बंजारानामा - 'नज़ीर' अकबराबादी

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Vijay Anant

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Sep 25, 2009, 7:51:41 AM9/25/09
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ये   धूम-धड़क्का   साथ   लिये    क्यों   फिरता  है   जंगल-जंगल

इक  तिनका  साथ न  जावेगा  मौक़ूफ़  हुआ  जब अन्न  और जल

घर-बार  अटारी  चौपारी   क्या  ख़ासा,  नैनसुख  और  मलमल

क्या चिलमन, परदे,  फ़र्श नए  क्या  लाल पलंग  और रंग-महल

                 सब ठाठ पड़ा रह जावेगा  जब लाद चलेगा बंजारा

 

कुछ   काम      आवेगा    तेरे    ये    लालो-ज़मर्रुद   सीमो-ज़र

जब   पूंजी   बाट  में   बिखरेगी   हर  आन   बनेगी   जान  ऊपर

नौबत,  नक़्क़ारे,  बान,  निशां,  दौलत,  हशमत,  फ़ौजें,  लशकर

क्या मसनद, तकिया, मुल्क मकां,  क्या चौकी, कुर्सी, तख़्त, छतर

                  सब ठाठ पड़ा रह जावेगा  जब लाद चलेगा बंजारा
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मौक़ूफ़ - बंद, लालो-ज़मर्रुद - लाल और पुखराज, सीमो-ज़र - चांदी-सोना

 

 

--

दीन-दुखियों की सेवा करो। भगवान के सेवकों की सेवा ही भगवान की सच्ची भक्ति है।

विजय अनन्त, अनन्त सेवाश्रम, 788, सेक्टर 16, पंचकूला, चंडीगढ़,

+919815900159,  http://vijayanant.blogspot.com

 

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BANJAARANAAMA - NAZIR AKBARABAADI.pdf
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