नारायण प्रसाद जी --
On Jun 2, 5:48 pm, narayan prasad <hin...@gmail.com> wrote:
> अगर अपना कहा तुम आप ही समझे, तो क्या समझे ?
> मज़ा कहने का तब है, जब एक कहे, दूसरा समझे ।
> ज़ुबाँ मीर लिखे और कलाम सौदा समझे ।
> मगर इनका कहा ये आप समझें या ख़ुदा समझे ।
> [ग़ालिब के वक़्त के नवाब आग़ा ख़ान अश्क का शेर]
इन पंक्तियों को अंग्रेजी में अनूदित करने के क़ाबिल तो शायद मैं नहीं
हूँ, मगर हाँ, जैसे ये ऊपर दर्ज हैं, इनमें कुछ तरमीम की आवश्यकता है.
आपकी इजाज़त से नीचे इनका दुरुस्त रूप लिख रहा हूँ --
अगर अपना कहा तुम आप ही समझे तो क्या समझे
मज़ा कहने का तब है, इक कहे और दूसरा समझे
ज़बान-ए-मीर समझे और ज़बान-ए-मीरज़ा समझे
मगर इनका कहा ये आप समझे या ख़ुदा समझे
उर्दू में इस कविता-रूप को "क़िता" (=[कटा हुआ] हिस्सा, टुकड़ा) कहते हैं.
'शेर' उसूलन दो (और केवल दो) पंक्तियों से बनता है.
मेरी जानकारी के अनुसार, यह क़िता हकीम आग़ा जान 'ऐश' का कहा हुआ है, और
इसमें 'ऐश' ग़ालिब की मुश्किल-पसंद शायरी का ज़िक्र कर रहे हैं, कि जनाब
ऐसी भी शायरी करने से क्या फ़ायदा जिसे ख़ुद शेर कहनेवाले के सिवा और कोई
समझ ही न पाए. यहाँ 'मीर' और 'मीरज़ा' से मुराद क्रमशः मीर तक़ी 'मीर' और
मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी 'सौदा' से है -- 'ऐश' कह रहे हैं कि इन दोनों की
शायरी समझने में तो कोई दिक़्क़त नहीं पेश आती, लेकिन ग़ालिब की बातें ...
-UVR.