़ेगा .
> संलग्न - टाईम्स ऑफ़ इंडिया एवं दैनिक जागरण में प्रकाशित समाचार.
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> *Prayer or show of > force*
> News and photos published in various newspapers today (22-09-2009) shows > the prays of muslim community on Delhi Gurgaon National Highway no – 8 , > Which shows that Whole muslim society is following fundamentalism and > Jihad under proper planning, by showing their unwanted strength.
> What they want to prove?
> Is this a India or Pakistan?
> Number of permissions are required for Shree Ram leelas or for any jagran, > chonki , but there is not a single law for these people ?
> We have to stop this by strongly oppsosing it and to save our country from > becoming next Pakistan.
> Attached - Published news in Times of India and Dainik Jagran. > ------------- > WRONG WRONG WRONG...all so called secular countries do have a religion, but > it is kept away from politics. > Only India is stupid to abolish ..erode...supress Hinduism and promote > Islam and Christianity. > India is a country with NO religion !!
> R.M.Jhalla > *2 attachments* — Download all attachments<http://?ui=2&ik=bd660975b1&view=att&th=123e4dcd557517fa&disp=zi p> > View all images<http://?ui=2&ik=bd660975b1&view=att&th=123e4dcd557517fa&disp=imgs>
> [image: Dainik jagran.jpg]<http://?ui=2&ik=bd660975b1&view=att&th=123e4dcd557517fa&attid=0 .1&disp=inline&zw> > *Dainik jagran.jpg* > 310K View<http://?ui=2&ik=bd660975b1&view=att&th=123e4dcd557517fa&attid=0.1&disp =inline&zw> > Download<http://?ui=2&ik=bd660975b1&view=att&th=123e4dcd557517fa&attid=0.1& disp=attd&zw> > [image: Times of inda.jpg]<http://?ui=2&ik=bd660975b1&view=att&th=123e4dcd557517fa&attid=0.2 &disp=inline&zw> > *Times of inda.jpg*
प्रिय मित्र , मैं आपकी बात से सहमत हूँ की किसी हिन्दू ने रेलगाडी में सफ़र किया पर वे समाचार पत्रों की सुर्खियाँ नहीं बन पाए जानतें हैं क्यों क्यों की उन्होंने रेलगाडी में आरती नहीं की और न ही पटाखे फोडे न ही रंग गुलाल खेला . जैसा की वे लोग करते हैं न ही हमने अपनी किसी पुरातात्त्विक महत्व की ईमारत में पूजा पाठ किया , यदि भारत में रहने वाले अपने को सामान भारतीय मानते हैं तो देश के नियम को मानने में अन्तेर क्यों ? यानि की हम नियम नहीं मानेंगे पर केवल अपने को भारतीय मानेगे , और व्यवस्था को बनाने में सहयोग नहीं करेंगे ? चलो अच्छा है यही सही . हम तो कहीं कब्जा नहीं करने जातें पर दुसरे हम पर कब्जा कर जाये तो हम खुश होते है की चलो हम इस लायक तो हैं की कोई हम पर कब्जा कर सकता है ? हम क्यों विरोध करे और क्यों अपने हिन्दू होने को साबित करें कोई बुरा मानं गया तो ? किसी को नाराज करना तो हमे आता नहीं हाँ कोई हमें नाराज करे इस से हमे शांति मिलती है. क्यों की गुलामी ने हमे यही तो सिखाया है न . कितना अंतर है हम में और दुसरे देश के नागरिको में ., वे अपने देश अपनी भाषा धर्म के प्रति गंभीर रहते हुए जीवन जीतें हैं तभी वहां वेवस्था बनी रहती है और प्रगति होती रहती है पर हम एय्सा नहीं कर सके क्या करें हमे किसी ने सिखाया ही नहीं ? हम तो पता नहीं कब से गुलामी से मुक्त ही नहीं हो पाए केवल प्रदेश वाद भाषा अंतर में ही अपने आप को उल्जाए रहे? केवल इसी कारण जानतें है थाईलैंड , चाइना जैसे देशों के बैंकों में भारतीय करेंसी स्वीकार नहीं की जाती ? और जब तक हम उनके देश की भाषा नहीं बोलते हमे सुविधाएँ नहीं मिलती ? और तो और उनके देशों के एअरपोर्ट में भारतियों के सामानों की जाँच कुछ ज्यादा ही सख्ती से करते है ?
यदि हम अपने को भारतीय मानते है तो नियमो का पालन सामान रूप से क्यों नहीं करते ? क्यों अपने आप को अल्पसंख्यक मानने में खुश होतें हैं ? क्यों नहीं विरोध करते एय्से लोगों का जो दो चेहरे का जीवन जेते है और भारतीय धरम का पालन नहीं करते ? जब की यहाँ हिन्दू धर्म सर्वोपरि है . आपने मेरे शब्दों का सम्मान रखा उसका धन्यवाद आपका ही मोहन भया आप मेरे ब्लोग्स पढ़ सकते है ग्लोबल टूरिस्टर के नाम से ब्लागस्पाट पर या गूगल पर सर्च करके .
> आज सुबह की शुरुआत एक कट्टरवादी को समझाने की कोशिश से हुई, और अब दिन का > समापन भी उसी अंदाज में करना पड़ रहा है, पर मैं उदार भारतीय संस्किति को नमन > करता हूँ...
> मुस्लिमों नें रेलगाडी में नमाज़ क्या पढ़ लिया, साम्प्रदायीक मुद्दा बन समाचार > पत्रों की एवं चिठ्ठाजगत की सुर्खियाँ बन बैठीं... क्या अपने ईश्वर की स्तुति > करना जेहाद कहलाता है.....
