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एक व्यंग : एक ग़ज़ल की मौत ......
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anand pathak  
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 More options Jun 21, 12:14 pm
From: anand pathak <akpathak3...@gmail.com>
Date: Sun, 21 Jun 2009 21:44:25 +0530
Local: Sun, Jun 21 2009 12:14 pm
Subject: एक व्यंग : एक ग़ज़ल की मौत ......

एक व्यंग : एक ग़ज़ल की मौत ......
 विवाहित कवियों को जो एक सुविधा सर्वदा उपलब्ध रहती है और अविवाहित कवियों को
नहीं - वह है एक अदद श्रोता | और वह श्रोता होती है उनकी श्रीमती जी -अभागिन|
अभागिन इसलिए कि वह हमारे जैसे चिरकुट  कवि की धर्मपत्नी होती है | अगर वह किसी
हवलदार की पत्नी होती तो वह हमसे ज्यादा ही कमा कर लाता | इसीलिए वह आजीवन अपने
भाग्य को कोसती रहती हैं | एक वह दिन कि  आज का दिन |वह तो विधि का विधान था कि
इस कलम घिसुए कवि से शादी हुई | कौन मिटा सकता है इसे.!हर कवि की  आदि श्रोता
वही होती है और अंतिम श्रोता भी वही -बेचारी |उधर किसी गीत का मुखडा बना नहीं
कि कवि महोदय के पेट में प्रसव-पीडा शुरू हो जाती है- कब सुनाए ,किसे सुनाए |उस
समय तो कोई मिलता है नहीं अत: पत्नी को ही आवाज़ लगाते हैं -'अरे !  भाग्यवान  !
इधर तो आना एक गीत सुनाता हूँ -

  'रोटी कपडा और मकान
  कवियों का इस से काम
 रोटी कपडा और मकान "

