[BST] swadeshi kaal maan padhati

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rohit sharma

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May 25, 2010, 12:18:44 AM5/25/10
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काल ही मनुष्य के सुख -दुःख जीवन -मरण ,लोक -परलोक , एवं उत्थान -पतन का नियामक होता है |
काल ही से मनुष्य उत्पन्न होकर उसी में लीन हो जाता है-
"काल: सृजति भूतानि काल: संहरते प्रजा: |"

काल के दो रूप कहे जा सकते हैं | एक अनादी ,अनंत एवं असीम महाकाल है |वह कितना बड़ा है ? गिना नहीं जा सकता | विश्वोत्पति से पूर्व भी इसका अस्तित्व था ,और भविष्य में भी सर्वदा रहेगा |
काल का दूसरा रूप सगुनात्मक एवं व्यवहार योग्य हैं | सगुनाताम्क काल (समय )का आधार सूर्य ही है | यह काल सूर्य के वश चक्रवत परिवर्तित होता रहता हैं -
"चक्रवत परिवर्तते काल : सुर्यवाशात ||"
काल के दो रूप कहे जा सकते हैं | एक अनादी ,अनंत एवं असीम महाकाल है |वह कितना बड़ा है ? गिना नहीं जा सकता | विश्वोत्पति से पूर्व भी इसका अस्तित्व था ,और भविष्य में भी सर्वदा रहेगा |

मानव जीवन को नियमित एवं सुव्यवस्थित रूप निर्धारण करने के लिए ही हमारे पूर्वाचार्यों ने व्यवहारिक 'काल मान ' का प्रणयन किया है

व्यवहारिक रूप में 'वर्षमान' की सूक्ष्मतम इकाई को क्षण , विपल या सैकिंड कहते हैं लेकिन भारतीय काल मान पद्धति मीन तीन (३ )निमेष का एक क्षण होता है | निमेष -पलक झपकने में जितना समय लगता है , उसे निमेष कहते हैं | वर्तमान में २४ घंटे की दिन रात होती है | लेकिन प्राचीन समय में ६० घटी की दिन रात होती थी | सूर्योदय से दिन शुरू होता था और सूर्योदय पर ही समाप्त होता था | इसके महत्व को आप इसे जान कर तथा उपयोग करके ही समझ सकतें हैं | बाबाजी कब हम भारतीय काल मान पद्धति को व्यवहार में लायेंगे ? क्या आप इसके महत्व को अबोध भारतियों को नहीं बताएँगे ? क्षमा करें किन्तु मैं आप से पूछना चाहता हूँ कि आप स्वदेशी कि बात करतें हैं और आप टाइम सिस्टम कौन सा अपना रहे हैं ?
क्या वर्तमान टाइम सिस्टम भारतीय है ?
आप इस पर बात क्यूँ नहीं करते ? कृपया मुझ अबोध पर कृपा करें | बार बार मेरे मन में ये बात आती है |

आप सभी भारतियों से मेरी बिनती है कि आप इस बात को बाबा तक पहुंचाये |

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Prakriti (A call to return to the nature)

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May 25, 2010, 3:06:34 AM5/25/10
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भाई रोहित जी के उठाये गए प्रश्न का मैं समर्थन करता हूँ. हमें सब कुछ स्वदेशी चाहिए


राकेश चन्द्र


2010/5/25 rohit sharma <rohitsh...@gmail.com>



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Thanks and Regards,

Prakriti
(A call to return to the nature)

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DD Sharma

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May 25, 2010, 5:21:31 AM5/25/10
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भाई रोहित जी !
आपकी बात सही है लेकिन मेरे विचार से अभी हमको उन बातों को प्राथमिकता देनी है जिस से देश का और देश के लोगों का नुकशान हो रहा है ! टाइम सिस्टम तो बाद में भी बदला जा सकता है ! इस से किसी का अहित नहीं हो रहा है ! सबसे पहले हम लोगों की प्राथमिकता सत्ता परिवर्तन की होनी चाहिए ! इसके बाद ही सारी व्यवस्था परिवर्तन हो सकती है !
धन्यवाद
भवदीय
डी डी शर्मा
 


2010/5/25 rohit sharma <rohitsh...@gmail.com>

dinesh rathore

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May 25, 2010, 6:42:39 AM5/25/10
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सबसे पहले हम लोगों की प्राथमिकता सत्ता परिवर्तन की होनी चाहिए ! इसके
बाद ही सारी व्यवस्था परिवर्तन हो सकती है !

