बोनसाई पिता पिता ने वषों नाईट शिफ्ट करके बनाये थे पैसे और ली थी एक कट्ठा जमीन, पिता जाते थे - दौरे पर बचाते थे पैसे खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट...... पिता ने कर्ज लिए थे , ऑफिस से सवारी और घर अग्रिम के खाते में फिर खड़ी की थी दीवारें, पिता ने बेच दिए थे माँ के गहने माँ हो गई थी क्षत-विक्षत इस प्रकार ढली थी छत, पिता बैठे हैं उसी घर के बाहर जिनके लिए कोई भी कमरा खाली नहीं है, पिता सोते हैं ओसारे में चरमराती चारपाई पर पिते हैं बीडियां बकते हैं गालियाँ चिडचिडे हो गए हैं इन दिनों माँ भी नहीं रही अब खड़ी हो गई है दीवारें कमरों के बिच बेटे सिर झुकाए अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते हैं छोटी बहु सोचती है आज बडकी/मझली /संझली कोई न कोई दो रोटी दे ही देंगी पिता को कल ही तो उसने दी थी आज फिर ....ना बाबा ना ..... मेरे भी तो..... घर नहीं रह गया पिता का पिता नहीं रह गए बेटों के कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ इसी जीवन यात्रा में.... ताड़ के रिश्ते तले बोनसाई हो गया पिता विजय रंजन
VIJAI JI BAHUT SUNDER KAVITA LEKHI HAI. AAP NE.
DEL KO CHU GAI,
DARD HAI, PEEDA HAI,AAJ KE SAMAY KI SAHI DASTAN HAI.
SACH AAP BADHAI KE PATRA HAIN.
PADEEP SRIVASTAVA
NIZAMABAD A.P.
www.paryatan.mywebdunia.com
> बोनसाई > पिता > पिता ने > वषों नाईट शिफ्ट करके > बनाये थे पैसे > और ली थी एक कट्ठा जमीन, > पिता जाते थे - दौरे पर > बचाते थे पैसे > खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट...... > पिता ने कर्ज लिए थे , > ऑफिस से > सवारी और घर अग्रिम के खाते में > फिर खड़ी की थी दीवारें, > पिता ने > बेच दिए थे माँ के गहने > माँ हो गई थी क्षत-विक्षत > इस प्रकार ढली थी छत, > पिता > बैठे हैं उसी घर के बाहर > जिनके लिए कोई भी कमरा > खाली नहीं है, > पिता सोते हैं ओसारे में > चरमराती चारपाई पर > पिते हैं बीडियां > बकते हैं गालियाँ > चिडचिडे हो गए हैं इन दिनों > माँ भी नहीं रही अब > खड़ी हो गई है दीवारें कमरों के बिच > बेटे सिर झुकाए > अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते हैं > छोटी बहु सोचती है > आज बडकी/मझली /संझली > कोई न कोई > दो रोटी दे ही देंगी पिता को > कल ही तो उसने दी थी > आज फिर ....ना बाबा ना ..... > मेरे भी तो..... > घर नहीं रह गया पिता का > पिता नहीं रह गए बेटों के > कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ > इसी जीवन यात्रा में.... > ताड़ के रिश्ते तले > बोनसाई हो गया पिता > विजय रंजन
Bahut bahut Achchi kavita likhi he aapne ek ek shabd me Mata- Pita ka dard kut-kut kar bhara he .....
Aap aisi hi jamane ki sachchai Kavita ke roop me likhte rahe aur hame bhejiye hamari subhkamnaye aapke sath he.........
Dhanyavad....
Thanks & Regards,
DIPAKKUMAR,
09328180551
--- On Sat, 6/20/09, Arun Kumar Jha <wgm...@gmail.com> wrote:
From: Arun Kumar Jha <wgm...@gmail.com>
Subject: [Hindi Bhasha] bonsai kavita
To: hindibhasha@googlegroups.com
Date: Saturday, June 20, 2009, 8:12 PM
बोनसाई
पिता
पिता ने
वषों नाईट शिफ्ट करके
बनाये थे पैसे
और ली थी एक कट्ठा जमीन,
पिता जाते थे - दौरे पर
बचाते थे पैसे
खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट......