> क्या कभी किसी पत्रकार नें नवरात्रि, दशहरा, दीपावली के दौरान कभी भी रेलगाडी > में सफर नहीं किया....? यकीनन नहीं ही किया होगा.... शायद इसीलिए हिन्दू > यात्रियों द्बारा रेलगाडी में हिन्दू धार्मिक त्यौहार जोर-शोर एवं हर्षोल्हास > के साथ मनाने की खबर भी किसी न किसी अखबार में जरूर छपती.....
> पत्रकारिता की ऐसी व्यवसायीकरण एवं तथाकथित कट्टरवाद ने ही भारतवर्ष को > साम्प्रदायीक तनावों में उलझाए रखा है!!!
> बस अब और ज्यादा नहीं लिखा सकता.... निन्द्रासन में जाना भी जरूरी हो रहा > है....
> ------------------------------ > With Best Regards, > Dinesh Saroj > Desktop Engineer > --------------------------------------------------------------- > आओ हिंदी में कम्प्युटर सीखें > http://learncomputersinhindi.blogspot.com/ > --------------------------------------------------------------- > मेरी रचनाएँ > http://merirachanaein.blogspot.com/ > ----------------------------------------------------------------
> २३ सितम्बर २००९ ५:५४ PM को, (swamee shree ji ) swamee shree param chetana > nand ji <natarajkriya...@gmail.com> ने लिखा:
>> *From:* RASHTRAWADI SENA >> *Subject:* : Prayer or show of force >> * नमाज या शक्ति प्रदर्शन * >> *दिल्ली गुडगाँव एक्सप्रेस वे एन .एच 8 पर मुसलमानों द्वारा पढ़ी गई नमाज >> के सन्दर्भ में आज (22-09-2009) के विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचार >> व फोटो देखकर एहसास हुआ कि मुस्लिम समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग या यूँ कहें कि >> पूरा मुस्लिम समाज कट्टरवाद का शिकार हो रहा है l आज से कुछ वर्ष पूर्व >> गली मुहल्लों की मस्जिदों में पढ़ी जाने वाली नमाज अब सडको , मुख्या मार्गो >> में पढ़ी जा रही है .
>> आखिर इससे क्या साबित किया जा रहा है ? >> कही यह हिंदुस्तान में तालिबान की संरचना का एक अंग तो नहीं ? >> हिन्दुओ के धार्मिक आयोजनों के लिए प्रशासनिक अनुमति की अनिवार्यता , इनके >> लिए कोई कानून नहीं ?
>> ये सब होता रहा और प्रशासन मूक बनकर देखता रहा .
>> हिंदुस्तान को पाकिस्तान , साउदी अरब बनने से रोकने के लिए हमे ऐसे आयोजनों >> (कट्टरता) का विरोध करना होगा अन्यथा वह समय दूर नहीं जब रोज नमाज के समय हमे >> अपने घरो में ही रहना पड़ेगा .
मैं आपके कहे इन तर्कों से पूर्णतया सहमत हूँ, हर भारतीय को भारतीयता का सम्मान एवं आदर सहित पालन करना ही चाहिए.... जो नहीं करते वो यकीनन भारतीय कहलाने के योग्य नहीं ही हैं....
और रही बार रेलगाडी में सफ़र की तो मुंबई के लोकल ट्रेन में आप हम हिन्दुओं को हर त्यौहार बड़ी ही सिद्धत से मानते पाएंगे, बिल्कुल वैसे ही जैसा की कोई अपने घर में या दफ्तर में मनाता है| रही बात पटाखे फोड़ने की तो आप समझ सकते हैं की हम ऐसा कम से कम ट्रेन में तो नहीं ही कर सकते हैं! पर हाँ हम लोकल ट्रेन में भी होली में रंग गुलाल से जरुर खुशियाँ मानते है| नवरात्रि में दुर्गा पूजा भी करते है...... और हर रोज सुबह दफ्तर जाते समय या शाम को घर लौटते समय लोकल ट्रेन में भजन-कीर्तन करना आम बात है| क्योंकि हम लोकल ट्रेन को अपनी जिंदगी का एक अहम् हिस्सा मानते है| क्या प्राचीनतम मंदिर पुरातत्व महत्व के नहीं है...... जरुर हैं.... और हम उनमें रोजाना पूजा-पाठ भी करते है...... तो यदि वर्ष में एक या दो बार ताजमहल में नमाज़ अदा कर दी तो एतराज क्यों.......? और यदि यह गैर कानूनी हो तो सरकार से गुजारिश है की वह कार्यवाही करें.........
ये हमारी संस्कृति की उदारता एवं बड़प्पन ही है की हम किसी संस्कृति पर आक्रमण नहीं करते और हमें इस संस्कृति पर गर्व होना चाहिए .... हमारी संस्कृति हमें सभी का सम्मान एवं आदर करना सिखाती है और यदि हम-आप या कोई और इसे हमारी कायरता और कमजोरी समझता है तो नादान है.... लेकिन अगर आप इतिहास देखें तो हम पर भाहरी लोगों ने इसीलिए राज करनें में सफलता पाई क्योंकि तत्कालीन राजा-राजवाडे और शासक आपसी रंजिस और मनमुटाव के चलते उनका मुकाबला एकजुटता से नहीं किया था कुछ तो बदले की भावना से बाहरी ताकत से मिल कर उनका साथ भी दिया..... खैर ये तो इतिहास हो चुका है ..... और ये भी सर्वविदित है की आज भी कुछ ऐसे लोग है जो बाहरी लोगों के बहकावे में या किसी मनमुटाव एवं हीनभावना के तहत आकर बाहरी लोगों को शय देते हैं और उनके इशारे पर देश विरोधी कृत्य को अंजाम देते है......