rohit sharma

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May 25, 2010, 6:57:28 AM5/25/10
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डी डी  शर्मा जी
                       टाइम सिस्टम विदेशी रहेगा तो आप भाषा हिंदी कैसे बोलेंगे ?
शायद आप भूल चुके हैं कि नेहरु ने हिंदी को प्रयोग में लाने पर ऐसा ही कहा था | अभी आजादी चाहिए बाद में हिंदी का देख लेंगें
आप टाइम को कम मत आंकिये | वर्तमान में जो टाइम सिस्टम का प्रयोग आप कर रहे हैं वो आपकी सोच का अहित कर रहा है आपके गर्व को ख़त्म कर रहा है | आप में पूर्ण स्वदेशी वाली बात नहीं दिखाती | आप वर्तमान नेतायों कि तरह सम्जौतों पे यकीं रखतें हैं |
                                                                       आप ढोते रहिये अंग्रेजो के टाइम सिस्टम को जो बिलकुल गलत है जिसमे रात के १२ बजे सुबह हो जाती है |
नया दिन रात को शुरू हो जाता है जो टाइम को मोटे मोटे तौर पर लेते हैं जिनका टाइम का आधार निराधार है |

2010/5/25 DD Sharma <sharm...@gmail.com>

Gopal Krishna

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May 25, 2010, 2:59:52 PM5/25/10
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अरे बंधु, संपूर्ण संसार की विरासत हमारी ही तो है| जो विचार या तकनीक ज्यादा उपयोगी हो, उसे अपनाना है| देश-प्रेम का मतलब यह थोड़े है कि दुसरे देश के चिंतकों का योगदान अपनाना कोई गलत बात हो जाएगी| फिर भी यदि किसी चीज़ को भारतवासियों को अपनाने के लिए प्रेरित ही करना है तो हमें तर्कपूर्वक यह साबित करना होगा कि हमारा विचार ज्यादा उपयोगी है| क्या आप भारतीय और वर्तमान  समय-पद्धति के बीच  तुलनात्मक विश्लेषण कर यह साबित करने की कोशिश करेंगे कि इन दोनों के क्या फायदें और कमियां हैं और किस प्रकार भारतीय समय-पद्धति वर्तमान  समय-पद्धति से ज्यादा उपयोगी है? मुझे वर्तमान  समय-पद्धति में कोई बड़ी खामी नहीं दिखाई देती है| रात १२ बजे दिन बदल जाता है तो इसमें तकलीफ कि क्या बात है - यह तो एक मानक मात्र है| व्यक्ति के लिए दिन ४ बजे या जब भी वह जागे,  शुरू हो सकता है|
 
किसी भी नयी पद्धति को व्यापक स्तर पर अपनाने में काफी उर्जा लगती है| अतः काफी समझदारी की आवश्यकता है| और जब बहुत सारे लक्ष्य हों, तब हमें उनके पारस्परिक महत्व के आधार पर कुछ लक्ष्यों को पहले पाने की चेष्टा करनी चाहिए| अभी तो भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी, अपराध-नियंत्रण, जनसँख्या नियंत्रण आदि पर सबसे ज्यादा ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है| बिना इस समझदारी के दिखाए, सफलता मिलने की सम्भावना घट जाती है  - राजनीति में परिवर्तन करना महापुरुषों के लिए भी आसान नहीं होता, पूरा इतिहास इस बात की गवाही देता है| यह संसार नैतिकता से ज्यादा कर्म-बल से चलता है| यदि अच्छे लोगों की योजनाओं और परिश्रम में बुद्धि और युक्ति का अभाव होगा, तो उन्हें भी मुहँ की खानी पड़ती है| इन बिन्दुओं पर नम्रतापूर्वक विचार करें|   
 
धन्यवाद| 
आपका बंधु,
गोपाल
 

 
2010/5/25 rohit sharma <rohitsh...@gmail.com>



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Thoughtless awareness: the ultimate peace of mind - learn about it more here http://gopal4mission.wordpress.com/2007/12/29/thoughtless-awareness-faq-on-basic-concepts

Dinesh Verma

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May 28, 2010, 11:02:35 AM5/28/10
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Dear all Members

I fully support the point of view of Sri Gopal ji

Regards
Dinesh Verma


2010/5/26 Gopal Krishna <gopalkrish...@gmail.com>
अरे बंधु, संपूर्ण संसार की विरासत हमारी ही तो है| जो विचार या तकनीक ज्यादा उपयोगी हो, उसे अपनाना है| देश-प्रेम का मतलब यह थोड़े है कि दुसरे देश के चिंतकों का योगदान अपनाना कोई गलत बात हो जाएगी| फिर भी यदि किसी चीज़ को भारतवासियों को अपनाने के लिए प्रेरित ही करना है तो हमें तर्कपूर्वक यह साबित करना होगा कि हमारा विचार ज्यादा उपयोगी है| क्या आप भारतीय और वर्तमान  समय-पद्धति के बीच  तुलनात्मक विश्लेषण कर यह साबित करने की कोशिश करेंगे कि इन दोनों के क्या फायदें और कमियां हैं और किस प्रकार भारतीय समय-पद्धति वर्तमान  समय-पद्धति से ज्यादा उपयोगी है? मुझे वर्तमान  समय-पद्धति में कोई बड़ी खामी नहीं दिखाई देती है| रात १२ बजे दिन बदल जाता है तो इसमें तकलीफ कि क्या बात है - यह तो एक मानक मात्र है| व्यक्ति के लिए दिन ४ बजे या जब भी वह जागे,  शुरू हो सकता है|
 