पिता ने कर्ज लिए थे ,
ऑफिस से
सवारी और घर अग्रिम के खाते में
फिर खड़ी की थी दीवारें,
पिता ने
बेच दिए थे माँ के गहने
माँ हो गई थी क्षत-विक्षत
इस प्रकार ढली थी छत,
पिता
बैठे हैं उसी घर के बाहर
जिनके लिए कोई भी कमरा
खाली नहीं है,
पिता सोते हैं ओसारे में
चरमराती चारपाई पर
पिते हैं बीडियां
बकते हैं गालियाँ
चिडचिडे हो गए हैं इन दिनों
माँ भी नहीं रही अब
खड़ी हो गई है दीवारें कमरों के बिच
बेटे सिर झुकाए
अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते हैं
छोटी बहु सोचती है
आज बडकी/मझली /संझली
कोई न कोई
दो रोटी दे ही देंगी पिता को
कल ही तो उसने दी थी
आज फिर ....ना बाबा ना .....
मेरे भी तो.....
घर नहीं रह गया पिता का
पिता नहीं रह गए बेटों के
कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ
इसी जीवन यात्रा में....
ताड़ के रिश्ते तले
बोनसाई हो गया पिता
विजय रंजन
प्रदीप जी नमस्कार बोनसाई कविता अच्छी लगी- यह कविता की सफलता है, और आप के जैसे पारखी पाठक की कृपा है, कि थोडा बहुत लिख लेता हूँ. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद विजय रंजन श्रीवास्तव
नमस्कार , बोनसाई पिता इस वास्तविक और मार्मिक रचना के लिए -धन्यवाद स्वामि श्री परम चेतनानन्द जी (स्वमि श्री जी ) प्रवर्तक:नटराजक्रिया योग २१ जून २००९ ०१:४२ को, Arun Kumar Jha <wgm...@gmail.com> ने लिखा:
> बोनसाई पिता पिता ने > वषों नाईट शिफ्ट करके > बनाये थे पैसे > और ली थी एक कट्ठा जमीन, > पिता जाते थे - दौरे पर > बचाते थे पैसे > खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट...... > पिता ने कर्ज लिए थे , > ऑफिस से > सवारी और घर अग्रिम के खाते में > फिर खड़ी की थी दीवारें, > पिता ने > बेच दिए थे माँ के गहने > माँ हो गई थी क्षत-विक्षत > इस प्रकार ढली थी छत, > पिता > बैठे हैं उसी घर के बाहर > जिनके लिए कोई भी कमरा > खाली नहीं है, > पिता सोते हैं ओसारे में > चरमराती चारपाई पर > पिते हैं बीडियां > बकते हैं गालियाँ > चिडचिडे हो गए हैं इन दिनों > माँ भी नहीं रही अब > खड़ी हो गई है दीवारें कमरों के बिच > बेटे सिर झुकाए > अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते हैं > छोटी बहु सोचती है > आज बडकी/मझली /संझली > कोई न कोई > दो रोटी दे ही देंगी पिता को > कल ही तो उसने दी थी > आज फिर ....ना बाबा ना ..... > मेरे भी तो..... > घर नहीं रह गया पिता का > पिता नहीं रह गए बेटों के > कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ > इसी जीवन यात्रा में.... > ताड़ के रिश्ते तले > बोनसाई हो गया पिता > विजय रंजन
> नमस्कार , > बोनसाई पिता > इस वास्तविक और मार्मिक रचना के लिए > -धन्यवाद > स्वामि श्री परम चेतनानन्द जी (स्वमि श्री जी ) > प्रवर्तक:नटराजक्रिया योग > २१ जून २००९ ०१:४२ को, Arun Kumar Jha <wgm...@gmail.com> ने लिखा:
