> चारा - (कविता) - पंकज त्रिवेदी
> एडमिशन,
> पढाई,
> नौकरी...
> सबा जगह डालना पङता है चारा
> सुबह से छोटी सी मछली को कांटे में चारा
> बनाकर बैठा
> इन्सान
> इंतजार करता है बड़ी मछली के शिकार
> का...
> शाम ढली
> निराश होकर देखा लौटते हुए
> एक मछुआरा जाल पूरी भर
> मछलिया लेकर निकला
> तब
> एक जेन्तलमेन अफ़सर की
> गिरतारी होती है बिन-अधिकृत
> मिलाकत के लिए...
> फजीहत के बाद निर्दोष बारी हुए
> अफ़सर के
> छोटे से कारकुन, बुजदिल परिवार और
> प्रतिष्ठा को दांव पर रखकर
> चार दीवारों के एक्वेरियम में
> तद्फड़ता है...
> व्हेल मछली सागर की विशाल
> गहराई को नज़रंदाज़ करके
> तैरती है
> मौज से... !
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