अंकल! अंकल! "चिट्ठा विश्व" कैसा दिखता था?

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Debashish

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Oct 23, 2007, 7:30:38 AM10/23/07
to Chithakar
श्रीश ने मुझसे कई बार पूछा है कि हिन्दी चिट्ठा संसार का पहला पहल
एग्रीगेटर "चिट्ठा विश्व" कैसा दिखता था उन्हें नहीं पता। उनके समान अनके
लोगों ने शायद इस जालस्थल का नाम सुना हो पर देखा न हो।

चिट्ठा विश्व http://www.myjavaserver.com/~hindi/ पूर्णतः हैंडब्लेंडेड
जावा कोड पर आधारित था, इसमें किसी विजेट या बने बनाये कोड का प्रयोग
नहीं किया गया (नहीं हो सकता था)। डेटा रखने हेतु इसमें किसी प्रकार के
डेटाबेस का नहीं बल्कि रिसोर्ज़ बंडल का प्रयोग किया गया। माईजावासर्वर
तथा ब्लॉगडिग्गर की मुफ्त सुविधा पर निर्भर ये सेवा ज़ाहिर तौर पर धीमी
थी। नारद के जन्म के बाद ये ठप्प सा पड़ गया और फिर माईजावासर्वर की कृपा
से बंद। इसमें चिट्ठाकारों के प्रोफाईल, ब्लॉगजगत के आँकड़ें, रोचक तथ्य
और टैगक्लाउड जैसी सुविधायें थीँ। नेपाली, मराठी व गुजराती जैसी अन्य
भारतीय भाषाओं को जोड़ने की योजना भी थी। विगत एक साल से ये जालस्थल बंद
था क्योंकि जावालॉबी ने इस मुफ्त सेवा को सड़ने के लिये छोड़ रखा था, किसी
नेकदिल ने शायद पुनः पैबंद लगा कर इसे चालू कर दिया। साईडबार पर लगे
चिट्ठों की सूची में पहले सभी चिट्ठों के नाम होते थे, जिसे चिट्ठों की
लगातार बढ़ती संख्या के कारण अब कर पाना असंभव है। ये सूची अविनाश के
मुहल्ला पर काफी दिन चलती भी रही, माईजावासर्वर पर कुछ कंपाईल्ड जेएसपी
भली भाँति चल जाया करती थीं।

माईजावासर्वर के पुनः शुरु होने की खबर मुझे अप्रत्यक्ष रूप से मीनाक्षी
से मिली जिन्होंने "शब्दनिधी" http://shabdnidhi.debashish.com की
प्रशंसा की। माईजावासर्वर पर ही स्थापित शब्दनिधी भी काफी दिनों से काम
नहीं करती थी।

चिट्ठाविश्व को दुबारा चालू करने की मेरी कोई योजना नहीं है। ये अद्यतन
नहीं होता अतः इसमें जोड़ने के लिये अपनी साईटें न भेजें। इस खत का
उद्देश्य केवल रुचि रखने वाले मित्रों को ये बताना था कि चिट्ठा विश्व
कैसा दिखता था ये इस साईट से जीवंत रूप में देख सकते हैं। इस नाते ये बस
अब एक संग्रहालय में रखा एक डिस्पले भर है :)

आपका

देबाशीष

Pankaj Bengani

unread,
Oct 23, 2007, 7:36:17 AM10/23/07
to Chit...@googlegroups.com
आपका यह मास्टर पीश या अब शो केस मे सजी कलाकृति कईयों के लिए प्रेरणास्रोत रही है. आपको साधुवाद. :)
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Pankaj Bengani
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Shrish Sharma

unread,
Oct 24, 2007, 9:19:39 AM10/24/07
to Chit...@googlegroups.com

वाह देबु दा, पुराने दिनों की याद ताजा हो गई। उन दिनों मैं हिन्दी चिट्ठाजगत में आया ही था तथा इसका स्वरुप समझ ही रहा था। उन्हीं दिनों दो-चार बार चिट्ठा-विश्व देखा था। आज फिर से इसको जीवन्त देखकर बहुत आनन्द आया।

सचमुच चिट्ठा-विश्व उस समय के लिहाज से बहुत एडवांस एग्रीगेटर था। पंकज भाई ने सही कहा कि आपका यह मास्टरपीस नए एग्रीगेटरों के लिए प्रेरणास्रोत है।

फिलहाल मैं चिट्ठा-विश्व पर कच्चा चिट्ठा स्तम्भ का आनन्द ले रहा हूँ। :)

On 10/23/07, Debashish <deba...@gmail.com> wrote:
If u can't beat them, join them.

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Dr Amar Kumar

unread,
Oct 25, 2007, 5:48:44 PM10/25/07
to Chit...@googlegroups.com
 
वाह साहब,
भला आप कौन होते हैं,फ़तवा देने वाले?
ठीक है, आप इतिहास रचने में साझीदार रहें हैं, किंतु हमको उस संघर्षशील अतीत में झांकने से क्योंकर रोक सकते हैं ?
कल को आप कहेंगे, इतिहास न पढ़ो आज़ के लिये अप्रासंगिक है ! हम तो नहीं मानने वाले.
मुंहजोरी के लिये माफ़ी . मैं तो आपका मेल आधे में ही छोड़ कर पूरी सईटिया घूम फिर आया हूं.
साधुवाद !
अमर

 
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