> बोनसाई पिता पिता ने >> वषों नाईट शिफ्ट करके >> बनाये थे पैसे >> और ली थी एक कट्ठा जमीन, >> पिता जाते थे - दौरे पर >> बचाते थे पैसे >> खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट...... >> पिता ने कर्ज लिए थे , >> ऑफिस से >> सवारी और घर अग्रिम के खाते में >> फिर खड़ी की थी दीवारें, >> पिता ने >> बेच दिए थे माँ के गहने >> माँ हो गई थी क्षत-विक्षत >> इस प्रकार ढली थी छत, >> पिता >> बैठे हैं उसी घर के बाहर >> जिनके लिए कोई भी कमरा >> खाली नहीं है, >> पिता सोते हैं ओसारे में >> चरमराती चारपाई पर >> पिते हैं बीडियां >> बकते हैं गालियाँ >> चिडचिडे हो गए हैं इन दिनों >> माँ भी नहीं रही अब >> खड़ी हो गई है दीवारें कमरों के बिच >> बेटे सिर झुकाए >> अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते हैं >> छोटी बहु सोचती है >> आज बडकी/मझली /संझली >> कोई न कोई >> दो रोटी दे ही देंगी पिता को >> कल ही तो उसने दी थी >> आज फिर ....ना बाबा ना ..... >> मेरे भी तो..... >> घर नहीं रह गया पिता का >> पिता नहीं रह गए बेटों के >> कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ >> इसी जीवन यात्रा में.... >> ताड़ के रिश्ते तले >> बोनसाई हो गया पिता >> विजय रंजन
> मीनाक्षी जी नमस्कार आको मेरी कविता बोनसाई अच्छी लगी. बहुत-बहुत धन्यवाद् , > आप जैसे पाठक से ही तो प्रेरणा लेकर मैं लिख पाता हूँ. भविष्य में भी ऐसे > सुन्दर रचना दूंगा. > विजय रंजन
मीनाक्षी जी नमस्कार आको मेरी कविता बोनसाई अच्छी लगी. बहुत-बहुत धन्यवाद् , आप जैसे पाठक से ही तो प्रेरणा लेकर मैं लिख पाता हूँ. भविष्य में भी ऐसे सुन्दर रचना दूंगा. विजय रंजन
> 2009/6/22 (swami shree ji ) swami shree param chetana nand ji < > natarajkriya...@gmail.com>
> नमस्कार , >> बोनसाई पिता >> इस वास्तविक और मार्मिक रचना के लिए >> -धन्यवाद >> स्वामि श्री परम चेतनानन्द जी (स्वमि श्री जी ) >> प्रवर्तक:नटराजक्रिया योग >> २१ जून २००९ ०१:४२ को, Arun Kumar Jha <wgm...@gmail.com> ने लिखा:
>> बोनसाई पिता पिता ने >>> वषों नाईट शिफ्ट करके >>> बनाये थे पैसे >>> और ली थी एक कट्ठा जमीन, >>> पिता जाते थे - दौरे पर >>> बचाते थे पैसे >>> खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट...... >>> पिता ने कर्ज लिए थे , >>> ऑफिस से >>> सवारी और घर अग्रिम के खाते में >>> फिर खड़ी की थी दीवारें, >>> पिता ने >>> बेच दिए थे माँ के गहने >>> माँ हो गई थी क्षत-विक्षत >>> इस प्रकार ढली थी छत, >>> पिता >>> बैठे हैं उसी घर के बाहर >>> जिनके लिए कोई भी कमरा >>> खाली नहीं है, >>> पिता सोते हैं ओसारे में >>> चरमराती चारपाई पर >>> पिते हैं बीडियां >>> बकते हैं गालियाँ >>> चिडचिडे हो गए हैं इन दिनों >>> माँ भी नहीं रही अब >>> खड़ी हो गई है दीवारें कमरों के बिच >>> बेटे सिर झुकाए >>> अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते हैं >>> छोटी बहु सोचती है >>> आज बडकी/मझली /संझली >>> कोई न कोई >>> दो रोटी दे ही देंगी पिता को >>> कल ही तो उसने दी थी >>> आज फिर ....