हिन्दी को बेहतर बनाये

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Rajesh Roshan

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Jun 27, 2008, 6:59:20 AM6/27/08
to chithakar

आदरणीय शास्त्री जी का कहना है, हिन्दी के नए शब्द गढे जाने चाहिए, इसके बजाये कि हम अंग्रेजी के शब्द उपयोग में लाये. गढ़ने तक मैं सहमत हू. लेकिन उपयोग और प्रयोग एक निजी मामला है. किसी और कड़ी में न जाकर इस कड़ी में अपनी राय या विचार प्रकट करे. मैं किसी भी भाषा को नदी के माफिक मानता हू, जो अपना रास्ता ख़ुद तय करती है.

ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी में हर साल हरेक भाषा से कई ऐसे शब्द जोड़े जाते हैं. हिन्दी का आलू और टोपी आज इंग्लिश डिक्शनरी का हिस्सा है.

हम भारतीय इंग्लिश से इतना क्यों खौफ खाते हैं?? ऐसा क्यों लगता है कि इंग्लिश पीपल का पेड़ है जो अपने सामने किसी और को उगने नही देगा?

इस कड़ी में हम बात कर सकते हैं. देबू दा कुछ नही कहेगे.

--
Rajesh Roshan
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Pankaj Bengani

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Jun 27, 2008, 7:22:55 AM6/27/08
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मैं भी वही कह रहा हुँ हिन्दी मे अजीब से और कठीन लगने वाले शब्द जैसे कि जालोपलब्ध जैसे शब्द गढने से अच्छा अंग्रेजी के शब्द अपना लिए जाएँ.

इसमे हर्ज क्या है.

देखिए सीधी सी बात है, हमने रोटी बनाई , अंग्रेज ने नहीं बनाई, तो अंग्रेज ने रोटी शब्द को अपना लिया. हमने रेल नही बनाई तो रेल शब्द हिन्दी मे अपना लेने से क्या बिगड गया? क्या लोहपतगामिनी गढना जरूरी है.

पित्ज़ा को पित्ज़ा ही कहेंगे अब हिन्दी बनाने जाएँगे क्या?

इसलिए अमुक शब्द अगर अंग्रेजी मे हैं तो रहने दीजिए ना, हिन्दी को इससे कोई अहित होने वाला नहीं है. वे लोग हमारे शब्द अपनाते हैं तो हम फुले नहीं समाते ... तो उनके शब्द अपनाने मे क्या बुराई हैं.

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Pankaj Bengani
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2008/6/27 Rajesh Roshan <rajr...@gmail.com>:

Rajesh Roshan

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Jun 27, 2008, 7:31:18 AM6/27/08
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रोटी की अंग्रेजी हैं Chapati और Rail मतलब पटरी, Train मतलब ये आपका लम्बा वाला नाम जिसे मैं कभी उपयोग नही कर पाउँगा.

2008/6/27 Pankaj Bengani <pben...@gmail.com>:

Sarathi Hindi Blog

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Jun 27, 2008, 7:45:44 AM6/27/08
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प्रिय राजेश, (एवं अन्य मित्रगण)
 
मेरा कहना यह नहीं था कि हिन्दी में  जबर्दस्ती, अर्थहीन,
या क्लिष्ट शब्द गढे जायें. बल्कि मेरे कहने का तात्पर्य यह
था कि जहां आसान हिन्दी शब्द गढे जा सकते हैं वहां जबर्दस्ती
अंग्रेजी का प्रयोग करने की जरूरत नहीं है.
 
अंग्रेजी से खौफ या नफरत की बात नहीं है. बात एतिहासिक
तथ्यों पर आधारित है -- कि जो भी समूह गैर भाषा के समक्ष हीन
भावना से नतमस्तक हो जाता है वह अपनी मातृभाषा को बर्बाद
कर देता है.
 