और मैं आपके बता दूं की यदि कुछ स्वार्थी राजनीतिज्ञ और कट्टरपंथ धर्मगुरु हम लोगों को एकदूसरे के खिलाफ भड़काना और बरगलाना बंद करदें तो भारत देश में भी असीम शांति और भाईचारा बना रह सकेगा, पर यही हमारी बदकिस्मती है की ऐसा तब नहीं हो पायेगा जब तक हर एक नागरिक समझदार एवं जागरुक नहीं हो जाता|
और ये कहावत भी है की जहां चार बर्तन होंगे वहां आवाजें तो होंगी ही.....| और वही हो रहा है..... हमें चाहिए की सभी बर्तनों को करीने से सजाये ना की आपस में टकराने दें.... पर यह क्रांति कौन लाये..............? क्या आप और हम नहीं ला सकते.............? जरूर ला सकते हैं यदि हर एक नागरिक सजग एवं जागरुक हो और जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद एवं धर्मान्धता से ऊपर उठ कर सोचे तो........!!!
सप्रेम, जय हिंद .....
------------------------------ With Best Regards, Dinesh Saroj Desktop Engineer -------------------------------------------------------------- आओ हिंदी में कम्प्युटर सीखें http://learncomputersinhindi.blogspot.com/ --------------------------------------------------------------- मेरी रचनाएँ http://merirachanaein.blogspot.com/ ---------------------------------------------------------------- दिनेश का ब्लाग http://dineshsaroj.blogspot.com/ ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
२७ सितम्बर २००९ २:०८ AM को, mohan bhaya <mohanbh...@gmail.com> ने लिखा:
> प्रिय मित्र , > मैं आपकी बात से सहमत हूँ की किसी हिन्दू ने रेलगाडी में सफ़र किया पर वे > समाचार पत्रों की सुर्खियाँ नहीं बन पाए जानतें हैं क्यों क्यों की उन्होंने > रेलगाडी में आरती नहीं की और न ही पटाखे फोडे न ही रंग गुलाल खेला . जैसा की वे > लोग करते हैं न ही हमने अपनी किसी पुरातात्त्विक महत्व की ईमारत में पूजा पाठ > किया , यदि भारत में रहने वाले अपने को सामान भारतीय मानते हैं तो देश के नियम > को मानने में अन्तेर क्यों ? > यानि की हम नियम नहीं मानेंगे पर केवल अपने को भारतीय मानेगे , और व्यवस्था को > बनाने में सहयोग नहीं करेंगे ? > चलो अच्छा है यही सही . हम तो कहीं कब्जा नहीं करने जातें पर दुसरे हम पर > कब्जा कर जाये तो हम खुश होते है की चलो हम इस लायक तो हैं की कोई हम पर कब्जा > कर सकता है ? हम क्यों विरोध करे और क्यों अपने हिन्दू होने को साबित करें कोई > बुरा मानं गया तो ? किसी को नाराज करना तो हमे आता नहीं हाँ कोई हमें नाराज करे > इस से हमे शांति मिलती है. क्यों की गुलामी ने हमे यही तो सिखाया है न . > कितना अंतर है हम में और दुसरे देश के नागरिको में ., वे अपने देश अपनी भाषा > धर्म के प्रति गंभीर रहते हुए जीवन जीतें हैं तभी वहां वेवस्था बनी रहती है और > प्रगति होती रहती है पर हम एय्सा नहीं कर सके क्या करें हमे किसी ने सिखाया ही > नहीं ? हम तो पता नहीं कब से गुलामी से मुक्त ही नहीं हो पाए केवल प्रदेश वाद > भाषा अंतर में ही अपने आप को उल्जाए रहे? केवल इसी कारण जानतें है थाईलैंड ,
प्रिय दिनेश सरोज जी , आपने मेरे शब्दों को सम्मान दिया उसके लिए धन्यवाद , एक बात की ओर आपका ध्यान चाहूँगा कि जो लोग समाज सेवा या किसी की सेवा का कार्य नहीं करते तो क्या उनसे इस बात की आशा कर सकते हैं कि वे देश सेवा की भावना या देशवासी होने का भाव व्यक्त कर सकते हैं ? या वे कहते कुछ और हैं और करते कुछ और ? आपने कुछ उधाहरण दिए तो वे ठीक हैं पर अगर बहुत सारे में कुछ नाम इस बात को सही बताने के लिए हैं तो क्या उचित है ? क्या इस से आप यह कह कर अपने आप को संतुष्ट करते है कि मैंने सबको खुश कर दिया ?? रही बात मेरी तो मैंने कहा है कि मैंने सभी जाति के स्टूडेंट्स को गाइड किया और करता भी रहा पर जबमैंने देखा कि वे लोग अध्यन के प्रति गंभीर न हो कर अन्य कार्यों में ज्यादा धयान देतें है तो मेरी जगह आप होते तो क्या करते ? इसलिय अ़ब मैं उन्हें कहता हूँ कि उन्हें यहीं अध्यन करना ठीक होगा, क्यांकि यहाँ उन्हें परेशानी नहीं होगी, और अपने धर्म कि दुहाई दे कर पास भी हो जायेंगे और उसके बाद बैंक से लोन ले कर गबन भी कर जायेंगे, तो कोई रोक भी नहीं सकेगा या अपने अल्पसंख्यक होने की दुहाई दे कहीं भी कब्जा करके आराम से जीवन बिता सकते हो ...