ना बाबा ना ..... >>> मेरे भी तो..... >>> घर नहीं रह गया पिता का >>> पिता नहीं रह गए बेटों के >>> कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ >>> इसी जीवन यात्रा में.... >>> ताड़ के रिश्ते तले >>> बोनसाई हो गया पिता >>> विजय रंजन
-- मित्रवर, आप से निवेदन है कि कृपया इस रचना पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दे।
> बोनसाई पिता पिता ने > वषों नाईट शिफ्ट करके > बनाये थे पैसे > और ली थी एक कट्ठा जमीन, > पिता जाते थे - दौरे पर > बचाते थे पैसे > खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट...... > पिता ने कर्ज लिए थे , > ऑफिस से > सवारी और घर अग्रिम के खाते में > फिर खड़ी की थी दीवारें, > पिता ने > बेच दिए थे माँ के गहने > माँ हो गई थी क्षत-विक्षत > इस प्रकार ढली थी छत, > पिता > बैठे हैं उसी घर के बाहर > जिनके लिए कोई भी कमरा > खाली नहीं है, > पिता सोते हैं ओसारे में > चरमराती चारपाई पर > पिते हैं बीडियां > बकते हैं गालियाँ > चिडचिडे हो गए हैं इन दिनों > माँ भी नहीं रही अब > खड़ी हो गई है दीवारें कमरों के बिच > बेटे सिर झुकाए > अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते हैं > छोटी बहु सोचती है > आज बडकी/मझली /संझली > कोई न कोई > दो रोटी दे ही देंगी पिता को > कल ही तो उसने दी थी > आज फिर ....ना बाबा ना ..... > मेरे भी तो..... > घर नहीं रह गया पिता का > पिता नहीं रह गए बेटों के > कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ > इसी जीवन यात्रा में.... > ताड़ के रिश्ते तले > बोनसाई हो गया पिता > विजय रंजन
--~--~---------~--~----~------------~-------~--~----~ कृपया हिन्दी कविताओं को देवनागरी में टंकणित करने का प्रयास करें। यदि आप नये हैं तो http://uninagari.kaulonline.com टूल को आजमायें। हिन्दी में लेखन आपके हिन्दी प्रेम का द्योतक है।
>> बोनसाई पिता पिता ने >> वषों नाईट शिफ्ट करके >> बनाये थे पैसे >> और ली थी एक कट्ठा जमीन, >> पिता जाते थे - दौरे पर >> बचाते थे पैसे >> खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट...... >> पिता ने कर्ज लिए थे , >> ऑफिस से >> सवारी और घर अग्रिम के खाते में >> फिर खड़ी की थी दीवारें, >> पिता ने >> बेच दिए थे माँ के गहने >> माँ हो गई थी क्षत-विक्षत >> इस प्रकार ढली थी छत, >> पिता >> बैठे हैं उसी घर के बाहर >> जिनके लिए कोई भी कमरा >> खाली नहीं है, >> पिता सोते हैं ओसारे में >> चरमराती चारपाई पर >> पिते हैं बीडियां >> बकते हैं गालियाँ >> चिडचिडे हो गए हैं इन दिनों >> माँ भी नहीं रही अब >> खड़ी हो गई है दीवारें कमरों के बिच >> बेटे सिर झुकाए >> अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते हैं >> छोटी बहु सोचती है >> आज बडकी/मझली /संझली >> कोई न कोई >> दो रोटी दे ही देंगी पिता को >> कल ही तो उसने दी थी >> आज फिर ....