मेरा अनुमान है कि कम से कम हिन्दी चिट्ठाजगत में
जो हिन्दीप्रेमी एवं प्रचारक हैं उनमें से कोई भी अंग्रेजी से
नफरत नहीं करता है. लेकिन वे लोग अनावश्यक अंग्रेजीकरण
से हिन्दी को बचाना चाहते हैं.
 
सस्नेह
 
शास्त्री जे सी फिलिप
 
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
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Pankaj Bengani

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Jun 27, 2008, 7:54:34 AM6/27/08
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चपाती मूल अंग्रेजी शब्द नहीं है

Pankaj Bengani

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Jun 27, 2008, 7:58:11 AM6/27/08
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मुझे जालोपलब्ध आसान हिन्दी शब्द नही लगा था.

मैं शाष्त्री जी सहमत हुँ कि यदि आसान हिन्दी शब्द गढे जा सकें तो ठीक है, लेकिन ऐसा होता नही है.

दूसरा अंग्रेजी के शब्द ले लेने से हम अंग्रेजी के गुलाम नहीं हो जाएँगे. हम सिर्फ तकनीकी शब्द ले रहे हैं.

एक उदाहरण देखिए... उर्दु में वैज्ञानिक को कहते हैं साइंसदान तो इसमे उर्दु की क्या गलती. उनके पास शब्द है ही नही तो साइंस+दान मिला दिया.

हिन्दी के पास है तो अच्छा ही है. ना हो तो अपना लीजिए.
क्लिष्ट शब्द क्यों गढे जाते हैं.

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Pankaj Bengani
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2008/6/27 Sarathi Hindi Blog <shastri....@gmail.com>:

Rajesh Roshan

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Jun 27, 2008, 8:09:02 AM6/27/08
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मैंने डिक्शनरी को शब्दकोष नही कहा, मुझे कोई कहे शब्दकोष कहना चाहिए डिक्शनरी नही. तब मुझे लगता है की लोगो को अंग्रेजी से डर लगने लगा है. आज से २०० साल बाद मौसी शब्द का क्या मायने रहेंगे मुझे नही पता. इसलिए क्योंकि तब हम दो और हमारे एक के लिए सरकार को प्रचार नही करना पड़ेगा. दो बहने नही होंगी. मौसी शब्द लुप्त होता चला जाएगा.

भाषा अपने हिसाब और समय के साथ चलती है एपी और हम जरुर उसमे थोड़ा फेर बदल कर सकते हैं लेकिन.... जालोपलब्ध जैसे शब्द नही चल पाएंगे. प्रभाश जोशी जी का अपन जब नही चल पाया तो जालोपलब्ध जैसे शब्द कैसे चलेंगे. अपन शब्द बुंदेलखंड का हिस्सा था और वही रह गया. चलन में नही आ पाया. आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इतनी बड़ी मीडिया जब ऐसे शब्द को गढ़ने में पिछड गई फ़िर.....
 
-----------------------------------
 
पंकज जी फ़िर हमलोगों को लैटिन कि पढ़ाई पढ़नी होगी. अंग्रजी के कई सारे शब्द लैटिन से लिए गए हैं. मूल तो है ही नही ...

2008/6/27 Sarathi Hindi Blog <shastri....@gmail.com>:
प्रिय राजेश, (एवं अन्य मित्रगण)

Pankaj Bengani

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Jun 27, 2008, 8:12:58 AM6/27/08
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Pankaj Bengani
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2008/6/27 Rajesh Roshan <rajr...@gmail.com>:

मैंने डिक्शनरी को शब्दकोष नही कहा, मुझे कोई कहे शब्दकोष कहना चाहिए डिक्शनरी नही. तब मुझे लगता है की लोगो को अंग्रेजी से डर लगने लगा है. आज से २०० साल बाद मौसी शब्द का क्या मायने रहेंगे मुझे नही पता. इसलिए क्योंकि तब हम दो और हमारे एक के लिए सरकार को प्रचार नही करना पड़ेगा. दो बहने नही होंगी. मौसी शब्द लुप्त होता चला जाएगा.