ये भारत है हम विरोध नहीं करते भले हमारा कोई भी विरोध करें हम बुरा नहीं मानते.. यही तो हमारी संस्कृति है न ... वैसे भी मैं इस बात को सही नहीं मानता कि मेरे कारण दुसरे देश के लोगों को परेशानी हो ? हमे तो आदत है परेशानी में रहने की. हम व्यवस्था में रहने के आदी नहीं है तो हमे हक़ नहीं कि हम दुसरे देश की व्यवस्था को डिस्टर्ब करें ? वैसे मैं संतुष्ट हूँ कि मैं जो काम कर रहा हूँ वो अपने देश के लिय कर रहा हूँ क्योकि भारतीय स्टूडेंट्स विदेशों से न केवल अध्यन करके वापस आयेंगे बल्कि पार्ट टाइम कार्य करके पैसा भी कमाएंगे यानि वे वहां कि अच्छी बातें अच्छी तकनीक भी जानेंगे साथ ही विदेशी करेंसी भी साथ ले कर आयेंगे जो हमारे देश को मजबूत बनाएगी . साथ ही वे हिन्दू वादी भी बनेगे क्योकि वहां जाने से महसूस होता है कि हिन्दू होना और गर्व से अपने आप को हिन्दुस्तानी कहना कितना अच्छा लगता है . यहाँ तो अपने आप को गर्व से हिन्दू कहना कट्टर्तारवादी घोषित करता है , और हम घिर जातें है सम्प्रदाइक ए़कता, सर्व धर्म सम्भाव टाइप की बिना मतलब की बातों से , वैसे आपके पेज में न्यूज़ पेपर के माध्यम से बताया गया है कि कैसे मुसलमानों से नमाज के समय रोड ब्लोक कर दिया था ? और हाँ ताजमहल मुसलमानों की दरगाह या मस्जिद नहीं है वो विश्व के सात अजूबों में एक ईमारत है तो वो किसी धर्म विशेष की नहीं है कि कोई एक वहां नमाज करे च्चाहे एक बार ही क्यों ? मुझे आपकी यह तरफदारी पसंद नहीं आये एय्सा लगा जैसे एक नेता वोट मागने के लिए कुछ लोगों की तरफदारी कर रहा हो ? मेरी समझ में नहीं आता कि इतना भी क्या नरम होना कि अपने देश के गर्व को भी भूल जाएँ ? अपनी अस्मिता , अपनी धरोहर को अपने देश की न समझ कर दूसरों को दे दें ? क्या एय्सा करना किसी भी देश के नागरिक को शोभा देता है ? हमारे देश में दंगों की शुरुआत कौन करता है हिन्दू या मुस्लमान? नकली करेंसी चलाने वालों, रोड के किनारे नकली सी डी बेचने वालों में सबसे ज्यादा किस जाति के लोग हैं कभी आपने देखा है ? इतना सब होने के बाद भी आप कहते हैं हमे उनका आदर करना चाइए? हम खुद जब खुल कर विरोध नहीं कर सकते तो कह देतें हैं कि सरकार या प्रशासन विरोध करे ? क्या एक भारतीय होने के नाते हमारा कर्त्तव्य नहीं है कि पहले हम विरोध करें और प्रशासन का धयान खींचे? आपको एक जानकारी देना चाहूँगा कि वेस्ट बंगाल, उत्तर प्रदेश , बिहार , जमू कश्मीर में जो मुस्लमान रहते हैं वे बांग्लादेश या पाकिस्तान से गैरकानूनी रूप से आने वालों को अपने घरों में ठहरातें हैं उनका नकली राशन कार्ड वोटर कार्ड बन्वातें हैं और फिर वे लोग मिल कर देश में घूम घूम कर अपराध करते है और यहाँ रहने वाले मुस्लमान अपने आप को बेगुनाह बताते हैं ? बताइए इस को आप क्या कहेंगे ? देश भक्ति ? और ये सब वे लोग इसलिए कर पातें हैं क्योंकि उन्हें पता है कि हिन्दू विरोध तो करते नहीं हैं खुल कर चलो इस कमजोरी का लाभ उठातें है और इस देश को अन्दर से खोखला बनातें है ? जय हिंद आपका ही मोहन भया
> मैं आपके कहे इन तर्कों से पूर्णतया सहमत हूँ, हर भारतीय को भारतीयता का > सम्मान एवं आदर सहित पालन करना ही चाहिए.... जो नहीं करते वो यकीनन भारतीय > कहलाने के योग्य नहीं ही हैं....
> और रही बार रेलगाडी में सफ़र की तो मुंबई के लोकल ट्रेन में आप हम हिन्दुओं को > हर त्यौहार बड़ी ही सिद्धत से मानते पाएंगे, बिल्कुल वैसे ही जैसा की कोई अपने > घर में या दफ्तर
में आपके द्वारा कही बातों से पूर्णतया सहमत हूँ, तथा आपने जिन-जिन विषयों पर चिंता जताई है सभी शत-प्रतिशत जायज हैं... परन्तु फिर भी यही कहना चाहूँगा की एक गन्दी मछली के वजह से सारे तालाब को गन्दा कहना अनुचित है..... अब किसी को केवल तालाब की गन्दगी दिखाई दे नकी गन्दी मछली तो इसमे कोई क्या कर सकता है...... यही तो विडम्बना है की अर्जुन दृष्टि से सभी नहीं देख पाते....
जैसा की मैंने आपसे पहले भी कहा था की इस वाद-प्रतिवाद का न तो पहले कभी निष्कर्स निकल पाया है न ही कभी निकलेगा ..... आप के नजरिये से आप सही है.... अपने नजरिये में मैं..... लेकिन मैं आपके द्वारा कहे बातों को भी मनाता हूँ पूरी तरह.... पर उसमें भी मेरा एक नजरिया है जो मैं अब तक बताते आ रहा हूँ....