ना बाबा ना ..... >> मेरे भी तो..... >> घर नहीं रह गया पिता का >> पिता नहीं रह गए बेटों के >> कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ >> इसी जीवन यात्रा में.... >> ताड़ के रिश्ते तले >> बोनसाई हो गया पिता >> विजय रंजन
पिता ने वषों नाईट शिफ्ट करके बनाये थे पैसे और ली थी एक कट्ठा जमीन, पिता जाते थे - दौरे पर बचाते थे पैसे खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट......पिता ने कर्ज लिए थे , ऑफिस से सवारी और घर अग्रिम के खाते में फिर खड़ी की थी दीवारें, पिता ने बेच दिए थे माँ के गहने माँ हो गई थी क्षत-विक्षत इस प्रकार ढली थी छत, पिता बैठे हैं उसी घर के बाहर जिनके लिए कोई भी कमरा खाली नहीं है, पिता सोते हैं ओसारे में चरमराती चारपाई पर पिते हैं बीडियां बकते हैं गालियाँ चिडचिडे हो गए हैं इन दिनों माँ भी नहीं रही अबखड़ी हो गई है दीवारें कमरों के बिच
बेटे सिर झुकाए अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते हैं
छोटी बहु सोचती है आज बडकी/मझली /संझली कोई न कोई दो रोटी दे ही देंगी पिता को कल ही तो उसने दी थी आज फिर ....ना बाबा ना .....मेरे भी तो..... घर नहीं रह गया पिता कापिता नहीं रह गए बेटों के
कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ इसी जीवन यात्रा में....
ताड़ के रिश्ते तलेबोनसाई हो गया पिता विजय रंजन
> बोनसाई पिता पिता ने > वषों नाईट शिफ्ट करके > बनाये थे पैसे > और ली थी एक कट्ठा जमीन, > पिता जाते थे - दौरे पर > बचाते थे पैसे > खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट...... > पिता ने कर्ज लिए थे , > ऑफिस से > सवारी और घर अग्रिम के खाते में > फिर खड़ी की थी दीवारें, > पिता ने > बेच दिए थे माँ के गहने > माँ हो गई थी क्षत-विक्षत > इस प्रकार ढली थी छत, > पिता > बैठे हैं उसी घर के बाहर > जिनके लिए कोई भी कमरा > खाली नहीं है, > पिता सोते हैं ओसारे में > चरमराती चारपाई पर > पिते हैं बीडियां > बकते हैं गालियाँ > चिडचिडे हो गए हैं इन दिनों > माँ भी नहीं रही अब > खड़ी हो गई है दीवारें कमरों के बिच > बेटे सिर झुकाए > अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते हैं > छोटी बहु सोचती है > आज बडकी/मझली /संझली > कोई न कोई > दो रोटी दे ही देंगी पिता को > कल ही तो उसने दी थी > आज फिर ....ना बाबा ना ..... > मेरे भी तो..... > घर नहीं रह गया पिता का > पिता नहीं रह गए बेटों के > कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ > इसी जीवन यात्रा में.... > ताड़ के रिश्ते तले > बोनसाई हो गया पिता > विजय रंजन