भाषा अपने हिसाब और समय के साथ चलती है एपी और हम जरुर उसमे थोड़ा फेर बदल कर सकते हैं लेकिन.... जालोपलब्ध जैसे शब्द नही चल पाएंगे. प्रभाश जोशी जी का अपन जब नही चल पाया तो जालोपलब्ध जैसे शब्द कैसे चलेंगे. अपन शब्द बुंदेलखंड का हिस्सा था और वही रह गया. चलन में नही आ पाया. आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इतनी बड़ी मीडिया जब ऐसे शब्द को गढ़ने में पिछड गई फ़िर.....
 
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पंकज जी फ़िर हमलोगों को लैटिन कि पढ़ाई पढ़नी होगी. अंग्रजी के कई सारे शब्द लैटिन से लिए गए हैं. मूल तो है ही नही ...

मुझे नही लगता हमे लैटिन, ग्रिक जैसी भाषाएँ पढने की जरूरत है.

अंग्रेजी को वहाँ से उठाने दीजिए.

दूसरी बात क्या आपको लगता है कि ऑनलाइन शब्द लैटिन है?? यदि नहीं तो चिंता ना करें हमे लैटिन पढने की जरूरत नहीं है. हमें अंग्रेजी पढने की भी जरूरत नही हैं. मेरी दादीमाँ ने अंग्रेजी का A भी नही सिखा था, उन्हे पता था कि टेलिफोन क्या होता है.


Anunad Singh

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Jun 27, 2008, 9:47:52 AM6/27/08
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तकनीकी एवं वज्ञानिक शब्द किसी भी भाषा के हों, वे उस भाषा में गढ़े जाते हैं, उछाले जाते हैं और बार-बार प्रयोग करने के कारण वे 'सहज' लगने लगते हैं। दूसरी बात यह है कि तकनीकी शब्द अपने-आप में स्वयंस्पष्ट किंचिद ही होते हैं। उनकी परिभाषा ही उनका वास्तविक अर्थ स्पष्ट करती है।


मेरा डर  दूसरा है। बिना बिचारे किसी भाषा के तकनीकी शब्दों को ले लेना हमारी भाषायी रचनात्मकता को पंगु भी बना सकता है। किसी वज्ञानिक एवं तकनीकी अवधारणा ( कांसेप्ट ) के लिये नये शब्द गढ़ना एक बहुत अच्छी रचनाशीलता है और विकसित देश इसमें माहिर हैं।

हमारी रचनात्मकता इतनी पंगु हो चुकी है कि हम  दूसरों के रचे हुए रूपक, मुहावरे एवं नारे  ही प्रयोग करने लगे हैं।  भाषा एक नदी के समान 'प्रवाहमान'  हो यह अच्छी बात है। किन्तु इसका अनियन्त्रित प्रवाह  तबाही मचा सकता है। जिस प्रकार किसी फ़सल की सुरक्षा के लिये उसमें साथ-साथ उगे खर-पतवारों को समूल निकालकर बाहर किया जाना जरूरी होता है, उसी प्रकार अपनी भाषा के साथ भी करना चाहिये (मार्क ट्वेन की तरह यह मत कहियेगा कि खर भी बहुत उपयोगी होते है, वे सही स्थान पर होने चाहिये।)

सारांश रूप में मेरा विचार यह है कि सतत अपनी भाषा में तकनीकी अवधारणाओं (कांसेप्ट्स) के लिये नये शब्द गढ़े जाने चाहिये - इससे हमारी रचनाशक्ति प्रखर होती रहती है तथा साथ ही साथ  भाषा  का परिवेश भी नहीं बिगड़ता।  आज ही दुनिया का अन्त नहीं है; हमे आगे भी शब्दनिर्माण करना पडेगा।