और मैं समझता हूँ की अब तक मैंने जितना कहना था कह दिया और कुछ कहने की गुन्जाइस नहीं रही,....
मोहन जी, मैंने ये जो भी बातें कहीं या अपना जो भी तर्क रखा वो किसी जमात या व्यक्ती विशेष को खुश रखने के लिए नहीं कहीं, मैंने वो कहा जो मुझे सही लगा जो मैंने अब तक के अपने जीवन में अनुभव किया... और आपके अनुभवों का भी आदर करता हूँ.... और यह खेद भी प्रकट करना चाहूँगा की इस विषय पर इस ग्रुप में केवल आप और मैं ही अपने विचारों का आदान-प्रदान कर रहे हैं, बाकी सभी बन्धु गण जैसे मनो चुप्पी साधे बैठ गए हैं..... कोई बात नहीं वैसे कोई बाध्य भी नहीं है.....
यदि मेरे कहे बातों से कोई आहत हो तो कृपया मुझे नासमझ जान कर क्षमा कर दें, इन्ही बातों के साथ मैं अब इस चर्चा-प्रति चर्चा में अपने पक्ष को समाप्त करता हूँ, और निष्कर्ष आप सभी सज्जन पर छोड़ता हूँ....
अंत में कबीर साहिब की कुछ बातें रखना चाहूँगा....
*कबीरा खडा बाज़ार, मांगे सब की खैर! ना काहु से दोस्ती, ना काहु से बैर!!*
"चलती चक्की देखि के, दिया कबीरा रोय! दुई पाटन के बिच में, साबुत बचिया न कोई!!"
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय, जो मन खोजा आपना, तो मुझसे बुरा न कोई!!
पोती पढ़ी-पढ़ी जग मुआँ, पंडित भया न कोई! ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होई!!
*कबीर यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं! सीस उतारै हाथि धरी, सो पैसे घर माहिं।*
अंत में अपने मन को यह कह कर शांत कर लेता हूँ की, *कबीर साहिब कहते है......
धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय! माली सींचे सौ घडा, ऋतू आये फल होय!!*
*सप्रेम जय हिंद!!!* ------------------------------ With Best Regards, Dinesh Saroj Desktop Engineer ---------------------------------------------- आओ हिंदी में कम्प्युटर सीखें http://learncomputersinhindi.blogspot.com/ --------------------------------------------------------------- मेरी रचनाएँ http://merirachanaein.blogspot.com/ ---------------------------------------------------------------- दिनेश का ब्लाग http://dineshsaroj.blogspot.com/ ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
२७ सितम्बर २००९ २:५८ PM को, mohan bhaya <mohanbh...@gmail.com> ने लिखा:
> प्रिय दिनेश सरोज जी , > आपने मेरे शब्दों को सम्मान दिया उसके लिए धन्यवाद , > एक बात की ओर आपका ध्यान चाहूँगा कि जो लोग समाज सेवा या किसी की सेवा का > कार्य नहीं करते तो क्या उनसे इस बात की आशा कर सकते हैं कि वे देश सेवा की > भावना या देशवासी होने का भाव व्यक्त कर सकते हैं ? या वे कहते कुछ और हैं और > करते कुछ और ? > आपने कुछ उधाहरण दिए तो वे ठीक हैं पर अगर बहुत सारे में कुछ नाम इस बात को > सही बताने के लिए हैं तो क्या उचित है ? क्या इस से आप यह कह कर अपने आप को > संतुष्ट करते है कि मैंने सबको खुश कर दिया ?? > रही बात मेरी तो मैंने कहा है कि मैंने सभी जाति के स्टूडेंट्स को गाइड किया > और करता भी रहा पर जबमैंने देखा कि वे लोग अध्यन के प्रति गंभीर न हो कर अन्य > कार्यों में ज्यादा धयान देतें है तो मेरी जगह आप होते तो क्या करते ? इसलिय > अ़ब मैं उन्हें कहता हूँ कि उन्हें यहीं अध्यन करना ठीक होगा, क्यांकि यहाँ > उन्हें परेशानी नहीं होगी, और अपने धर्म कि दुहाई दे कर पास भी हो जायेंगे और > उसके बाद बैंक से लोन ले कर गबन भी कर जायेंगे, तो कोई रोक भी नहीं सकेगा या > अपने अल्पसंख्यक होने की दुहाई दे कहीं भी कब्जा करके आराम से जीवन बिता सकते > हो ...ये भारत है हम विरोध नहीं करते भले हमारा कोई भी विरोध करें हम बुरा नहीं > मानते.. यही तो हमारी संस्कृति है न ... > वैसे भी मैं इस बात को सही नहीं मानता कि मेरे कारण दुसरे देश के लोगों को > परेशानी हो ? हमे तो आदत है परेशानी में रहने की. हम व्यवस्था में रहने के आदी > नहीं है तो हमे हक़ नहीं कि हम दुसरे देश की व्यवस्था को डिस्टर्ब करें ? > वैसे मैं संतुष्ट हूँ कि मैं जो काम कर रहा हूँ वो अपने देश के लिय कर रहा हूँ > क्योकि भारतीय स्टूडेंट्स विदेशों से न केवल अध्यन करके वापस आयेंगे बल्कि > पार्ट टाइम कार्य करके पैसा भी कमाएंगे यानि वे वहां कि अच्छी बातें अच्छी > तकनीक भी जानेंगे साथ ही विदेशी करेंसी भी साथ ले कर