> बोनसाई पिता पिता ने > वषों नाईट शिफ्ट करके > बनाये थे पैसे > और ली थी एक कट्ठा जमीन, > पिता जाते थे - दौरे पर > बचाते थे पैसे > खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट...... > पिता ने कर्ज लिए थे , > ऑफिस से > सवारी और घर अग्रिम के खाते में > फिर खड़ी की थी दीवारें, > पिता ने > बेच दिए थे माँ के गहने > माँ हो गई थी क्षत-विक्षत > इस प्रकार ढली थी छत, > पिता > बैठे हैं उसी घर के बाहर > जिनके लिए कोई भी कमरा > खाली नहीं है, > पिता सोते हैं ओसारे में > चरमराती चारपाई पर > पिते हैं बीडियां > बकते हैं गालियाँ > चिडचिडे हो गए हैं इन दिनों > माँ भी नहीं रही अब > खड़ी हो गई है दीवारें कमरों के बिच > बेटे सिर झुकाए > अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते हैं > छोटी बहु सोचती है > आज बडकी/मझली /संझली > कोई न कोई > दो रोटी दे ही देंगी पिता को > कल ही तो उसने दी थी > आज फिर ....ना बाबा ना ..... > मेरे भी तो..... > घर नहीं रह गया पिता का > पिता नहीं रह गए बेटों के > कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ > इसी जीवन यात्रा में.... > ताड़ के रिश्ते तले > बोनसाई हो गया पिता > विजय रंजन
--- On Mon, 6/22/09, kavyadhara team <kavyadharat...@gmail.com> wrote:
From: kavyadhara team <kavyadharat...@gmail.com>
Subject: [Hindi Bhasha] Re: bonsai kavita
To: hindibhasha@googlegroups.com
Date: Monday, June 22, 2009, 9:39 AM
2009/6/22 (swami shree ji ) swami shree param chetana nand ji <natarajkriya...@gmail.com>
नमस्कार ,
बोनसाई पिता इस वास्तविक और मार्मिक रचना के लिए -धन्यवाद स्वामि श्री परम चेतनानन्द जी (स्वमि श्री जी )
प्रवर्तक:नटराजक्रिया योग
२१ जून २००९ ०१:४२ को, Arun Kumar Jha <wgm...@gmail.com> ने लिखा:
बोनसाई पिता पिता ने
वषों नाईट शिफ्ट करके
बनाये थे पैसे
और ली थी एक कट्ठा जमीन,
पिता जाते थे - दौरे पर
बचाते थे पैसे
खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट......
पिता ने कर्ज लिए थे ,
ऑफिस से
सवारी और घर अग्रिम के खाते में
फिर खड़ी की थी दीवारें,
पिता ने
बेच दिए थे माँ के गहने
माँ हो गई थी क्षत-विक्षत
इस प्रकार ढली थी छत,
पिता
बैठे हैं उसी घर के बाहर
जिनके लिए कोई भी कमरा
खाली नहीं है,
पिता सोते हैं ओसारे में
चरमराती चारपाई पर
पिते हैं बीडियां
बकते हैं गालियाँ
चिडचिडे हो गए हैं इन दिनों
माँ भी नहीं रही अब
खड़ी हो गई है दीवारें कमरों के बिच
बेटे सिर झुकाए
अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते हैं
छोटी बहु सोचती है
आज बडकी/मझली /संझली
कोई न कोई
दो रोटी दे ही देंगी पिता को
कल ही तो उसने दी थी
आज फिर ....ना बाबा ना .....
मेरे भी तो.....
घर नहीं रह गया पिता का
पिता नहीं रह गए बेटों के
कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ
इसी जीवन यात्रा में....