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२००८ जून २७ १७:४२ को, Pankaj Bengani <pben...@gmail.com> ने लिखा:

दिनेशराय द्विवेदी

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Jun 27, 2008, 10:39:13 AM6/27/08
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आनन्द जी की बात से पूरी सहमति है, लेकिन गढ़े गए शब्दों को स्वीकार करना या न करना किसी भाषा समूह के सदस्यों के उस शब्द के उपयोगकर्ताओं के बहुमत पर निर्भर करता है। उन के द्वारा स्वीकार किए जाने पर ही गढ़े गए शब्द प्रचलन में आना संभव है, और समूह अपेक्षाकृत आसान शब्दों को ही प्रचलन में लाता है।
अंतिम स्वीकृति और निर्णय तो जनता ही करेगी। हम तो केवल प्रयास भर कर सकते हैं। पारिभाषिक शब्दावली के अधिकांश शब्द व्यवहार में आने के स्थान पर केवल पुस्तकीय हो कर रह गए हैं।

2008/6/27 Anunad Singh <anu...@gmail.com>:



--
दिनेशराय द्विवेदी, कोटा, राजस्थान, भारत
Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan, http://anvarat.blogspot.com/
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दिनेशराय द्विवेदी

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Jun 27, 2008, 12:15:36 PM6/27/08
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पिछले संदेश मे आनन्द जी को अनुनाद जी पढ़ें।

2008/6/27 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com>:

Debashish

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Jun 28, 2008, 3:33:31 AM6/28/08
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नये पारिभाषिक शब्द गढ़े जाने चाहिये बिल्कुल सही है। भले यह नाइंसाफी लगे मैं यह ठीकरा पुनः सरकारी विभागों पर फोड़ना चाहुंगा। सीडैक जैसी अनेक संस्थायें हैं जिनका इंटरनेट पर नित उपजते नयी शब्दावली से निरंतर साक्षात्कार होता है। नये पारिभाषिक शब्द जो वैज्ञानिक तौर पर भी सटीक हों अगर वे गढ़ें तो आम लोग आसानी से स्वीकार भी करेंगे और उनके सही होने की भी आशंका रहेगी, बशर्ते वे बाबा आदम के ज़माने के शब्दों के प्रयोद से उसे क्लिष्ट बनाकर न छोड़ें।

कई बार अटपटे शब्द सरल होने पर भी मान्य हो जाते हैं, ब्लॉग के लिये चिट्ठा ही लें ले। पर आम लोगों में जो शब्द स्वीकार्य हैं क्या वे कभी औपचारिक रूप से अपनाये जायेंगे? मुझे इसमें संदेह है कि अगले 50 सालों में भी सरकार कभी चिट्ठा शब्द को ब्लॉग के लिये मानक शब्द मानेगी। चिट्ठा तो खैर हम सभी चिट्ठाकारों में प्रचलन में हैं, पर अगर इन शब्दों को रचने के लिये हम केवल विज़डम आफ क्राउड्स का ही सहारा लेंगे तो फिर जालोपलब्ध जैसे बेसिरपैर के शब्दों का बनना रोका जा नहीं जा सकता। मैं निजी तौर पर हर जगह शब्द गढ़ने का पक्षधर नहीं, मसलन "आनलाइन" शब्द का अर्थ "उपलब्ध" से पूर्णतः स्पष्ट नहीं होता। कुछ समय पहले किसी ने "ट्रैकबैक" http://en.wikipedia.org/wiki/Trackback के लिये "विपरीतपथ" शब्द गढ़ लिया, यह बेतुकापन है और कुछ नहीं। क्या विपरीतपथ से ट्रैकबैक के अर्थ से संबद्ध acknowledgment या feedback के तत्व के अंश ज़रा भी झलकते हैं?