प्रिय दिनेश सरोज जी, आपने मेरे शब्दों को जो सम्मान दिया उसका धन्यवाद . हम अपनी बहस को आज विजय दशमी के इस पवन अवसर पर समाप्त नहीं विराम देतें हैं क्योंकि यदि हम ही प्रयास नहीं करेंगे मिल कर तो उन लोगों की नींद कैसे खुलेगी जो देश भक्ति , नागरिक भावना , अपने नैतिक कर्त्तव्य के प्रति गंभीर न हो कर उन राजनेताओं की चमचा गिरी और उनके गुणगान में इतना व्यस्त रहतें है कि न तो वे अपने परिवार को ही समय दे पातें है और न ही पुरे मन से धरम को ही , वो एक गीत है न- कभी सुबह तो आएगी सुबह का इन्तेजार कर , मैं गत ८ वर्षों से दुनिया के देश घूम रहा हूँ वहां देश भक्ति , भाषा , नागरिक भावना का जो रूप देखता रहा हूँ उस से मैं प्रभवित तो होता ही हूँ साथ ही भारतीय होने के कारण अपने देश में उनका मूल्य कम होते देख कर मन दुखित तो होता ही है न, इसलिए कोशिश रहती है कि कोई और इस ओर धयान दे या न दे कम से कम मैं तो अपना भारतीय होने का कर्तव्य करता रहूँ ता कि उस के कारण मुझमे जोश तो बना रहे , मैं जीवित होने का अहसास को कर सकूं , चलिए एक बात तो है आपके साथ बात करके अचछा लगा , मैं आपसे आशा करूंगा कि आप सदेव एय्से कार्य करें जिस से आप अपने जीवन में हर वो सफलता , खुशियाँ , सम्मान पाते रहे जिसकी आपने कामना की, सपने देखे, आशाये रखीं हैं. आपको कभी लगे की हम आपस में फ़ोन से बातें करें तो मेरे नम्बर्स हैं- ९४२५२१२०१७ ०७७१ ४०९०९२९ ( ऑफिस ) शेष फिर आपका ही मोहन भया
> में आपके द्वारा कही बातों से पूर्णतया सहमत हूँ, तथा आपने जिन-जिन विषयों पर > चिंता जताई है सभी शत-प्रतिशत जायज हैं... परन्तु फिर भी यही कहना चाहूँगा की > एक गन्दी मछली के वजह से सारे तालाब को गन्दा कहना अनुचित है..... अब किसी को > केवल तालाब की गन्दगी दिखाई दे नकी गन्दी मछली तो इसमे कोई क्या कर सकता > है...... यही तो विडम्बना है की अर्जुन दृष्टि से सभी नहीं देख पाते....
> जैसा की मैंने आपसे पहले भी कहा था की इस वाद-प्रतिवाद का न तो पहले कभी > निष्कर्स निकल पाया है न ही कभी निकलेगा ..... आप के नजरिये से आप सही है.... > अपने नजरिये में मैं..... लेकिन मैं आपके द्वारा कहे बातों को भी मनाता हूँ > पूरी तरह.... पर उसमें भी मेरा एक नजरिया है जो मैं अब तक बताते आ रहा हूँ....
> और मैं समझता हूँ की अब तक मैंने जितना कहना था कह दिया और कुछ कहने की > गुन्जाइस नहीं रही,....
> मोहन जी, मैंने ये जो भी बातें कहीं या अपना जो भी तर्क रखा वो किसी जमात या > व्यक्ती विशेष को खुश रखने के लिए नहीं कहीं, मैंने वो कहा जो मुझे सही लगा जो > मैंने अब तक के अपने जीवन में अनुभव किया... और आपके अनुभवों का भी आदर करता > हूँ.... और यह खेद भी प्रकट करना चाहूँगा की इस विषय पर इस ग्रुप में केवल आप > और मैं ही अपने विचारों का आदान-प्रदान कर रहे हैं, बाकी सभी बन्धु गण जैसे मनो > चुप्पी साधे बैठ गए हैं..... कोई बात नहीं वैसे कोई बाध्य भी नहीं है.....
> यदि मेरे कहे बातों से कोई आहत हो तो कृपया मुझे नासमझ जान कर क्षमा कर दें, > इन्ही बातों के साथ मैं अब इस चर्चा-प्रति चर्चा में अपने पक्ष को समाप्त करता > हूँ, और निष्कर्ष आप सभी सज्जन पर छोड़ता हूँ....
> अंत में कबीर साहिब की कुछ बातें रखना चाहूँगा....
> *कबीरा खडा बाज़ार, > मांगे सब की खैर! > ना काहु से दोस्ती, > ना काहु से बैर!!*
> "चलती चक्की देखि के, > दिया कबीरा रोय! > दुई पाटन के बिच में, > साबुत बचिया न कोई!!"
> बुरा जो देखन मैं चला, > बुरा न मिलया कोय, > जो मन खोजा आपना, > तो मुझसे बुरा न कोई!!
> पोती पढ़ी-पढ़ी जग मुआँ, > पंडित भया न कोई! > ढाई आखर प्रेम का, > पढ़े सो पंडित होई!!
> *कबीर यह घर प्रेम का, > खाला का घर नाहिं! > सीस उतारै हाथि धरी, > सो पैसे घर माहिं।*
> अंत में अपने मन को यह कह कर शांत कर लेता हूँ की, > *कबीर साहिब कहते है......