ताड़ के रिश्ते तले
बोनसाई हो गया पिता
विजय रंजन
> --- On *Mon, 6/22/09, kavyadhara team <kavyadharat...@gmail.com>* wrote:
> From: kavyadhara team <kavyadharat...@gmail.com> > Subject: [Hindi Bhasha] Re: bonsai kavita > To: hindibhasha@googlegroups.com > Date: Monday, June 22, 2009, 9:39 AM
> 2009/6/22 (swami shree ji ) swami shree param chetana nand ji < > natarajkriya...@gmail.com<http://us.mc464.mail.yahoo.com/mc/compose?to=natarajkriya...@gmail.com>
>> नमस्कार , >> बोनसाई पिता >> इस वास्तविक और मार्मिक रचना के लिए >> -धन्यवाद >> स्वामि श्री परम चेतनानन्द जी (स्वमि श्री जी ) >> प्रवर्तक:नटराजक्रिया योग >> २१ जून २००९ ०१:४२ को, Arun Kumar Jha <wgm...@gmail.com<http://us.mc464.mail.yahoo.com/mc/compose?to=wgm...@gmail.com> >> > ने लिखा:
>> बोनसाई पिता पिता ने >>> वषों नाईट शिफ्ट करके >>> बनाये थे पैसे >>> और ली थी एक कट्ठा जमीन, >>> पिता जाते थे - दौरे पर >>> बचाते थे पैसे >>> खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट...... >>> पिता ने कर्ज लिए थे , >>> ऑफिस से >>> सवारी और घर अग्रिम के खाते में >>> फिर खड़ी की थी दीवारें, >>> पिता ने >>> बेच दिए थे माँ के गहने >>> माँ हो गई थी क्षत-विक्षत >>> इस प्रकार ढली थी छत, >>> पिता >>> बैठे हैं उसी घर के बाहर >>> जिनके लिए कोई भी कमरा >>> खाली नहीं है, >>> पिता सोते हैं ओसारे में >>> चरमराती चारपाई पर >>> पिते हैं बीडियां >>> बकते हैं गालियाँ >>> चिडचिडे हो गए हैं इन दिनों >>> माँ भी नहीं रही अब >>> खड़ी हो गई है दीवारें कमरों के बिच >>> बेटे सिर झुकाए >>> अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते हैं >>> छोटी बहु सोचती है >>> आज बडकी/मझली /संझली >>> कोई न कोई >>> दो रोटी दे ही देंगी पिता को >>> कल ही तो उसने दी थी >>> आज फिर ....ना बाबा ना ..... >>> मेरे भी तो..... >>> घर नहीं रह गया पिता का >>> पिता नहीं रह गए बेटों के >>> कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ >>> इसी जीवन यात्रा में.... >>> ताड़ के रिश्ते तले >>> बोनसाई हो गया पिता >>> विजय रंजन
सर जी ! आपकी रचना तो हमको बहुत अच्छी लगी बड़ी मार्मिक है आपने आजकल के परिवेश में जो हो रहा है उसकी हकीकत बयां कि है. हमको यह रचना बहुत अच्छी लगी. हम भी कुछ लिखते है कभी- कभी. कृपया आप हमारा मार्गदर्शन करें. क्या आप बोनसाई का मतलब बता सकते है. हमको यह समझ में नहीं आया है प्लीज़ ....................
२१ जून २००९ ०१:४२ को, Arun Kumar Jha <wgm...@gmail.com> ने लिखा:
> बोनसाई पिता पिता ने > वषों नाईट शिफ्ट करके > बनाये थे पैसे > और ली थी एक कट्ठा जमीन, > पिता जाते थे - दौरे पर > बचाते थे पैसे > खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट...... > पिता ने कर्ज लिए थे , > ऑफिस से > सवारी और घर अग्रिम के खाते में > फिर खड़ी की थी दीवारें, > पिता ने > बेच दिए थे माँ के गहने > माँ हो गई थी क्षत-विक्षत > इस प्रकार ढली थी छत, > पिता > बैठे हैं उसी घर के बाहर > जिनके लिए कोई भी कमरा > खाली नहीं है, > पिता सोते हैं ओसारे में > चरमराती चारपाई पर > पिते हैं बीडियां > बकते हैं गालियाँ > चिडचिडे हो गए हैं इन दिनों > माँ भी नहीं रही अब > खड़ी हो गई है दीवारें कमरों के बिच > बेटे सिर झुकाए > अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते हैं > छोटी बहु सोचती है > आज बडकी/मझली /संझली > कोई न कोई > दो रोटी दे ही देंगी पिता को > कल ही तो उसने दी थी > आज फिर ....ना बाबा ना ..... > मेरे भी तो..... > घर नहीं रह गया पिता का > पिता नहीं रह गए बेटों के > कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ > इसी जीवन यात्रा में.... > ताड़ के रिश्ते तले > बोनसाई हो गया पिता > विजय रंजन
dipak kumar ji bonsai ka aapne matalab puchha hai. BONSAI jo samanay bhasha men kisi ke aakar ko uske vastweek roop se chhota krna ya karte rahna mana gaya hai. aur kritrim roop se kisi ko kat-chhant kar bauna bana dena bhi mana gaya hai, isi bhaw bhoomi par aadharit hai, bonsai kavita.