हमारा समूह अब काफी विस्तारित है, हम सभी इस विषय में इतना सोच रहे हैं तो क्यों नहीं साझे तौर पर हम ज्ञापन देकर सराकर पर ज़ोर डालें कि अमुक अमुक तकनीकी पारिभाषिक शब्दों का हिन्दीकरण अब ज़रूरी हो चला है। साथ ही सुझाते चलें कि इन श्बदों के फलां फलां हिन्दी शब्दार्थ प्रचलन में है।

अगर सरकार के कान पर जूं रेंगी और शब्द गढ़े भी गये तब भी, जैसा अनुनाद ने लिखा, अपनाये तो वही जायेंगे जो लोगों को सहज लगेंगे और जो अधिक प्रचलन में आ जायेगें। पर मुझे लगता है कि उसी चिंता हमें करनी भी नहीं चाहिये, समय यह निर्णय स्वयं ले लेगा।

2008/6/27 Anunad Singh <anu...@gmail.com>:



--
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Rajesh Roshan

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Jun 28, 2008, 3:41:40 AM6/28/08
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क्या आप लोगो में से कोई हिन्दी के ऐसे शब्द बता सकता है जिसको मीडिया या किसी और ने अंग्रेजी शब्द के बजाय उपयोग किया हो, जो अब सब की जबान में है?

2008/6/28 Debashish <deba...@gmail.com>:

Anunad Singh

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Jun 28, 2008, 3:59:33 AM6/28/08
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".... मसलन "आनलाइन" शब्द का अर्थ "उपलब्ध" से  पूर्णतः  स्पष्ट नहीं होता। '''



मैं फ़िर दोहराना चाहता हूँ कि 'पारिभाषिक शब्द'  अपना अर्थ स्वत: स्पष्ट करने में सक्षम नहीं होते।  जिसने "आनलाइन" शब्द कभी नहीं सुना हो, वह भी इसका अर्थ नहीं बता सकता।  आज शेक्सपीयर जिन्दा हो जाय तो वह भी आनलाइन का सही अर्थ  नही बता सकता।

इन्टरनेट से अनभिज्ञ किसी "आम अंग्रेज" से भी "आनलाइन" का अर्थ पूछा जाय यो शायद वह कहे - "टेलीफ़ोन लाइन या बिजली की लाइन के उपर.."


आलोक कुमार

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Jun 28, 2008, 4:23:50 AM6/28/08
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> का ही सहारा लेंगे तो फिर जालोपलब्ध जैसे बेसिरपैर के शब्दों का बनना रोका जा

बेसिरपैर, आपकी राय में। कृपया "मेरी राय में बेसिरपैर" कहें, सिर्फ़
"बेसिरपैर" नहीं।


मेरी राय में शब्दों का प्रचलन प्रयोक्ताओं से होता है, सरकार या शब्दकोष
निर्माताओं से नहीं।

--
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Sarathi Hindi Blog

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Jun 28, 2008, 4:39:16 AM6/28/08
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एक बात समझ में नहीं आई दोस्तों. आनलाईन जैसा शब्द आप में
से कई को बडा आसान लग रहा है.  इसकी हिन्दी क्यों आप
लोगों को अटपटी लग रही है:
 
On+Line = available on internet
जाल पर उपलब्ध  =  जाल+उपलब्ध
 
सवाल यह है कि आप लोगों को आनलाईन तो बहुत
मधुर लग रहा है लेकिन इसकी सरल हिन्दी
 
जाल+उपलब्ध
 
क्यों कठिन लग रहा है?
 
मुझे बात कुछ समझ में नहीं आई. इसे देबाशिश ने "बेसिरपैर"
का शब्द बताया है. कारण समझ में नहीं आया.
 
जाल+उपलब्ध कैसे बेसिरपैर का शब्द हो गया. यदि यह बे-सिरपैर
शब्द है तो फिर सिरपैर वाल शब्द कैसा होगा ??
 
यदि आप लोग समझा दें तो इस बूढे होती खोपडी को कुछ
तसल्ली मिल जायगी.
 