> धीरे धीरे रे मना, > धीरे सब कुछ होय! > माली सींचे सौ घडा, > ऋतू आये फल होय!!*
> *सप्रेम जय हिंद!!!* > ------------------------------ > With Best Regards, > Dinesh Saroj > Desktop Engineer > ---------------------------------------------- > आओ हिंदी में कम्प्युटर सीखें > http://learncomputersinhindi.blogspot.com/ > --------------------------------------------------------------- > मेरी रचनाएँ > http://merirachanaein.blogspot.com/ > ---------------------------------------------------------------- > दिनेश का ब्लाग > http://dineshsaroj.blogspot.com/ > ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
> २७ सितम्बर २००९ २:५८ PM को, mohan bhaya <mohanbh...@gmail.com> ने लिखा:
> प्रिय दिनेश सरोज जी , >> आपने मेरे शब्दों को सम्मान दिया उसके लिए धन्यवाद , >> एक बात की ओर आपका ध्यान चाहूँगा कि जो लोग समाज सेवा या किसी की सेवा का >> कार्य नहीं करते तो क्या उनसे इस बात की आशा कर सकते हैं कि वे देश सेवा की >> भावना या देशवासी होने का भाव व्यक्त कर सकते हैं ? या वे कहते कुछ और हैं और >> करते कुछ और ? >> आपने कुछ उधाहरण दिए तो
आपके संग हुए संवाद से मुझे भी काफी संतुष्टि हुई है|
प्राचीन समय में भी शाश्त्रार्थ, सत्संग, चर्चा-प्रतिचर्चा इसी उद्देश्य से होते रहे हैं की उनके द्वारा समाज में ज्ञान और आपसी प्रेम का प्रचार-प्रसार हो सके.... और हमारे संवाद ने भी सम्भवत: ऐसा ही कुछ प्रभाव दर्ज किया हो ऐसी उम्मीद करता हूँ| यदि दुनिया का हर इंसान यह बात समझ ले की इंसानियत हर धर्म-मजहब, जाति-पात एवं भेद-भाव से सर्वोपरि है तो संसार में मानवता ही एकमात्र धर्म रह जायेगी... जिससे संसार और भी ज्यादा मोहक एवं सुखी बन जायेगा|
आपने जिस संयम, सहयोग एवं प्रेम से मेरी बातों को ग्रहण किया एवं जिस स्वच्छंदता से उनका प्रतिवाद किया उसके लिए आपका तहे दिल से आभार व्यक्त करता हूँ!!! आशा है की यह चर्चा कभी परवान भी चढेगी..... कहते भी हैं ना..... उम्मीद पर ही तो दुनिया कायम है.....
हरिवंश जी के "मधुशाला" की कुछ पंक्तियाँ .....
मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला, 'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला, अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ - 'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।'।।
चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला! 'दूर अभी है', पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला, हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे, किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।
मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला, हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला, ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का, और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।।
मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला, अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला, बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे, रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।।
सप्रेम, जय हिंद..... ------------------------------ With Best Regards, Dinesh Saroj Desktop Engineer -------------------------------------------------------------- आओ हिंदी में कम्प्युटर सीखें http://learncomputersinhindi.blogspot.com/ --------------------------------------------------------------- मेरी रचनाएँ http://merirachanaein.blogspot.com/ ---------------------------------------------------------------- दिनेश का ब्लाग http://dineshsaroj.blogspot.com/ ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
२८ सितम्बर २००९ १२:५८ PM को, mohan bhaya <mohanbh...@gmail.com> ने लिखा:
> प्रिय दिनेश सरोज जी, > आपने मेरे शब्दों को जो सम्मान दिया उसका धन्यवाद . > हम अपनी बहस को आज विजय दशमी के इस पवन अवसर पर समाप्त नहीं विराम देतें हैं > क्योंकि यदि हम ही प्रयास नहीं करेंगे मिल कर तो उन लोगों की नींद कैसे खुलेगी > जो देश भक्ति , नागरिक भावना , अपने नैतिक कर्त्तव्य के प्रति गंभीर न हो कर उन > राजनेताओं की चमचा गिरी और उनके गुणगान में इतना व्यस्त रहतें है कि न तो वे > अपने परिवार को ही समय दे पातें है और न ही पुरे मन से धरम को ही , > वो एक गीत है न- कभी सुबह तो आएगी सुबह का इन्तेजार कर , > मैं गत ८ वर्षों से दुनिया के देश घूम रहा हूँ वहां देश भक्ति , भाषा , नागरिक > भावना का जो रूप देखता रहा हूँ उस से मैं प्रभवित तो होता ही हूँ साथ ही भारतीय > होने के कारण अपने देश में उनका मूल्य कम होते देख कर मन दुखित तो होता ही है > न, > इसलिए कोशिश रहती है कि कोई और इस ओर धयान दे या न दे कम से कम मैं तो अपना > भारतीय होने का कर्तव्य करता रहूँ ता कि उस के कारण मुझमे जोश तो बना रहे , मैं > जीवित होने का अहसास को कर सकूं , > चलिए एक बात तो है आपके साथ बात करके अचछा लगा , > मैं आपसे आशा करूंगा कि आप सदेव एय्से कार्य करें जिस से आप अपने जीवन में हर > वो सफलता , खुशियाँ , सम्मान पाते रहे जिसकी आपने कामना की, सपने देखे, आशाये > रखीं हैं. > आपको कभी लगे की हम आपस में फ़ोन से बातें करें तो मेरे नम्बर्स हैं- > ९४२५२१२०१७ ०७७१ ४०९०९२९ ( ऑफिस ) > शेष फिर > आपका ही > मोहन भया
> 2009/9/28 Dinesh R Saroj <dineshrsa...@gmail.com>
> माननीय मोहन भया जजी,
>> में आपके द्वारा कही बातों से पूर्णतया सहमत हूँ, तथा आपने जिन-जिन विषयों पर >> चिंता जताई है सभी शत-प्रतिशत जायज हैं... परन्तु फिर भी यही कहना चाहूँगा की >> एक गन्दी मछली के वजह से सारे तालाब को गन्दा कहना अनुचित है..... अब किसी को >> केवल तालाब की गन्दगी दिखाई दे नकी गन्दी मछली तो इसमे कोई क्या कर सकता >> है...... यही तो विडम्बना है की अर्जुन दृष्टि से सभी नहीं देख पाते....