 'बोलो कैसी लगी ?'- कवि महोदय ने समर्थन माँगा
  पत्नी इस कविता का अर्थ नहीं ,मर्म समझती है -अपना निठ्ठ्ल्लापन ढांप रहा है
यह आदमी.जल्दी रसोई घर में भागती है .तवे पर रोटी छोड़ कर आई थी. रोटी पलटनी थी
. देखा रोटी जल गई . सोचती है -क्या जला?  रोटी ,दिल या अपना भाग्य? इनकी कविता
सुनते-सुनते | काश ! कि हम बहरे होते |
     ऐसी ही एक प्रसव-पीडा एक कवि जी को रात २ बजे हुई कि सोती हुई पत्नी को
जगा कर एक अंतरा सुनाने की चेष्टा की थी.पत्नी ने उनके मुख पर तकिया रख कर दबा
दिया फिर सारे अंतरा-मुखडा सुप्त हो गए |कहते हैं कि वह  एक
विदुषी महिला थीं |
    परन्तु अविवाहित कवियों को  एक जो सुविधा सर्वदा उपलब्ध होती है वह विवाहित
कवियों को आजीवन उपलब्ध नहीं होती . चाहें तो वाजपेई जी से पूछ सकते हैं | और
वह सुविधा है रात्रि शयन में खाट से उतरना| अविवाहित कवि स्वेच्छा से जिस तरफ
से चाहें उतर सकता है | वह स्वतंत्र है |  स्वतंत्र लेखन करता है| यह
स्वतंत्रता विवाहित कवियों को नहीं है | यही कारण है की विवाहित कवि या तो
'वाम-पंथी' विचारधारा के होते हैं या फिर 'दक्षिण-पंथी' विचारधारा के होते है |
जो खाट से उतरते ही नहीं वह 'निठ्ठल्ले" कवि होते हैं -नाम बताऊँ?
    मगर शायरों की बात अलग है. एक बार ऐसा ही जच्चा वाला दर्द मुझे भी हुआ था .
शे'र बाहर आने के लिए कुलांचे मार रहा था' 'मतला' हो गया (मिचली नहीं)
.सोचा नई ग़ज़ल है .बेगम को  सुनाते है -
                   तुमको न हो यकीं मगर मुझको यकीन है
                    रहता है दिल में  कोई तुझ-सा मकीन है
 'यह यकीन कौन है?कोई कमीन तो नहीं ? -बेगम ने शक की निगाह से पूछा
दिलखुश हो गया. चलो एक लफ्ज़ तो ऐसा लिखा जिसका मायने इन्हें नहीं मालूम.
वज़नदार शे'र वही जिसका न तासीर समझ में आये न अल्फाज़ .लगता है शे"र अच्छा बना
है| मैंने बड़े प्यार से समझाया- 'मकीन माने जो घर में रहता है मकान वाला
-उर्दू में मकीन बोलते हैं . उन्हें मेरे उर्दू की जानकारी पर फक्र हुआ हो या न
हुआ हो मगर शुबहा ज़रूर हो गया की हो न हो मेरे दिल में उनके अलावा और भी कोई
रहता है .मेरा कहीं लफडा ज़रूर है
  यकायक चिल्ला उठी - मुझे तो पहले से ही यकीन था की ज़रूर तुम्हारा कहीं लफडा
है | आपा ठीक ही कहती थी कि ये शायर बड़े रोमानी आशिकाना मिजाज़ के होते हैं
.इश्किया शायरी की आड़ में क्या क्या गुल खिलाते है | ज़रा इन पर कड़ी नज़र
रखना | लगता है आपा ने ठीक ही कहा  था
' बेगम तुम औरतों के दिमाग में बस एक ही बात घूमती रहती है  अरे! इस शे'र का
मतलब समझो ,शे'र का वज़न देखो -शायर कहना चाहता है की या अल्लाह ,परवरदिगार मेरे
,आप को  यकीन हो न हो परन्तु हमें पूरा यकीन है की मेरे दिल में आप की मानिंद
एक साया इधर भी रहता है |
अभी मैं समझा ही रहा था की बेगम साहिबा बीच में ही चीख उठी -" चुप रहिए! हमें
चराने की कोशिश न कीजिए .हम वो  बकरियां नहीं कि आप चराएं और हम चर जाएँ. आप
क्या समझते हैं की हमे आप की नियत नहीं मालूम !,नज़र किधर है नहीं मालूम !हमे सब
मालूम्हें .अरे! यह शायर  लिखते तो  है अपने उस 'छमक-छल्लो' के लिए और नाम लेते
है 'खुदा' का . अल्लाह का > अरे कमज़र्फ़ आदमी !शर्म नहीं आती परवरदिगार को बीच
में लाने पर.
" कौन है वह?'-उन्होंने गुस्से में आँख तरेरते हुए पूछा
'कौन? -मैंने सकपकाते हुए पूछा
' अरे! वही कलमुंही ,मकीन,कमीन यकीन जो भी नाम हो उसका जो तुम्हारे दिलमें
दिल-ओ-जान से रहती है ?'
'लाहौल विला कूवत. लानत है तुम्हारी समझदारी पर '
'हाँ हाँ !अब तो लानत भेजोगे ही मुझ पर| जब शादी कर के लाए थे तब लानत नहीं
भेजी थी '
'बेगम साहिबा ! तुम तो समझती ही नहीं  '
'हाँ हाँ अब मैं क्यों समझने लगूं. तुम क्या समझते हो कि हमें शे'र समझने की
तमीज नहीं !अरे! हमने भी कमेस्ट्री से एम० ए० किया है हम ने भी हाई स्कूल तक
हिंदी पढ़ी है .खूब समझती हूँ तुम्हारी ग़ज़ल और ग़ज़ल की ...

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Ratan Jain  
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 More options Jun 21, 9:41 pm
From: Ratan Jain <marwaridig...@gmail.com>
Date: Mon, 22 Jun 2009 07:11:40 +0530
Local: Sun, Jun 21 2009 9:41 pm
Subject: Re: [Hindi Bhasha] एक व्यंग : एक ग़ज़ल की मौत ......
Anandji, Aapka vyang padha.Ajkal lekhan chaturya aur bhasha madhurya
kafi age badh gaya hai. kripya anyatha n le, main apse kafi bada hu
isliye sujhav de raha hun. kamsekam shabdo me adhik se adhik likhne ka
prayas kare to apko lekhan ko achchha manch milega.Ratan Jain

2009/6/21 anand pathak <akpathak3...@gmail.com>:

...

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परमजीत सिहँ बाली  
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 More options Jun 22, 7:35 am
From: परमजीत सिहँ बाली <paramjitb...@gmail.com>
Date: Mon, 22 Jun 2009 17:05:27 +0530
Local: Mon, Jun 22 2009 7:35 am
Subject: Re: [Hindi Bhasha] Re: एक व्यंग : एक ग़ज़ल की मौत ......

बहुत अच्छा लगा आपका यह व्यंग्य।धन्यवाद।

२२ जून २००९ ०७:११ को, Ratan Jain <marwaridig...@gmail.com> ने लिखा:

...

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