विनीत

Pankaj Bengani

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Jun 28, 2008, 5:20:06 AM6/28/08
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देबुदा का बैसिरपेर उनकी अपनी राय होनी चाहिए. मेरा अजीबोगरीब मेरी व्यक्तिगत राय है.

अनुनाद जी सही कहते हैं कि प्रयोग होते रहना चाहिए. मैं उम्मीद करूंगा कि शाष्त्रीजी अब जालोपलब्ध शब्द का प्रयोग अवश्य करेंगे.

मैं अपनी बात पर कायम हुँ कि हर शब्द की "हिन्दी" करने की जरूरत नही है.

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Pankaj Bengani
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2008/6/28 Sarathi Hindi Blog <shastri....@gmail.com>:

Rajesh Roshan

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Jun 28, 2008, 5:30:20 AM6/28/08
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वेद प्रताप वैदिक जी ने सार्क का नाम दिया दक्षेस. जिसको अब मीडिया भी उपयोग करती है.

2008/6/28 Pankaj Bengani <pben...@gmail.com>:

Sarathi Hindi Blog

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Jun 28, 2008, 6:00:28 AM6/28/08
to Chit...@googlegroups.com
प्रिय पंकज
 
यहां किसी ने यह नहीं कहा कि "हर" शब्द का हिन्दीकरण
होना चाहिये. बल्कि जो कहा गया उसका सार निम्न है:
 
1. किसी ने आनलाईन के लिये हिन्दी सुझाने को कहा, एवं
मैं ने एक सटीक शब्द सुझाया. आगे वे उपयोग करना चाहे
य न चाहें यह उनके ऊपर है.
 
2. हिन्दी का कोई भी हितैषी "सर्वत्र" हिन्दीकरण की बात नहीं,
बल्कि "जहां तक हो सके" हिन्दी की उपेक्षा न करें की बात
करता है.
 
3. अंग्रेजी से हमारा किसी भी तरह बैर नहीं है, लेकिन
"अनावश्यक" अंग्रेजीकरण से जरूर बैर है.
 
4. अंग्रेजी की तुलना में हिन्दी को निम्न स्थान दिये जाने
से भी बैर है एवं उसका नखशिखांत विरोध करते हैं.

Pankaj Bengani

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Jun 28, 2008, 6:12:59 AM6/28/08
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Pankaj Bengani
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2008/6/28 Sarathi Hindi Blog <shastri....@gmail.com>:
प्रिय पंकज
 
यहां किसी ने यह नहीं कहा कि "हर" शब्द का हिन्दीकरण
होना चाहिये. बल्कि जो कहा गया उसका सार निम्न है:
 
1. किसी ने आनलाईन के लिये हिन्दी सुझाने को कहा, एवं
मैं ने एक सटीक शब्द सुझाया. आगे वे उपयोग करना चाहे
य न चाहें यह उनके ऊपर है.
 
2. हिन्दी का कोई भी हितैषी "सर्वत्र" हिन्दीकरण की बात नहीं,
बल्कि "जहां तक हो सके" हिन्दी की उपेक्षा न करें की बात
करता है.
 
3. अंग्रेजी से हमारा किसी भी तरह बैर नहीं है, लेकिन
"अनावश्यक" अंग्रेजीकरण से जरूर बैर है.
 
4. अंग्रेजी की तुलना में हिन्दी को निम्न स्थान दिये जाने
से भी बैर है एवं उसका नखशिखांत विरोध करते हैं.
 
सस्नेह
 
शास्त्री जे सी फिलिप
 
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
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अच्छी बात है, लेकिन आप मुद्दे को छोडकर कहीं और जा रहे हैं. मुझ पर बातचीत को केन्द्रित मत करिए. मुझे बहुत कम पता होता है वैसे भी. :)

मैं तो अभागा हिन्दी की सेवा भी नहीं कर पाता. :)

हा हा हा...बुरा मत मानिएगा शाष्त्री जी. प्लीज चर्चा आगे बढाते रहिए... मैं अभी अवकाश ले रहा हुँ, फिर मिलुंगा.