--- On Thu, 6/25/09, meenakshi nimodia <meenakshi.nimo...@gmail.com> wrote:
From: meenakshi nimodia <meenakshi.nimo...@gmail.com>
Subject: [Hindi Bhasha] Re: bonsai kavita
To: hindibhasha@googlegroups.com
Date: Thursday, June 25, 2009, 5:18 AM
bonsai ka matlab hota hai chhota. kisi vastu ka chhota roop.
On 6/24/09, dipakkumar Nainwal <dipakkumar.nain...@yahoo.com> wrote:
बोनसाई ka matlab kya hota he dosto ....?
Thanks & Regards,
DIPAKKUMAR,
09328180551
--- On Mon, 6/22/09, kavyadhara team <kavyadharat...@gmail.com> wrote:
From: kavyadhara team <kavyadharat...@gmail.com>
Subject: [Hindi Bhasha] Re: bonsai kavita
To: hindibhasha@googlegroups.com
Date: Monday, June 22, 2009, 9:39 AM
2009/6/22 (swami shree ji ) swami shree param chetana nand ji <natarajkriya...@gmail.com>
नमस्कार ,
बोनसाई पिता इस वास्तविक और मार्मिक रचना के लिए -धन्यवाद स्वामि श्री परम चेतनानन्द जी (स्वमि श्री जी )
प्रवर्तक:नटराजक्रिया योग
२१ जून २००९ ०१:४२ को, Arun Kumar Jha <wgm...@gmail.com> ने लिखा:
बोनसाई पिता पिता ने
वषों नाईट शिफ्ट करके
बनाये थे पैसे
और ली थी एक कट्ठा जमीन,
पिता जाते थे - दौरे पर
बचाते थे पैसे
खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट......
पिता ने कर्ज लिए थे ,
ऑफिस से
सवारी और घर अग्रिम के खाते में
फिर खड़ी की थी दीवारें,
पिता ने
बेच दिए थे माँ के गहने
माँ हो गई थी क्षत-विक्षत
इस प्रकार ढली थी छत,
पिता
बैठे हैं उसी घर के बाहर
जिनके लिए कोई भी कमरा
खाली नहीं है,
पिता सोते हैं ओसारे में
चरमराती चारपाई पर
पिते हैं बीडियां
बकते हैं गालियाँ
चिडचिडे हो गए हैं इन दिनों
माँ भी नहीं रही अब
खड़ी हो गई है दीवारें कमरों के बिच
बेटे सिर झुकाए
अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते हैं
छोटी बहु सोचती है
आज बडकी/मझली /संझली
कोई न कोई
दो रोटी दे ही देंगी पिता को
कल ही तो उसने दी थी
आज फिर ....ना बाबा ना .....
मेरे भी तो.....
घर नहीं रह गया पिता का
पिता नहीं रह गए बेटों के
कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ
इसी जीवन यात्रा में....
ताड़ के रिश्ते तले
बोनसाई हो गया पिता
विजय रंजन
--- On Wed, 6/24/09, Arun Kumar Jha <wgm...@gmail.com> wrote:
From: Arun Kumar Jha <wgm...@gmail.com>
Subject: [Hindi Bhasha] Re: bonsai kavita
To: hindibhasha@googlegroups.com
Date: Wednesday, June 24, 2009, 5:10 PM
dipak kumar ji bonsai ka aapne matalab puchha hai. BONSAI jo samanay
bhasha men kisi ke aakar ko uske vastweek roop se chhota krna ya karte
rahna mana gaya hai. aur kritrim roop se kisi ko kat-chhant kar bauna
bana dena bhi mana gaya hai, isi bhaw bhoomi par aadharit hai, bonsai
kavita.