>> जैसा की मैंने आपसे पहले भी कहा था की इस वाद-प्रतिवाद का न तो पहले कभी >> निष्कर्स निकल पाया है न ही कभी निकलेगा ..... आप के नजरिये से आप सही है.... >> अपने नजरिये में मैं..... लेकिन मैं आपके द्वारा कहे बातों को भी मनाता हूँ >> पूरी तरह.... पर उसमें भी मेरा एक नजरिया है जो मैं अब तक बताते आ रहा हूँ....
>> और मैं समझता हूँ की अब तक मैंने जितना कहना था कह दिया और कुछ कहने की >> गुन्जाइस नहीं रही,....
>> मोहन जी, मैंने ये जो भी बातें कहीं या अपना जो भी तर्क रखा वो किसी जमात या >> व्यक्ती विशेष को खुश रखने के लिए नहीं
> आपके संग हुए संवाद से मुझे भी काफी संतुष्टि हुई है|
> प्राचीन समय में भी शाश्त्रार्थ, सत्संग, चर्चा-प्रतिचर्चा इसी उद्देश्य से > होते रहे हैं की उनके द्वारा समाज में ज्ञान और आपसी प्रेम का प्रचार-प्रसार हो > सके.... और हमारे संवाद ने भी सम्भवत: ऐसा ही कुछ प्रभाव दर्ज किया हो ऐसी > उम्मीद करता हूँ| यदि दुनिया का हर इंसान यह बात समझ ले की इंसानियत हर > धर्म-मजहब, जाति-पात एवं भेद-भाव से सर्वोपरि है तो संसार में मानवता ही > एकमात्र धर्म रह जायेगी... जिससे संसार और भी ज्यादा मोहक एवं सुखी बन जायेगा|
> आपने जिस संयम, सहयोग एवं प्रेम से मेरी बातों को ग्रहण किया एवं जिस > स्वच्छंदता से उनका प्रतिवाद किया उसके लिए आपका तहे दिल से आभार व्यक्त करता > हूँ!!! आशा है की यह चर्चा कभी परवान भी चढेगी..... कहते भी हैं ना..... उम्मीद > पर ही तो दुनिया कायम है.....
> हरिवंश जी के "मधुशाला" की कुछ पंक्तियाँ .....
> मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला, > 'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला, > अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ - > 'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।'।।
> चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला! > 'दूर अभी है', पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला, > हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे, > किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।
> मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला, > हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला, > ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का, > और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।।
> मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला, > अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला, > बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे, > रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।।
> सप्रेम, > जय हिंद..... > ------------------------------ > With Best Regards, > Dinesh Saroj > Desktop Engineer > -------------------------------------------------------------- > आओ हिंदी में कम्प्युटर सीखें > http://learncomputersinhindi.blogspot.com/ > --------------------------------------------------------------- > मेरी रचनाएँ > http://merirachanaein.blogspot.com/ > ---------------------------------------------------------------- > दिनेश का ब्लाग > http://dineshsaroj.blogspot.com/ > ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
> २८ सितम्बर २००९ १२:५८ PM को, mohan bhaya <mohanbh...@gmail.com> ने लिखा:
> प्रिय दिनेश सरोज जी, >> आपने मेरे शब्दों को जो सम्मान दिया उसका धन्यवाद . >> हम अपनी बहस को आज विजय दशमी के इस पवन अवसर पर समाप्त नहीं विराम देतें हैं >> क्योंकि यदि हम ही प्रयास नहीं करेंगे मिल कर तो उन लोगों की नींद कैसे खुलेगी >> जो देश भक्ति , नागरिक भावना , अपने नैतिक कर्त्तव्य के प्रति गंभीर न हो कर उन >> राजनेताओं की चमचा गिरी और उनके गुणगान में इतना व्यस्त रहतें है कि न तो वे >> अपने परिवार को ही समय दे पातें है और न ही पुरे मन से धरम को ही , >> वो एक गीत है न- कभी सुबह तो आएगी सुबह का इन्तेजार कर , >> मैं गत ८ वर्षों से दुनिया के देश घूम रहा हूँ वहां देश भक्ति , भाषा , >> नागरिक भावना का जो रूप देखता रहा हूँ उस से मैं प्रभवित तो होता ही हूँ साथ ही >> भारतीय होने के कारण अपने देश में उनका मूल्य कम होते देख कर मन दुखित तो होता >> ही है न, >> इसलिए कोशिश रहती है कि कोई और इस ओर धयान दे या न दे कम से कम मैं तो अपना >> भारतीय होने का कर्तव्य करता रहूँ ता कि उस के कारण मुझमे जोश तो बना रहे , मैं >> जीवित होने का अहसास को कर सकूं , >> चलिए एक बात तो है आपके साथ बात करके अचछा लगा , >> मैं आपसे आशा करूंगा कि आप सदेव एय्से कार्य करें जिस से आप अपने जीवन में हर >> वो सफलता , खुशियाँ , सम्मान पाते रहे जिसकी आपने कामना की, सपने देखे, आशाये >> रखीं हैं. >> आपको कभी लगे की हम आपस में फ़ोन से बातें करें तो मेरे नम्बर्स हैं- >> ९४२५२१२०१७ ०७७१ ४०९०९२९ ( ऑफिस ) >> शेष फिर >> आपका ही >> मोहन भया
>> 2009/9/28 Dinesh R Saroj <dineshrsa...@gmail.com>