अविनाश वाचस्पति

unread,
Jun 28, 2008, 11:45:10 AM6/28/08
to Chit...@googlegroups.com
वैसे शब्‍दों में सिर और पैर की तलाश क्‍यों की जा रही है,
 
इसमें शब्‍द, मात्राएं, व्‍यंजन, छंद इत्‍यादि की खोज की जानी चाहिए.
अवश्‍य ही कोई मांसाहारी है
या पुजारी है देह अंगों का
पर शब्‍दों को तो शाकाहारी ही रहने दें
उसमें सिर पैर की न करें तलाश
वरना अच्‍छे भले शब्‍द भी बन जायेंगे
खोज के बाद त लाब में डूबी लाश
तलाश.
उन्‍हें प्रयोग करने का करें भरपूर प्रयास
न हों हताश न करें हताश
शाबाश भाई शाबाश.
लगे रहो सारे भाई
मुन्‍नू, चुन्‍नू, गुड्डू, टिंकू, डब्‍बू, बब्‍बू.
अविनाश वाचस्‍पति

 

Debashish

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Jun 30, 2008, 12:43:53 AM6/30/08
to Chithakar
आलोक: ज़ाहिर तौर पर मेरे द्वारा लिखे शब्द मेरी और केवल मेरी ही राय
व्यक्त करते हैं। मैं यहाँ केवल अपना ही प्रतिनिधित्व कर रहा हूँ :)

जालोपलब्ध अटपटा शब्द है यह मुझे अपनी व्यावहारिक बुद्धि ने बताया, दीपक
ने व्याकरण की दृष्टि से उसकी अशुद्धि स्पष्ट कर दी। पर हम तो शब्द के
उपयुक्त होने पर चर्चा भर ही कर रहे हैं बस, शास्त्री जी और अन्य इसका
उपयोग बिल्कुल कर सकते हैं, इस पर कौन रोकटोक लगा सकता है? ब्लॉग के लिये
"चिट्ठा" या टैग के लिये "चिप्पी" या क्लिक के लिये "चटका" शब्द की तरह
अगर यह प्रचलित हो गया तो सबकी ज़ुबान पर स्वतः ही होगा। मैं आलोक द्वारा
ईजाद किये यह तीनों ही शब्द इस्तेमाल करता हूँ, जबकि "विपरीतपथ" (जो वैसे
उनका दिया शब्द नहीं है) मुझे अटपटा लगता है।

खैर अपनी बात में मैंने बहस में मुद्दा मुख्यतः पारिभाषिक शब्दों के
"मानकीकरण" का उठाया था जो परे रह गया और मुझे लगता है कि इसके लिये
भाषाविद् और देश की शीर्ष वैज्ञानिक संस्थाओं को अपनी जिम्मेवारी निभानी
चाहिये, यह मानकीकरण हम साधारण नागरिक नहीं कर सकते।

sanjay | जोग लिखी

unread,
Jun 30, 2008, 12:50:45 AM6/30/08
to Chithakar
सभी के विचारों को पढ़ कर मुझे लगा ऑनलाइन के लिए उपलब्ध सर्वाधिक उपयुक्त
मगर फिर भी अधूरा शब्द है. इसमें जाल शब्द जोड़ देने से यह ऑनलाइन का
पर्यायवाची हो जाता है. तो जालोपलब्ध को मैं अपनाता हूँ, देखते है, जबान
पर चढ़ता है या नहीं.

एक-दो साइट पर मुझे उन शब्दो की सूची अंग्रेजी शब्दो के साथ रखनी पड़ी है
जो हम चिट्ठाकारों के लिए आम है. यह सही है की शब्दो के अर्थ पहले लोगो
तक पहूँचाने पड़ते है.

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