किसी भी नयी पद्धति को व्यापक स्तर पर अपनाने में काफी उर्जा लगती है| अतः काफी समझदारी की आवश्यकता है| और जब बहुत सारे लक्ष्य हों, तब हमें उनके पारस्परिक महत्व के आधार पर कुछ लक्ष्यों को पहले पाने की चेष्टा करनी चाहिए| अभी तो भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी, अपराध-नियंत्रण, जनसँख्या नियंत्रण आदि पर सबसे ज्यादा ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है| बिना इस समझदारी के दिखाए, सफलता मिलने की सम्भावना घट जाती है  - राजनीति में परिवर्तन करना महापुरुषों के लिए भी आसान नहीं होता, पूरा इतिहास इस बात की गवाही देता है| यह संसार नैतिकता से ज्यादा कर्म-बल से चलता है| यदि अच्छे लोगों की योजनाओं और परिश्रम में बुद्धि और युक्ति का अभाव होगा, तो उन्हें भी मुहँ की खानी पड़ती है| इन बिन्दुओं पर नम्रतापूर्वक विचार करें|   

Prakriti (A call to return to the nature)

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May 30, 2010, 9:33:21 AM5/30/10
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बंधू गोपाल जी,

आपके विचार अवसरवादी लगे. नैतिकता के बिना कर्म बल और विचारों के बिना कर्म हमें गर्त में ले जायगा. आज यही तो हो रहा है जिसके खिलाफ भारत स्वाभिमान आन्दोलन चलाने की आवश्यकता है.

अगर आपकी मानें तो होर्लिक्स पीने में, शराब पीने में, सिगरेट पीने में, व्यभिचार में भी कोई बुराई नहीं है. है क्या?

धन्यवाद्,

राकेश


2010/5/26 Gopal Krishna <gopalkrish...@gmail.com>



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Gopal Krishna

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May 30, 2010, 1:48:03 PM5/30/10
to bharatswab...@googlegroups.com
राकेश  भाई,
 
आपने मेरी बातों का कुछ अलग मतलब निकाल लिया| मेरे इन मंतव्यों
किसी भी नयी पद्धति को व्यापक स्तर पर अपनाने में काफी उर्जा लगती है| अतः काफी समझदारी की आवश्यकता है| और जब बहुत सारे लक्ष्य हों, तब हमें उनके पारस्परिक महत्व के आधार पर कुछ लक्ष्यों को पहले पाने की चेष्टा करनी चाहिए| अभी तो भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी, अपराध-नियंत्रण, जनसँख्या नियंत्रण आदि पर सबसे ज्यादा ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है| बिना इस समझदारी के दिखाए, सफलता मिलने की सम्भावना घट जाती है  - राजनीति में परिवर्तन करना महापुरुषों के लिए भी आसान नहीं होता, पूरा इतिहास इस बात की गवाही देता है| यह संसार नैतिकता से ज्यादा कर्म-बल से चलता है| यदि अच्छे लोगों की योजनाओं और परिश्रम में बुद्धि और युक्ति का अभाव होगा, तो उन्हें भी मुहँ की खानी पड़ती है| इन बिन्दुओं पर नम्रतापूर्वक विचार करें|
का किसी भी दृष्टिकोण से यह मतलब नहीं है कि हमें नैतिकता को महत्व नहीं देना चाहिए| इसका मतलब सिर्फ सूझबूझ के साथ योजना बना कर काम करने का है| कर्म का नियम बहुत जटिल है| कितने जन्मों का कर्म-फल हमें भुगतना पड़ता है| अपने विचार, वाणी और कर्म को सात्त्विक बनाना ही परम धर्म है| हमें छह विकृतियों पर विजय पानी होगी या कम से कम उन्हें मर्यादा की सीमा में बाँधना होगा - काम (सभी प्रकार के इंद्रिय-सुख), क्रोध, लोभ, मद (अहंकार), मोह और मत्सर्य (इर्ष्या)| यही हमारी आतंरिक नैतिकता है| और हमारी सामाजिक नैतिकता है समाज (या मानवता) के हितों को अपने व्यक्तिगत एवं पारिवारिक हितों से हमेशा ज्यादा महत्व देना और जब भी आवश्यकता पड़े, ख़ुशीपूर्वक  अपने व्यक्तिगत एवं पारिवारिक हितों का समाज के लिए त्याग कर देना| हम सभी को अपनी तरफ से इन सिद्धांतो  के प्रति पूर्ण भक्ति दिखाने की कोशिश करनी चाहिए||
 
कृपया जमीनी संगठन बनाने पर जोड़ दें (खास कर भारत में रहने वाले साथीगण) | औरंगजेब को परास्त  करने के लिए शिवाजी और गुरु गोविन्द  सिंह जी को मजबूत संगठन की आवश्यकता पड़ी थी, केवल नैतिकता से विजय नहीं मिलती| धीरज, सतत परिश्रम और दृढ संकल्प बल के सहारे ही  धर्म के योद्धा  विजयश्री पा सकते हैं|   
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